शरीर का स्वस्थ रहना जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। रोगाी व्यक्ति का जीवन स्वस्थ आचार-विचार के अभाव में बोझ बनकर नष्ट हो जाता है। जिस देश के नागरिक स्वस्थ नहीं होते वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता । यही कारण है कि प्रत्येक राष्ट्र अपने नागारिकों के पोषाहार के स्तर को अच्छे से अच्छा बनाए रखने की चेष्टा करता है। पोषाहार का सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि पोषाहार पर किसी भी राष्ट्र की सपन्नता, सुरक्षा और प्रगाति निर्भर करती है। कुपोषण का बुरा प्रभाव न केवल शारिरिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है, बल्कि वह मानसिक और बौद्धिक क्षमता को भी नष्ट करता है।, जिससे राष्ट्र की उत्पादन शक्ति घट जाती है, राष्ट्र पतन की और बढ़ने लगता है! पोषाहार व्यक्ति के शरीर को सुडौल, सुन्दर तथा प्रभावशाली बनाता है। सुन्दर व्यक्तित्व रखने वालों को सदैव सफलता मिलती है। अपरिचित लोग भी ऐसे व्यक्ति के सहायक तथा हितैषी बन जाते हैं।
गरीबी और अज्ञानवश लोग कुपोषण के चंगुल में फंस जाते हैंै। इसलिए गरीबी दूर के साथ-साथ उन्हें पोषाहार की उचित शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गरीबी ही कुपोषण का कारण है। साधारण आय वाला व्यक्ति भी खान-पान के सम्बन्ध में सूझ-बूझ से काम लेकर उचित पोषाहार प्राप्त कर सकता है। भारत सरकार की और से ऐसे कई केन्द्र और कई इकाइयां स्थापित की गई हैं जो गांवों में साधारण तौर से पाई जाने वाली खाद्य-वस्तुओं के सही उपयोग की शिक्षा दे रही हैं। सरकारी प्रशिक्षण केन्द्र गांव वालों को यह शिक्षा देते हैं कि जो मौसमी फल,सब्जियां गांव में मिलती हैं उनका संरक्षण किस प्रकार किया जाए ताकि दूसरे मौसमों में भी उन्हें वे फल और सब्जियां मिलती रहें। शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्येक्रम बड़े व्यापक रूप से व्याख्यान, परिचर्चा, फिल्म, प्रदर्शनी आदि की सहायता से चलाया जाता है। इतना ही नहीं, भोजन में क्या लेना चाहिए, कितना देना चाहिए तथा भोजन पकाने में कोैन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए आदि बातों से भी लोगों को परिचित कराया जा रहा है। वे यह भी सीखते हैं कि भोजन का संरक्षण किस प्रकार किया जाए और दूषित भोजन से कैसे बचा जाए। ऐसे प्रशिक्षित लोग इस तथ्य को अच्छी तरह समझ लेते हैं कि गरिष्ठ, सुस्वादु और महंगा भोजन स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार हानिकारक होता है।
स्रकार के खाद्य-विभाग ने गरीब परिवारों के लोगों के लिए सस्ते खाद्य-पदार्थ बनाने की योजनाएं बनाई हैं और उन्हें शुरू कर दिया हैं। ऐसा एक पदार्थ है-‘मिल्टन‘। यह दूध जैसा एक पेय पदार्थ है। आज हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख लीटर ‘मिल्टन‘ तैयार किया जाता है। इसी तरह दूध में विटामिन ‘ए‘ और नमक में लौह तथा आयोडीन तत्व मिलाकर उन्हें अधिक पोषक बनाया जा सकता है। राजस्थान और तमिलनाडु में ऐसी योजनाएं अपनाई जा रही हैं, जिनके द्वारा नमक में लौह तत्व मिलाकर उसे विशेष गुणकारी बनाया जा रहा है। कृषि-वैज्ञानिक निरन्तर नये-नये किस्म के अनाज, फल और सब्जियों उगाने के उपायों की खोज में लगे हुए हैं, ताकि भारत जैसे गरीबों की विशाल जनसंख्या वाला देश सस्ते पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन अधिक से अधिक मात्रा में कर सके।
भारत मुख्यतः गांवों का देश है जहां तीन-चैथाई आबादी गांवों में ही रहती है। गांवों की जनता का दो-तिहाई भाग गरीब है और बीस प्रतिशत भाग तो गरीबी रेखा के बीच है। अतः कुपोषण इस देश की महŸवपूर्ण समस्या है। भारत सरकार का खाद्य विभाग कुपोषण से देश की रक्षा के लिए अनेक कार्यक्रमों को क्रमशः लागू कर रहा है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में चार प्रयोगशालाएं फलों और सब्जियों के क्षेत्र में उनके विभिन्न गुणों तथा घरेलू उपभोग के सम्बन्ध में निरन्तर अनुसंधान कार्य कर रही हैं। इसी तरह प्रत्येक खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों और उनकी मात्रा की खोज की जा रही है। अत्यधिक पिछड़े क्षेत्रों में और आदिवासी इलाकों में विशेष तथा पूरक पोषाहार और दिन में भोजन देने के कार्यक्रम भी धीरे-धीरे लागू किए जा रहे हैं। इसमें सरकार के साथ-साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी भाग ले रही हैं। अतः भारत में लोग पोषाहार के महŸव को समझने लगे हैं तथा उनमें जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है।