विश्व व्यापार संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पेटेंट अधिनियम में संशोधन हेतु एक अध्यादेश 25 दिसम्बर 2004 को जारी किया। इससे बहुविवादित रही उत्पाद पेटेंट व्यस्था 1 जनवरी 2004 से प्रभावी हो गई। इसके पूर्व 1999 एवं 2002 के पेटेंट (संशोधन) अधिनियमों के जरिये प्रक्रिया पेटेंट को लागू कर दिया गया था, जबकि दवाओं, रसायनों एवं अनाज के मामलों में उत्पाद पेटेंट अभी तक लम्बित था। अन्य क्षेत्रों में उत्पाद पेटेंट का प्रावधान पहले के संशोधन के जरिये किया जा चुका था। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत भारत को दवाओं, खाद्य पदार्थो व रसायनों के मामले में उत्पाद पेटेंट व्यवस्था को 1 जनवरी 2005 तक लागू करना था। इस प्रतिबद्धता को सन्दर्भित अध्यादेश के जरिये पूरा किया गया है।
विश्लेषकों का मत है कि उत्पाद पेटेंट व्यवस्था लागू होने से शरू के कुछ वर्ष तक भले ही इसका अधिक प्रभाव आम व्यक्तियों पर न पडे़, किन्तु उन्नत दवाओं, रसायनों, कृषि बीजों के मूल्यों में भारी वृद्धि इसके परिणामस्वरूप अन्ततः होगी। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत नई खोजों पर आधारित उत्पादों के 20 वर्ष तक विपणन का विशेषाधिकार केवल शोधकर्ता व्यक्ति अथवा कम्पनी को प्रप्त होगा तथा उसे उसके मूल्य निर्धारण की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। इन आलोचनाओं का खण्डन करते हुए सरकार ने दावा किया है कि नए अध्यादेश के कारण न तो दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होंगी और न ही भारतीय उद्योगों पर इसका बुरा असर पडे़गा। नयी पेटेण्ट व्यवस्था में भारतीय फार्मा इण्डस्ट्री को उन्नति के पहले से अधिक अवसर प्राप्त होंगे तथा बाजार में प्रतिस्पद्र्धा बढ़ने से दवाएं सस्ती भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में तीन तथ्यों का हवाला सरकार ने दिया है। एक तो यह कि बाजार में उपलब्ध 97 प्रतिशत दवाएं पेटेंट के दायरे में आती ही नहीं, इसलिए उनके महंगा होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। दूसरे पेटेंट के दायरे में आने वाली बाकी तीन प्रतिशत दवाओं में से भी अनेक ऐसी हैं जिनके बाजार में विकल्प उपलब्ध हैं और तीसरे भारत सरकार ने संशोधित कानून में जनहित की दृष्टि से 7 ऐसे विशेष प्रावधान रखे हैं जिनके जरिये सरकार किसी भी पेटेंट का रद्द करने, पेटेंटशुदा प्रोडक्ट का आयात करने अथवा किसी भी आविष्कार को अपने लिए इस्तेमाल करने का अधिकार रख सकेगी।
विदित है कि एक दशक पूर्व भारत में पेटेंट कानून की बात डराती थी, क्योंकि ऐसे कानून से सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा होता नजर आता था, किन्तु अब हालात बदल गए हैं। अब स्वयं भारतीय दवा कम्पनियों को विश्व बाजार में झण्डे गाड़ने के लिए पेटेंट संरक्षण की आवश्यकता है। 10 वर्ष पूर्व भारत का फार्म निर्यात 4 हजार करोड़ रूपये था जो आज बढ़कर 14 हजार करोड़ रूपये हो गया है। भारतीय फार्मा निर्यात अब प्रति वर्ष 30 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है और कम्पनियां अब अपने टर्न-ओवर का 6 से 8 प्रतिशत भाग अनुसन्धान (त्-क्) मे लगा रही हैं। इन परिस्थितियों में कडे़ पेटेंट कानून से भारतीय दवा बाजार को नुकसान नहीं, फायदा होने जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि ट्रिप्स समझौते के अनुपालन हेतु 1970 के पेटेंट अधिनियम (जो 20 अप्रैल 1972 से प्रभावी हुआ) में यह तीसरा संशोधन 26 दिसम्बर 2004 के आध्यादेश के जरिये किया गया तथा 23 मार्च 2005 को इसे संसद के दानो सदनों द्वारा पारित कर दिया गया। पहला संशोधन मार्च 1999 में अधिसूचित किया गया, जो 1 जनवरी 1995 से प्रभावी हुआ था। जून 2002 में अधिसूचित दूसरा संशोधन 1 जनवरी 2000 से प्रभावी हुआ था जबकि तीसरा संशोधन 1 जनवरी 2005 से प्रभावी हुआ था।