गंगा की आत्मकथा

मेरा नाम गंगा है। मैं ही हूँ पतित पावन गंगा। मेरी शोभा बढ़ाने मेरे किनारों पर कई तीर्थ स्थान बने हैं। मैं ही जन जन को पावन करती हूँ।
वेदों के अनुसार मैं देवताओं की नदी हूँ। मैं पहले स्वर्ग में बहा करती थी, मेरा नाम अमृत था। एक दिन मेरे भक्त ने मेरी कड़ी तपस्या कर मुझे भू लोक पर आने को विवश कर दिया।राजा सगर के वंश की तप-परंपरा के कारण ही मुझे विवश हो, धरती पर आना पड़ा।
मैं आज आप सभी को मेरी धरती पर आने की महान् कथा सुनाती हूँ, मेरी यह कहानी सिर्फ रोचक ही नहीं बल्कि रोमांचक भी है।
बात बहुत पुरानी है। सगर नाम के प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा थे। उन्हें 100 अश्वमेघ यज्ञ परे करने का गौरव प्राप्त था। अंतिम यज्ञ के लिए जब उन्होंने श्यामवर्ण का अश्व छोड़ा तो इंद्र का सिंहासन तक हिलने लगा था। सिंहासन छिन जाने के भय से इंद्र ने उस अश्व को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। राजा सगर ने अपने 60,000 पुत्रों को अश्व की खोज के लिए भेजा। काफी खोज के
बाद वे जब कपिल मुनि के आश्रम पहुँचकर अपने अश्व को बंधा पाया, तो यह देख राजकुमारों ने कपिल महर्षि का अपमान कर दिया। क्रोधित कपिल मुनि ने सभी के सभी 60,000 राजकुमारों को भस्म कर डाला।
राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने जब कपिल मुनि को प्रसन्न किया और अपने चाचाओं की मुक्ति का उपाय पूछा, जब मुनि ने बताया कि स्वर्ग से गंगा भू-लोक पर उतरेगी और तुम्हारे चाचाओं के भस्म को स्पर्श करेगी, तभी उनकी मुक्ति संभव है। फिर क्या था लग गया अंशुमान घोर तप करने। पर वह सफल न हो सका।
फिर उसके पुत्र दिलीप का अथक् श्रम भी सार्थकन हुआ। फिर दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से मैं प्रसन्न होकर पृथ्वी पर आना स्वीकार किया। साथ ही भगीरथ की तपस्या से मैं प्रसन्न होकर मैंने उसे वरदान दिया कि इस धरती पर मुझे तुम्हारे नाम से यानि भागीरथी के नाम से भी जाना जाएगा।
फिर मैं अपने वादेनुसार धरती पर प्रकट होकर भगीरथ की तपस्या को सफल बनाया और उनके परदादाओं के भस्मों के स्पर्श कर उन्हें मुक्ति भी दिलवाई।
हिमालय की गोद में एक एकांत स्थान पर एक छोटी सी घाटी बनी है, जो लगभग 1.5 कि.मी. चौड़ी है। इसे चारों ओर बर्फ से ढके हुए ऊंचे ऊंचे पर्वत शिखर हैं। जिस कारण वहाँ बड़ी ठंड भी होती है। यहीं एक गुफा भी है जिसे गोमुख कहते हैं। यहीं से मेरा उद्भव होता है।
यह गुफा ऊंची और चौड़ी है। कभी-कभी इसके किनारों से बर्फ के बड़े बड़े टुकड़े टूटकर गिरते हैं और मैं अपने तेज बहाव में उन्हें बालू मिश्रित घाटी की ओर पहुंचा देती हैं।
मैं गाती, नाचती, कूदती हुई मेरी धारागंगोत्री के पास से गुजरती है, वहीं एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी बन गया है। इसी तरह देवप्रयाग में मेरा मिलन अलकनंदा से होता है। जिससे मेरी गति और अधिक बढ़ जाती है।
यहीं मैं अपने पिता हिमराज की गोद से उतरती हूँ जिसे हरिद्वार का पुण्य तीर्थ कहा जाता है। इसी से कुछ ऊपर मैं ऋषिकेश में मैं लक्ष्मण झूला के साथ, खेलती हूं और नीचे से गुजर जाती हैं। यहीं पर कुछ प्राचीन मंदिर भी हैं।
हरिद्वार से अपनी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हुई मैं प्रयाग, काशी के तटों को पवित्र करती हुई बंगाल जा पहुँचती हैं। फिर हुगली नदी के मुहाने के पास दक्षिण पहुँच दामोदर नदी से मिलती हूँ। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य देखने लायक होता
इसी तरह मेरी कहानी बड़ी लंबी है। मेरे कई नाम भी हैं जिसमें से मुख्यतः मैं मंदाकिनी, सुरसरु, भागीरथी, विष्णुपदी, देवापगा, हरिनदी हैं। मेरे हर एक नाम के पिछे अपना एक इतिहास व कथा है।
मुझे भारतीय संस्कृति के प्रतिक के रूप में गौरव प्राप्त है।