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सानिया मिर्जा

   उम्र के लिहाज से ज्यादा प्रतिभावान, दोनों हाथों से रैकेट पकड़कर बैक हैंड शाॅट लगाने वाली, विश्व टेनिस में सबसे तेजी से रैकिंग सुधारने वाली 18 वर्षीय यह बाला भारत में हैदराबाद शहर में जन्मी और बढ़ी। मात्र 18 वर्ष की इस बाला ने अपने खेल से विश्व टेनिस में सनसनी फैला दी है। इस बाला के पास जज्बा है, महत्वकांक्षा है और ऐसी दमखम वाली कलाई है जिसने विशेषज्ञों को भी हैरत में डाल दिया है। उसका जोश टेनिस कोर्ट पर बिजली की चमक पैदा कर देता है। वह रमेश कृष्णन के बाद दुनिया के चोटी के 50 टेनिस खिलाड़ियों में पहुंचने वाली पहली भारतीय है। वह टेनिस की ऐसी उभरती खिलाड़ी है। जो डब्ल्यू. टी. ए. रैकिंग सूची में तेजी से ऊपर चढ़ रही है। पिछले 18 माह में ही वह आश्चर्यजनक ढंग से 264 अंक ऊपर आ गई है।

                बेहद कम उ्र्रम और कम समय में एक के बाद एक कामयाबी, कोर्ट में उतरने के समय हर बार दर्शकों के बीच भारी हलचल, दुनिया भर के स्टेडियमों में उनकी हौसला अफजाई के लिए मौजूद उनके ऐसे प्रशंसकों की बढ़ती फौैज, डब्ल्यू. टी. ए. की वेबसाइट के मुताबिक यह तथ्य कि वे यू.एस. ओपन में तीसरी ऐसी महिला खिलाड़ी थीं, जिनकी सबसे ज्यादा तस्वीरें खींची गईं। जिन्दगी तथा टेनिस के प्रति एकदम नया नजरिया, नाक तथा कान की बालियों का शौक और जोरदार संदेश वाली टी-शर्ट सानिया मिर्जा की खास पहचान है। उनके प्रदर्शन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उनका रवैया है, ंजैसा कि टेनिस स्टार लिएंडर पेस कहते हैं- ’’उनके खेल का एक दिलचस्प पहलू उनकी यह सोच है कि किसी भी खिलाड़ी को हराया जा सकता है।’’

सानिया के चमत्कारिक उत्थान की एक वजह यह है कि उनके पास हमेशा साथ सफर करने वाले कोच जाॅन फैरिंगटन हैं, जो टेनिस के दिग्गज हैं और पिछले दो दशक से कोच हैं, वे अपने शार्गिद को चोटी की 10 खिलाड़ियों में लाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

                सानिया मिर्जा ने फरवरी 2004 में अपने गृह नगर हैदराबाद के दर्शकों के सामने अपना पहला डब्ल्यू. टी. ए. खिताब जीता – युगल का ताज। फ्रेंच ओपन में उन्होंने सीधे ग्रैण्ड स्लैम में प्रवैश लेने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रच दिया। सानिया ने अपना पहला टूर्नामेेंट भारत में 2002 में आइ. टी. एफ. वुमन सर्किट में खेला- वे तब मात्र 14 साल की थीं। उन्होंने नौ मैचों में उस समय 6 में जीत दर्ज की।

                सानिया ने छः साल की उम्र में तब टेनिस खेलना शुरू किया था जब उनके माता-पिता प्रिंटिग प्रेस चलाते थे। वे गर्मी की छुट्टियों के दौरान उन्हें टेनिस सिखाने ले जाते थे। सानिया ने एक साल से भी कम समय में अपने कौशल को निखार लिया। जब वे 12 साल की थीं तो उन्होंने अंडर-14 और अंडर-16 की राष्ट्रीय चैम्पियनशिप जीतीं। तभी उन्होंने टेनिस को अपना करिअर बनाने का फैसला कर लिया। जब वे मात्र 11 साल की जूनियर खिलाड़ी थीं तभी जी. वी. के. गु्रप ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया और वह उनका पहला प्रायोजक बन गया। प्रोमोटर जी. वी. कृष्ण रेड्डी, जो खुद टेनिस खिलाड़ी हैं, कहते हैं – ’’हममें से कुछ लोगों ने उनका खेल देखा और उन्हें समर्थन देने का फैसला कर लिया।’’

                सानिया ने उम्र के लिहाज से कहीं ऊंची प्रतिभा का परिचय दिया है लेकिन अंततः उनके भविष्य का फैसला इस आधार पर होगा कि अपनी शोहरत, दबाव, खामियों और वरीयता क्रम में अपने से ऊपर के खिलाड़ियों से मैदान में कैसे निपटती हैं। फिलहाल, दुनिया भारतीय खेल जगत की इस सनसनी का दिल खोलकर स्वागत कर रही है।

जातिवाद की समस्या

गाीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ’चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।’ अर्थात चार वर्ण-बा्रहाण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-गुण एवं कर्म के आधार पर मेरे द्वारा रचित हैं। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी कहा है- ’मनुष्य जन्म से नहीें, वरन कर्म से बा्रहाण या शुद्र होता है।’ पहले बा्रहाण का पुत्र व्यवसाय करता था, तो वह वैश्य हो जाता था। सभी आपस में मिलजुल रहते थे। पर, कुछ कट्टर जातिवादियों ने इसके मूल स्वरूप में परिवर्तन ला दिया। धीरे-धीरे यह विभाजन कर्म के अनुसार न होकर जन्म के आधार पर होने लगा। शूद्र पुत्र को क्षत्रिय का कार्य करने की प्रवृत्ति रखने पर भी शूद्र का ही कार्य करना पड़ता था। जाति के बाहर विवाह करना या अन्य जाति वालो के साथ रहन-सहन करना धर्म-विरूद्ध घोषित कर दिया गया, जिससे समाज में भाईचारे का सम्बन्ध खत्म हो गया और जातिवादी झगड़े होने लगे। यहीं से जातिवाद की गलत परम्परा चह पड़ी। मध्यकालीन भारत में यह जातिवाद सुरसा की तरह मुंह फैलाए हुए था।

जातिवाद देश के विकास में सबसे बड़ा बाधक है। इसके सहारे जहां एक ओर प्रतिभाहीन व्यक्ति ऊंचे-ऊंचे पदों को सुशोभित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिभावान दर-दर की ठोकरें खाते-फिरते हैं। इससे राष्ट्रीय क्षमता का हृास होता है। देश अन्तर्राष्ट्रीय स्पद्धाओं में पिछड़ जाता है। सामाजिक एकता के स्थान पर समाज खण्ड-खण्ड हो जाता है। देश की आजादी खतरे में पड़ जाती है। राष्ट्र कवि दिनकर ने जाति व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए लिखा है-  भारत को सुखी और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए जातिवाद का समूल विनाश आवश्यक है। इसके लिए चलचित्र, साहित्य, प्रेस, अखबार, टेलिविजन आदि प्रचार-साधनों के द्वारा जाति विरोधी प्रचार करना आवश्यक है। अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सरकार द्वारा अस्पृश्यता एवं छूआछूत को राष्ट्रीय अपराध घोषित किया जाना चाहिए। अगर सरकारी नीति ऐसी है भी तो व्यवहार में यह कहीे दिखता नहीं है, बल्कि सरकार में शामिल नेता जातिवाद को और प्रश्रय देते हैं। वे जातिवाद को अपनी राजनीतिक सफलता के लिए हथकण्डा बनाते हैं। अभी वर्तमान में जो स्थिति है उससे तो यही मालूम पड़ता है कि भारत से जातिवाद कभी विदा नहीे हो सकता । अब भी बहुत से ऐसे मंदिर हैं, जहां हरिजनों का प्रवेश वर्जित है। बहुत-सी ऐसी जातियां हैं जिसकी छाया से भी उच्च वर्ग के लोग परहेज करते हैं। आज के परिवेश में वे नेता कितने निर्लज्ज हैं जो जातीय सम्मेलन आयोजित करते हैं। इसके समापन के लिए सभी राजनीतिक दलों, समाज-सुधारकों, धार्मिक संस्थाओं एवं स्वयंसेवी एवं सामाजिक संस्थाओं को कारगर प्रयास करना चाहिए। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी, विनोबा भावे के बताए मार्ग पर चलकर ही इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। आम चुनावों में नेताओं द्वारा जात-पात का नारा दिया जाता है। सरकार को इसे कानूनी रूप से रोकना चाहिए। पंÛ जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में-’’भारत में जाति-पाति प्राचीन काल में चाहे कितनी भी उपयोगी क्यों न रही हो, परन्तु इस समय सब प्रकार की उन्नति के मार्ग में भारी बाधा और रूकावट बन रही है। हमें इसे जड़ से उखाड़कर अपनी सामाजिक रचना दूसरे ही ढंग से करनी चाहिए।’’

                सारांशतः जातिवाद भारत के माथे पर कलंक है। इसे मिटाकर ही इस अखण्ड एवं शक्तिशाली भारत की कल्पना कर सकते हैं। सुमित्रानंदन पंत की इन पंक्तियों से भी यही भाव उजागर होता है-

सेतुसमुद्रम परियोजना

सेतुसमुद्रम नौवहन परियोजना ;ैमजनेंउनकतंउ ैीपच ब्ंदंस च्तवरमबज.ैैब्च्) भारत और श्रीलंका के बीच एक परियोजना है। भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र की गहराई बढ़ाकर इस मार्ग को नौवहन योग्य बनाने की परियोजना के तहत तमिलनाडु में कोडैकनाल के तट से 45 कि.मी. दूर खाड़ी में खुदाई का काम प्रारम्भ हो चुका है।

लगभग 100 साल पुरानी सेतुसमुद्रम परियोजना को केन्द्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद ही यह काम शुरू हो सका। इस पर 2427.40 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना के तहत भारत और श्रीलंका के बीच स्थित पाक-जलडमरूमध्य से होकर चैनल की खुदाई की योजना है जिससे भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तटों में आने-जाने वाले जलपोतों को श्रीलंका का चक्कर लगाकर नहीं जाना पडे़गा बल्कि वे सीधे जा सकेंगे। इससे जलपोतों को 424 नाॅटिकल मील (780 कि.मी.) दूरी की बचत के साथ-साथ यात्रा के दरम्यान लगभग 30 घंटे समय की बचत भी होगी। सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह परियोजना काफी लाभदायक सिद्ध होगी। नौ सैनिक तथा सीमा सुरक्षा गार्ड अब श्रीलंका का चक्कर लगाकर जाने की बजाय सीधे गश्त लगा सकेंगे।

इस परियोजना के तहत बंगाल की खाडी़ (ठंल व िठमदहंस) और मन्नार की खाड़ी (ळनस िव िडंददंत) के मध्य भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में समुद्र के भीतर चट्टानों को काटकर जल की गहराई बढ़ाकर नौवहन योग्य चैनल का निर्माण किया जाना है। स्वेज नहर और पनामा नहर की तर्ज पर बनाए जाने वाले इस नौवहलनीय जलमार्ग का निर्माण पूर्ण होने पर भारत के पूर्वी व पश्चिमी तटों के बीच नौवहन के लिए पोतों को श्रीलंका का चक्कर नहीं लगाना पडे़गा।

वास्तविकता यह है कि इस परियोजना की परिकल्पना सौ साल से अधिक पहले इंडियन मैरींस के कमाण्डर ए.डी. टेलर ने सन् 1860 में की थी। अनुमान है कि इस परियोजना को पूरा होने में तीन साल का समय लगेगा। यों तो यह आर्थिक रूप से फायदे वाली परियोजना का चैतरफा विरोध हो रहा है। विरोध में जो मुद्दे सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं-

–            क्या परियोजना में मन्नार की खाड़ी के नाजुक जैव क्षेत्र के बारे में दी गई पर्यावरणविदों की चेतावनी पर ध्यान दिया जा रहा है?

–             क्या केन्द्र सरकार ने समुद्री जीवन पर परियोजना के पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है जिससे यह हमेशा के लिए बर्बाद हो सकता है?

–             क्या परियोजना में जीवित मूंगे की खूबसूरत चादर और मैन्ग्रोव ईकोसिस्टम पर ध्यान दिया गया है?

–             क्या मछुआरों के विस्थापित होने की स्थिति पर विचार किया गया है ?

इस  परियोजना का विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि इस परियोजना से मन्नार की खाडी़ का समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाएगा। जैव विविधता भी स्थायी रूप से प्रभावित होगी और परंपरागत मछुआरों के लिए रोजी-रोटी के लाले पड़ जाएंगे। वास्तव में मन्नार की खाडी़ जीवित वैज्ञानिक प्रयोगशाला का काम करती है, जिसका राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय महत्व है। सागर विज्ञानियों के मुताबिक अगर यह मान भी लिया जाए कि परियोजना मेंक सभी बातों का ध्यान रखा जाएगा और खुदाई की गतिविधियों से पर्यावरण को नुकसार नहीं पहुंचेगा तो भी जहाजों की आवाजाही में वृद्धि होने से नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाएगा। समुद्री अध्ययन विज्ञानी डाॅ. अरण्यचलम कहते हैं-’’सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जहाज बंदरगाह में प्रवेश करने से पहले गंदा पानी छोड़ता है जिसमें विदेशी प्रजाति के जीव और अंडे होते हैं। ये जीव मन्नार की खाडी़ में भी आ सकते हैं और यहां के पौधे, प्राणियों और दूसरी चीजों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।’’

इन विरोधों के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने हाल में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों के अध्ययन के लिए आठ सदस्यीय समिमि का गठन किया है। यह समिति समय-समय पर संबंधित संस्थाओं को परियोजना के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी देगी।

पर्यावरणवादियों की आपŸिायां दर्ज कराई हैं। उनका विरोध इन बातों पर है-

–             सुखा सहित जलवायु में बदलाव की आशंका

–            पŸानों में बाढ़ की संभावना

–             समुद्र के अपरदन की आशंका

चूंकि मन्नार की खाड़ी एवं बंगाल की खाडी़ में जलस्तर भिन्न है और परियोजना के पूरा होने के बाद धारा प्रवाह में बदलाव आएगा, इसी से श्रीलंकाई तटीय भूमि पर बाढ़ की संभावना बनी रहेगी। पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होने के कारण जलवायु भी परिवर्तित होगी और परियोजना से कोलंबो पŸान के अन्तर्राष्ट्रीय परिवहन पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा।

एकता का महत्व

एक होने के भाव को ‘एकता’ कहते हैं। किसी काम को करते समय हाथ की पांचों उंगलियों का एक होना, तिनकों को मिलाकर रस्सी का निर्माण, ईंटों के संयोग से दीवार का निर्माण, कुछ व्यक्तियों के मेल से परिवार का निर्माण एवं छोटे-छोटे राज्यों के संयोग से एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण इत्यादि एकता के कुछ दृष्टान्त हैं। यदि मानव परस्पर पृथक-पृथ्क होकर विचार एवं कार्य करे तो उसकी प्रगति असम्भव है एवं उसका पालन धु्रव सत्य है। अतः व्यक्ति को मन, वचन और कर्म से एक होकर कार्य करना चाहिए। यही एकता है।

एकता के महत्व से सम्बन्धित अनेक लोकोक्तियां प्रचलित है। यथा- संघे शक्तिः कलौयुगे; दस की लाठी एक का बोझ; अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इत्यादि। एक तिनके की क्या हस्ती लेकिन जब वही तिनका संगठित होकर रस्सी बन जाता है। तब इससे बलशाली हाथी भी बंध जाता है। एक ईट की क्या बिसात लेकिन, जब यही ईट मिलकर दीवार बनती है, तब उसे तोड़ना मुश्किल हो जाता है। एक बूंद जल का क्या अस्तित्व लेकिन जब इन्हीं बूंदों के मेल से सागर का निर्माण होता है तो उसे लांघना दुष्कर हो जाता है। एक चीटीं की क्या औकात। लेकिन जब यही चीटीं एकजुट हो जाती है तब अपने से बड़े आकार के जीवों को चट कर जाती है।एकता के महत्व से सम्बन्धित एक किसान, उसके बच्चे और लकड़ी के टुकड़ों की कथा प्रचलित है। लकड़ी के टुकड़े जब अलग-अलग रहते हैं।, तब बच्चों द्वारा वे आसानी से तोड़ दिए जाते हैं। परन्तु वे ही टुकड़े जब संगठित होकर गट्ठर बन जाते हैं। तब बच्चे उसे तोड़ नहीं पाते हैं, इन दृष्टान्तों से स्पष्ट है कि एकता में ही बल है।ेे

अ्रंगेजी में एक कहावत है- संगठित होने पर हम खड़े होंगे और असंगठित होने पर बिखर जाएंगे। इतिहास साक्षी है- जब-जब हमारी एकता विखण्डित हुई है, तब-तब हम पराधीन हुए हैं और जब-जब हम संगठित हुए हैं, दुश्मन को भागना पड़ा है। कौरवों और पाण्डवों की आपसी फूट के कारण इतना बड़ा महाभारत हुआ। विभीषण की एक फूट के कारण ही रावण जैसे शक्तिशाली राजा का विनाश हुआ। पृथ्वीराज और जयचन्द की फूट के कारण ही हमारा देश विदेशियों का गुलाम बना। ठीक दूसरी ओर एकताबद्ध भारत ने चन्द्रगुप्त और चाणक्य के नेतृत्व में विश्व विजयी सिकंदर का मान-मर्दन किया। नेपोलियन के नेतृत्व में संगठित फ्रांस ने यूरोप पर कब्जा जमाया। द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजित अणु बमों से ध्वस्त जापान एकता के कारण ही आज विश्व की एक शक्ति है। गांधी जी के नेतृत्व में जब सारा हिन्दुस्तान एक हो गया, तब अंग्रेजों को भागना पड़ा और हमें स्वतंत्रता मिली।

लेकिन आज जातीयता, साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रीयता हमारी एकता की नींव को भीतर ही भीतर खोखली करती जा रही है। आज जगह-जगह जातीय हिंसा एवं अगड़े-पिछड़े के बीच दंगों से हमारी शक्ति बिखर रही है। राष्ट्रीय एकता की लौ मद्धिम पड़ती जा रही है। इसी फूट के कारण एक दिन विदेशी हमारे शासक बन बैठे थे। हम पुनः गुलाम न बन जाएं, इसके लिए हमें पहले से ही सचेष्ट रहना चाहिए। यह तभी सभ्भव है, जब हम भारतवासी क्षुद्र स्वार्थपरक राजनीति से ऊपर उठकर घर की फूट को रोकें।

सेंसर बोर्ड की भूमिका

 ज्ञातव्य है कि भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है। सांस्कृतिक क्षेत्र में फिल्म निर्माण एवं प्रदर्शन का स्थान महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि जनतंत्र में यह सर्वाधिक प्रशंसित विधा है। जनता के राय-निर्माण और उन्हें जानकारियां उपलब्ध कराने मंे, उनके जीवन और परंपराओं को समझने में फिल्मों की उल्लेखनीय भूमिका होती है। लोगों के विचारांे और सोच को प्रभावित करने की क्षमता जितनी फिल्मों में है उतनी अन्य किसी माध्यम में नहीं। वस्तुतः फिल्में भारतीय जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई हैं। भारत में प्रेस स्वतंत्र है और यही स्वतंत्रता फिल्मों को भी हासिल है। यह सरकारी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्र उद्यम है। सिनेमा अथवा प्रेस को संविधान में अलग से सूचीबद्ध नहीं किया गया है। प्रेस और सिनेमा संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल हैं। जिनमें बोलने और अभिव्यक्ति (अनुच्छेद 10 (1) (क) में वर्णित) की स्वतंत्रता को शामिल किया गया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है अपने विचारों को वाणी, लेखन, चित्रकला अथवा फिल्म सहित किसी अन्य तरीके से व्यक्त करने की स्वतंत्रता।

                मीडिया हमारे देश में आजाद है लेकिन फिल्म के संदर्भ में यह आवश्यक समझा गया कि बाजार में प्रदर्शित किए जाने से पूर्व एक बार उनकी जांच कर ली जाए। ऐसा इसलिए कि दृश्य-श्रव्य (।नकपव.टपेनंस) माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव मुद्रित सामग्री की बनिस्बत काफी अधिक होता है। फिल्म विचारों और गतिविधियों को प्रेरित करती है तथा अधिक ध्यान आकर्षित करती हैं। हमारे देखने और सूनने की इंद्रियों को इसका प्रभाव एक साथ उद्वेलित करता है। पर्दे पर तीव्र प्रकाश का केंद्रण तथा तथ्यांे और विचारों की नाटकीय प्रस्तुति उन्हें अधिक प्रभावशाली बनाती है। सिनेमाघर के धुंधलके में अभिनय और आवाज, दृश्य और ध्वनि का संगम एकाग्रता भंग करने वाले सभी कारकों को नष्ट करते हुए दर्शकों के मस्तिष्क पर स्पष्ट प्रभाव डालता है। इसलिए कहा जा सकता है कि फिल्मों में भावनाओं को आहत करने की जितनी क्षमता है उतनी ही बुरा करने की भी। इन्हीं विशेषताआंे के आलोक में, खासकर इस तथ्य के मद्देनजर कि आमतौर पर दर्शक सिनेमा की अंतर्वस्तु के चयन को लेकर सतर्क नहीं होते, इस माध्यम की तुलना अन्य माध्यमों से नहीं की जा सकती। इसीलिए, समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की तरह इसे स्वच्छंद रूप से प्रदर्शित नहीं किया जा सकता और उनकी सेंसरशिप न केवल अपेक्षित, बल्कि अनिवार्य हो जाती हैं।

                भारत में फिल्मों का प्रदर्शन केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा उन्हंे प्रमाणित करने के बाद ही किया जा सकता है। बेरोक-टोक सभी वर्ग के दर्शकों को दिखाई जाने योग्य फिल्मों को ‘यू’ प्रमाणपत्र दिया जाता है। जिन फिल्मों को 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को न दिखाने योग्य माना जाता है, उन्हें ‘यू/ए’ प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। केवल वयस्कों को दिखाई जा सकने वाली फिल्मों को ‘ए’ प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए अनुपयुक्त फिल्मों को प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाता है।

                केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का गठन 1952 के अधिनियम तथा सिनेमेटोग्राफ (प्रमाणन) विनियम 1993 के अनुरूप किया गया। वर्तमान समय में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलोर, गुवाहाटी, तिरूवनन्तपुरम, कटक तथा नई दिल्ली में नौ क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो फिल्म निर्माण के केन्द्रीय तथा उदयमान केन्द्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इस तरह बोर्ड पूरी तरह से एक विकेन्द्रीकृत संस्था है जो भारत जैसे देश की विविधता के अनुरूप है। प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य भी विभिन्न विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ताकि समाज मंे व्याप्त विभिन्न दृष्टिकोणों और विचारों का फिल्म प्रमाणन के क्रम में प्रतिनिधित्व कर सकें।

                बोर्ड में फिल्मों की जांच और संशोधन की दो अलग-अलग समितियां होती हैं। इनसे फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया द्विस्तरीय हो जाती हैं। जांच समिति में विचार-मतभेद होने की स्थिति में अथवा उनके निर्णय से आवेदक के असंतुष्ट होने की हालत मेें फिल्म को संशोधन समिति के पास भेजा जाता है। बोर्ड के निर्णय के खिलाफ फिल्म प्रमाणन अपीलीय ट्रिब्यूनल मंे अपील की जा सकती है, जिसके उध्यक्ष उच्च न्यायालय के आवकाश प्राप्त न्यायाधीश होते हैं। प्रमाणन संबंधी नियम विदेशी फिल्मों, डब की गई फिल्मों तथा वीडियों फिल्मों का प्रमाणन नहीं होता, क्योंकि  दूरदर्शन स्वयं फिल्मों की जांच करता है।

                बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य में सेक्स तथा हिंसा के प्रदर्शन को रोकने हेतु निम्नांकित उपाय किए गए हैं-

–             दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाली भारतीय फिल्मों के टेªलर और गानों को अब प्री-सेंसरशिप के लिए भेजा जाता है।

–             यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक जांच समिति/संशोधन समिति की कम से कम 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएं हों।

–             बोर्ड तथा परामर्शदात्री समिति के सदस्यों को दिशा-निर्देशों का कठोरतापूर्वक पालन करने के लिए कहा गया है।

–             जिन दिशा-निर्देशों का बार-बार उल्लंघन किया जाता है, उनके बारे में स्पष्टीकरण जारी किए गए हैं।

–             किसी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुशंसा करने वाली जांच समिति/संशोधन समिति/फिल्म प्रमाणन अपीलीय ट्रिब्यूनल के सदस्यांे के नाम उसके प्रमाणपत्र पर दिखाए जाते हैं।

इधर सिनेमा संस्कृति की पांरपरिक दृष्टि में बदलाव आ रहा है और अधिक बोल्ड तथा लीक से हटकर विषयों पर फिल्में बनाई जा रही हैं। नागरिक अधिकार संगठन भी काफी सक्रिय हो उठे हैं और फिल्मकारों से बच्चों के साथ दुव्र्यवहार, महिलाओं की घिसी-पिटी छवि की प्रस्तुति, पशुओं के प्रति क्रूरता आदि जैसे विषयों पर निरंतर संवाद कर रहे हैं। इन सब कारणों से सेंसरशिप का कार्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। हर वक्त तेजी से परिवर्तनशील समाज की नब्ज पर ध्यान रखना जरूरी हो गया है। लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि दर्शकों के लिए क्या उपयुक्त है और क्या नहीं, इसका निर्णय कौन करे? इस सवाल का उत्तर आसान नहीं है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि संेसरशिप को समाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। इसका मकसद मनमाने तरीके से कैंची चलाकर खेल खराब करना न हो, बल्कि फिल्मों की इस तरह जांच करना हो कि दर्शकों की संवेदनाएं आहत न होने पाएं, यही सबसे बड़ी चुनौती है।

G8 शिखर सम्मेलन

विश्व के 8 प्रमुख औद्योगिक लोकतंात्रिक देशों का समूह G 8 के नाम से जाना जाता है। इसके सदस्य देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, इटली, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, व रूस। इसके गठन की शुरूआत 1975 में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी व फ्रांस ने न्यूयाॅर्क में G5 से की। कुछ दिनों बाद इटली के शामिल होने से यह G6 हो गया। 1976 में कनाडा और रूस (जो पहले सिर्फ डायलाॅग पार्टनर थे) इसमें शामिल नहीं थे, 1998 में इसमें शामिल हो गये और G6 पुनः G 8 हो गया। इस समूह की वार्षिक बैठक होती है, जिसमें सदस्य देश पारस्परिक हितों, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति व अर्थव्यवस्था, तृतीय विश्व के देशों की समस्याएं, विश्व शांति एवं सुरक्षा तथा विज्ञान और तकनीकी प्रसार जैसे विषयों पर विचार विमर्श करते हैं तथा इनसे संबंधित कार्यक्रमों को लागू करने की योजना बनाते हैं। 2000 में जापान में नागो-ओकीनावा में सम्पन्न इस समूह की बैठक में गरीब देशों के ऋण को माफ करने का निर्णय किया गया। 2005 में स्काॅटलैंड के ग्लेनिंगलन में आयोजित शिखर सम्मेलन में पांच प्रमुख विकासशाील देशों को बैठक में भाग लेने क लिए आमंत्रित किया गया। ये देश थे- भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और मैक्सिको।

8-10 जुलाई 2005 को विश्व के आठ सर्वाधिक औद्योगीकृत एवं समृद्ध देशों का शिखर सम्मलेन स्काॅटलैंड के ग्लेनिंगलन में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में 5 आमंत्रित देशों के सदस्यों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्रसंघ, विश्व बैंक तथा विश्व व्यापार संगठन के प्रमुखों ने भी हिस्सा लिया।

इस शिखर बैठक में वैसे तो बातचीत के मुख्य मुद्दे अफ्रीकी देशों में छाई व्यापक गरीबी, स्वच्छ ऊर्जा का विकास, सतत विकास और ग्लोबल वाॅर्मिंग का मुद्दा प्रमुख था, लेकिन लंदन में हुए आतंकवादी हमले के बाद आतंकवाद का मुद्दा इस सूची में सबसे ऊपर आ गया। इस विशेष परिस्थिति में सबसे अधिक फायदा अमेरिका के राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश को हुआ जिनकी इच्छा के मुताबिक ग्लोबल वाॅर्मिंग का मुद्दा दब गया। आतंकवादी हमले की ओट में उन्होंने ग्लोबल वाॅर्मिंग को सामान्य मुद्दा बना दिया।

पारम्परिक तौर पर G 8 का मेजबान देश समझौते के लिए एजेंडा तय करता है, जिस पर सम्मेलन के अंत में सहमति के आधार पर संयुक्त बयान जारी किया जाता है। लेकन 2005 के शिखर सम्मेलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने प्राथमिकताओं को तय किया, जिसमें अफ्रीका के आर्थिक विकास को (गरीब देशांे का ऋण माफ करने तथा सहायता राशि बढ़ाकर) तथा ग्लोबल वाॅर्मिंग को उच्च प्राथमिकता दी गई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने क्योटो प्रोटोकाॅल से भी आगे बढ़कर एक योजना तैयार की थी, जिसके अन्तर्गत कुछ चुने हुए विकासशील देशों को शामिल न करके उनको ग्रीन आउस गैसों को कम करने के बदले में स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलाॅजी स्थानांतरित करने के बात थी। लेकिन 7 जुलाई को लंदन में हुए बम धमाकों से प्राथमिकता पर आतंकवाद आ गया।इस शिखर सम्मेलन में समझौते के मुख्य बिन्दु इस प्रकार थे-

 2010 तक विकासशील देशों के लिए 50 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की सहायता जिसमंे 25 बिलियन अमेरिकी डाॅलर अफ्रीका को दिए जाएंगे।
 2010 तक अफ्रीका में एंटी-एचआईवी दवाओं तक सामान्य लोगों की पहुंच कायम करना।
 अफ्रीका के लिए 20,000 शांति सैनिकांे को प्रशिक्षण देना। बदले में अफ्रीका अच्छे शासन तथा प्रजातंत्र के लिए वचनबद्धता दिखाएगा।
 G 8 के सदस्य देश 2010 तक जीडीपी का 0.56 प्रतिशत तथा 2010 तक जीडीपी का 0.7 प्रतिशत विदेशी सहायता के रूप में देंगे।
 व्यापार में बाधा पहंुचाने वाले टैरिफ तथा सब्सिडी को कम किया जाएगा।
 फिलिस्तीन को आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए 3 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की सहायता।

ब्रिटेन की पहल पर G 8 देशों ने वर्षों से गरीबी झेल रहे अफ्रीकी देशों के लिए 40 बिलियन डाॅलर के कर्ज माफ कर देने की बात पर सहमति व्यक्त की गई यह भी तय किया गया कि अफ्रीका को दी जाने वाली सहायता को 2010 तक दुगुना कर दिया जाए। यह भी तय हुआ कि सहायता में की जाने वाली वृद्धि 2004 के स्तर के आधार पर मापी जाएगी। साथ ही अफ्रीकी शांति सैनिकों को संघर्ष रोकने के अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

सम्मेलन के दौरान जलवायु परिवर्तन से जुडे़ ग्लोबल वाॅर्मिंग के मुद्दे पर अमेरिका के अन्य देशों के साथ मतभेद खुलकर सामने आ गए। सम्मेलन के अंत मंे कोई ठोस प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका।
विश्व में भारत को अब आर्थिक शक्ति के रूप में पहचन मिलने लगी है तथा इसी वजह से आज भारत के साथ आर्थिक संबंधांे को प्रगाढ़ करने का प्रयास लगभग सभी आर्थिक शक्तियों, देशों तथा क्षेत्रीय-संगठनों द्वारा किया जा रहा है। G 8 भी भारतीय बाजार तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है। G 8 देशों के साथ भारत के व्यापार की स्थिति इस प्रकार है-

 भारत और G 8 देशों के बीच व्यापार में वर्ष 2004-05 के दौरान 17 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
 भारत और G 8 देशों के बीच 2004-05 के दौरान 48 बिलियन डाॅलर का व्यपार किया गया।
 विश्व के साथ किए जाने वाले कुल व्यापार का 25 प्रतिशत व्यापार भारत G 8 देशों के साथ करता है।
 G 8 के देशों को वर्ष 2004-05 में भारत द्वारा अपने कुल निर्यात का 33.6 प्रतिशत निर्यात किया गया।
 लेकिन इन देशों में किए जाने वाले आयात की मात्रा वर्ष 2003-04 के 22.5 प्रतिशत से घटकर 2004-05 में 20 प्रतिशत रह गई।

इसी तरह अगर देखा जाए तो भारत तथा G 8 देशों के बीच आपसी व्यापार तथा सहयोग की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं, जिन्हें तलाशने और भुनाने की जरूरत है।

औधोगिकरण

   जिसे अंग्रेजी भाषा में इंडस्ट्रियलाइजेशन कहा  जाता है, उसे ही हिन्दी में उद्योगीकरण कहा जाता है। इसका आशय यह है कि किसी भी देश में वहां के आर्थिक विकास के लिए वैज्ञानिक आधारों पर और विशाल पैमाने पर उद्योग का विकास हो। कारण, आज केवल ग्रामीण अद्योग-धन्धे ही इसके लिए पर्याप्त नहीं कहे जा सकते हैं। कारखानों से उत्पादन भी हो और उत्पादित वस्तुओं को खपाने के लिए बाजार भी हो। तब लाभ यह होगा कि वस्तुओं की मांग बढ़ने से अधिकाधिक उत्पादन हो सकेगा। तब परिणाम यह होगा कि बेकारी की समस्या बहुत हद तक दूर हो सकेगी। पूंजी किसी व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं रहकर कुछ तो कारखानों में व्यय होगी और कुछ पर सरकार का नियंत्रण रहेगा। इससे मजदूरों के शोषण की बात समाप्त होगी। सब लोग अधिक परिश्रम करेंगे और देश उन्नति की ओर अग्रसर होगा। आज भारत में उपर्युक्त कारणों से उद्योगीकरण की अपेक्षा है।

                अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व यहां कच्चे माल का उत्पादन बहुत होता था और फिर दैनिक उपयोग के लिए वस्तुएं भी तैयार होती थीं। लेकिन वैज्ञानिक साधनों को यहां अभाव था और पश्चिमी राष्ट्र इन साधनों को अपनाकर धनी होते जा रहे थे। जब अंग्रेज भारत में आए तब उनका उद्योग केवल इंग्लैण्ड द्वारा निर्मित माल को यहां खपाना था। ग्रामीण उद्योगों की अपेक्षा यह सस्ता भी था और चमकदार भी। अतः अधिकांश व्यक्तियों का ध्यान उधर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। लेकिन भारतीय माल पर टैक्स बढ़ा दिया गया, फलतः उनका निर्यात भी रूक गया और अपने देश में भी महंगा होने के कारण कम प्रयुक्त होने लगा। अंग्रेजी शिक्षा तथा रहन-सहन का प्रसार होने के कारण भारतीय भारतीयता को भूलने लगे। भारतीय आत्मा पर विदेशी आवरण चढ़ने लगा। इंग्लैण्ड निर्मित वस्तुएं भारत में खूब बिकने लगीं। लेकिन अंग्रेजों ने हमारे यहां (भारत में) अपने वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग नहीं किया। भारत में ग्रामीण उद्योग धीरे-धीरे समाप्त हाने लगे तथा भारत अंग्रेजी माल की  मण्डी बन गया। हमें अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रतिपल विदेशी माल की शरण लेनी पड़ी। लेकिन हर्ष का विषय यही है कि आज हम स्वतंत्र है और भारत सरकार उद्योगीकरण के लिए सतत प्रयत्नशील है।

                आज औद्योगिक विकास के लिए अनेक साधन उपलब्ध हैं। हम जिस रूप में चाहें उनका प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं। सर्वप्रथम इनके लिए कच्चे माल की अपेक्षा है। लोहे-कोयले के प्रचुर भंडार भारत में हैं। अतः कारखानों के चलाने में कोई परेशानी नहीं हो सकती। इसके बाद वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग का प्रश्न उठता है। इस सम्बन्ध में अभी हमें अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन यदि इन मशाीनों को मंगाकर यहां काम में लाया जाए तो उत्पादन बढ़ सकता है। अनेक स्थानों पर इस साधनों का अधिकाधिक प्रयोग किया जा रहा है। साथ ही सीमेंट, लोहा-इस्पात, सूती-उद्योग, मशीनों के छोटे-छोटे पुर्जे, हवाई जहाज, बिजली के अनेक सामान भी इन्हीं आधारों पर बनने लगे हैं। इनके अतिरिक्त इसके लिए कुशल मजदूरों की आवश्यकता है और यह तभी सम्भव है जबकि यहां औद्योगिक-शिक्षा का पर्याप्त प्रचार हो। शैशव से ही बच्चे की रूचि-अनुकूल क्षेत्र में विकास के लिए साधन जुटाए जाएं। वैज्ञानिक-साधनों के साथ उनके प्रयोबों की विधियों से भी अवगत होना जरूरी है। जिससे परिस्थिनिवश मशीनादि में कोई त्रुटि होने पर पुनः विदेश दौड़ना न पड़े अन्यथा देश का धन इन्हीं खात्राओं में समाप्त हो जाएगा। देश ने पूंजीपतियों का भी इस ओर (उद्योगीकरण की दिशा में) प्रेरित किया जाना चाहिए। छोटे व्यापार से अधिक लाभ उठाने की उनकी प्रवृŸिा को कम किया जाए। ऐसे बाजारों की भी व्यवस्था की जाए जहां निर्मित माल को बेचा भी जा सके। हमाराी पंचवर्षीय योजनाओं का इसमें बहुत अधिक हाथ है। इन साधनों की व्यवस्था और प्रयोग से जहां हम दैनिक जीवन की अपेक्षित वस्तुओं का प्राप्त कर सकेंगे वहां सैनिक-दृष्टि से भी उद्योगीकरण में सफल हो सकेंगे, क्योंकि गोली-बारूद एवं आयुध आदि वस्तुओं का निर्माण भी देश-रक्षा के लिए आज के युग में आवश्यक है।

                भारत सरकार का कर्तव्य है  िकवह व्यापारियों का मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे। उन्हें उद्योग-विकास की ओर बढ़ने की प्रेरणा दे। शिक्षा का विशेष प्रबन्ध हो और इस प्रकार तैयार माल को देश के कोने-कोने में पहुंचाने का कार्य भी सरकार द्वारा पूरा हो। फलतः हमारा पैसा हमारे ही पास रहेगा तथा हमारी आवश्यकताओं की भी सहज ही पूति हो सकेगी। उद्योगीकरण ही भारत के भावी विकास में सर्वाधिक उपयोगी है।

एफ. एम. रेडियो के लाभ

    स्थानीय बोली में स्थानीय सांस्कृतिक परम्पराओं से सम्बन्धित ढेर सारे कार्यक्रम अब श्रोताओं तक प्रसारित किए जा सकेंगे जिसका प्रसारण-माध्यम होगा-एफ.एम.रेडियो। पहले की भांति अब समय सीमा की वजह से रेडियो तरंगों से स्थानीय सामग्री और संदर्भ वाले कार्यक्रमों का हटाया नहीं जा सकेगा। निजी एफ.एम. (फ्रीक्वेंसी माॅड्यूलेशन) रेडियो स्टेशनों के दूसरे चरण की सरकार की नीति लागू होते ही यह हकीकत सामने आ गई।

                नौवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार का रेडियो के बारे में नीतिगत लक्ष्य विषय वस्तु की विविधता तथा तकनीकी गुणवत्ता  बढ़ाना था। तकनीकी मोर्चे पर जोर मीडियम वेव से हटकर एफ.एम. पर आ गया। कार्यक्रम में सुधार, तकनीकी विशिष्टता के बढ़ाने, पुराने और बेकार उपकरणों के नवीनीकरण और रेडियो स्टेशनों पर नवीन सुविधाएं उपलब्ध कराने पर मुख्य जोर था। उदारीकरण और सुधारों की नीति के अनुरूप सरकार ने लाइसेंस शुल्क आधार पर पूर्ण भारतीय स्वामित्व वाले एफ.एम. रेडियो केंद्र स्थापित करने की अनुमति प्रदान कर दी है। मई 2005 में सरकार ने देश के 40 नगरों में एफ.एम. की 40 फ्रीक्वेंसियों की खुली बोली के द्वारा नीलामी की। सरकार द्वारा निजी भागीदारी के लिए फ्रीक्वेंसियों को खोलने के मुख्य अभिप्रेत थे-एफ.एम. रेडियो नेटवर्क का विस्तार, उच्च  गुणवत्ता वाले रेडियो कार्यक्रम उपलब्ध कराना, स्थानीय प्रतिभा को प्रोत्साहन देना तथा रोजगार बढ़ाना और आकाशवाणी की सेवाओं की सहायता करना एवं भारतवासियों के लाभार्थ देश में प्रसरण नेटवर्क के त्वरित विस्तार को बढ़ावा देना।

                जुलाई 2003 में सरकार ने एफ.एम. प्रसारण के उदारीकरण के दूसरे चरण के लए रेडियो प्रसारण नीति समिति का गठन किया। इस समिति ने पहले चरण से  हासिल सीखें, दूरसंचार क्षेत्र से सम्बद्ध अनुभवों तथा वैश्विक अनुभवों का अध्ययन करने के उपरांत कई सुझाव दिए। इनमें प्राथमिक रूप से प्रसारण क्षेत्र में प्रवेश करने और छोड़ने की प्रविधि, लाइसेंस शुल्क की संरचना, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ने और मौजूदा लाइसेंसधारियों के दूसरे चरण में जाने की विधि सम्बन्धी अनुशंसाएं हैं।

                दुनिया भर में रेडियो प्रसारणों का पसंदीदा माध्यम एफ.एम. ही है। इसकी वजह इसकी उक्त गुणवŸाा वाली स्टीरियोफोनिक आवाज है। इसलिए दसवीं योजना में मीडियम वेव प्रसारण नेटवर्क को, जिसकी पहुंच 99 प्रतिशत आबादी तक है, समन्वित करने के साथ-साथ एफ.एम. की कवरेज को दोगुना करने पर जोर दिया गया। एफ.एम. की कवरेज देश की आबादी के 30 प्रतिशत तक थी। यह सारा का सारा कवरेज तब तक आकाशवाणी के द्वारा किया जा रहा था। इसे दोगुना कर 60 प्रतिशत आबादी का एफ.एम. प्रसारण की कवरेज के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने तथा लाइसेंस की नीलामी की मौजूदा प्रणाली क स्थान पर प्रविधि लाने पर जोर दिया गया। अन्य मुख्य क्षेत्र इस प्रकार रखे गए-20 किलोवाट तक की क्षमता वाले सभी एफ.एम. एवं मीडियम वेव ट्रांसमीटरों को स्वचालित बनाना, सिक्किम सहित सभी पूर्वोŸार राज्यों तथा द्वीप-समूहों में रेडियो की पहुंच का विस्तार और उसे मजबूती देना तथा एफ.एम. के बेहतर प्रसारण और साफ आवाज के कारण उपयोग साक्षरता के प्रसार के लिए करना।

                पहले चरण में 108 फ्रीक्वेंशियों का चालू किया गया था और दो को चालू किया गया ’मान’ लिया था। 40 शहरों के 108 फ्रीक्वेंसियों के लिए सरकार को कुल 101 बोलियां प्राप्त हुई। पहले भाग में वे फ्रीक्वेंशियां शामिल हैं जिन्हें पहले चरण में कवर किए गए नगरों की अन्य फ्रीक्वेंसियां भी शामिल हैं। दूसरे भाग में नए नगरों की फ्रीक्वेंसियों को शामिल किया गया है, जिन्हें अब तक कवर नहीं किया जा सका है।

                नई नीति के तहत देश के 90 नगरों में 336 अतिरिक्त निजी एफ.एम. रेडियो चैनल उपलब्ध होंगे। इन नगरों को ।़ए ।ए ठए ब्ए क्  वर्गों में रखा गया है। इसके अतिरिक्त इग्नू के 36 चैनल तथा 51 अन्य चैनलों को भी शैक्षिक उदेश्यों के लिए रखा गया है। लेकिन समाचार प्रसारण एफ.एम. रेडियो के दायरे से बाहर बना रहोगा। पूर्वोŸार  के आठ शहरों का इस कार्यक्रम के तहत कवर किया जाएगा। इनमें 40 चैनल होंगे, जिनमें से 32 चैनल निजी प्रचालकों द्वारा संचालित किए जाएंगे तथा आठ शैक्षिक उदेश्यों को समर्पित होंगे। इसी तरह, जम्मू-कश्मीर के लिए नौ चैनलों की योजना बनाई गई है, जिनमें से सात पर निजी प्रसारण होंगे तथा दो पर शैक्षिक प्रसारण। ये सभी चैनल श्रीनगर तथा जम्मू में स्थित होंगे।

                नवीन नीति के प्रावधानों के अन्तर्गत इस बात का ख्याल रखा गया है कि कोई एक बड़ा समूह वायु तरंगों पर एकाधिकार न कर ले। कोई भी समूह एक नगर में एक से अधिक एफ.एम. रेडियो स्टेशनों का स्वामित्व नहीं हासिल कर सकता। एक समूह को देश के कुल वायु तरंगों के 15 प्रतिशत से अधिक का स्वामित्व हासिल करने की अनुमति नहीं होगी।

                ’ग’ और ’घ’ वर्ग में आने वाले छोटे शहरों में अधिकाधिक प्रचालकों को आकर्षित करने के मकसद से यहां कार्यरत प्रचालाकों को अपने कार्यक्रम की नेटवर्किंग करने की अनुमति होगी। व उच्च वर्ग के शहरों में स्थित रेडियो स्टेशनों पर अपना विज्ञापन दे सकेंगे तथा उनके कार्यक्रमों का उपयोग कर सकेंगे।

                शैक्षिक महत्व की सामग्री का सही-सही निर्धारण कठिन होने के बावजूद उम्मीद है कि इग्नू के 36 चैनलों सहित कुल 87 चैनल शैक्षिक उ६ेश्य की पूर्ति के लिए प्रसारण करेंगे। वे निचले स्तर पर अनौपचारिक तथा औपचारिक शिक्षा के प्रसार में अपना योगदान देंगे। कुछ लोगों को आशंका है कि ये निजी चैनल आकाशवाणी के साथ स्पद्र्धा करेंगे तथा उनके राजस्व का एक हिस्सा ले जाएंगे। लेकिन इससे श्रोताओं का बेहतर गुणवŸाा वाले कार्यक्रम मिल पाएंगे। वित्तिय हानि यदि हुई भी तो समय के साथ-साथ उसकी भरपाई कर ली जाएगी। इससे स्थानीय प्रतिभा के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

                इन दिशा-निर्देशों के साथ सरकार ने देश में एफ.एम. रेडियो के विकास का वातावरण तैयार करने का गंभीर प्रयास किया है। समय के साथ-साथ इसके वास्तविक विकास का स्वरूप निजी उद्यम पर निर्भर करेगा।

एशियाई खेल प्रतियोगिता

     भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहा और इस गुलामी के कारण हम हर क्षेत्र में पिछड़ते चले गए। क्रीड़ा-क्षेत्र में भी हमारी यही स्थिति रही। लेकिन इन दिनों प्रत्येक क्षेत्र में हमारा विकास हो रहा है और खेलों में भी हम अब दुनिया से बहुत पीछे नहीं चल रहे हैं। बावजूद इस सब के, अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में हमारी उपलब्धि कम है। इसी भावना से आहत और प्रेरित होकर हमारे तत्कालीन लोकप्रिय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई खेल प्रतियोगता की नींव रखने में सक्रिय भूमिका निभाई। एशियाई खेल-प्रतियोगता को ही ’एशियाड’ कहा जाता है। हम भारतीयों के लिए तो यह और भी खुशी की बात हुई कि प्रथम एशियाड का आयोजन 4 मार्च 1952 ई. को भारत की धरती पर ही हुआ। ओलम्पिक व राष्ट्रमंडल खेलों के बाद यह विश्व का सबसे बड़ा क्रीड़ा-समारोह है। इस समारोह में एशिया महादेश के प्रायः सभी देशों के खिलाड़ी बिना जाति, लिंग, धर्म एवं रंग व भेद-भाव के हिस्सा लेते हैं। इसका आयोजन चार वर्षों के अन्तराल पर किया जाता है।

                4 मार्च 1952 ई. को प्रथम एशियाड के आयोजन के अवसर पर पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रसारित संदेश इस आयोजन के उ६ेश्य को स्पष्ट कर देता है। नेहरूजी के ये शब्द खेल और खिलाड़ियों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं-

                “खिलाड़ियों के इस अन्तर्राष्ट्रीय मिलन का एक और भी महत्वपूर्ण पहलू ह। इनमें अनेक देशों के युवा लोग शामिल होते हैं और इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को बढ़ावा मिलता है। प्रत्येक खिलाड़ी को अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए, चाहे वह हारे, चाहे जीते। उसे दोष मुक्त होकर खेल की भावना से ही खेल खेलना चाहिए।“

                सन् 1952 ई. के प्रथम एशियाड में मात्र 6 खेल ही खेले गए थे। प्रतियोगी देशों की संख्या भी मात्र ग्यारह ही थी। किन्तु वर्तमान में इस आयोजन में सम्मिलित खेलों की संख्या तीस से ऊपर हो चुकी है। इन खेलों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर के विजेताओं को क्रमशः स्वर्ण, रजत एवं कांस्य-पदक प्रदान किया जाता है। पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी एवं संबंधित देश कि लिए गौरव की बात है। इन दिनों एशियाई खेलों में चीन का वर्चस्व है। जापान दूसरे स्थान पर रहता है तथा भारत प्रायः पांचवें व सातवें स्थान पर रहता है।

                अब तक दो बार-प्रथम और नौवें एशियाड की मेजबानी करने का सुअवसर  भारत का मिल चुका है। नवें एशियाड को तो बड़ी धूमधाम से नई दिल्ली में आयोजित किया गया। 19 नवम्बर 1982 ई. को तत्कालीन राष्ट्रपति माननीय ज्ञानी जैल सिंह द्वारा इसका उद्घाटन हुआ और 4 दिसम्बर 1982 का उसी गरिमा के साथ इसका समापन भी किया गया। इस आयोजन का सफल बनाने के लिए दिल्ली में कुल सत्रह स्टेडियम तैयार किए गए। जिनमें जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इन्द्रप्रस्थ स्टेडियम और तालकटोरा स्टेडियम उल्लेखनीय हैं।