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सानिया मिर्जा

   उम्र के लिहाज से ज्यादा प्रतिभावान, दोनों हाथों से रैकेट पकड़कर बैक हैंड शाॅट लगाने वाली, विश्व टेनिस में सबसे तेजी से रैकिंग सुधारने वाली 18 वर्षीय यह बाला भारत में हैदराबाद शहर में जन्मी और बढ़ी। मात्र 18 वर्ष की इस बाला ने अपने खेल से विश्व टेनिस में सनसनी फैला दी है। इस बाला के पास जज्बा है, महत्वकांक्षा है और ऐसी दमखम वाली कलाई है जिसने विशेषज्ञों को भी हैरत में डाल दिया है। उसका जोश टेनिस कोर्ट पर बिजली की चमक पैदा कर देता है। वह रमेश कृष्णन के बाद दुनिया के चोटी के 50 टेनिस खिलाड़ियों में पहुंचने वाली पहली भारतीय है। वह टेनिस की ऐसी उभरती खिलाड़ी है। जो डब्ल्यू. टी. ए. रैकिंग सूची में तेजी से ऊपर चढ़ रही है। पिछले 18 माह में ही वह आश्चर्यजनक ढंग से 264 अंक ऊपर आ गई है।

                बेहद कम उ्र्रम और कम समय में एक के बाद एक कामयाबी, कोर्ट में उतरने के समय हर बार दर्शकों के बीच भारी हलचल, दुनिया भर के स्टेडियमों में उनकी हौसला अफजाई के लिए मौजूद उनके ऐसे प्रशंसकों की बढ़ती फौैज, डब्ल्यू. टी. ए. की वेबसाइट के मुताबिक यह तथ्य कि वे यू.एस. ओपन में तीसरी ऐसी महिला खिलाड़ी थीं, जिनकी सबसे ज्यादा तस्वीरें खींची गईं। जिन्दगी तथा टेनिस के प्रति एकदम नया नजरिया, नाक तथा कान की बालियों का शौक और जोरदार संदेश वाली टी-शर्ट सानिया मिर्जा की खास पहचान है। उनके प्रदर्शन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उनका रवैया है, ंजैसा कि टेनिस स्टार लिएंडर पेस कहते हैं- ’’उनके खेल का एक दिलचस्प पहलू उनकी यह सोच है कि किसी भी खिलाड़ी को हराया जा सकता है।’’

सानिया के चमत्कारिक उत्थान की एक वजह यह है कि उनके पास हमेशा साथ सफर करने वाले कोच जाॅन फैरिंगटन हैं, जो टेनिस के दिग्गज हैं और पिछले दो दशक से कोच हैं, वे अपने शार्गिद को चोटी की 10 खिलाड़ियों में लाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

                सानिया मिर्जा ने फरवरी 2004 में अपने गृह नगर हैदराबाद के दर्शकों के सामने अपना पहला डब्ल्यू. टी. ए. खिताब जीता – युगल का ताज। फ्रेंच ओपन में उन्होंने सीधे ग्रैण्ड स्लैम में प्रवैश लेने वाली पहली भारतीय महिला बनकर इतिहास रच दिया। सानिया ने अपना पहला टूर्नामेेंट भारत में 2002 में आइ. टी. एफ. वुमन सर्किट में खेला- वे तब मात्र 14 साल की थीं। उन्होंने नौ मैचों में उस समय 6 में जीत दर्ज की।

                सानिया ने छः साल की उम्र में तब टेनिस खेलना शुरू किया था जब उनके माता-पिता प्रिंटिग प्रेस चलाते थे। वे गर्मी की छुट्टियों के दौरान उन्हें टेनिस सिखाने ले जाते थे। सानिया ने एक साल से भी कम समय में अपने कौशल को निखार लिया। जब वे 12 साल की थीं तो उन्होंने अंडर-14 और अंडर-16 की राष्ट्रीय चैम्पियनशिप जीतीं। तभी उन्होंने टेनिस को अपना करिअर बनाने का फैसला कर लिया। जब वे मात्र 11 साल की जूनियर खिलाड़ी थीं तभी जी. वी. के. गु्रप ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया और वह उनका पहला प्रायोजक बन गया। प्रोमोटर जी. वी. कृष्ण रेड्डी, जो खुद टेनिस खिलाड़ी हैं, कहते हैं – ’’हममें से कुछ लोगों ने उनका खेल देखा और उन्हें समर्थन देने का फैसला कर लिया।’’

                सानिया ने उम्र के लिहाज से कहीं ऊंची प्रतिभा का परिचय दिया है लेकिन अंततः उनके भविष्य का फैसला इस आधार पर होगा कि अपनी शोहरत, दबाव, खामियों और वरीयता क्रम में अपने से ऊपर के खिलाड़ियों से मैदान में कैसे निपटती हैं। फिलहाल, दुनिया भारतीय खेल जगत की इस सनसनी का दिल खोलकर स्वागत कर रही है।

जातिवाद की समस्या

गाीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ’चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।’ अर्थात चार वर्ण-बा्रहाण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-गुण एवं कर्म के आधार पर मेरे द्वारा रचित हैं। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी कहा है- ’मनुष्य जन्म से नहीें, वरन कर्म से बा्रहाण या शुद्र होता है।’ पहले बा्रहाण का पुत्र व्यवसाय करता था, तो वह वैश्य हो जाता था। सभी आपस में मिलजुल रहते थे। पर, कुछ कट्टर जातिवादियों ने इसके मूल स्वरूप में परिवर्तन ला दिया। धीरे-धीरे यह विभाजन कर्म के अनुसार न होकर जन्म के आधार पर होने लगा। शूद्र पुत्र को क्षत्रिय का कार्य करने की प्रवृत्ति रखने पर भी शूद्र का ही कार्य करना पड़ता था। जाति के बाहर विवाह करना या अन्य जाति वालो के साथ रहन-सहन करना धर्म-विरूद्ध घोषित कर दिया गया, जिससे समाज में भाईचारे का सम्बन्ध खत्म हो गया और जातिवादी झगड़े होने लगे। यहीं से जातिवाद की गलत परम्परा चह पड़ी। मध्यकालीन भारत में यह जातिवाद सुरसा की तरह मुंह फैलाए हुए था।

जातिवाद देश के विकास में सबसे बड़ा बाधक है। इसके सहारे जहां एक ओर प्रतिभाहीन व्यक्ति ऊंचे-ऊंचे पदों को सुशोभित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिभावान दर-दर की ठोकरें खाते-फिरते हैं। इससे राष्ट्रीय क्षमता का हृास होता है। देश अन्तर्राष्ट्रीय स्पद्धाओं में पिछड़ जाता है। सामाजिक एकता के स्थान पर समाज खण्ड-खण्ड हो जाता है। देश की आजादी खतरे में पड़ जाती है। राष्ट्र कवि दिनकर ने जाति व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए लिखा है-  भारत को सुखी और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए जातिवाद का समूल विनाश आवश्यक है। इसके लिए चलचित्र, साहित्य, प्रेस, अखबार, टेलिविजन आदि प्रचार-साधनों के द्वारा जाति विरोधी प्रचार करना आवश्यक है। अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सरकार द्वारा अस्पृश्यता एवं छूआछूत को राष्ट्रीय अपराध घोषित किया जाना चाहिए। अगर सरकारी नीति ऐसी है भी तो व्यवहार में यह कहीे दिखता नहीं है, बल्कि सरकार में शामिल नेता जातिवाद को और प्रश्रय देते हैं। वे जातिवाद को अपनी राजनीतिक सफलता के लिए हथकण्डा बनाते हैं। अभी वर्तमान में जो स्थिति है उससे तो यही मालूम पड़ता है कि भारत से जातिवाद कभी विदा नहीे हो सकता । अब भी बहुत से ऐसे मंदिर हैं, जहां हरिजनों का प्रवेश वर्जित है। बहुत-सी ऐसी जातियां हैं जिसकी छाया से भी उच्च वर्ग के लोग परहेज करते हैं। आज के परिवेश में वे नेता कितने निर्लज्ज हैं जो जातीय सम्मेलन आयोजित करते हैं। इसके समापन के लिए सभी राजनीतिक दलों, समाज-सुधारकों, धार्मिक संस्थाओं एवं स्वयंसेवी एवं सामाजिक संस्थाओं को कारगर प्रयास करना चाहिए। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी, विनोबा भावे के बताए मार्ग पर चलकर ही इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। आम चुनावों में नेताओं द्वारा जात-पात का नारा दिया जाता है। सरकार को इसे कानूनी रूप से रोकना चाहिए। पंÛ जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में-’’भारत में जाति-पाति प्राचीन काल में चाहे कितनी भी उपयोगी क्यों न रही हो, परन्तु इस समय सब प्रकार की उन्नति के मार्ग में भारी बाधा और रूकावट बन रही है। हमें इसे जड़ से उखाड़कर अपनी सामाजिक रचना दूसरे ही ढंग से करनी चाहिए।’’

                सारांशतः जातिवाद भारत के माथे पर कलंक है। इसे मिटाकर ही इस अखण्ड एवं शक्तिशाली भारत की कल्पना कर सकते हैं। सुमित्रानंदन पंत की इन पंक्तियों से भी यही भाव उजागर होता है-

सेतुसमुद्रम परियोजना

सेतुसमुद्रम नौवहन परियोजना ;ैमजनेंउनकतंउ ैीपच ब्ंदंस च्तवरमबज.ैैब्च्) भारत और श्रीलंका के बीच एक परियोजना है। भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र की गहराई बढ़ाकर इस मार्ग को नौवहन योग्य बनाने की परियोजना के तहत तमिलनाडु में कोडैकनाल के तट से 45 कि.मी. दूर खाड़ी में खुदाई का काम प्रारम्भ हो चुका है।

लगभग 100 साल पुरानी सेतुसमुद्रम परियोजना को केन्द्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद ही यह काम शुरू हो सका। इस पर 2427.40 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस परियोजना के तहत भारत और श्रीलंका के बीच स्थित पाक-जलडमरूमध्य से होकर चैनल की खुदाई की योजना है जिससे भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तटों में आने-जाने वाले जलपोतों को श्रीलंका का चक्कर लगाकर नहीं जाना पडे़गा बल्कि वे सीधे जा सकेंगे। इससे जलपोतों को 424 नाॅटिकल मील (780 कि.मी.) दूरी की बचत के साथ-साथ यात्रा के दरम्यान लगभग 30 घंटे समय की बचत भी होगी। सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह परियोजना काफी लाभदायक सिद्ध होगी। नौ सैनिक तथा सीमा सुरक्षा गार्ड अब श्रीलंका का चक्कर लगाकर जाने की बजाय सीधे गश्त लगा सकेंगे।

इस परियोजना के तहत बंगाल की खाडी़ (ठंल व िठमदहंस) और मन्नार की खाड़ी (ळनस िव िडंददंत) के मध्य भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में समुद्र के भीतर चट्टानों को काटकर जल की गहराई बढ़ाकर नौवहन योग्य चैनल का निर्माण किया जाना है। स्वेज नहर और पनामा नहर की तर्ज पर बनाए जाने वाले इस नौवहलनीय जलमार्ग का निर्माण पूर्ण होने पर भारत के पूर्वी व पश्चिमी तटों के बीच नौवहन के लिए पोतों को श्रीलंका का चक्कर नहीं लगाना पडे़गा।

वास्तविकता यह है कि इस परियोजना की परिकल्पना सौ साल से अधिक पहले इंडियन मैरींस के कमाण्डर ए.डी. टेलर ने सन् 1860 में की थी। अनुमान है कि इस परियोजना को पूरा होने में तीन साल का समय लगेगा। यों तो यह आर्थिक रूप से फायदे वाली परियोजना का चैतरफा विरोध हो रहा है। विरोध में जो मुद्दे सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं-

–            क्या परियोजना में मन्नार की खाड़ी के नाजुक जैव क्षेत्र के बारे में दी गई पर्यावरणविदों की चेतावनी पर ध्यान दिया जा रहा है?

–             क्या केन्द्र सरकार ने समुद्री जीवन पर परियोजना के पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है जिससे यह हमेशा के लिए बर्बाद हो सकता है?

–             क्या परियोजना में जीवित मूंगे की खूबसूरत चादर और मैन्ग्रोव ईकोसिस्टम पर ध्यान दिया गया है?

–             क्या मछुआरों के विस्थापित होने की स्थिति पर विचार किया गया है ?

इस  परियोजना का विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि इस परियोजना से मन्नार की खाडी़ का समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाएगा। जैव विविधता भी स्थायी रूप से प्रभावित होगी और परंपरागत मछुआरों के लिए रोजी-रोटी के लाले पड़ जाएंगे। वास्तव में मन्नार की खाडी़ जीवित वैज्ञानिक प्रयोगशाला का काम करती है, जिसका राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय महत्व है। सागर विज्ञानियों के मुताबिक अगर यह मान भी लिया जाए कि परियोजना मेंक सभी बातों का ध्यान रखा जाएगा और खुदाई की गतिविधियों से पर्यावरण को नुकसार नहीं पहुंचेगा तो भी जहाजों की आवाजाही में वृद्धि होने से नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाएगा। समुद्री अध्ययन विज्ञानी डाॅ. अरण्यचलम कहते हैं-’’सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जहाज बंदरगाह में प्रवेश करने से पहले गंदा पानी छोड़ता है जिसमें विदेशी प्रजाति के जीव और अंडे होते हैं। ये जीव मन्नार की खाडी़ में भी आ सकते हैं और यहां के पौधे, प्राणियों और दूसरी चीजों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।’’

इन विरोधों के मद्देनजर केन्द्र सरकार ने हाल में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों के अध्ययन के लिए आठ सदस्यीय समिमि का गठन किया है। यह समिति समय-समय पर संबंधित संस्थाओं को परियोजना के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी देगी।

पर्यावरणवादियों की आपŸिायां दर्ज कराई हैं। उनका विरोध इन बातों पर है-

–             सुखा सहित जलवायु में बदलाव की आशंका

–            पŸानों में बाढ़ की संभावना

–             समुद्र के अपरदन की आशंका

चूंकि मन्नार की खाड़ी एवं बंगाल की खाडी़ में जलस्तर भिन्न है और परियोजना के पूरा होने के बाद धारा प्रवाह में बदलाव आएगा, इसी से श्रीलंकाई तटीय भूमि पर बाढ़ की संभावना बनी रहेगी। पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होने के कारण जलवायु भी परिवर्तित होगी और परियोजना से कोलंबो पŸान के अन्तर्राष्ट्रीय परिवहन पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा।

एकता का महत्व

एक होने के भाव को ‘एकता’ कहते हैं। किसी काम को करते समय हाथ की पांचों उंगलियों का एक होना, तिनकों को मिलाकर रस्सी का निर्माण, ईंटों के संयोग से दीवार का निर्माण, कुछ व्यक्तियों के मेल से परिवार का निर्माण एवं छोटे-छोटे राज्यों के संयोग से एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण इत्यादि एकता के कुछ दृष्टान्त हैं। यदि मानव परस्पर पृथक-पृथ्क होकर विचार एवं कार्य करे तो उसकी प्रगति असम्भव है एवं उसका पालन धु्रव सत्य है। अतः व्यक्ति को मन, वचन और कर्म से एक होकर कार्य करना चाहिए। यही एकता है।

एकता के महत्व से सम्बन्धित अनेक लोकोक्तियां प्रचलित है। यथा- संघे शक्तिः कलौयुगे; दस की लाठी एक का बोझ; अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इत्यादि। एक तिनके की क्या हस्ती लेकिन जब वही तिनका संगठित होकर रस्सी बन जाता है। तब इससे बलशाली हाथी भी बंध जाता है। एक ईट की क्या बिसात लेकिन, जब यही ईट मिलकर दीवार बनती है, तब उसे तोड़ना मुश्किल हो जाता है। एक बूंद जल का क्या अस्तित्व लेकिन जब इन्हीं बूंदों के मेल से सागर का निर्माण होता है तो उसे लांघना दुष्कर हो जाता है। एक चीटीं की क्या औकात। लेकिन जब यही चीटीं एकजुट हो जाती है तब अपने से बड़े आकार के जीवों को चट कर जाती है।एकता के महत्व से सम्बन्धित एक किसान, उसके बच्चे और लकड़ी के टुकड़ों की कथा प्रचलित है। लकड़ी के टुकड़े जब अलग-अलग रहते हैं।, तब बच्चों द्वारा वे आसानी से तोड़ दिए जाते हैं। परन्तु वे ही टुकड़े जब संगठित होकर गट्ठर बन जाते हैं। तब बच्चे उसे तोड़ नहीं पाते हैं, इन दृष्टान्तों से स्पष्ट है कि एकता में ही बल है।ेे

अ्रंगेजी में एक कहावत है- संगठित होने पर हम खड़े होंगे और असंगठित होने पर बिखर जाएंगे। इतिहास साक्षी है- जब-जब हमारी एकता विखण्डित हुई है, तब-तब हम पराधीन हुए हैं और जब-जब हम संगठित हुए हैं, दुश्मन को भागना पड़ा है। कौरवों और पाण्डवों की आपसी फूट के कारण इतना बड़ा महाभारत हुआ। विभीषण की एक फूट के कारण ही रावण जैसे शक्तिशाली राजा का विनाश हुआ। पृथ्वीराज और जयचन्द की फूट के कारण ही हमारा देश विदेशियों का गुलाम बना। ठीक दूसरी ओर एकताबद्ध भारत ने चन्द्रगुप्त और चाणक्य के नेतृत्व में विश्व विजयी सिकंदर का मान-मर्दन किया। नेपोलियन के नेतृत्व में संगठित फ्रांस ने यूरोप पर कब्जा जमाया। द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजित अणु बमों से ध्वस्त जापान एकता के कारण ही आज विश्व की एक शक्ति है। गांधी जी के नेतृत्व में जब सारा हिन्दुस्तान एक हो गया, तब अंग्रेजों को भागना पड़ा और हमें स्वतंत्रता मिली।

लेकिन आज जातीयता, साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रीयता हमारी एकता की नींव को भीतर ही भीतर खोखली करती जा रही है। आज जगह-जगह जातीय हिंसा एवं अगड़े-पिछड़े के बीच दंगों से हमारी शक्ति बिखर रही है। राष्ट्रीय एकता की लौ मद्धिम पड़ती जा रही है। इसी फूट के कारण एक दिन विदेशी हमारे शासक बन बैठे थे। हम पुनः गुलाम न बन जाएं, इसके लिए हमें पहले से ही सचेष्ट रहना चाहिए। यह तभी सभ्भव है, जब हम भारतवासी क्षुद्र स्वार्थपरक राजनीति से ऊपर उठकर घर की फूट को रोकें।

सेंसर बोर्ड की भूमिका

 ज्ञातव्य है कि भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है। सांस्कृतिक क्षेत्र में फिल्म निर्माण एवं प्रदर्शन का स्थान महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि जनतंत्र में यह सर्वाधिक प्रशंसित विधा है। जनता के राय-निर्माण और उन्हें जानकारियां उपलब्ध कराने मंे, उनके जीवन और परंपराओं को समझने में फिल्मों की उल्लेखनीय भूमिका होती है। लोगों के विचारांे और सोच को प्रभावित करने की क्षमता जितनी फिल्मों में है उतनी अन्य किसी माध्यम में नहीं। वस्तुतः फिल्में भारतीय जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई हैं। भारत में प्रेस स्वतंत्र है और यही स्वतंत्रता फिल्मों को भी हासिल है। यह सरकारी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्र उद्यम है। सिनेमा अथवा प्रेस को संविधान में अलग से सूचीबद्ध नहीं किया गया है। प्रेस और सिनेमा संविधान के मौलिक अधिकारों में शामिल हैं। जिनमें बोलने और अभिव्यक्ति (अनुच्छेद 10 (1) (क) में वर्णित) की स्वतंत्रता को शामिल किया गया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है अपने विचारों को वाणी, लेखन, चित्रकला अथवा फिल्म सहित किसी अन्य तरीके से व्यक्त करने की स्वतंत्रता।

                मीडिया हमारे देश में आजाद है लेकिन फिल्म के संदर्भ में यह आवश्यक समझा गया कि बाजार में प्रदर्शित किए जाने से पूर्व एक बार उनकी जांच कर ली जाए। ऐसा इसलिए कि दृश्य-श्रव्य (।नकपव.टपेनंस) माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव मुद्रित सामग्री की बनिस्बत काफी अधिक होता है। फिल्म विचारों और गतिविधियों को प्रेरित करती है तथा अधिक ध्यान आकर्षित करती हैं। हमारे देखने और सूनने की इंद्रियों को इसका प्रभाव एक साथ उद्वेलित करता है। पर्दे पर तीव्र प्रकाश का केंद्रण तथा तथ्यांे और विचारों की नाटकीय प्रस्तुति उन्हें अधिक प्रभावशाली बनाती है। सिनेमाघर के धुंधलके में अभिनय और आवाज, दृश्य और ध्वनि का संगम एकाग्रता भंग करने वाले सभी कारकों को नष्ट करते हुए दर्शकों के मस्तिष्क पर स्पष्ट प्रभाव डालता है। इसलिए कहा जा सकता है कि फिल्मों में भावनाओं को आहत करने की जितनी क्षमता है उतनी ही बुरा करने की भी। इन्हीं विशेषताआंे के आलोक में, खासकर इस तथ्य के मद्देनजर कि आमतौर पर दर्शक सिनेमा की अंतर्वस्तु के चयन को लेकर सतर्क नहीं होते, इस माध्यम की तुलना अन्य माध्यमों से नहीं की जा सकती। इसीलिए, समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं की तरह इसे स्वच्छंद रूप से प्रदर्शित नहीं किया जा सकता और उनकी सेंसरशिप न केवल अपेक्षित, बल्कि अनिवार्य हो जाती हैं।

                भारत में फिल्मों का प्रदर्शन केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा उन्हंे प्रमाणित करने के बाद ही किया जा सकता है। बेरोक-टोक सभी वर्ग के दर्शकों को दिखाई जाने योग्य फिल्मों को ‘यू’ प्रमाणपत्र दिया जाता है। जिन फिल्मों को 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को न दिखाने योग्य माना जाता है, उन्हें ‘यू/ए’ प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। केवल वयस्कों को दिखाई जा सकने वाली फिल्मों को ‘ए’ प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए अनुपयुक्त फिल्मों को प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाता है।

                केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का गठन 1952 के अधिनियम तथा सिनेमेटोग्राफ (प्रमाणन) विनियम 1993 के अनुरूप किया गया। वर्तमान समय में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलोर, गुवाहाटी, तिरूवनन्तपुरम, कटक तथा नई दिल्ली में नौ क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो फिल्म निर्माण के केन्द्रीय तथा उदयमान केन्द्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इस तरह बोर्ड पूरी तरह से एक विकेन्द्रीकृत संस्था है जो भारत जैसे देश की विविधता के अनुरूप है। प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य भी विभिन्न विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ताकि समाज मंे व्याप्त विभिन्न दृष्टिकोणों और विचारों का फिल्म प्रमाणन के क्रम में प्रतिनिधित्व कर सकें।

                बोर्ड में फिल्मों की जांच और संशोधन की दो अलग-अलग समितियां होती हैं। इनसे फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया द्विस्तरीय हो जाती हैं। जांच समिति में विचार-मतभेद होने की स्थिति में अथवा उनके निर्णय से आवेदक के असंतुष्ट होने की हालत मेें फिल्म को संशोधन समिति के पास भेजा जाता है। बोर्ड के निर्णय के खिलाफ फिल्म प्रमाणन अपीलीय ट्रिब्यूनल मंे अपील की जा सकती है, जिसके उध्यक्ष उच्च न्यायालय के आवकाश प्राप्त न्यायाधीश होते हैं। प्रमाणन संबंधी नियम विदेशी फिल्मों, डब की गई फिल्मों तथा वीडियों फिल्मों का प्रमाणन नहीं होता, क्योंकि  दूरदर्शन स्वयं फिल्मों की जांच करता है।

                बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य में सेक्स तथा हिंसा के प्रदर्शन को रोकने हेतु निम्नांकित उपाय किए गए हैं-

–             दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाली भारतीय फिल्मों के टेªलर और गानों को अब प्री-सेंसरशिप के लिए भेजा जाता है।

–             यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक जांच समिति/संशोधन समिति की कम से कम 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएं हों।

–             बोर्ड तथा परामर्शदात्री समिति के सदस्यों को दिशा-निर्देशों का कठोरतापूर्वक पालन करने के लिए कहा गया है।

–             जिन दिशा-निर्देशों का बार-बार उल्लंघन किया जाता है, उनके बारे में स्पष्टीकरण जारी किए गए हैं।

–             किसी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुशंसा करने वाली जांच समिति/संशोधन समिति/फिल्म प्रमाणन अपीलीय ट्रिब्यूनल के सदस्यांे के नाम उसके प्रमाणपत्र पर दिखाए जाते हैं।

इधर सिनेमा संस्कृति की पांरपरिक दृष्टि में बदलाव आ रहा है और अधिक बोल्ड तथा लीक से हटकर विषयों पर फिल्में बनाई जा रही हैं। नागरिक अधिकार संगठन भी काफी सक्रिय हो उठे हैं और फिल्मकारों से बच्चों के साथ दुव्र्यवहार, महिलाओं की घिसी-पिटी छवि की प्रस्तुति, पशुओं के प्रति क्रूरता आदि जैसे विषयों पर निरंतर संवाद कर रहे हैं। इन सब कारणों से सेंसरशिप का कार्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। हर वक्त तेजी से परिवर्तनशील समाज की नब्ज पर ध्यान रखना जरूरी हो गया है। लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि दर्शकों के लिए क्या उपयुक्त है और क्या नहीं, इसका निर्णय कौन करे? इस सवाल का उत्तर आसान नहीं है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि संेसरशिप को समाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। इसका मकसद मनमाने तरीके से कैंची चलाकर खेल खराब करना न हो, बल्कि फिल्मों की इस तरह जांच करना हो कि दर्शकों की संवेदनाएं आहत न होने पाएं, यही सबसे बड़ी चुनौती है।

G8 शिखर सम्मेलन

विश्व के 8 प्रमुख औद्योगिक लोकतंात्रिक देशों का समूह G 8 के नाम से जाना जाता है। इसके सदस्य देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, इटली, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, व रूस। इसके गठन की शुरूआत 1975 में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी व फ्रांस ने न्यूयाॅर्क में G5 से की। कुछ दिनों बाद इटली के शामिल होने से यह G6 हो गया। 1976 में कनाडा और रूस (जो पहले सिर्फ डायलाॅग पार्टनर थे) इसमें शामिल नहीं थे, 1998 में इसमें शामिल हो गये और G6 पुनः G 8 हो गया। इस समूह की वार्षिक बैठक होती है, जिसमें सदस्य देश पारस्परिक हितों, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति व अर्थव्यवस्था, तृतीय विश्व के देशों की समस्याएं, विश्व शांति एवं सुरक्षा तथा विज्ञान और तकनीकी प्रसार जैसे विषयों पर विचार विमर्श करते हैं तथा इनसे संबंधित कार्यक्रमों को लागू करने की योजना बनाते हैं। 2000 में जापान में नागो-ओकीनावा में सम्पन्न इस समूह की बैठक में गरीब देशों के ऋण को माफ करने का निर्णय किया गया। 2005 में स्काॅटलैंड के ग्लेनिंगलन में आयोजित शिखर सम्मेलन में पांच प्रमुख विकासशाील देशों को बैठक में भाग लेने क लिए आमंत्रित किया गया। ये देश थे- भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और मैक्सिको।

8-10 जुलाई 2005 को विश्व के आठ सर्वाधिक औद्योगीकृत एवं समृद्ध देशों का शिखर सम्मलेन स्काॅटलैंड के ग्लेनिंगलन में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में 5 आमंत्रित देशों के सदस्यों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्रसंघ, विश्व बैंक तथा विश्व व्यापार संगठन के प्रमुखों ने भी हिस्सा लिया।

इस शिखर बैठक में वैसे तो बातचीत के मुख्य मुद्दे अफ्रीकी देशों में छाई व्यापक गरीबी, स्वच्छ ऊर्जा का विकास, सतत विकास और ग्लोबल वाॅर्मिंग का मुद्दा प्रमुख था, लेकिन लंदन में हुए आतंकवादी हमले के बाद आतंकवाद का मुद्दा इस सूची में सबसे ऊपर आ गया। इस विशेष परिस्थिति में सबसे अधिक फायदा अमेरिका के राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश को हुआ जिनकी इच्छा के मुताबिक ग्लोबल वाॅर्मिंग का मुद्दा दब गया। आतंकवादी हमले की ओट में उन्होंने ग्लोबल वाॅर्मिंग को सामान्य मुद्दा बना दिया।

पारम्परिक तौर पर G 8 का मेजबान देश समझौते के लिए एजेंडा तय करता है, जिस पर सम्मेलन के अंत में सहमति के आधार पर संयुक्त बयान जारी किया जाता है। लेकन 2005 के शिखर सम्मेलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने प्राथमिकताओं को तय किया, जिसमें अफ्रीका के आर्थिक विकास को (गरीब देशांे का ऋण माफ करने तथा सहायता राशि बढ़ाकर) तथा ग्लोबल वाॅर्मिंग को उच्च प्राथमिकता दी गई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने क्योटो प्रोटोकाॅल से भी आगे बढ़कर एक योजना तैयार की थी, जिसके अन्तर्गत कुछ चुने हुए विकासशील देशों को शामिल न करके उनको ग्रीन आउस गैसों को कम करने के बदले में स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलाॅजी स्थानांतरित करने के बात थी। लेकिन 7 जुलाई को लंदन में हुए बम धमाकों से प्राथमिकता पर आतंकवाद आ गया।इस शिखर सम्मेलन में समझौते के मुख्य बिन्दु इस प्रकार थे-

 2010 तक विकासशील देशों के लिए 50 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की सहायता जिसमंे 25 बिलियन अमेरिकी डाॅलर अफ्रीका को दिए जाएंगे।
 2010 तक अफ्रीका में एंटी-एचआईवी दवाओं तक सामान्य लोगों की पहुंच कायम करना।
 अफ्रीका के लिए 20,000 शांति सैनिकांे को प्रशिक्षण देना। बदले में अफ्रीका अच्छे शासन तथा प्रजातंत्र के लिए वचनबद्धता दिखाएगा।
 G 8 के सदस्य देश 2010 तक जीडीपी का 0.56 प्रतिशत तथा 2010 तक जीडीपी का 0.7 प्रतिशत विदेशी सहायता के रूप में देंगे।
 व्यापार में बाधा पहंुचाने वाले टैरिफ तथा सब्सिडी को कम किया जाएगा।
 फिलिस्तीन को आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए 3 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की सहायता।

ब्रिटेन की पहल पर G 8 देशों ने वर्षों से गरीबी झेल रहे अफ्रीकी देशों के लिए 40 बिलियन डाॅलर के कर्ज माफ कर देने की बात पर सहमति व्यक्त की गई यह भी तय किया गया कि अफ्रीका को दी जाने वाली सहायता को 2010 तक दुगुना कर दिया जाए। यह भी तय हुआ कि सहायता में की जाने वाली वृद्धि 2004 के स्तर के आधार पर मापी जाएगी। साथ ही अफ्रीकी शांति सैनिकों को संघर्ष रोकने के अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

सम्मेलन के दौरान जलवायु परिवर्तन से जुडे़ ग्लोबल वाॅर्मिंग के मुद्दे पर अमेरिका के अन्य देशों के साथ मतभेद खुलकर सामने आ गए। सम्मेलन के अंत मंे कोई ठोस प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका।
विश्व में भारत को अब आर्थिक शक्ति के रूप में पहचन मिलने लगी है तथा इसी वजह से आज भारत के साथ आर्थिक संबंधांे को प्रगाढ़ करने का प्रयास लगभग सभी आर्थिक शक्तियों, देशों तथा क्षेत्रीय-संगठनों द्वारा किया जा रहा है। G 8 भी भारतीय बाजार तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है। G 8 देशों के साथ भारत के व्यापार की स्थिति इस प्रकार है-

 भारत और G 8 देशों के बीच व्यापार में वर्ष 2004-05 के दौरान 17 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
 भारत और G 8 देशों के बीच 2004-05 के दौरान 48 बिलियन डाॅलर का व्यपार किया गया।
 विश्व के साथ किए जाने वाले कुल व्यापार का 25 प्रतिशत व्यापार भारत G 8 देशों के साथ करता है।
 G 8 के देशों को वर्ष 2004-05 में भारत द्वारा अपने कुल निर्यात का 33.6 प्रतिशत निर्यात किया गया।
 लेकिन इन देशों में किए जाने वाले आयात की मात्रा वर्ष 2003-04 के 22.5 प्रतिशत से घटकर 2004-05 में 20 प्रतिशत रह गई।

इसी तरह अगर देखा जाए तो भारत तथा G 8 देशों के बीच आपसी व्यापार तथा सहयोग की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं, जिन्हें तलाशने और भुनाने की जरूरत है।

औधोगिकरण

   जिसे अंग्रेजी भाषा में इंडस्ट्रियलाइजेशन कहा  जाता है, उसे ही हिन्दी में उद्योगीकरण कहा जाता है। इसका आशय यह है कि किसी भी देश में वहां के आर्थिक विकास के लिए वैज्ञानिक आधारों पर और विशाल पैमाने पर उद्योग का विकास हो। कारण, आज केवल ग्रामीण अद्योग-धन्धे ही इसके लिए पर्याप्त नहीं कहे जा सकते हैं। कारखानों से उत्पादन भी हो और उत्पादित वस्तुओं को खपाने के लिए बाजार भी हो। तब लाभ यह होगा कि वस्तुओं की मांग बढ़ने से अधिकाधिक उत्पादन हो सकेगा। तब परिणाम यह होगा कि बेकारी की समस्या बहुत हद तक दूर हो सकेगी। पूंजी किसी व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं रहकर कुछ तो कारखानों में व्यय होगी और कुछ पर सरकार का नियंत्रण रहेगा। इससे मजदूरों के शोषण की बात समाप्त होगी। सब लोग अधिक परिश्रम करेंगे और देश उन्नति की ओर अग्रसर होगा। आज भारत में उपर्युक्त कारणों से उद्योगीकरण की अपेक्षा है।

                अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व यहां कच्चे माल का उत्पादन बहुत होता था और फिर दैनिक उपयोग के लिए वस्तुएं भी तैयार होती थीं। लेकिन वैज्ञानिक साधनों को यहां अभाव था और पश्चिमी राष्ट्र इन साधनों को अपनाकर धनी होते जा रहे थे। जब अंग्रेज भारत में आए तब उनका उद्योग केवल इंग्लैण्ड द्वारा निर्मित माल को यहां खपाना था। ग्रामीण उद्योगों की अपेक्षा यह सस्ता भी था और चमकदार भी। अतः अधिकांश व्यक्तियों का ध्यान उधर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। लेकिन भारतीय माल पर टैक्स बढ़ा दिया गया, फलतः उनका निर्यात भी रूक गया और अपने देश में भी महंगा होने के कारण कम प्रयुक्त होने लगा। अंग्रेजी शिक्षा तथा रहन-सहन का प्रसार होने के कारण भारतीय भारतीयता को भूलने लगे। भारतीय आत्मा पर विदेशी आवरण चढ़ने लगा। इंग्लैण्ड निर्मित वस्तुएं भारत में खूब बिकने लगीं। लेकिन अंग्रेजों ने हमारे यहां (भारत में) अपने वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग नहीं किया। भारत में ग्रामीण उद्योग धीरे-धीरे समाप्त हाने लगे तथा भारत अंग्रेजी माल की  मण्डी बन गया। हमें अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रतिपल विदेशी माल की शरण लेनी पड़ी। लेकिन हर्ष का विषय यही है कि आज हम स्वतंत्र है और भारत सरकार उद्योगीकरण के लिए सतत प्रयत्नशील है।

                आज औद्योगिक विकास के लिए अनेक साधन उपलब्ध हैं। हम जिस रूप में चाहें उनका प्रयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं। सर्वप्रथम इनके लिए कच्चे माल की अपेक्षा है। लोहे-कोयले के प्रचुर भंडार भारत में हैं। अतः कारखानों के चलाने में कोई परेशानी नहीं हो सकती। इसके बाद वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग का प्रश्न उठता है। इस सम्बन्ध में अभी हमें अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन यदि इन मशाीनों को मंगाकर यहां काम में लाया जाए तो उत्पादन बढ़ सकता है। अनेक स्थानों पर इस साधनों का अधिकाधिक प्रयोग किया जा रहा है। साथ ही सीमेंट, लोहा-इस्पात, सूती-उद्योग, मशीनों के छोटे-छोटे पुर्जे, हवाई जहाज, बिजली के अनेक सामान भी इन्हीं आधारों पर बनने लगे हैं। इनके अतिरिक्त इसके लिए कुशल मजदूरों की आवश्यकता है और यह तभी सम्भव है जबकि यहां औद्योगिक-शिक्षा का पर्याप्त प्रचार हो। शैशव से ही बच्चे की रूचि-अनुकूल क्षेत्र में विकास के लिए साधन जुटाए जाएं। वैज्ञानिक-साधनों के साथ उनके प्रयोबों की विधियों से भी अवगत होना जरूरी है। जिससे परिस्थिनिवश मशीनादि में कोई त्रुटि होने पर पुनः विदेश दौड़ना न पड़े अन्यथा देश का धन इन्हीं खात्राओं में समाप्त हो जाएगा। देश ने पूंजीपतियों का भी इस ओर (उद्योगीकरण की दिशा में) प्रेरित किया जाना चाहिए। छोटे व्यापार से अधिक लाभ उठाने की उनकी प्रवृŸिा को कम किया जाए। ऐसे बाजारों की भी व्यवस्था की जाए जहां निर्मित माल को बेचा भी जा सके। हमाराी पंचवर्षीय योजनाओं का इसमें बहुत अधिक हाथ है। इन साधनों की व्यवस्था और प्रयोग से जहां हम दैनिक जीवन की अपेक्षित वस्तुओं का प्राप्त कर सकेंगे वहां सैनिक-दृष्टि से भी उद्योगीकरण में सफल हो सकेंगे, क्योंकि गोली-बारूद एवं आयुध आदि वस्तुओं का निर्माण भी देश-रक्षा के लिए आज के युग में आवश्यक है।

                भारत सरकार का कर्तव्य है  िकवह व्यापारियों का मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे। उन्हें उद्योग-विकास की ओर बढ़ने की प्रेरणा दे। शिक्षा का विशेष प्रबन्ध हो और इस प्रकार तैयार माल को देश के कोने-कोने में पहुंचाने का कार्य भी सरकार द्वारा पूरा हो। फलतः हमारा पैसा हमारे ही पास रहेगा तथा हमारी आवश्यकताओं की भी सहज ही पूति हो सकेगी। उद्योगीकरण ही भारत के भावी विकास में सर्वाधिक उपयोगी है।

एफ. एम. रेडियो के लाभ

    स्थानीय बोली में स्थानीय सांस्कृतिक परम्पराओं से सम्बन्धित ढेर सारे कार्यक्रम अब श्रोताओं तक प्रसारित किए जा सकेंगे जिसका प्रसारण-माध्यम होगा-एफ.एम.रेडियो। पहले की भांति अब समय सीमा की वजह से रेडियो तरंगों से स्थानीय सामग्री और संदर्भ वाले कार्यक्रमों का हटाया नहीं जा सकेगा। निजी एफ.एम. (फ्रीक्वेंसी माॅड्यूलेशन) रेडियो स्टेशनों के दूसरे चरण की सरकार की नीति लागू होते ही यह हकीकत सामने आ गई।

                नौवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार का रेडियो के बारे में नीतिगत लक्ष्य विषय वस्तु की विविधता तथा तकनीकी गुणवत्ता  बढ़ाना था। तकनीकी मोर्चे पर जोर मीडियम वेव से हटकर एफ.एम. पर आ गया। कार्यक्रम में सुधार, तकनीकी विशिष्टता के बढ़ाने, पुराने और बेकार उपकरणों के नवीनीकरण और रेडियो स्टेशनों पर नवीन सुविधाएं उपलब्ध कराने पर मुख्य जोर था। उदारीकरण और सुधारों की नीति के अनुरूप सरकार ने लाइसेंस शुल्क आधार पर पूर्ण भारतीय स्वामित्व वाले एफ.एम. रेडियो केंद्र स्थापित करने की अनुमति प्रदान कर दी है। मई 2005 में सरकार ने देश के 40 नगरों में एफ.एम. की 40 फ्रीक्वेंसियों की खुली बोली के द्वारा नीलामी की। सरकार द्वारा निजी भागीदारी के लिए फ्रीक्वेंसियों को खोलने के मुख्य अभिप्रेत थे-एफ.एम. रेडियो नेटवर्क का विस्तार, उच्च  गुणवत्ता वाले रेडियो कार्यक्रम उपलब्ध कराना, स्थानीय प्रतिभा को प्रोत्साहन देना तथा रोजगार बढ़ाना और आकाशवाणी की सेवाओं की सहायता करना एवं भारतवासियों के लाभार्थ देश में प्रसरण नेटवर्क के त्वरित विस्तार को बढ़ावा देना।

                जुलाई 2003 में सरकार ने एफ.एम. प्रसारण के उदारीकरण के दूसरे चरण के लए रेडियो प्रसारण नीति समिति का गठन किया। इस समिति ने पहले चरण से  हासिल सीखें, दूरसंचार क्षेत्र से सम्बद्ध अनुभवों तथा वैश्विक अनुभवों का अध्ययन करने के उपरांत कई सुझाव दिए। इनमें प्राथमिक रूप से प्रसारण क्षेत्र में प्रवेश करने और छोड़ने की प्रविधि, लाइसेंस शुल्क की संरचना, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ने और मौजूदा लाइसेंसधारियों के दूसरे चरण में जाने की विधि सम्बन्धी अनुशंसाएं हैं।

                दुनिया भर में रेडियो प्रसारणों का पसंदीदा माध्यम एफ.एम. ही है। इसकी वजह इसकी उक्त गुणवŸाा वाली स्टीरियोफोनिक आवाज है। इसलिए दसवीं योजना में मीडियम वेव प्रसारण नेटवर्क को, जिसकी पहुंच 99 प्रतिशत आबादी तक है, समन्वित करने के साथ-साथ एफ.एम. की कवरेज को दोगुना करने पर जोर दिया गया। एफ.एम. की कवरेज देश की आबादी के 30 प्रतिशत तक थी। यह सारा का सारा कवरेज तब तक आकाशवाणी के द्वारा किया जा रहा था। इसे दोगुना कर 60 प्रतिशत आबादी का एफ.एम. प्रसारण की कवरेज के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने तथा लाइसेंस की नीलामी की मौजूदा प्रणाली क स्थान पर प्रविधि लाने पर जोर दिया गया। अन्य मुख्य क्षेत्र इस प्रकार रखे गए-20 किलोवाट तक की क्षमता वाले सभी एफ.एम. एवं मीडियम वेव ट्रांसमीटरों को स्वचालित बनाना, सिक्किम सहित सभी पूर्वोŸार राज्यों तथा द्वीप-समूहों में रेडियो की पहुंच का विस्तार और उसे मजबूती देना तथा एफ.एम. के बेहतर प्रसारण और साफ आवाज के कारण उपयोग साक्षरता के प्रसार के लिए करना।

                पहले चरण में 108 फ्रीक्वेंशियों का चालू किया गया था और दो को चालू किया गया ’मान’ लिया था। 40 शहरों के 108 फ्रीक्वेंसियों के लिए सरकार को कुल 101 बोलियां प्राप्त हुई। पहले भाग में वे फ्रीक्वेंशियां शामिल हैं जिन्हें पहले चरण में कवर किए गए नगरों की अन्य फ्रीक्वेंसियां भी शामिल हैं। दूसरे भाग में नए नगरों की फ्रीक्वेंसियों को शामिल किया गया है, जिन्हें अब तक कवर नहीं किया जा सका है।

                नई नीति के तहत देश के 90 नगरों में 336 अतिरिक्त निजी एफ.एम. रेडियो चैनल उपलब्ध होंगे। इन नगरों को ।़ए ।ए ठए ब्ए क्  वर्गों में रखा गया है। इसके अतिरिक्त इग्नू के 36 चैनल तथा 51 अन्य चैनलों को भी शैक्षिक उदेश्यों के लिए रखा गया है। लेकिन समाचार प्रसारण एफ.एम. रेडियो के दायरे से बाहर बना रहोगा। पूर्वोŸार  के आठ शहरों का इस कार्यक्रम के तहत कवर किया जाएगा। इनमें 40 चैनल होंगे, जिनमें से 32 चैनल निजी प्रचालकों द्वारा संचालित किए जाएंगे तथा आठ शैक्षिक उदेश्यों को समर्पित होंगे। इसी तरह, जम्मू-कश्मीर के लिए नौ चैनलों की योजना बनाई गई है, जिनमें से सात पर निजी प्रसारण होंगे तथा दो पर शैक्षिक प्रसारण। ये सभी चैनल श्रीनगर तथा जम्मू में स्थित होंगे।

                नवीन नीति के प्रावधानों के अन्तर्गत इस बात का ख्याल रखा गया है कि कोई एक बड़ा समूह वायु तरंगों पर एकाधिकार न कर ले। कोई भी समूह एक नगर में एक से अधिक एफ.एम. रेडियो स्टेशनों का स्वामित्व नहीं हासिल कर सकता। एक समूह को देश के कुल वायु तरंगों के 15 प्रतिशत से अधिक का स्वामित्व हासिल करने की अनुमति नहीं होगी।

                ’ग’ और ’घ’ वर्ग में आने वाले छोटे शहरों में अधिकाधिक प्रचालकों को आकर्षित करने के मकसद से यहां कार्यरत प्रचालाकों को अपने कार्यक्रम की नेटवर्किंग करने की अनुमति होगी। व उच्च वर्ग के शहरों में स्थित रेडियो स्टेशनों पर अपना विज्ञापन दे सकेंगे तथा उनके कार्यक्रमों का उपयोग कर सकेंगे।

                शैक्षिक महत्व की सामग्री का सही-सही निर्धारण कठिन होने के बावजूद उम्मीद है कि इग्नू के 36 चैनलों सहित कुल 87 चैनल शैक्षिक उ६ेश्य की पूर्ति के लिए प्रसारण करेंगे। वे निचले स्तर पर अनौपचारिक तथा औपचारिक शिक्षा के प्रसार में अपना योगदान देंगे। कुछ लोगों को आशंका है कि ये निजी चैनल आकाशवाणी के साथ स्पद्र्धा करेंगे तथा उनके राजस्व का एक हिस्सा ले जाएंगे। लेकिन इससे श्रोताओं का बेहतर गुणवŸाा वाले कार्यक्रम मिल पाएंगे। वित्तिय हानि यदि हुई भी तो समय के साथ-साथ उसकी भरपाई कर ली जाएगी। इससे स्थानीय प्रतिभा के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

                इन दिशा-निर्देशों के साथ सरकार ने देश में एफ.एम. रेडियो के विकास का वातावरण तैयार करने का गंभीर प्रयास किया है। समय के साथ-साथ इसके वास्तविक विकास का स्वरूप निजी उद्यम पर निर्भर करेगा।

एशियाई खेल प्रतियोगिता

     भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहा और इस गुलामी के कारण हम हर क्षेत्र में पिछड़ते चले गए। क्रीड़ा-क्षेत्र में भी हमारी यही स्थिति रही। लेकिन इन दिनों प्रत्येक क्षेत्र में हमारा विकास हो रहा है और खेलों में भी हम अब दुनिया से बहुत पीछे नहीं चल रहे हैं। बावजूद इस सब के, अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में हमारी उपलब्धि कम है। इसी भावना से आहत और प्रेरित होकर हमारे तत्कालीन लोकप्रिय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई खेल प्रतियोगता की नींव रखने में सक्रिय भूमिका निभाई। एशियाई खेल-प्रतियोगता को ही ’एशियाड’ कहा जाता है। हम भारतीयों के लिए तो यह और भी खुशी की बात हुई कि प्रथम एशियाड का आयोजन 4 मार्च 1952 ई. को भारत की धरती पर ही हुआ। ओलम्पिक व राष्ट्रमंडल खेलों के बाद यह विश्व का सबसे बड़ा क्रीड़ा-समारोह है। इस समारोह में एशिया महादेश के प्रायः सभी देशों के खिलाड़ी बिना जाति, लिंग, धर्म एवं रंग व भेद-भाव के हिस्सा लेते हैं। इसका आयोजन चार वर्षों के अन्तराल पर किया जाता है।

                4 मार्च 1952 ई. को प्रथम एशियाड के आयोजन के अवसर पर पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रसारित संदेश इस आयोजन के उ६ेश्य को स्पष्ट कर देता है। नेहरूजी के ये शब्द खेल और खिलाड़ियों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं-

                “खिलाड़ियों के इस अन्तर्राष्ट्रीय मिलन का एक और भी महत्वपूर्ण पहलू ह। इनमें अनेक देशों के युवा लोग शामिल होते हैं और इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को बढ़ावा मिलता है। प्रत्येक खिलाड़ी को अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए, चाहे वह हारे, चाहे जीते। उसे दोष मुक्त होकर खेल की भावना से ही खेल खेलना चाहिए।“

                सन् 1952 ई. के प्रथम एशियाड में मात्र 6 खेल ही खेले गए थे। प्रतियोगी देशों की संख्या भी मात्र ग्यारह ही थी। किन्तु वर्तमान में इस आयोजन में सम्मिलित खेलों की संख्या तीस से ऊपर हो चुकी है। इन खेलों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर के विजेताओं को क्रमशः स्वर्ण, रजत एवं कांस्य-पदक प्रदान किया जाता है। पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी एवं संबंधित देश कि लिए गौरव की बात है। इन दिनों एशियाई खेलों में चीन का वर्चस्व है। जापान दूसरे स्थान पर रहता है तथा भारत प्रायः पांचवें व सातवें स्थान पर रहता है।

                अब तक दो बार-प्रथम और नौवें एशियाड की मेजबानी करने का सुअवसर  भारत का मिल चुका है। नवें एशियाड को तो बड़ी धूमधाम से नई दिल्ली में आयोजित किया गया। 19 नवम्बर 1982 ई. को तत्कालीन राष्ट्रपति माननीय ज्ञानी जैल सिंह द्वारा इसका उद्घाटन हुआ और 4 दिसम्बर 1982 का उसी गरिमा के साथ इसका समापन भी किया गया। इस आयोजन का सफल बनाने के लिए दिल्ली में कुल सत्रह स्टेडियम तैयार किए गए। जिनमें जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इन्द्रप्रस्थ स्टेडियम और तालकटोरा स्टेडियम उल्लेखनीय हैं।

क्या संसदीय लोकतंत्र असफल हो गया है ?

        भारत द्वारा स्वतंत्रता के बाद संसदात्मक लोकतंत्र अपनाए जाने के बाद कई पश्चिमी विद्वानों का कहना था कि धार्मिक महानता, सामाजिक भेदभाव तथा मूलतः असंगठन में लिप्त भारत संसदीय लोकतंत्र के उपयुक्त नहीं है, परन्तु उनके ये आक्षेप चूर-चर हो गए, जब विभाजन के बाद राष्ट्रीय सरकार ने 552 रियासतों को भारत में मिला लिया। इसलिए मौरिस जोन्स का कहना था कि भारत में संसदीय राजनीति का प्रतिरूप उदय हो चुका है। उसने उस समय का सब भ्रान्तियों को दूर कर दिया हो भारत में संसदीय लोकतंत्र की सफलता के बारे में उत्पन्न की गई थी।

                वर्तमान में समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र असफल हो गया है और इसकी जगह राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू की जाए। राष्ट्रपति शासन वह शासन है जिसमें कार्यपालिका अपनी अवधि, शक्तियों और कार्यांे के सम्बन्ध में व्यवस्थापिका से स्वतंत्र रहती है। इस व्यवस्था में राष्ट्रपति राज्य एवं सरकार दोनों का प्रधान होता है। संसदीय लोकतंत्र सुचारू रूप से चल सके, क्या वह भारत में विद्यमान है। इन शर्तों में अनुशासन, चरित्र, संयम, नैतिकता की उच्च भावना, अल्पसंख्यक दृष्टिकोण को सुनने की तत्परता, राजनीतिक सहिष्णुता तथा सहनशाीलता की आवश्यकता होती है।

                जहां तक पहली शर्त अनुशासन की बात है, हमारे प्रतिनिधियों का  अमर्यादित आचरण जगजाहिर है। संसद भवन में ये लोग एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, गाली-गलौज करते हैं; असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं। राज्यों की विधानसभाओं में तो स्थिति कई बाद भारी अराजकता की सी बन जाती है। चरित्रवान व्यक्ति का आज संसद में पहुंचना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि राजनीति का अपराधीकरण एवं अपराध का राजनीतिकरण हो गया है। चुनाव के दौरान बूथ कैप्चरिंग, धन के बला पर वोटों को खरीदना तो आम बात है।

                संसदीय लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेही होती है। इस जवाबदेही की उपेक्षा के चलते हमारे संसदीय लोकतंत्र का क्षरण हुआ है। संसद के लिफ्ट संख्या-2 के निकटवर्ती गुम्बज का भिŸिा लेख दो शाश्वत गुणों- सत्य और धर्म-पर जोर देते हैं, सिसका संसद को पालन करना चाहिए। अंकित सूक्ति कहती है-“सभा वा न प्रवेष्टव्या, वक्तवयं वा सामंजसम अबुवन विबुवन वापि, नरो भवति किल्विषी।“ जिसका हिन्दी अर्थ है-कोई व्यक्ति या तो सभा में प्रवेश ही न करे अथवा यदि व ऐसा करे तो वहां धर्मासुनार बोलना चाहिए क्योंकि न बोलने वाला असत्य बोलने वाला मनुष्य दोनों ही पाप के भागी होते हैं। इस सूक्ति की रोशनी में जब हम अपने सांसदों के आचरण का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हमारे जनप्रतिनिधि अपने मतदाताओं और अन्तर्वस्तु में संसदीय लोकतंत्र को समृद्ध करने के लिए क्या करते हैं। इनके आचरण व राजनीति से ही आम जन को घृणा पैदा होने लगी है, जिसके लिए इसका स्वयं का गैर जिम्मेदाराना जनविरोधी आचरण मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

                दल-बदल संसदीय लोकतंत्र का शोक कर्म है। दल-बदल विरोधी कानून बनाए जाने के बावजूद हमारी संसदीय व्यवस्था को घुन की तरह खा रहे इस गम्भीर रोग को रोकने के लिए हमारी संसद ने कठोर कदम नहीं उठाया क्या ऐसा कठारे कानून नहीं बनाना चाहिए जिससे दल-बदल करने वाले संासद एवं विधायक को तत्काल प्रभाव से अपनी सीट से त्यागपत्र देना पड़े इसके साथ ही गैर जिम्मेदारी एवं निजी लोभा से प्रेरित प्रतिनिधियों को जनता द्वारा वापस बुलाने (राइट टू रीकाॅल) का अधिकार दे देला चाहिए।

                अनेक लोग तर्क दे रहे हैं कि बहुदलीय प्रणाली संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए उŸारदायी है। लेकिन यदि ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र का उदाहरण लिया जाए तो वहां भी शुरू में बहुदलीय प्रणाली थी, लेकिन वहां की जागरूक जनता ने अन्य दलों का नकार दिया तथा यह परम्परा बना दी कि दो ही दल उचित है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बहुदलीय प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए जनता को शिक्षित किया जाए एवं उन्हें जागरूक बनाया जाए, जिससे भारत में संसदीय लोकतंत्र समृद्ध हो सके। आज लोकतन्त्रीय संस्थाओं में बढ़ती अनास्था का ही परिणाम है कि केन्द्रीयकरण की घातक प्रवृŸिा बढ़ रही है और राष्ट्रपति शासन प्रणाली है कि केन्द्रीयकरण की घातक प्रवृŸिा बढ़ रही है और राष्ट्रपति शासन प्रणाली की मांग एक तरफ से तो जायज दिखाई देती है। राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना जी जाए, जिसमें राष्ट्रपति के हाथों में सम्पूर्ण शासन होता है तो इससे लोकतंत्र का मूल उ६ेश्य ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि संसदीय लोकतन्त्र में प्रशासन का कार्यभार जनता द्वारा  चुले गए प्रतिनिधियों को रहता है। जबकि राष्ट्रपति प्रणाल में राष्ट्रपति प्रशासनिक पदों पर अपने मनुकूल व्यक्तियों की नियुक्ति करता है। इसलिए इस प्रणाली में जनता की अनदेखी हो सकती है और भारत जैसे विकासशील देश के लिए तो यह और खतरलाक हो सकता है। इसके अतिरिक्त हमारे यहां सैनिकों को प्रशासन से अलग रखा गया है। इसलिए यदि एकाएक राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना जी जाती है तो इन सैनिकों के माध्यम से राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है और भाता की लोकतांत्रिक एवं सांविधानिक भावनओं को ठेस पहुंच सकती है।

                आवश्यकता है भारतीय संसदीय लोकतंत्र की जो कमजोरियां हैं, उन्हें दूर किया जाए क्योंकि संसदीय लोकतांत्रिक परिवेश में ही समस्याओं का समाधान हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि सम्पूर्ण समाज के जनवादीकरण के लिए चैतरफा प्रयास चलाया जाए। जनवाद की विरोधी सामंती शक्तियों को श्किस्त दी जाए। राज्य मशीनरी का जनवादीकरण किया जाए, जिससे आम जनता की भागीदारी बढ़ेगी। केवल संसदीय लोकतंत्र में ही जन शिक्षण हो सकता है, क्योंकि इस व्यवस्था में सरकार जनता की आवश्कताओं के प्रति अनुक्रियाशील रहती है। साथ जी यह कहा जा सकता है कि केवल इसी व्यवस्था में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का रक्षण हो सकता है।

                निष्कर्षतः, यह कहा जस सकता है कि राष्ट्रपति शासन की मांग विचार के स्तर पर तो ठीक है, लेकिन यह कहना कि अपने देश की समस्याएं इसी तरह ठीक हो सकती हैं-इस कहावत को चरितार्थ करता है कि ’नाच न जाने आंगन टेढ़ा’। इसीलिए हमारी संसद का लोकतंत्र को जमीना स्तर पर मजबूत करने के कार्य में लगना चाहिए, तभी संसदीय लोकतंत्र का वृक्ष फलदायी वृक्ष के रूप में विकसित हो सकता है अन्यथा समस्याएं बढ़ती जाएंगी।

काला धन: समस्या एवं समाधान

        जिस रूपये को हम काले धन के नाम से पुकारते हैं, उसकी आत्मा तथा मन दोनों ही काला है। सरकारी टैक्स से बचने के लिए इसे अत्यन्त गुप्त एवं गोपनीय रखा जाता है और साथ ही विधिवत या लिखित रूप में भी इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता है। देश की अर्थव्यवस्था के लिए काला धन टी.बी. समान रोग है। यदि ठीक से इसका निदान नहीं किया गया तो देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो सकती है। देश की प्रगति एवं अर्थव्यवस्था दिनोंदिन अवनति की ओर बढ़ती जाएगी।

                काले धन का हमारे आज के जीवन में और हमारे आर्थिक व्यवहार में कितना बड़ा हाथ है, इसके तरह-तरह के अनुमान लगाए जाते है। एक अर्थशास्त्री के अनुसार हमारा आधा आर्थिक व्यापार काले धन के बल पर ही चलता है। यह बात तो सच है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर इस काले धन ने बहुत ही अनिष्टकारी प्रभाव डाला है। इसका सबसे भयानक दुष्परिणाम यह है कि इसके कारण सरकार की तमाम नीतियां निष्फल जा रही हैं।

                अगर किसी ने सफेद धन कमा लिया तो उसका एक बड़ा भाग करों के द्वारा छीन लिया जाता है। सफेद धन को परिश्रम से कमाया जाता है। उसका अधिकांश भाग करों और आज के बढ़े हुए मूल्यों के कारण हाथ से निकल जाता है और बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता है। इसके विपरीत काला धन आसानी से कमाया जाता है और इसे आसानी से छिपा भी लिया जाता है और उस पर कर चुकाने को प्रश्न ही नहीं उठता। काले धन से अभिप्राय उस धन से है जो सरकारी टैक्स से बचने हेतु बिना लिखा-पढ़ी किए हुए छिपाकर तथा गोपनीय रखा  जाता है। चाहे चल संपत्ति हो अथवा अचल संपत्ति, सबके ऊपर कालेधन की काली छाया मंडरा नही है। काला धन व्यक्ति तक ही सीमित रहता है। इसका उपयोग भी सीमित हो जाता है। इससे देश की अत्यधिक क्षति हो रही है।

                काले धन से एक और अनिष्टकारी प्रभाव पड़ रहा है। समाज का अधिकांश आर्थिक कारोबार सरकार की आंखों से छिपाकर किया जाता है और सरकार को बचे-खुचे संकुचित क्षेत्र पर अपना नियंत्रण रखकर करना पड़ता है। हमारा सामाजिक जीवन भी इस काले धन से खोखला होता जा रहा है। जिन सामाजिक गुणो से हमें पे्ररणा लेनी चाहिए, वे गुण नष्ट होते जा रहे हैं और जिन असामाजिक तŸवों की रोकथाम होनी चाहिए, वे ’दिन दूना राज चैगुना’ करते जा रहे है। आज प्रायः हर व्यवसायी काला धन कमाने और उसे छुपाने में ही व्यस्त रहता है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 250 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा चोरी की जाती है, जिसकी काले धन के अन्तर्गत ही गणना करनी चाहिए। इस कालेधन के कारण धन का संचय सीमित लोगों के हाथों में सिमटा है। ’काले धन’ का संचय केवल धनिक वर्ग तक सीमित रहता है क्योंकि निर्धन का तो कठोर श्रम करने के पश्चात भी बड़ी कठिनाई से पेट भर पाता है। धनिक लोग ’काले धन’ के माध्यम से समाज में महंगाई का घातक विष प्रसारित करते रहते हैं।

ओलम्पिक खेल प्रतियोगिता

    ओलम्पिक अन्तर्राष्टीय स्तर पर प्रत्येक चार वर्षों में आयोजित होने वाला विश्व का सबसे विशालतम खेल-मेला है जिसमें, विश्व के लगभग सभी देशाों के खिलाड़ी जाति, धर्म, राजनिति, भाषा एवं सम्प्रदाय का भेद-भाव भुलाकर एक जगह एकत्रित हो अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। इन खेलों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर के विजेताओं को क्रमाशः स्वर्ण, रजत एवं कांस्य-पदक प्रदान किया जाता है। ओलम्पिक में पदक जीतना खिलाडी़ एवं राष्ट्र दोनों के लिए गौरव का विषय है।

                ओलम्पिक का इतिहास काफी पुराना है। सर्वप्रथम 776 ई. पूर्व यूनान के नगर एथेंस के ओलम्पिया पर्वत की तलहटी में खेलों की एक प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। बाद में ओलम्पिया पर्वत के नाम पर ही इस आयोजन का नाम ओलम्पिक पडा़। समय के साथ-साथ इसकी परम्परा एवं स्वरूप में धीरे-धीरे संशोधन एवं परिवर्धन होते गए। अब ओलम्पिक सारे विश्व को अपने में समाहित किए हुए है। आधुनिक ओलम्पियन खेलों के आयोजन का मुख्य श्रेय यूनान-निवासी ’पियरे द कुबर्तिन’ को जाता है, जिनके अथक प्रयास के फलस्वरूप ओलम्पिक का वर्तमान विशाल स्वरूप विश्व के सामने हैं।

                ओलम्पिक का एक झण्डा है जिसक रंग सफेद है और इसमें आपस में जुडे़ पांच गोले अंकित हैं।  ये गोले पंाच महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उद्घाटन के समय मशाल जलाकर हजारों कबूतरों को आकाशा में उड़ाया जाता है, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना एवं शांति का प्रतीक माना जाता है।

                आधुनिक ओलम्पिक का प्रथम आयोजन सन् 1896 में यूनान के एथेंस नगर में ही हुआ था। इसके बाद से प्रति चार वर्षो के अन्तराल पर विश्व के बडे़-बड़े नगरों में ओलम्पिक का आयोजन होता चला आ रहा है। अंतराल आया केवल दो बार, जब प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इन खेलों का आयोजन रद्द का देना पड़ा था।

खेल में हार और जीत का विशेष महत्व पहीं होता । महत्व होता है अनुशासन, भइचारे ओर इमानदारी का। 1996 ई. के आलम्पिक में इन्हीं कारणों से भारत को हाॅकी में ’फेयर प्ले एवार्ड’ मिला। जिस खेल-स्पर्धा में उŸाम खेल तकनीक के साथ-साथ जितना अधिक अनुशासन, ईमानदारी और बन्घत्व का भाव रहता है, उस खेल का उतना ही उत्कृष्ट माना जाता है। ओलम्पिक -आयोजन का उद्देश् खेलों के माध्यम से सारे जगत को एक सूत्र में जोडनस है। वस्तुतः ’वसुधैव कुटुम्बकम’ ही ओलम्विक का नारा है। 

Emotional Check-Ins in a Teaching Webinar

I always start my classes with some form of emotional check-in regardless of age or grade level. I do so in my college classes as well as in my elementary gifted classes. I think this is even more imperative given the stress students are experiencing due to COVID19. The 10 to 15 minutes it takes is so worth the class time.

Some of the benefits of emotional check-ins discussed in the Edutopia article, A Simple but Powerful Class Opening Activity, include:

Students know that every voice matters: The emotional check-in gets every student’s voice into the room at the start of each class. Although students can always say “pass” instead of sharing, each student has the opportunity to be heard every class session. The check-in is also a great opportunity to practice active listening, turn-taking, and following group norms.

Students develop awareness of others’ emotions—and how to respond to them: When students share their emotions during the check-in, they give their classmates a snapshot of their emotional state. And if I hear a student say that “I didn’t sleep much last night” or “I feel like I can’t focus today,” I can adjust my interactions with that person accordingly.

The check-ins also acknowledge that how students are feeling is important to the educator, that they matter as human beings who have feelings and emotions.

One of my college classes moved from face-to-face to Zoom this semester. What follows are some of the check-in activities I have done with them.

Using a Feeling Chart

Students use a feeling chart to describe how they are feeling. A side benefit of using feeling charts is that they help students increase their feelings vocabulary.

Source: Emotional Intelligence 2.0 by Travis Bradberry

Share a Rose; Share a Thorn

Each student shares a Rose, something good or positive, from the day or week; and a Thorn, something not-so-good or positive, from the day or week.

Four Types of Care

Students, during the check-in, take turns using the four types of self care graphic to describe strategies they are doing or would like to do to be physically, emotionally, socially, and spiritually healthy.

5 Step Check-In Process

The teacher leads students through the 5 step check-in process described in Emotional Check-ins: Why You Need Them:

  1. Tune into your body.
  2. Take a deep breath.
  3. Ask the question. Use the simple question, “How am I feeling?” Make it even more specific by tacking on the phrase “right now” or “in this moment.” 
  4. Use descriptive words to capture how you feel. 
  5. Brainstorm what might be contributing to those emotions.

Then each student is given an opportunity to share what came up for them during the exercise.

Pear Deck

Pear Decks are very similar to a PowerPoint or Google Slides presentation. But instead of simply static, informational slides, you get to create Interactive Slides that let every student respond to your questions or prompts. Once PearDeck is activated, through the Google Slides add-on, students are given a code to access the Pear Deck. There they interact with each slide through typing, drawing, and using a draggable icon depending how the teacher set up the slide. What follows is the Pear Deck I used for a check-in at the start of one of my classes.



Create an Image Based Timeline of Feelings

Students create a timeline of images that represent: how you felt last week; how you feel today; how you want to feel this coming week; and finally, what strategies you can use to get to how you want to feel this coming week. Students then share their images via their webinar cameras and discuss their meaning with the rest of the class. What follows are (1) the prompt for this activity, and (2) sample student pictures:

Gif Image

Using Giphy students do a search for different feelings and emotions they are currently experiencing, and then select one or more Gifs that represent those feelings. They then take turns to do a screenshare of their selected Giphy and explain why they selected it.

Padlet Check-In

Padlet is an application to create an online bulletin board that you can use to display information for any topic. You can add images, links, videos, text, and drawings. Below is a Padlet I created for an emotional check-in.

Mentimeter

Menitmeter allows teachers to engage and interact with students in real-time. It is a polling tool wherein teachers can set the questions and your students can give their input using a mobile phone or any other device connected to the Internet. Their input is displayed on a slide in a selected format: Word Cloud, Speech Bubbles, One-By-One, and Flowchart. In the case of check-ins, it can be used to have students put in responses to a question related to how they feeling at the start of class and their responses then are shown to the class via a slide. The example below shows a slide with a Word Cloud of emotional check-in responses.

Flipgrid

Flipgrid is a website that allows teachers to create “grids” to facilitate video discussions. Each grid is like a message board where teachers can pose questions, called “topics,” and their students can post video responses. For an emotional check-in, students record a short video about how they are feeling.

इन्टरनेट का बढ़ता प्रभाव

      इंटरनेट दूनिया भर में फैले कम्प्यूटरों का एक विशाल संजाल है जिसमें ज्ञान एवं सूचनाएं भौगोलिक एवं राजनितिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए अनवरत प्रवाहित होती रहती है। उस संजाल में कुछ ऐसे कम्प्यूटर होते हैं जो सर्वदा सक्रिय  रहते हैं और कुछ ऐसे कम्प्यूटर होते हैं जो उपभोक्ताओं के द्वारा आवश्यकता पड़ने पर खोले  जाते हैं। जो कम्प्यूटर इस संजाल में सर्वदा खुले  होते हैं, वह संजाल उन्हीं कम्प्यूटरों के द्वारा चलता है। ऐसे कम्प्यूटर को सर्वर कहते है। इन्टरनेट के संजाल में ऐसे कई सर्वर होते हैं और ये सभी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। हम जब कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं तो इन्हीं में से किसी एक सर्वर से अपने कम्प्यूटर का संबंध स्थापित करते हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

                इंटरनेट का प्रारम्भ आज से लगभग साढे़ तीन दशक पूर्व अमेरिका के रक्षा विभाग के एक शोध प्रकल्प के रूप में हुआ था। उस समय इस शोध में लगे वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि दो अलग-अलग स्थानों पर स्थित कम्प्यूटरों के माध्यम से आंकडों एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान कैसे किया जाए। शीत युद्ध के दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया के तीन मेनफ्रेम कम्प्यूटर और यूटा के एक मेनफ्रेम कम्प्यूटर को आपस में जोड़ा गया और इसे अर्पानेट  कहा गया। इस शोध परियोजना के लिए अमेरिका की उन्नत अनुसंधान परियोजना ऐजेंसी  धन उपलब्ध करा रही थी, इसलिए नेटवर्क का यह नाम रखा गया। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सियोनार्ड क्लिनराॅक एवं उनके साथियों द्वारा किए गए एक प्रयोग से दिनांक 2 सितम्बर 1969 को इस कार्य को अंजाम मिला। डाॅ. क्निराॅक को इन्टरनेट का जन्मदाता माना जाता है। इन्टरनेट के स्थापना के पीछे उद्देश्य यह था कि परमाणु हमले की स्थिति में संचार के एक जीवंत नेटवर्क को बनाए रखा जाए। लेकिन जल्द ही रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला से हटकर इसका प्रयोग व्यावसायिक आधार पर होने लगा । फिर इन्टरनेट के व्यापक स्तर पर उपयोग की संभवनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ और बड़ी-बडी़ कम्पनियों ने इस नेटवर्क को व्यापक स्तर पर स्थापित करने के लिए अपना धन लगाना प्रारम्भ कर दिया। 1992 ई. के बाद इन्टरनेट पर ध्वनि एवं वीडियो का आदान-प्रदान संभव हो गया। अपनी कुछ दशकों की यात्रा में ही इन्टरनेट ने आज विकास की कल्पनातीत दूरी तय कर ली है। आज के इन्टरनेट के संजाल में छोटे-छोटे व्यक्तिगत कम्म्यूटरों से लेकर मेनफ्रेम और सुपर कम्प्यूटर तक परस्पर सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं। आज जिसके पास भी अपना व्यक्तिगत कम्प्यूटर  है वह इंटरनेट से जुड़ने की आकांक्षा रखता है।

                इन्टरनेट आधुनिक विश्व के सूचना विस्फोट की क्रांति का आधार है। इन्टरनेट के ताने-बाने में आज पूरी दुनिया है। विश्व के जिस शहर में इन्टरनेट की सुविधा उपलब्ध है, वह शहर सूचना के सुपर हाइवे का हिस्सा है। दुनिया में जो कुछ भी घटित होता है और नया होता है वह सुपर हाइवे के उस शहर में तत्काल पहुंच जाता है। इन्टरनेट आधुनिक सदी का ऐसा ताना बाना है, जो अपनी स्वच्छन्द गति से पूरी दुनिया को अपने आगोश में लेता जा रहा है। कोई सीमा इसे रोक नहीं सकती। यह एक ऐसा तंत्र है, जिस पर किसी एक संस्था या व्यक्ति या देश का अधिकार नहीं है बल्कि सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ताओं की सामूहिक संपत्ति है। इन्टरनेट सभी संचार माध्यमों का समन्वित एक नया रूप है। पत्र-पत्रिका, रेडियों और टेलीविजन ने सुचनाओं के आदान-प्रदान के रूप् में लिस सूचना क्रांति का प्रवर्तन किया था, आज इन्टरनेट के विकास के कारण वह विस्फोट की स्थिति में है। इन्टरनेट में माध्यम से सूचनाओं के आदान-प्रदान एवं संवाद आज दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पलक झपकते संभव हो चुका है।

उत्पाद पेटेंट व्यवस्था

विश्व व्यापार संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पेटेंट अधिनियम में संशोधन हेतु एक अध्यादेश 25 दिसम्बर 2004 को जारी किया। इससे बहुविवादित रही उत्पाद पेटेंट  व्यस्था 1 जनवरी 2004 से प्रभावी हो गई। इसके पूर्व 1999 एवं 2002 के पेटेंट (संशोधन) अधिनियमों के जरिये प्रक्रिया पेटेंट को लागू कर दिया गया था, जबकि दवाओं, रसायनों एवं अनाज के मामलों में उत्पाद पेटेंट अभी तक लम्बित था। अन्य क्षेत्रों में उत्पाद पेटेंट का प्रावधान पहले के संशोधन के जरिये किया जा चुका था। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत भारत को दवाओं, खाद्य पदार्थो व रसायनों के मामले में उत्पाद पेटेंट व्यवस्था को 1 जनवरी 2005 तक लागू करना था। इस प्रतिबद्धता को सन्दर्भित अध्यादेश के जरिये पूरा किया गया है।

विश्लेषकों का मत है कि उत्पाद पेटेंट व्यवस्था लागू होने से शरू के कुछ वर्ष तक भले ही इसका अधिक प्रभाव आम व्यक्तियों पर न पडे़, किन्तु उन्नत दवाओं, रसायनों, कृषि बीजों के मूल्यों में भारी वृद्धि इसके परिणामस्वरूप अन्ततः होगी। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत नई खोजों पर आधारित उत्पादों के 20 वर्ष तक विपणन का विशेषाधिकार केवल शोधकर्ता व्यक्ति अथवा कम्पनी को प्रप्त होगा तथा उसे उसके मूल्य निर्धारण की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। इन आलोचनाओं का खण्डन करते हुए सरकार ने दावा किया है कि नए अध्यादेश के कारण न तो दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होंगी और न ही भारतीय उद्योगों पर इसका बुरा असर पडे़गा। नयी पेटेण्ट व्यवस्था में भारतीय फार्मा इण्डस्ट्री को उन्नति के पहले से अधिक अवसर प्राप्त होंगे तथा बाजार में प्रतिस्पद्र्धा बढ़ने से दवाएं सस्ती भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में तीन तथ्यों का हवाला सरकार ने दिया है। एक तो यह कि बाजार में उपलब्ध 97 प्रतिशत दवाएं पेटेंट के दायरे में आती ही नहीं, इसलिए उनके महंगा होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। दूसरे पेटेंट के दायरे में आने वाली बाकी तीन प्रतिशत दवाओं में से भी अनेक ऐसी हैं जिनके बाजार में विकल्प उपलब्ध हैं और तीसरे भारत सरकार ने संशोधित कानून में जनहित की दृष्टि से 7 ऐसे विशेष प्रावधान रखे हैं जिनके जरिये सरकार किसी भी पेटेंट का रद्द करने, पेटेंटशुदा प्रोडक्ट का आयात करने अथवा किसी भी आविष्कार को अपने लिए इस्तेमाल करने का अधिकार रख सकेगी।

विदित है कि एक दशक पूर्व भारत में पेटेंट कानून की बात डराती थी, क्योंकि ऐसे कानून से सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा होता नजर आता था, किन्तु अब हालात बदल गए हैं। अब स्वयं भारतीय दवा कम्पनियों को विश्व बाजार में झण्डे गाड़ने के लिए पेटेंट संरक्षण की आवश्यकता है। 10 वर्ष पूर्व भारत का फार्म निर्यात 4 हजार करोड़ रूपये था जो आज बढ़कर 14 हजार करोड़ रूपये हो गया है। भारतीय फार्मा निर्यात अब प्रति वर्ष 30 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है और कम्पनियां अब अपने टर्न-ओवर का 6 से 8 प्रतिशत भाग अनुसन्धान (त्-क्) मे लगा रही हैं। इन परिस्थितियों में कडे़ पेटेंट कानून से भारतीय दवा बाजार को नुकसान नहीं, फायदा होने जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि ट्रिप्स समझौते के अनुपालन हेतु 1970 के पेटेंट अधिनियम (जो 20 अप्रैल 1972 से प्रभावी हुआ) में यह तीसरा संशोधन 26 दिसम्बर 2004 के आध्यादेश के जरिये किया गया तथा 23 मार्च 2005 को इसे संसद के दानो सदनों द्वारा पारित कर दिया गया। पहला संशोधन मार्च 1999 में अधिसूचित किया गया, जो 1 जनवरी 1995 से प्रभावी हुआ था। जून 2002 में अधिसूचित दूसरा संशोधन 1 जनवरी 2000 से प्रभावी हुआ था जबकि तीसरा संशोधन 1 जनवरी 2005 से प्रभावी हुआ था।

गंगा नदी – हमारी सांस्कृतिक गरिमा

गंगा पतित पावनी कहलाती है। पुण्य सलिला गंगा, गीता और गौ-इन तीनों को हमारी संस्कृति का आधार तत्व माना गया है। इसमें गंगा का स्थान प्रमुख है। इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि गंगा विष्णु के चरण-नख से निःसृत होकर ब्रह्या के कमण्डलु और तत्पश्चात शिव की जटाओं में विश्राम पाती हुई भगीरथ के अथक प्रयास के फलस्वरूप पृथ्वी पर अवतरित हो पाई है। पृथ्वी पर आते ही इसने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को शाप से मुक्त कर दिया। तब से अब तक न जाने कितने पतितों का उद्धार इसने किया। इसकी पावन पुलिन पर याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, अंगिरा, विश्वामित्र आदि ऋषि-मुनियों के आश्रम थे, जहां से ज्ञान की किरणें प्रस्फुटित होती थीं गंगा पुत्र भीष्म के पराक्रम को कौन नहीं जानता? इसकी पविता तो सर्वविदित है ही। ऐसी मान्यता है कि मरते समय व्यक्ति के मुख में अगर गंगा जल पड़ जाए तो व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, गंगा को हमारी संस्कृति में मां का स्थान दिया गया है। जैसे जन्मदात्री मां पुत्रों का दुख हरकर सुख देती है, वैसे ही गंगा भक्तों के लिए दुखहरणी और समस्त आनन्द-मंगलों की जननी है। गोस्वामी जी गंगा महात्म्य के बारे में लिखते हैंः-     ग्ंगा का अतीत जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान भी उतना ही प्रभावशाली है। हिमालय भारत का रजत-मुकुट है और गंगा इसके वक्षस्थल का हीरक-हार। हिमालय से निःसृत होने के कारण इसके जल में जड़ी-बूटियां मिली होती हैं। इसलिए गंगाजल का स्नान और पान दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हितकर हैं। इसके तट पर बड़े-बडे़ महानगरों का आर्विभाव हुआ है, यथा ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, कोलकाता इत्यादि। ये नगर धार्मिक एवं व्यावसायिक-दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण हैं। गंगोत्री से निकलकर बंगाल की खाड़ी से मिलने तक गंगा लंबी दूरी तय करती है। इस बीच गंगाजल से सिंचित भूमि (गंगा का मैदान) सोना उगलने लगाती है। इसके तटों पर हरे-भरे जंगल हैं, जो पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं। इस प्रकार गंगा आध्यात्मिक एवं भौमिक दोनों दृष्टिकोणों से भारत के लिए वरदान है। गीमा में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-’स्त्रोतसामस्ति जाहृवी’ (10/31) अर्थात मैं नदियों में गंगा हूं।

                आज इनती पवित्र और उपयोगी गंगा हमारे कुकृत्यों से दूषित हो चली है। बडे़-बडे़ नगरों का प्रदूषित जल एवं कल-कारखानों से निकले विषैले स्त्राव को सीधे गंगा में प्रवाहित किया जा रहा। यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसकी शु़िद्ध के लिए केन्द्र सरकार ने ’गंगा सफाई योजना’ शुरू की है। परन्तु अभी तक इसके सार्थक परिणाम नहीं प्राप्त हो सके हैं। हमें तो गंगा की वह पूर्ण स्थिति प्राप्त करनी है, जब कहा जाता था-’गंगा तेरा पानी अमृत’। अतः हम भारतीयों का यह पुनीत कर्Ÿाव्य है कि गंगा को प्रदुषित होने से बचाएं।

                सच पूछा जाए तो भातर की मर्यादा गंगा में निहित है औार गंगा की मर्यादा भारत में। गंगा की कहानी भारतीय संस्कृति का इतिहास है। वैदिक युग से इस वैज्ञानिक युग तक सामाजिक तथा राजनीतिक उत्थान- पतन की सारी गाथाएं गंगा की लहरों तथा तटवर्ती शिलाओं पर अंकित है।

गंगा-प्रदुषण की समस्या

पुण्य-सलिला गंगा के जल को सर्वपापहारी, सर्वरोगहारी अमृत-तुल्य माना गया है। यही कारण है कि हिन्दुओं के अनेक तीर्थ हरिद्वार, काशी, प्रयाग आदि गंगा के तट पर स्थित हैं। आर्थिक दृष्टि से गंगा के उपकारों का भारत सदैव ऋणी रहेगा। अनगिनत कल-कारखाने गंगा-तट पर स्थापित किए गए हैं तथा उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल का विशाल क्षेत्र गंगा-जल से सिंचित उर्वर कृषि-क्षेत्र. बना हुआ है। तथापि राष्ट्र का दुर्भाग्य है कि ज्यों-ज्यों जनसंख्या बढ़ती जा रही है त्यों-त्यों गंगा का जल विभिन्न रूपों मंे अधिकाधिक प्रदुषित होता जा रहा है।

                हिमालय के अंक में अवस्थित गंगोत्री से जन्मी हिमालय पर होने वाली वर्षा की विभिन्न जल-धाराओं से गंगा ने नदी का स्वरूप धारण किया। उस क्षेत्र में गंगा निश्चय ही पुण्य सलिला है और उसकी गति में प्रखरता है। किन्तु मैदानी क्षेत्र में उतरते ही उसके प्रदुषण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण गंगा-तट पर घनी आबादी के शहर और गांव विकसित हो गए हैं। उन बस्तियों का सारा कूड़ा-करकट तथा उनसे निकलता हुआ गंदे नाले-नालियों का जल गंगा में दिन-रात समाता रहता है। गंगा तट पर बसे हुए छोटे-बड़े शहरों की संख्या लगभग 920 है। कहा जाता है कि परम पावनी काशी नगरी से ही प्रतिवर्ष लगभग 10 करोड़ लीटर दूषित जल गंगा मंे प्रवाहित होता है। बनारस से ही लगभग 9000 शव प्रतिवर्ष गंगा के किनारे जलाए या बहाए जाते हैं। अधजले मुर्दे बहा देना तो आम बात है। इसी तरह अन्य क्षेत्रों से भी गंदा जल तथा कूड़ा-कचरा गंगा में बहता रहता है।

                कानपुर के निकट से जब गंगा गुजरती है तब कल-कारखानों से भी गंगा-जल प्रदुषित होता है। कानपुर महानगर के चर्म शोधन संयंत्रों से बहुत घातक रासायनिक अवशेष गंगा में बहाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त कपड़ा-मिलों और सैकड़ों प्रकार के अन्य उद्योगों के द्वारा गंगा प्रदूषित होती रहती है। जूट, रसायन, धातु, नगरीय मल, चिकित्सकीय यंत्र, चमड़ा उद्योग, कपड़ा मिल आदि विभिन्न स्त्रोतों से गंगा का अमृत निरन्तर जहर बन रहा है। गंगा-तट पर स्थित उत्तर प्रदेश की औद्योगिक इकाइयों में से अधिकांश कानपुर में स्थित हैं। बिहार से होकर बंगाल की दिशा मंे बढ़ती हुई गंगा को इसी तरह प्रदूषण की भेंट स्वीकार करनी पड़ती है। बंगाल में यह हुगली कहलाती है। हुगली के दोनो तटों पर कोलकाता और उसके निकटवर्ती क्षेत्र मंे उद्योगों की बहुत सी इकाइयां कार्यरत हैं और उन सबसे रासायनिक प्रदूषण दिन-रात हुगली में खपता रहता है। महानगर से करोड़ों लीटर दूषित जन प्रति वर्ष हुगली में बहतर और घुलता रहता है। अनुमान है कि शहरी क्षेत्र से प्रतिवर्ष 4 लाख किलोग्राम वज्र्य पदार्थ नदी में बहाया जाता है। हालत यह है कि प्रदूषित गंगा अमृत के स्थान पर विष बांट रही है। हालांकि हिमालय की गोद में पवित्र गंगा की धारा की प्रत्येक बूंद आज भी, अभी भी अमृत-तुल्य है लेकिन मैदानी क्षेत्र का गंगा-जल प्रदूषण के कारण अपना संजीवनी गुण खो चुका है।

                सच पूछा जाए तो औद्योगिक विस्तारवाद की दानवी गिरफ्त से हमारे जल स्त्रोत बच नहीं पा हैं। यह गिरफ्त प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत, विकलांगता, अस्वस्थता और रूग्णता का कारण बन रही है। प्रदूषित गंगा जल न केवल प्रत्यक्ष उपयोग के कारण, बल्कि खाद्य-शल्य के माध्यम से, मछलियों तथा अन्य जलीय प्राणियों के द्वारा, गगांजल का प्रयोग करने वाले दुधारू पशुओं के द्वारा भी हमें विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार बनना पड़ता है। जल में घुलनशील पदार्थों में अतिरिक्त अघुलनशील पदार्थ भी प्रवेश करते हैं, जिनके कारण नदी की गहराई कम होती जा रही है, अतः छिछली नदी नौकायन के योग्य भी नहीं रह गई है। इससे हमारे व्यापार-वाणिज्य को भी क्षति पहुंचती है। यह भी देखा जा रहा है कि नदी के विषाक्त जल के कारण जलीय प्राणियों की संख्या कम होती जा रही है। कानपुर के निकट शहर का किनारा छोड़कर गंगा की धारा कई फर्लांग दूर हटकर बह रही है। जिसका दुष्परिणाम शहरवासी भोग रहे हैं। धारा को पूर्ववत शहर के निकट लाने के सारे प्रयास विफल हुए हैं। इसका एकमात्र कारण अघुलनशील द्रव्यों के जमा होने पर नदी के तलपट का अत्यधिक उथला हो जाना है।

                औद्योगिकरण की अनियोजित व्यवस्था गंगा-जल के प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है। औद्योगिक विकास के लिए सरकारी प्रयत्नों तथा नीतियों का अधकचरापन, उनके अधूरे निष्कर्ष तथा नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदूषण की जटिल समस्या है जिस पर काबू पाना भारत जैसे विकासशील देश के लिए असंभव नही ंतो कठिन जरूर है। यह भी द्रष्टत्व है कि पर्यावरणविदों द्वारा दिए गए सुझावों को सरकारी अधिकारी अपेक्षित महत्व नहीं देते हैं। पतित पावनी गंगा का 600 कि.मी. का जल-क्षेत्र विशेष रूप से विषाक्त हो चुका है। ’गंगा एक्शन प्जान’ का भी वही हाल हुआ जो प्रायः ऐसी सरकारी परियोजनाओं का होता है। गंगा के निकटवर्ती 29 शहरों को इसके लिए चुन भी लिया गया। यह योजना बनाई गई कि इन शहरों से बहकर गंगा में गिरते हुए गन्दे जल के नालों को गंगा मंे न मिलने दिया जाए, बल्कि नदी की धारा के समानान्तर नए नाले खोल कर सारा गन्दा जल उनसे होकर बड़े-बड़े कुओं में इकटठा किया जाए, जहां से पाइपों के जरिये उस जल को जल साफ करने वाले संयंत्रों को भेजा जाए। इस उद्देश्य से सभी योजनाएं पक्की तरह बनकर तैयार हो चुकी थीं। लेकिन योजनाएं अब भी कागज पर तो हैं, व्यवहार में शिथिलता आ गई है।

                गंगा प्रदूषण का सबसे कारण अगर कोई है तो वह हमारे कल-कारखाने और सरकार की गंगा के प्रति उपेक्षा की भावना। भारतीय लोकतंत्र में राजनीति से सम्बद्ध लोग 99 फीसदी तुष्टीकरण की नीति पर भरोसा करते हैं, इसीलिए यह कहा जाना काफी कठिन है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त कर पाने में सरकार कहां तक सफल हो सकेगी।

गांधी चिंतन

        गांधी दर्शन जितना पवित्र और आदर्शात्मक था उतना ही तत्कालीन भारत के लिए उपयोगी भी था। लेकिन 21वीं सदी में यह दर्शन हमारी जीवन शैली से दूर होता जा रहा है और ऐसा मालूम होने लगा है कि गांधी जी के सपनों का भारत कहीं खो गया है। सत्य के नाम पर झूठ एवं धोखाधड़ी, अहिंसा के नाम पर हिंसा और सादगी और सत्याग्रह के नाम पर स्वार्थ, दिखावा और पूर्वाग्रह से ग्रसित परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। घोटालों का देश हो जाए यह भारत, इससे बड़ा जुल्म और हो ही क्या सकता है  गांधी जी के पदचिन्हों पर चलकर जहां हम गरीबी हटाकर ग्राम विकास का दम्भ भरते थे वहीं आज गरीबी कर चिंता छोड़कर शहरी विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। गरीबी के स्थान पर गरीबों को ही हटाया जा रहा है। आधी जनसंख्या का गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करना, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी और नौकरशाही हमारे अंग-भंग में शामिल है। धर्म के परदे के पीछे साम्प्रदायिकता का जहर फैलने लगा है, धार्मिक उन्माद से हिंसा का ताण्डव हो रहा है। हमारी स्वतंत्रता एवं स्वाालम्बन को विदेशियों के हाथों बेचा जा रहा है। बढ़ता आंतकवाद, हमारी शांति, एकता और अखण्डता को निगल रहा है।

                अब गांधी जी का अस्तित्व तस्वीरों, प्रतिमाआंे व भजन तक सिमट कर रह गया है। प्रति वर्ष गांधी जयन्ती पर फूल-माला चढ़ाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेना ही हमारी और हमारे राजनेताओं की प्रवृति बन गई है। हमें यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि वास्तव मंे वर्तमान परिस्थितियों में गांधी जी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं।

                गांधी जी का सपना कुछ और था। वे पाश्चात्य सभ्यता की चकाचैंध से दूर रहकर भारतीय संस्कृति का उत्थान चाहते थे। उनके सपनों का भारत मानव कल्याण से आपूरित भारत था। उनका मानना था कि जब भी तुम्हें सन्देह हो या तुम्हारा अहंकार तुम्हें परेशान करने लगे, तब तुम स्वंय को निम्नलिखित कसौटी पर परखो-उस गरीब से गरीब और कमजोर से कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो, फिर खुदा से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो क्या उससे उस व्यक्ति का भला होगा? गांधी जी का तो आदर्श था-

                                ’’सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः।

                                सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्विद दुखभाग भवेत।।’’

गांधी जी स्वावलम्बन, समाजवाद, समानता, सादगी और स्वदेशी के माध्यम से ग्राम राज्य और राम राज्य लाना चाहते थे। दुर्भाग्यवश बापू का सपना साकार नहीं हो सका। गांधी के सारे सिद्धान्त हमारे व्यवहार से हटकर सिर्फ ढोल पीटने भर के लिए रह गए हैं। सम्प्रति विज्ञान और टेक्नोलाॅजी प्रधान युग में गांध जी के आदर्शों, सिद्धांतों तथा चिन्तन के साथ-साथ उनकी प्रतिपादित समूची जीवन पद्धति ही प्रासंगिकता के प्रश्नों के घेरे में फंस गई है। उनका विचार इस 21वीं सदी मंे दकियानूसी माना जा रहा है। अहिंसा रूपी ढाल टूट चुकी है, निहत्थी निरीह जनता गोलियों का शिकार हो रही है और गांधी का जीवन दर्शन सत्य की वह ढाल बन चुका है जिसे लेका सर्वत्र असत्य की लड़ाई लड़ी जा रही है। गांधी जी हरिजन उद्धार की बात करते थे, आज उन्हीं के देश में हरिजन इस  समाज में सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं। उन्हें आरक्षण के छलावे से फुसलाया जा रहा है।

                सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में ’गांधी नहीं रहे पर गांधीवाद घसीटा जा रहा हे। सैकड़ों संस्थाएं उनके  नाम पर चल रही हैं। सत्ता की नई पौध उनके नाम पर पनपती है। दार्शनिक उनके सिद्धांतों एवं आदर्शों की चकाचैंध फैलाते हैं। संसार को चकित करते हैं।’ गांधीजी का मूलमंत्र था साधन को पाने के लिए साधन की पवित्रता की अनिवार्यता। भारतीय समाज में गांधीजी की सबसे बड़ी देन यही थी कि उन्होंने करोड़ों बेबस लोगों को आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति संकल्प, स्वावलम्बन की प्रेरणा दी। सुस्पष्ट है कि गांधी की राजनीति नैतिक मूल्यों पर आधारित थी। बायड आर. के. का तो यहां तक कहना है कि ’’मेरे विचार स ेअब वह समय आया पहुंचा है जब गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को विश्वव्यापी स्तर पर व्यवहार में लाना चाहिए। इसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जनता वह अनुभव करती है कि इसके सिवा विनाश से परित्राण की कोई आशा नहीं है।’’

                ’’आजादी के बाद गांधी जैसे सन्त राजनीतिक नेता की सार्थकता ही नहीं रही।’’ यह कथन माक्र्सवादी विचाराधारा के पुरोधा ई. एम.एस. नंबूदरीपाद का है। उनका यह कथन कड़वा तो लगता है लेकिन यह सत्य है। गांधी ने अपने विषय मंे स्वयं भी कहा है-’आज हिन्दुस्तान में कौन-सी ऐसी चीज हो रही है जिसमें मुझे खुशी हो सके। कांग्रेस बहुत बड़ी संस्था हो चुकी है। इसके सामने मैं उपवास नहीं कर सकता। लेकिन आज मैं भटठी में पड़ा हूं और मेरे दिल में अंगार जल रहे हैं।’

                गांधी जी ने अपनी नयी जिन्दगी को सार्वजनिक आयाम देकर, अपने दर्शन को जमीन पर उतारकर, आखिरी आदमी की लड़ाई लड़ने की कोशिश की। धनी से लेकर सर्वहारा, कृषक से लेकर जमींदार, बाबू से लेकर अधिकारी, सभी के नेतृत्व का भार उठाया और राजनीतिक जगत में उनका मुकाबला करने वाला अब तक कोई पैदा नहीं हुआ। गांधी जी अपनी मृत्यु के कई दशक बाद भी लोगों के दिमाग मंे लिखित हैं क्योंकि वे भारत के लिए उसी प्रकार थे जिस प्रकार-’गंगा और हिमालय।’

                निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियो में गांधी दर्शन को अपनाकर चलना जहां मुश्किल है, वहीं उसे पूर्ण रूप से नकारना भी हमारे हित में नहीं है। नए विचारों के बारे में गांधी जी ने कहा था-’’मैं नए विचारों को कदापि नहीं रोकना चाहता, पर मैं उनका गुलाम भी नहीं बनना चाहता।’’ यदि हम कहें वह पुराने युग में थे-उनके सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका दर्शन पराधीन भारत के लिए ही मान्य था तो क्या हमारा यह कर्तव्य नही होगा कि हम विचार करें कि आज कौन से सिद्धांत हमारे देश के लिए मान्य होंगे। शांति, सुरक्षा, स्वावलम्बन, सादगी, स्वाभिमान, अहिंसा की आवश्यकता जितनी आज है उतनी तब नहीं थी। बढ़ते हुए कटटरवाद, अलगावाद, आंतकवाद एवं असहिष्णुता के वर्तमान युग में गांधी चिंतन आज पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक है।

                राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती बेरोजगारी, जाति एवं नस्ल की वैमनस्यता, आर्थिक विषमताओं से उभरती, आर्थिक नूतन प्रवृतियों एवं अस्थिरता मे गांधी की राजनीति, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विचारधारा आज अत्यन्त प्रासंगिक है क्योंकि यह इन समस्याओं को सुलझाने में सक्षम है। हमें गांधी दर्शन के समानुकूल दर्शन करने का सदुपयोग करने का संकल्प लेना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही गांधी दर्शन का उपयोग किया जाना चाहिए। आज हमें अंधानुकरण के संकीर्ण मार्ग से थोड़ा हटकर इस दिशा मंे गहन विचार करने की आवश्यकता है ताकि हम उस महान पुरूष के सपने को साकार कर सकें।               । हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल कहने की बात रह गई है। पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता का गहरा रंग चढ़ता जा रहा है, मद्यपान हमारी सभ्यता और सम्मान का परिचायक बन चुका है। जो लोग भ्रष्ट आचरण और चरित्रहीनता के लिए बदनाम हैं, वे ही हर क्षेत्र में हमारे पथ प्रदर्शक एवं भाग्य विधाता बन बैठे हैं-

चुनाव या निर्वाचन

‘जम्हूरियत वह तर्ज-ए-हुकूमत है कि जिसमें,

बन्दों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।‘

– मो. इकबाल

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। प्रजातांत्रिक शासत-प्रणाली में शासन जनता के हाथों में होता है। लेकिन यह संभव नहीं है कि जनता स्वयं शासर करे। इसमें जनता द्वारा चयनित या निर्वाचित प्रतिनिधि शासन चलाते हैं। इन प्रतिनिधियों का चयन जिस प्रक्रिया द्वारा होता है उसे ही ‘चुनाव या निर्वाचन‘ कहते हैं। चुनाव में विजयी उम्मीदवार देश का शासन चलाता है। अतः यह आवश्यक है कि प्रतिनिधियों का चयन सही हो अन्यथा देश में कुव्यवस्था फैल सकती है। इसलिए चुनाव प्रजातांत्रिक शासन-प्रणाली की आधारशिला है।

स्वतंत्र भारत में पांच वर्षों के अन्तराल पर आम चुनाव का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा मध्यावधि चुनाव और उन-चुनाव की भी व्यवस्था है। भारत में भली-भांति चुनाव सम्पन्न कराने के लिए चुनाव-आयोग की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग के सर्वोच्च पदाधिकारी को मुख्य चुनाव आयुक्त कहा जाता है। केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के अधीन राज्यों में भी राज्य निर्वाचन आयोग कार्य करता है। चुनाव में 18 वर्ष या ऊपर के सभी वयस्क स्त्री-पुरूष मतदाताओं को मन देने का समान अधिकार है, बशर्ते वह पागल, दिवालिया या आपराधिक चरित्र का न हो। चुनाव दो तरह से सम्पन्न कराए जाते हैं-1. प्रत्यक्ष, 2. अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता सीधे अपना मत देकर प्रतिनिधियों का चयन करती है, जैसे- विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों का चुनाव। अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही चुनाव में भाग लेते हैं। यथा- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा तथा विधान परिषद के चुनाव।

च्ुनाव के लिए सर्वप्रथम चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है। चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवार खड़ा करते हैं। इसके लिए चुनाव क्षेत्र निर्धारित रहते हैं। सम्पूर्ण चुनाव क्षेत्रों को छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया जाता है। उन इकाइयों के सभी मतदाता एक स्थान पर एकत्र होकर, पंक्तिबद्ध होकर मतदान करते हैं। उस स्थान को मतदान केन्द्र कहा जाता है। मतदान केन्द्र का सही संचालन करने के लिए उसका सबसे बड़ा अधिकारी पीठासीन अधिकारी कहलाता है। निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान के लिए पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है। प्रत्येक मतदान केन्द्र (बूथ) पर मतदाताओं की संख्या लगभग 500 से 1000 के बीच होती है। निर्धारित तिथि के एक दित पूर्व ही चुनाव कर्मचारी बूथ पर पर पहुंच जाते हैं। वे अपने साथ मतपत्र, मतपेटियां या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन (इ.वी.एम.) तथा अन्य चुनाव-सम्बन्धी सामान ले जाते हैं। शांति-व्यवस्था के लिए बूथों में से संवेदनशील अथवा अतिसंवेदनशील बूथों का चयन पहले ही कर लिया जाता है। पीठासीन अधिकारी की देख-रेख में चुनाव सम्पन्न होता है। मतदान कार्य प्रातः 8 बजे से 5 बजे शाम तक चलता रहता है। मतदान के बाद मतपेटियों या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन को सील कर दिया जाता है। मतगणना की तिथि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित की जाती है। निर्धारित समय पर मतगणना की जाती है। मतगणना स्थल के चारों ओर सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की जाती है। मतगणना के बाद जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे विजयी घोषित किया जाता है और सम्बन्धित जिले के जिलाधिकारी की उपस्थिति में उस उम्मीदवार को विजयी होने का प्रमाणपत्र दिया जाता है। उस क्षेत्र के सिविल एस.डी.ओ. या बी.डी.ओ., जो भी रिटर्निंग ऑफिसर होते हैं, उनके द्वारा विजयी होने का प्रमाण पत्र दिया जाता है।

भारत में चुनाव एक समस्या है, क्योंकि भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है। अशिक्षित जनता चुनाव का महŸव नहीं समझ पाती है। जातीयता, साम्प्रदायिकता एवं आर्थिक प्रलोभन के चक्कर में फंसकर वह अपने मताधिकार का दुरूपयोग कर बैठती है। चुनाव के समय हत्या, बूथ-कैप्चरिंग या बूथ पर भय का वातावरण बनाना आम बात है। शक्तिशाली लोग बहुमत प्राप्त करने के लिए बूथों को ही अपने पक्ष में लुटवा लेते हैं। पैसों के बल पर गरीब जनता का मत खरीद लिया जाता है। अब तो सŸाालोलुप पदाधिकारी भी बूथ लुटवाने में असामाजिक तŸवों का सहयोग करते हैं। इतना ही नहीं, वे पदाधिकारी मतगणना में भी हेराफरी से नहीं चूकते।

इस प्रकार चुनाव का अर्थ ही समाप्त हो जाता है। इस चुनाव का एक खास दोष यह भी है कि इसमें मूर्ख और विद्वान में कोई अन्तर नहीं रह जाता। यही कारण है कि आज विधायिकाओं में बुद्धिमान के बदले पहलवान लोग ही ज्यादा सुशोभित हो रहे हैं।

सारांशतः लोकतन्त्र की सफलता के लिए चुनाव का निष्पक्ष होना जरूरी है। इसके लिए चुनाव को एक पर्व की तरह मनाया जाना चाहिए। जैसे पर्व में पवित्रता का काफी महŸव है-हिंसा, बूथ-लूट, जातीयता, साम्प्रदायिकता, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि चुनाव की अपविभताएं हैं- इन्हें दूर भगाकर ही चुनाव को पवित्र बनाया जा सकता है। इसीलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए-’’चुनाव युद्ध नहीं, तीर्थ है, पर्व है।’’

दल-बदल की राजनीति

    दल-बदल का सामान्य अर्थ अपने दायित्व को त्यागना या उससे मुकरना है। लेकिन राजनीति में विशेष स्थितियों में इसके विभिन्न स्वरूप होते हैं। जैसे-दल का बदलना, जिस दल के अधीन चुनाव लड़े उस दल का त्याग, कोई दल छोड़ना या फिर उसमें शामिल होना आदि। अभी तक दल-बदल की कोई सार्वभौमिक एवं सर्व स्वीकृत परिभाषा नहीं बन पाई है। इस दिशा में डाॅ. सुभाष कश्यप की परिभाषा बहुत हद तक दल-बदल की अवधारणा को स्पष्ट करती है। उनके अनुसार दल-बदल का मतलब राजनीतिक प्रतीक का बदलना है, जिसमें निम्नलिखित मामले शामिल हो सकते हैं-

एक दल के टिकट पर विधायक चुना जाना और फिर उस विशेष दल को छोड़कर अन्य दल में चला जाना।दल से त्यागपत्र देकर अपने को निर्दलीय घोषित कर देना।

निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतकर किसी विशेष दल में शामिल हो जाना।

                यदि कोई विधायक या सांसद किसी मामले में दल से त्यागपत्र दिए बिना अपने दल के विपरीत मत देता है तो उसे किसी भी रूप में दल-बदल से कम नहीं माना जाना चाहिए। वस्तुतः दल-बदल की प्रक्रिया उसी समय शुरू हो जाती है जब व्यक्ति चाहे किसी भी उद्देश्य से अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलता है। मूलतः राजनीतिक दल-बदल की क्रिया का प्रेरक किसी लाभ की संभावना होती है। सामान्यतः दल-बदलू वे लोग है जो राजनीतिक लाभ के लिए अपनी अवस्था बदल लेते हैं। यद्यपि कुछ राजनेताओं ने सैद्धांतिक आधार एवं नीतिगत मतभेदों के आधार पर कोई दल छोड़ा है तथापि अधिकतर मामलों में राजनीतिक दल-बदल का कारण घोर अवसरवादिता तथा पद-लाभ की आकांक्षा रही है। यदि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लोकतांत्रिक स्वरूप के शासन मंे दल-बदल विभिन्न स्वरूपों एवं मात्राओं में पाया जाता है। विश्व का कोई लोकतांत्रिक देश इसका अपवाद नहीं है। ब्रिटेन में ग्लेडस्टन, चर्चिल जैसे महान नेताओं ने सदन में अपना पाला बदला। यदि हम स्वतंत्रता पूर्व इतिहास को देखें तो श्यामलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, हाफिज मुहम्मद इब्राहिम जैसे कई नाम हैं, जिन्होंने कई पद लाभों के लिए अपनी दलीय प्रतिबद्धताएं बदलीं। 1967 के पूर्व आचार्य नरेंद्रदेव, जे.बी. कृपालानी, अशोक मेहता इत्यादि नेताओं ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदलीं, किन्तु इन घटनाओं ने दलीय राजनीति को अधिक दूषित नहीं किया।

                जो भी हो, भारत में चतुर्थ आम चुनाव (1967) के बाद राजनीतिक दल-बदल की समस्या ने गंभीर रूप धारण कर लिया। इस दल-बदल की प्रवृति में और वृद्धि होती गई तथा जून 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद भारत की राजनीति में तो जैसे दल-बदल की बाढ़-सी आ गई। इतना तो तय है कि भारत में राजनीतिक दल-बदल की प्रक्रिया का उद्भव कांग्रेस के पतन से ही त्रीव हुआ।

  1. राजनीतिक दल-बदल के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-
  2. अधिकतर दल-बदल राजनीतिक लाभ के लिए होता है।
  3. दलों मे अन्तर्कलह और उनमें गुटबन्दी के कारण हो सकता ळें
  4. राजनीतिक दलों में सैद्धांतिक ध्रुवीकरण का अभाव हो सकता है।
  5. साधारण विधायक और दल के नेता के बीच व्यक्तित्व का टकराव हो सकता है।
  6. पद, धन, स्तर आदि का लालच या उसका अभाव हो सकता है।
  7. राजनीतिक दलों में शक्तिशाली दबाव समूहों की भूमिका हो सकती है।
  8. सभी दलों में वृद्ध लोगों का नेतृत्व हो सकता है।
  9. दलों की सदस्यता, उनके लक्ष्यव गतिविधियों में जन भागीदारी का अभाव तथा चुने हुए प्रतिनिधियों की दल-बदल सम्बन्धी गतिविधियों के प्रति जन उपेक्षा हो सकती है।
  10. राज्य विधानसभाओं में अल्पमत वाली सरकारें तथा निर्दलीय सदस्यों की भूमिका हो सकती है।

                उपरोक्त कारणों से  स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दल-बदल मंे व्यक्तिगत लाभ की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

                दल-बदल रोकने के लिए समय-समय पर सरकार ने प्रयास किए। 8 दिसम्बर 1967 को लोकसभा ने एक उच्च स्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव पारित किया, जिसमे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एवं संवैधानिक विशेषज्ञ रखें गए। इसके बाद पुनः 16 मई 1973 को लोकसभा मे राजनीतिक दल-बदल विरोधी विधेयक पेश किया। पुनः इसके बाद जनता सरकार ने अप्रैल 1978 में एक विधेयक रखा जिसमे संविधान के अनुच्छेद 102 और 109 को परिवर्तित कर संसद एवं राज्य व्यवस्थापिकाओं के सदस्यों की योग्यताओं को पुननिर्धारित किया गया और अनेक प्रावधान किए गए। लेकिन पूर्व के सभी प्रयास असफल ही सिद्ध हुए। दल-बदल के विरोध में पहला ठोस कदम राजीव गांधी के द्वारा उठाया गया। राजीव गांधी सरकार ने 8वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में विपक्षी दलों के सहयोग से दल-बदल पर अकुंश लगाने पर सहारनीय कार्य किया। जनवरी 1985 में दोनों सदनों से पारित होकर यह चर्चित विधेयक 52वें संविधान विधेयक के रूप में सामने आया। इसने भारतीय संविधान मंे दसवीं अनुसची को बढ़ाया जिसमें निम्नलिखित प्रावधान हैं, जिससे दल-बदल को रोकने का प्रयास किया गया-

                निम्न परिस्थितियों में संसद या राज्य विधानमण्डल के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी-

                यदि वह स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे दे।

                यदि वह अपने दल या उसके अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान के समय अनुपस्थित रहे। परन्तु यदि 15 दिन के अन्दर उसका दल उसे उल्लंघन के लिए क्षमा कर दे तो उसकी सदस्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य एक निश्चित समयावधि में किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाए, तो उसे दल-बदल का दोषी नहीं माना जाएगा।

                किसी राजनीतिक दल के विघटन पर विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होगी यदि मूल दल के एक तिहाई सांसद, विधायक वह दल छोड़ दें।

                इसी प्रकार विलय की स्थिति मंे दल-बदल नहीं माना जाएगा। यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में मिल जाएं।

                दल-बदल के किसी प्रश्न पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होगा और किसी न्यायालय को उसकी वैधता जांचने का अधिकार नहीं होगा।

                इस विधेयक को कार्यान्वित करने के लिए सदन के अध्यक्ष को नियम व निर्देश बनाने का अधिकार होगा।

                यह सही है कि दल-बदल विरोधी अधिनियम हमारे राजनीतिक जीवन को स्वच्छ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वह ज्यादा अच्छा होता कि दल-बदल के प्रमुख कारणों जैस भौतिक लाभ की सम्भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगाया जाता तथा दल-बदलू को स्वीकारने वाले दल को कुछ समय के लिए अमान्य घोषित कर दिया जाता। इसके अतिरिक्त एक व्यावहारिक सुझाव यह भी हो सकता है कि राजनीतिक लाभ रोकने के लिए किन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था के साथ-साथ स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं का विकास होता। मंत्रिपरिषद के आकार पर प्रतिबन्ध, मंत्री की अवधि का निर्धारण तथा राजनीतिक दल बदलुओं की सदन की सदस्यता समाप्ति आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे दल-बदल को कुछ हद तक रोका जा सकता है तथा जनता को भी इस दिशा में जागृत करना चाहिए जिससे ऐसे अपराधियों को स्वस्थ जनमत सजा दे तथा ऐसी संभवनाओं को निरूत्साहित करे। अतः जनता को स्वंय अपने सांसदों एवं विधायकों पर कड़ी निगाह रखनी होगी क्यांेकि विधायी एवं नैतिक विकल्पांे का संयोजन ही इसका एकमात्र प्रभावी उपचार हो सकता है।

नास्टैल्जिया

           आजकल हर जगह नास्टैल्जिया का व्यापार किया जा रहा है। एक संगीत कम्पनी ने फ्लैशबैक नामक एक एलबम के लिए 21 हिट गानों का चयन किया। यह कम्पनी तीसरे-चैथे दशक से संगीत का व्यापार कर रही है। उसके संग्रह में ऐसी धुनें हैं जिनसे लगभग प्रत्येक पीढ़ी की भावनाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। वस्तुतः इस कंपनी ने युगों पहले नास्टैल्जिया को कमाऊ जरिया बना लिया था। हम सब जानते हैं कि खुशबू के बाद संगीत ही आपको तत्काल अतीत में ले जा सकता है। प्रत्येक पीढ़ी के लोगों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ अपनी घड़ी को पीछे ले जाने और अतीत के सुखद समय में लौट जाने की चाह बढ़ती जाती है। व्यापारियों ने इसे समझ लिया है और इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं। हाल के समय में बाॅलीवुड में रीमेक और रीमिक्सेज की बहार आ गई है। दुनिया भर में ’मुगले आजम’ की सफलता से यह साफ है कि जितनी तेजी से हम सहस्त्राब्दी में आगे बढ़ रहे हैं उतनी ही तीव्र एक पीढी़ को वापस पीछे देखने की इच्छा है।

                नास्टैल्जिया तनाव से मुक्ति देता है। यह अनेकानेक लोगों को बढ़ती उम्र मृत्यु और सतत परिवर्तन की चिंता से लड़ने की शक्ति देता है। उच्च गति वाले माॅडेम तथा 200 के करीब चैबीसों घंटे चलने वाले चैनलों के प्रहार से भारतवासी घिर गए हैं। भारत की लगभग आधी आबादी जो अभी युवा है, इस नई सुबह का स्वागत कर रही है और डिजिटल युग से लाभ उठा रही है। जबकी अनेक ऐसे लोग हैं जो इस संस्कृति के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं क्योंकि यह उनकी अपनी जमीन से उदित नहीं हुई है। इन पुराने लोगों को अपने अतीत से कुछ ऐसी कोमल चीजें चाहिए जो उन्हें सुकून दे सकें।

                विश्व की सबसे बड़ी मार्केटिंग कम्पनियों के लिए काम करने वाले एक विशेषज्ञ ने पिछले दिनों कहा,’’इन दिनों हम अपनी अधुनिक सुविधाओं की पैकेजिंग पुरानी शैली में कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इससे उम्रदराज लोगों की अतीत की स्मृतियां जागेंगी, उनकी जेब में पैसे है, वे हमारे उत्पाद खरीदेंगे।‘‘ इससे मैकडोनाल्ड के उस विज्ञापन का निहितार्थ समझने में आसानी होगी जिसमें बर्गर के विज्ञापन के लिए वह राजकुमार, संजीव कुमार और राजेश खन्ना के हमशक्लों का इस्तेमाल करता है। ऐसा करके वह उम्रदराज लोगों को अपने फास्ट-फूड की ओर आकर्षित करता है।

                आजकल एफ. एम. रेडियों पुराने हिट गानों का कार्यक्रम प्रसारित करता है जबकि ऐसे टीवी चैनल भी हैं जो केवल पुरानी फिल्में ही दिखाते हैं। मुगले आजम का नया संस्करण न केवल भारत बल्कि पाकिस्तान मे भी हाथों-हाथ बिका है और फिल्म निर्माताओं की नई पीढ़ी अपने अगले विषय के लिए बाॅलीवुड का पुराना कचरा खंगाल रही है। आधुनिक अभिनेताओं को पुराने विषयों में प्रस्तुत कर वे अपना बाजार बढ़ा रहे है। पुरानी फिल्मों के री-मेक का दौर चल पड़ा है।

                स्वर्णिम स्मृतियों का व्यपार दुनिया भर में फायदे का धंधा बन रहा है। अमेरिका में समय-समय पर एक के बाद एक पुराने गानों की सीडी, पुरानी तस्वीरों की पुस्तकें अथवा बचपन की याद दिलाने वाले लेखों की पुनः पैकेजिंग कर उन्हें जारी किया जा रहा है। जापान के लगभग तीन करोड़ लोग जो कुल आबादी का लगभग एक चैथाई है 38 से 56 वर्ष की आयु के हैं। दुनिया भर में इस आयु वर्ग के लोग केवल किशोरों पर केन्द्रित पाॅप संस्कृति को खारिज कर रहे है। इस प्रवृति के अनुकूल तथा उपभोक्ताओं की नास्टैल्जिया से भरी भावनाओं के अनुरूप व्यापारी एक के बाद एक ऐसे उत्पादों की लहर पैदा कर रहें है जो इस समूह की युवावस्था के दौरान लोकप्रिय थे।

                भारत अब इस प्रवृति की तरफ आंखे खोल रहा है। मजबूत अर्थव्यवस्था तथा पिछले कुछ वर्षो में अचानक आई समृद्धि के बावजूद सच्चाई यह है कि भारतीय लोगों को इन्हें आत्मसात करने में अभी थोड़ा समय लगेगा। हमारे जीवन में आए नाटकीय परिवर्तनों के कारण हमारी इच्छा मित्रों और परिवार वालों के साथा सहज बातचीत की और हमारे जीवन पर छा गए ब्रांडों और गति से मुक्त ठेठ देहाती जीवन जीने की होती है। भारतीय लोग अपनी परम्परा के प्रति काफी संवेदनशील हैं और अतीत की स्मृमियां उन्हें धराशायी कर देती हैं। उदीयमान नास्टैल्जिया के व्यापार से उन्हें उपनी इस कमजोरी से मुक्ति मिलती है। युवा भारत आज जहां दीप्त भविष्य के सपने देख रहा है वहीं उम्रदराज लोग अपने धूमिल कल की स्मृतियों के सहारे जी रहे हैं।

                यह नास्टैल्जिया कब तक बना रहेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन यह कहना उचित होगा कि युवा सपनों के आक्रमण से बढ़ती उम्र के अमीर भारतीय लोगों को अतीत से सम्बन्ध स्थापित कर अपने जीवन पर नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा बलवती होती जा रही है।

निःशस्त्रीकरण

         निःशस्त्रीकरण का अभिप्राय है घातक शस्त्रास्त्र पर नियंत्रण रखना और शस्त्रों की बढ़ती संख्या को रोकना। विश्व-शांति का मूल उपाय निःशस्त्रीकरण में ही निहित है। आज विश्व शस्त्रों के अम्बार के नीचे दमघोंटू परिस्थिति में पड़ा हुआ है। विज्ञान ने इतने शक्तिशाली बमों का निर्माण कर लिया है कि विश्व की शांति के लिए खतरा पैदा हो गया है। प्रधानमंत्री नेहरू ने आधुनिक अस्त्रो की भीषणता का वर्णन करते हुए कहा-’’आज के भीषण हाइड्रोजन बमों के सम्मुख एक-एक बम जो हिरोशिमा और नागासाकी में गिराए गए थे, खिलौने के तुल्य हैं।’’ इन अणुबमों के विनाशक प्रभाव को हिरोशिमा और नागासाकी मे देखकर लोग कांप उठे थे। उसकी स्मृति से मानवता का कलेजा कांप उठता है, किन्तु जब वे शस्त्र आधुनिक शस्त्रों के सम्मुख खिलौने के तुल्य हैं, तो बड़े शस्त्र कितने भंयकर होंगे, हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

                जब इतने भंयकर शस्त्रों का निर्माण हो चुका और दिन-प्रतिदिन उनकी भंयकरता मंे वृद्धि होती जा रही है, तब मानव का चिंतित हो उठना नितान्त स्वाभाविक है। आज विश्व की समस्या युद्ध और शांति है। युद्ध शस्त्रों से ही लड़े जाएंगे और इन भयानक शस्त्रों का प्रयोग प्राणिजगत को रसातल में पहुंचा देगा। अतः विचारकों और शांतिप्रिय विश्व नेताओं का मत है कि मानवता की रक्षा के लिए अस्त्रों का विनाश आवश्यक है। निरस्त्रीकरण ही इस अशांति का एकमात्र उपाय है।      द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका देखकर प्रत्येक राष्ट्र चिंतित हो उठा और शांति-स्थापना के लिए सभी ने सामूहिक प्रयास आरम्भ किए। 1945 में निरस्त्रीकरण का प्रश्न बड़े-बड़े राष्ट्रों द्वारा उठाया गया। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने युद्धों की विभीषिका को रोकने के लिए ’संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की। सन् 1946 में आणविक शस्त्रों पर नियंत्रण रखने के लिए अणुशक्ति आयोग का गठन किया गया और 1947 में सशस्त्र सेनाओं और हथियारों को घटाने के लिए परम्परागत शस्त्रास्त्र आयोग बनाया गया। 11 जनवरी 1952 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निरस्त्रीकरण आयोग की स्थापना की। इसके कर्तव्य निम्नलिखित थे-

                सभी सशस्त्र सेनाओं और इस प्रकार के हथियारों के नियमन, उसकी सीमा और उसे संतुलित करना।

                जनसंहार के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले सभी बड़े अस्त्रों को नष्ट करना।

                अणुशक्ति का प्रभावकारी, अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण करने के लिए ऐसे प्रस्ताव तैयार करना।

                निरस्त्रीकरण को लागू करने, राज्यों के सैनिक बजटों के स्थिरीकरण करने, परमाणविक अस्त्रों के प्रयोग की समाप्ति की घोषणा करने, युद्ध प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने, समाजवादी और पूंजीवादी देशों के बीच अनाक्रमण संधि सम्पन्न करने, दूसरे देशों के प्रदेशों से फौजों को हटाने, परमाणविक अस्त्रों के और भी अधिक प्रसार करने के विरूद्ध कदम उठाने, आकस्मिक आक्रमण को समाप्त करने के लिए कार्यवाहियां करने सम्बन्धी उपायों को क्रियान्वित करने की नितांत आवश्यकता है। जब तक ईमानदारी एवं सद्भावना से बड़े राष्ट्र निःशस्त्रीकरण का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इसमंे सफलता की आशा नहीं की जा सकती। पश्चिमी शक्तियों ने दोरंगी चाल अपनाई है। एक ओर वे विश्व-शांति-सम्मेलन में भाग लेकर ऊंचे आदर्श और विचार रख रहे हैं, दूसरी ओर अपने परमाणु शक्ति परीक्षण में सतत प्रयत्नशील हैं।

                बहुत प्रसन्नता का विषय है कि आज संसार के अनेक देश निःशस्त्रीकरण की समस्या और उसके महत्व पर गम्भीरता से विचार करने लगे हैं। निःशस्त्रीकरण के लिए आज के बुद्धिवादी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है-सहानुभूति, करूणा, प्रेम, दया, भाईचारा तथा विश्व बन्धुत्व की जिसमें संसार मंे शांति का वातावरण उत्पन्न हो सके। राष्ट्रपति डाॅ. राधाकृष्णन के ये शब्द, जो परमाणु हथियार विरोधी सम्मेलन में भाषण देते हुए कहे थे, कितने तर्कयुक्त, सामयिक एवं गम्भीरतापूर्ण हैं-

                अतः निःशस्त्रीकरण आज की मांग है और आवश्यकता इस बात की सबसे अधिक है कि उचित निदान द्वारा विश्वजनित मतभेदों को भुलाकर अशान्ति का माहौल खत्म किया जाए। अतः निःशस्त्रीकरण वरणीय, ग्रहणीय, सराहनीय एवं श्लाघनीय है। 

पोषाहार

शरीर का स्वस्थ रहना जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। रोगाी व्यक्ति का जीवन स्वस्थ आचार-विचार के अभाव में बोझ बनकर नष्ट हो जाता है। जिस देश के नागरिक स्वस्थ नहीं होते वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता । यही कारण है कि प्रत्येक राष्ट्र अपने नागारिकों के पोषाहार के स्तर को अच्छे से अच्छा बनाए रखने की चेष्टा करता है। पोषाहार का सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि पोषाहार पर किसी भी राष्ट्र की सपन्नता, सुरक्षा और प्रगाति निर्भर करती है। कुपोषण का बुरा प्रभाव न केवल शारिरिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है, बल्कि वह मानसिक और बौद्धिक क्षमता को भी नष्ट करता है।, जिससे राष्ट्र की उत्पादन शक्ति घट जाती है, राष्ट्र पतन की और बढ़ने लगता है! पोषाहार व्यक्ति के शरीर को सुडौल, सुन्दर तथा प्रभावशाली बनाता है। सुन्दर व्यक्तित्व रखने वालों को सदैव सफलता मिलती है। अपरिचित लोग भी ऐसे व्यक्ति के सहायक तथा हितैषी बन जाते हैं।

गरीबी और अज्ञानवश लोग कुपोषण के चंगुल में फंस जाते हैंै। इसलिए गरीबी दूर के साथ-साथ उन्हें पोषाहार की उचित शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गरीबी ही कुपोषण का कारण है। साधारण आय वाला व्यक्ति भी खान-पान के सम्बन्ध में सूझ-बूझ से काम लेकर उचित पोषाहार प्राप्त कर सकता है। भारत सरकार की और से ऐसे कई केन्द्र और कई इकाइयां स्थापित की गई हैं जो गांवों में साधारण तौर से पाई जाने वाली खाद्य-वस्तुओं के सही उपयोग की शिक्षा दे रही हैं। सरकारी प्रशिक्षण केन्द्र गांव वालों को यह शिक्षा देते हैं कि जो मौसमी फल,सब्जियां गांव में मिलती हैं उनका संरक्षण किस प्रकार किया जाए ताकि दूसरे मौसमों में भी उन्हें वे फल और सब्जियां मिलती रहें। शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्येक्रम बड़े व्यापक रूप से व्याख्यान, परिचर्चा, फिल्म, प्रदर्शनी आदि की सहायता से चलाया जाता है। इतना ही नहीं, भोजन में क्या लेना चाहिए, कितना देना चाहिए तथा भोजन पकाने में कोैन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए आदि बातों से भी लोगों को परिचित कराया जा रहा है। वे यह भी सीखते हैं कि भोजन का संरक्षण किस प्रकार किया जाए और दूषित भोजन से कैसे बचा जाए। ऐसे प्रशिक्षित लोग इस तथ्य को अच्छी तरह समझ लेते हैं कि गरिष्ठ, सुस्वादु और महंगा भोजन स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार हानिकारक होता है।

स्रकार के खाद्य-विभाग ने गरीब परिवारों के लोगों के लिए सस्ते खाद्य-पदार्थ बनाने की योजनाएं बनाई हैं और उन्हें शुरू कर दिया हैं। ऐसा एक पदार्थ है-‘मिल्टन‘। यह दूध जैसा एक पेय पदार्थ है। आज हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख लीटर ‘मिल्टन‘ तैयार किया जाता है। इसी तरह दूध में विटामिन ‘ए‘ और नमक में लौह तथा आयोडीन तत्व मिलाकर उन्हें अधिक पोषक बनाया जा सकता है। राजस्थान और तमिलनाडु में ऐसी योजनाएं अपनाई जा रही हैं, जिनके द्वारा नमक में लौह तत्व मिलाकर उसे विशेष गुणकारी बनाया जा रहा है। कृषि-वैज्ञानिक निरन्तर नये-नये किस्म के अनाज, फल और सब्जियों उगाने के उपायों की खोज में लगे हुए हैं, ताकि भारत जैसे गरीबों की विशाल जनसंख्या वाला देश सस्ते पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन अधिक से अधिक मात्रा में कर सके।

भारत मुख्यतः गांवों का देश है जहां तीन-चैथाई आबादी गांवों में ही रहती है। गांवों की जनता का दो-तिहाई भाग गरीब है और बीस प्रतिशत भाग तो गरीबी रेखा के बीच है। अतः कुपोषण इस देश की महŸवपूर्ण समस्या है। भारत सरकार का खाद्य विभाग कुपोषण से देश की रक्षा के लिए अनेक कार्यक्रमों को क्रमशः लागू कर रहा है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में चार प्रयोगशालाएं फलों और सब्जियों के क्षेत्र में उनके विभिन्न गुणों तथा घरेलू उपभोग के सम्बन्ध में निरन्तर अनुसंधान कार्य कर रही हैं। इसी तरह प्रत्येक खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों और उनकी मात्रा की खोज की जा रही है। अत्यधिक पिछड़े क्षेत्रों में और आदिवासी इलाकों में विशेष तथा पूरक पोषाहार और  दिन में भोजन देने के कार्यक्रम भी धीरे-धीरे लागू किए जा रहे हैं। इसमें सरकार के साथ-साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी भाग ले रही हैं। अतः भारत में लोग पोषाहार के महŸव को समझने लगे हैं तथा उनमें जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है।