शरीर का स्वस्थ रहना जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। रोगाी व्यक्ति का जीवन स्वस्थ आचार-विचार के अभाव में बोझ बनकर नष्ट हो जाता है। जिस देश के नागरिक स्वस्थ नहीं होते वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता । यही कारण है कि प्रत्येक राष्ट्र अपने नागारिकों के पोषाहार के स्तर को अच्छे से अच्छा बनाए रखने की चेष्टा करता है। पोषाहार का सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि पोषाहार पर किसी भी राष्ट्र की सपन्नता, सुरक्षा और प्रगाति निर्भर करती है। कुपोषण का बुरा प्रभाव न केवल शारिरिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है, बल्कि वह मानसिक और बौद्धिक क्षमता को भी नष्ट करता है।, जिससे राष्ट्र की उत्पादन शक्ति घट जाती है, राष्ट्र पतन की और बढ़ने लगता है! पोषाहार व्यक्ति के शरीर को सुडौल, सुन्दर तथा प्रभावशाली बनाता है। सुन्दर व्यक्तित्व रखने वालों को सदैव सफलता मिलती है। अपरिचित लोग भी ऐसे व्यक्ति के सहायक तथा हितैषी बन जाते हैं।
गरीबी और अज्ञानवश लोग कुपोषण के चंगुल में फंस जाते हैंै। इसलिए गरीबी दूर के साथ-साथ उन्हें पोषाहार की उचित शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गरीबी ही कुपोषण का कारण है। साधारण आय वाला व्यक्ति भी खान-पान के सम्बन्ध में सूझ-बूझ से काम लेकर उचित पोषाहार प्राप्त कर सकता है। भारत सरकार की और से ऐसे कई केन्द्र और कई इकाइयां स्थापित की गई हैं जो गांवों में साधारण तौर से पाई जाने वाली खाद्य-वस्तुओं के सही उपयोग की शिक्षा दे रही हैं। सरकारी प्रशिक्षण केन्द्र गांव वालों को यह शिक्षा देते हैं कि जो मौसमी फल,सब्जियां गांव में मिलती हैं उनका संरक्षण किस प्रकार किया जाए ताकि दूसरे मौसमों में भी उन्हें वे फल और सब्जियां मिलती रहें। शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्येक्रम बड़े व्यापक रूप से व्याख्यान, परिचर्चा, फिल्म, प्रदर्शनी आदि की सहायता से चलाया जाता है। इतना ही नहीं, भोजन में क्या लेना चाहिए, कितना देना चाहिए तथा भोजन पकाने में कोैन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए आदि बातों से भी लोगों को परिचित कराया जा रहा है। वे यह भी सीखते हैं कि भोजन का संरक्षण किस प्रकार किया जाए और दूषित भोजन से कैसे बचा जाए। ऐसे प्रशिक्षित लोग इस तथ्य को अच्छी तरह समझ लेते हैं कि गरिष्ठ, सुस्वादु और महंगा भोजन स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार हानिकारक होता है।
स्रकार के खाद्य-विभाग ने गरीब परिवारों के लोगों के लिए सस्ते खाद्य-पदार्थ बनाने की योजनाएं बनाई हैं और उन्हें शुरू कर दिया हैं। ऐसा एक पदार्थ है-‘मिल्टन‘। यह दूध जैसा एक पेय पदार्थ है। आज हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख लीटर ‘मिल्टन‘ तैयार किया जाता है। इसी तरह दूध में विटामिन ‘ए‘ और नमक में लौह तथा आयोडीन तत्व मिलाकर उन्हें अधिक पोषक बनाया जा सकता है। राजस्थान और तमिलनाडु में ऐसी योजनाएं अपनाई जा रही हैं, जिनके द्वारा नमक में लौह तत्व मिलाकर उसे विशेष गुणकारी बनाया जा रहा है। कृषि-वैज्ञानिक निरन्तर नये-नये किस्म के अनाज, फल और सब्जियों उगाने के उपायों की खोज में लगे हुए हैं, ताकि भारत जैसे गरीबों की विशाल जनसंख्या वाला देश सस्ते पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन अधिक से अधिक मात्रा में कर सके।
भारत मुख्यतः गांवों का देश है जहां तीन-चैथाई आबादी गांवों में ही रहती है। गांवों की जनता का दो-तिहाई भाग गरीब है और बीस प्रतिशत भाग तो गरीबी रेखा के बीच है। अतः कुपोषण इस देश की महŸवपूर्ण समस्या है। भारत सरकार का खाद्य विभाग कुपोषण से देश की रक्षा के लिए अनेक कार्यक्रमों को क्रमशः लागू कर रहा है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में चार प्रयोगशालाएं फलों और सब्जियों के क्षेत्र में उनके विभिन्न गुणों तथा घरेलू उपभोग के सम्बन्ध में निरन्तर अनुसंधान कार्य कर रही हैं। इसी तरह प्रत्येक खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों और उनकी मात्रा की खोज की जा रही है। अत्यधिक पिछड़े क्षेत्रों में और आदिवासी इलाकों में विशेष तथा पूरक पोषाहार और दिन में भोजन देने के कार्यक्रम भी धीरे-धीरे लागू किए जा रहे हैं। इसमें सरकार के साथ-साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी भाग ले रही हैं। अतः भारत में लोग पोषाहार के महŸव को समझने लगे हैं तथा उनमें जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है।
मानव जीवन में बीता हुआ सब कुछ लौट सकता है पर समय एक ऐसा आजाद पंछी है जो एक बार जिस राह से गुजर जाए, वहाँ दोबारा नहीं लौटता। समय अमूल्य धन है। यही जीवन है। इसका सदुपयोग जीवन का सदुपयोग माना गया है। साथ ही इसका विनाश यानी जीवन का विनाश।
समय एक ऐसा है जिसको हमें उसके ही आकार में स्वीकारना पड़ेगा, न तो हम उसको बढ़ा सकते हैं और न ही हम उसको रोक सकते हैं।समय का जीवन में बहुत महत्व है। संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं उन्हें प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है, अगर हमारा धन नष्ट हो जाए, तो हम दोबारा मेहनत कर उसे पा सकते हैं। यदि स्वास्थ्य बिगड़ जाए तो आराम व इलाज कर उसे देबारा स्वस्थ कर सकते हैं। पर हाँ यदी मानव का बस कहीं नहीं चल पाया है तो वह है समय।
समय के सदुपयोग से ही मूर्ख, विद्वान बन सकता है। निर्बल बलवान बन सकता है और तो और निर्धन भी धनवान बन सकता है। । समय की हानि को सबसे बड़ी हानि बतलाया गया है। समय का दुरुपयोग या बर्बादी से मानव की उन्नति में बाधा पड़ सकती है और अंत में पश्चाताप के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं रह पाता। वे कभी अपने जीवन में सफल नहीं हो सकते हैं। जो समय का दुरुपयोग करते हैं।
समय का सदुपयोग करने से जीवन में बहुत ही लाभ हैं। इससे मानव सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इसी के बल पर सुखी और समृद्ध जीवन जिया जा सकता है। समय का सदुपयोग करने से ही मानव स्वस्थ रह सकता है। समय का सदुपयोग करने वाले के द्वार पर उन्नति सदैव फूल लिए उसका स्वागत करने खड़ी रहती है।
विद्यार्थी जीवन में तो समय का महत्व ही कुछ और है। विद्यार्थी जीवन को तो आगे आने वाले जीवन की तैयारी का समय बताया गया है, इस समय जो विद्यार्थी समय का सदुपयोग कर लेते हैं वह तो अपना जीवन सफल कर लेते हैं और जो विद्यार्थी समय का दुरुपयोग कर लेते हैं उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
किसी महापुरुष ने तो यहां तक कहा है कि विद्यार्थियों को तो समय का एकएक पल सोच-समझकर काम में लाना चाहिए क्यों कि यहाँ समय-समय नहीं बल्कि उसका भविष्य है जिसे जैसे वह अब रखेगा, भविष्य में वह वही पाएगा।
समय के महत्व पर किसी महाकविने सच ही लिखा है- समय ईश्वर का दिया हुआ एक अनुपम धन है।
समय के लिए कहा गया है कि एक विद्यार्थी को उसका समय केवल नवीनतम जानकारीव अध्ययन में लगाना चाहिए, एक भक्त को अपना समय केवल प्रभु भक्ति में लगाना चाहिए, एक कलाकार को अपना समय अपनी कलाकृति पर ही लगाना चाहिए तभी हम कह सकते हैं कि उन्होंने अपने समय का सदुपयोग किया है।
मानव जीवन में त्यौहारों का अपना महत्व है। त्यौहार जीवन की एकरसता को खत्म करने और उत्सव के द्वारा अपने में नयी स्फूर्ति हासिल करने के लिए मनाए जाते हैं। देश में मनाए जाने वाले हर त्यौहार के पीछे उसका अपना इतिहास व मान्यताएँ हैं। हमारे भारतवर्ष का एक और नाम भी है इसे हम त्यौहारों का देश भी कहते हैं। शायद ही भारत की कोई तिथि ऐसी हो, जो किसी न किसी त्यौहार से संबंधित न हो।दशहरा, रक्षाबंधन, बैसाखी, बसंत पंचमी आदि अनेक धार्मिक पर्व हैं। रंगों का यह त्यौहार अपने आप में सिर्फ एक त्यौहार ही नहीं बल्कि मनोरंजन का भी एक पर्व है। जो उल्लास, अमंग तथा उत्साह के साथ मनाया जाता है।
हंसी-मजाक के पर्व के नाम से भी होली मनाई जाती है। इसलिए तो कहते हैंभाई साहब बुरा न मानें, होली हैं।
इस त्यौहार में लोग अपने बैर-भाव को त्याग कर एक दूसरे को गुलाल लगा कर होली की बधाई देते हैं। होलिका दहन के दिन तो हर गल्ली-मुहल्ले में लकड़ी के ढेर लगा होलिका बनाई जाती है। जिसे शाम को सभी महिलाओं द्वारा पूजा जाता है।
होली सिर्फ हिन्दू का त्यौहार नहीं है, इसे समाज के सभी धर्मों, वर्गों द्वारा सहर्ष मनाया जाता है।
होली के त्यौहार की अपनी एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने अपनी प्रजा को भगवान का नाम न लेने का आदेश दे रखा था। किन्तु उसके स्वयं का पुत्र प्रह्लाद अपने पिता की आज्ञा न मानकर विष्णु भजन में लीन रहता था। उसके पिता उसे बार बार समझाते थे पर वह नहीं मानता था। प्रह्लाद, प्रजा के बीच में भी काफी प्रसिद्ध हो चुका था। दैत्यराज को डर था कि कहीं उसकी प्रजा विद्रोह न कर दे इसलिए उसने अपनी बहन होलिका (जिसे वरदान प्राप्त था कि आग उसे कुछ नुकसान नहीं पहुँचा सकती है।) के साथ मिलकर एक गुप्त योजना बनाई।
योजनानुसार होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ गई और उसके एक इशारे पर चारों तरफ आग लगा दी गई। उसे अहं था कि आग तो उसका कुछ नहीं कर सकती पर प्रह्लाद तो आग की चपेट में आने से मर जाएगा और प्रजा इसे एक दुर्घटना समझ भूल जाएगी।
पर प्रभु को तो कुछ और ही मंजूर था। आगने अपने में होलिका को तो समा ही लिया पर प्रहाद को छू भी न सकी क्यों कि प्रहाद तो आग की लपटों में भी प्रभु दर्शन कर रहा था और अपने प्रभु भजन में मस्त था। तभी से होलिका दहन मनाया जाता है।
इस होली के त्यौहार को ऋतुओं से भी संबंधित माना जाता है। इस सुअवसर पर किसानों द्वारा अपने खेतों में उगाई फसलें जो पककर तैयार हो चुकी होती हैं, उसे देखकर वह झूम उठता है। खेतों में खड़ी-पकी फसल को भूनकर वह अपने सगे संबंधियों व मित्रों में बाँटते हैं।
होलिका दहन के दूसरे दिन रंगों के साथ होली त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन सुबह से दोपहर तक लोग आपस में रंगों का अदान-प्रदान करते हैं एक दूसरे को मेह के साथ रंग लगाते हैं और शाम को आपस में मिलकर खूब मौज-मस्ती व ठंडाई का आनंद लेते हैं।
होली का दिन अपने आप में एक बुराई के अंत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कुछ लोग मदिरापान कर आपस में ही लड़ लेते हैं। जो त्यौहार के रंग में भंग डालता है।
होली के दिन कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा हास्य कवि सम्मेलनों वसंगोष्ठियों का भी आयोजन किया जाता है।
विभिन्न समाज के लोग अपने अपने तरीकों से होली-मिलन भी करते हैं।
भारत देश विभिन्नता में भी एकता के लिए प्रसिद्ध है, जो कि इसे पर्व व त्यौहारों में हमें देखने को मिलता है।
Say good bye to hugs, high fives and touching in school. (Reminder: a wave or text will suffice as a parting exchange unless you want detention).
Schools, like the Portland middle school noted in this ABC News video, are banning hugs and other physical contact because it is interfering with students’ educational experience.
त्यौहार खुशियाँ लाते हैं, साल में एक बार आते हैं और अपनी खट्टी मिठ्ठी यादें छोड़ जाते हैं। हिन्दू धर्म में तो त्यौहारों की अपनी मान्यताएँ भी हैं। हर त्यौहार के पीछे एक कथा है। चाहे अमीर हो या गरीब हर कोई सच्चे मन से त्यौहारों का स्वागत करते हैं। मानव जाति की तो मान्यता ही है कि एक त्यौहार हजारों दुश्मनों के सीने से होकर आता है। व्यापारी वर्ग में तो दीपावली का अपना ही महत्व है।
दीपावली हिन्दुओं का एक ऐसा पर्व है जो अपने साथ और भी कई पर्वो को लाता है। जैसे नरकाचोदस, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, पडवा आदि
दीपावली अर्थात् दीपों की वाली जिसका अर्थ है अपने चारों ओर फैले अंधियारे को दीए की रोशनी से दूर कर देना।
दीपावली के पहले दिन नरकाचोदस के रूप में घर, दुकान, ऑफिस आदि की तगड़ी सफाई होती है। रगड़ कर साफ किया जाता है, धोया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन घर से दरीदी भी साफ हो जाती है।
दूसरे दिन धनतेरस पर्व आता है। इस दिन हर कोई चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब परंपरानुसार नए बर्तन खरीदता है, फर्क बस इतना है कि अमीर सोने चाँदी के खरीदेगा तो गरीब तांबे, लोहे का। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि उस खरीदी हुई वस्तु के साथ ही घर में लक्ष्मी जी का प्रवेश भी होता है।
तीसरे दिन छोटी दीपावली का त्यौहार बनाया जाता है। फिर बड़ी दीपावली, अगले दिन गोवर्धन पूजा, अंत में भैय्याज।
दीपावली के पीछे कई पौराणिक कथाएँ हैं, अधिक मान्यतानुसार पहली पौराणिक कथा है कि इस दिन विष्णु भगवान ने नृसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप को मारकर भक्त प्रहाद की रक्षा की थी। और कुछ लोगों कि मान्यता थी कि इस दिन भगवान पुरुषोत्तम राम ने लंका के राजा रावण को मारकर अपने अयोद्धया वापस लौटे थे।
कथा या मान्यता कुछ भी हो सच तो यह है कि यह त्यौहार बड़ी ही खुशी एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में दीए जलाकर प्रकाश करते हैं। आजकल कुछ लोग मोमबत्तियाँ, झिमझिम लाइटों का भी प्रयोग करने लगे हैं। इस त्यौहार की हर किसी को प्रतीक्षा होती है। खासकर बच्चों व व्यापारियों को। पर्व के शुरूआत में तो लोग अपने निवास, आवास की सफाई में जुट जाते हैं। पताई एवं रंग-रोपन भी कराते हैं। बाजारों में तो हफ्तों पहले से ही चहल पहल शुरु हो जाती है। मिठाई की सुगंध से घर घर आनंदित होने लगता है। बच्चे आतिशबाजी करने को बेताब होते हैं।
दीपावली रात्रि को व्यापारी वर्ग अपने व्यापार में उन्नति हेतु कई धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं। घर घर लक्ष्मी गणेश का पूजन मिठाई और खील बताशों द्वारा किया जाता है। कई बाजार तो रात भर खुले रहते हैं इसके पीछे मान्यता है कि रात्रि को गणेश-लक्ष्मी ठहलने को निकलते हैं। जहाँ जाते हैं वहीं के हो जाते हैं।
दीपावली के दूसरे दिन पण्डवा मनाया जाता है व्यापारी लोग इस दिन मुहर्त देखकर अपने दुकान की बोनी (पहली बिक्री) करते हैं। फिर फौरन दुकान बंद करके परिवार सहित घूमने, फिरने, मौज मस्ती करने निकलते हैं।
इस पंच-दिवसीय त्यौहार की महीमा ही निराली है। जिसे न सिर्फ हिन्दू बल्कि हर धर्म के लोग धूमधाम से मनाते हैं। सभी आपस में मिलकर मिठाई खाते हैं।
कुछ समाज ने निम्नवर्गीय, मंदबुद्धि वाले लोग इस दिन शराब पीकर जुआ खेलते हैं हारने पर खुद का माहौल तो दूषित करते हैं साथ ही दूसरों के लिए भी परेशानी बनते हैं।
आजकल बाजार में उपलब्ध प्रदूषण युक्त पटाखों द्वारा आतिशबाजी करने के कारण हमारा वातावरण भी दूषित हो रहा है। हमें इसके निवारण हेतु पारंपरिक पटाखों का ही प्रयोग करना चाहिए ताकि हमारी परंपरा भी कायम रहे और पर्यावरण भी दूषित न हो।
There is only so much a teacher can do with their few hours of instructional time each week. More than ever, we need to encourage students to learn outside the classroom.
Luckily, learning opportunities are everywhere, especially in science! read more
रमजान का महीना मुस्लिम भाइयों के लिए विशेष महत्व रखता है। माना जाता है कि यह महीना रहमतों व पाक से भरा हुआ होता है। ईद का अर्थ ही है खुशी जाहीर करना।
सबसे ज्यादा खुशी तो उनको होती है जो कठिन परीक्षा देते हुए अपने एक महीने का रोजा रखते हैं। ऐसा माना जाता है कि महीने भर रोजा रखने वालों के सभी गुनाह अल्लाह माफ कर देता है। रमजान के पूरे माह के रोजे रखना हर मुसलमान का फर्ज है। बदले में खुदा भी अपने बंदों के लिए जन्नत के सारे दरवाजे खोल देता
ऐसा माना जाता है कि इस त्यौहार की शुरुआत अरब से हुई थी। पर सबसे ज्यादा उमंग व उत्साह तो भारतीय मुसलमानों में देखा जाता है। जहाँ दिन भर रोजा रखते हुए मुसलमान लोग अपना सारा वक्त खुदा की इबादत में बिताते हैं और शाम के समय नमाज अदा करके अपना रोजा खोलते हैं।
ईद का चाँद दिखते ही महीने भर के रोजे समाप्त हो जाते हैं। दूसरे दिन लोग खुदा की मेहरबानी के प्रति शुक्रिया अदा करते हैं कि खुदा ने उन्हें महीने भर के रोजे रखने की शक्ति दी। यह धन्यवाद सामूहिक रूप से नमाज अदा करके दी जाती है। साथ ही इस दिन अपनी सालाना आमदनी और जायदाद का एक हिस्सा मोहताजों और गरीबों में बाँटा जाता है। ईद की नमाज के पहले जकात और फितरा अदा करने का नियम है।
ईद के दिन सभी लोग सुबह के स्नान के बाद कुर्ता-पायजामा पहनकर ईद की नमाज में सम्मिलित होने के लिए जाने से पहले गरीबों में सदका देते हैं। ताकि वह गरीब लोग भी उनके ईद में शमिल हो सकें। ईद की नमाज के दिन ईदगाह, मस्जिद अथवा दरगाह आदि पर नमाज करने के लिए लोग एकत्र होते हैं।
इस पाक दिन पंक्ति बनाकर एक इमाम के नेतृत्व में ईद की नमाज अदा की जाती है। नमाज के बाद लोग एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं, यह सिलसिला लगभग पूरे दिन चलता रहता है।
अगर हम ईद की बात करें और हलीम (रोजा खोलने के समय खाने वाले एक पकवान का नाम) का जिक्र न करें तो यह नाइंसाफी होगी।
हलीम जिसे खाने के लिए साल भर लोग इंतजार करते हैं आजकल तो विदेशों में भी भेजा जा रहा है। इस पाक महीने में गली गली दुकानें लगती हैं और शाम को नमाज के समय के बाद से मेले के रूप में बदल जाता है। इस पाक त्यौहार में एकता व अपने पन को बनाए रखने के लिए कई लोग सामूहिक रूप से दावत भी देते हैं। जिसमें अपने भाइयों, इष्ट मित्रों को नमाज के बाद बुलाकर फल और हलीम की दावत देते हैं।
इस पाक त्यौहार के बाद निश्चित समय पर ईद-उल-जुहा या बकरीद त्यौहार मनाया जाता है इस पाक दिन बकरे को काट कर उसके माँस को अपने ईष्ट मित्रों में । बाँटा जाता है।
बकरीद का अपना महत्व है। इस दिन को कुर्बानी का दिन भी कहते हैं।
इस ईद के महीने में चाहे वह गरीब हो या अमीर सभी वर्ग के लोग नए नए कपड़े सिलवाते हैं जिसे पहनकर वे खुशी-खुशी मेलों में जाते हैं और मौज मस्ती करते हैं।
ईद के महीने में सभी मिठाइयों व खिलौनों की दुकानों में अच्छी खासी भीड़ देखी जाती है।
ईद के महीने में तो शुरुआत से ही कपड़ों के व्यापारी रात भर अपनी दुकाने खोल कर अपने कपड़े बेचते हैं।
ईद मन को पवित्र और आत्मा की शुद्धता का संदेश अपने साथ लाता है। सिवइयाँ (मीठी खीर फल-मेवे सहित) तो इस पर्व की पहचान है।।
K-2: My Super Powers If you could be a superhero, what would you want your super power to be? What would you use it to do?
3-5: Your Super Identity If you were a superhero, what would you want your name to be? Explain why that name would be a perfect fit for you and your super powers. What would you wear? Choose your superhero name and draw a picture of you in your superhero outfit.
भारतवर्ष एक बड़ा विशाल देश है। इस देश में अनेक जातियों एवं धर्मों के लोग निवास करते हैं। धर्मों के अनुसार यहाँ पर्व एवं त्यौहार मनाए जाते हैं। क्रिसमस ईसाइयों का त्यौहार है। क्रिसमस को बड़ा दिन भी कहते हैं। ईसाई धर्म का मार्गदर्शन महात्मा ईसा मसीह ने किया था।
महात्मा ईसा का जन्म 25 दिसंबर को येरुशलम के पास बेतलहम गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम मरियम एवं पिता का नाम यूसुफ था। जन्म के समय से ही लोगों ने ईसा मसीह की पूजा आरंभ कर दी थी। जिस कारण वहाँ के राजा हैरोदस बहुत क्रोधित हुए। उसने बालक ईसा को मारने का आदेश दे दिया। ईसा के मातापिता को किसी तरह इस बात का पता चल गया। जिस कारण वे अपने पुत्र को चुपचाप लेकर मिस्त्र चले गए। वहीं पर उनका लालन-पालन हुआ। वहीं पर उन्होंने अपने पिता से बढ़ाई का काम भी सीखा। कहा जाता है कि उन्हें 31 वें वर्ष में ईश्वरीय प्रेरणा प्राप्त हुई। फिर क्या था वे संत मार्ग को स्वीकार कर प्रभु की तपस्या में लीन हो गए। 40 दिनों की अखण्ड तपस्या में वे उपवास रह कर करे थे। फिर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
ईसा मसीह ने अपने संदेश में कहा था- मनुष्य को नम्रता, पवित्रता, शांति, प्यार, भलाई, गुप्त दान एवं क्षमा का धर्म अपनाना चाहिए। उनके अधिकाधिक शिष्य भी बन गए।
उनकी बढ़ती हुई प्रसिद्धि के कारण यहूदी धर्म-गुरु उनके शत्रु बन गए। पर ईसा मसीह बेपरवाह हो अपने कार्य में लगे रहे। वे अपने वचनुसार सदैव दूसरों की भलाई करते रहे। जैसा अक्सर हर महापुरुष के साथ होता है उन्हें भी उनके एक शिष्य ने धोखा दे, उनके साथ विश्वासघात कर उन्हें बंदी बना लिया।
यहूदियों संग मिलकर उन्हें क्रूस पर लटकाकर सजा दी गई। क्रूस पर उन्हें अत्यंत वेदना दी गई थी पर ईसा मसीह ने प्रभु से माँगा कि – हे प्रभु! इन्हें क्षमा करना। ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं। फिर वहीं पर कूस में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
ऐसा माना जाता है कि क्रिसमस मनाने का मुख्य कारण ईसा मसीह द्वारा जो ईसाई धर्म का प्रचार किया गया, चलाया गया। इसलिए ही उन्हें याद कर उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को यह पर्व मनाया जाने लगा।
हर त्यौहार कि भांति क्रिसमस की तैयारियाँ एक माह पूर्व से की जाती है। ईसाई लोग नए वस्त्र बनाते हैं। क्रिसमस के कार्ड खरीदते हैं। बच्चों एवं मित्रों के लिए उपहार लाते हैं।
इस शुभ अवसर पर ईसाई लोग अपने ईसा को याद करते हैं। ठीक रात को बारह बजे के बाद बच्चों एवं युवकों की विभिन्न टोलियाँ रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाकर क्रिसमस की बधाई देती हैं।
इस दिन के विभिन्न आकर्षणों में से एक है एक्स-मास ट्री, जिसे लोग विभिन्न प्रकार से सजाते हैं। घर घर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
हम क्रिसमस की बात करें और सेंताक्रुज को भूल जाए ऐसा कैसे संभव हो सकता है। इस पवित्र दिन सेंताक्रुज सभी बड़ों-बच्चों के लिए विभिन्न उपहार और हर किसी के लिए खुशियों की सौगात लाता है साथ ही ईसा के जन्मअध्ययन का संदेश जन जन तक पहुँचाता है। हर धर्म के लोग इसे बड़े उत्साह के साथ मानते भी हैं। लोग आपस में मिलते भी हैं और अपनी अपनी शुभकामनाएँ भी देते हैं।
दिन के शुरुआत में लोग गिरजाघरों में जाकर प्रभु ईशु की प्रार्थना करते हैं। धर्मगुरु इस दिन ईसा के उपदेशों की व्याख्याएँ लोगों को सुनाते हैं, साथ ही मिलजुल कर साथ-साथ रहने की शिक्षा देते हैं।
गरीबों में अन्न, धन एवं वस्त्र आदि का दान अपनी स्वेच्छानुसार करते हैं।
क्रिसमस के दिन हर ईसाई घर से हमें यह गीत (प्रार्थना) जरूर सुनने को | मिलते है
To kick off this holiday week, we want to spread a little Thanksgiving joy with our Top 12 Thanksgiving jokes, fun facts and games fun for you and students of all ages.
मेरा नाम गंगा है। मैं ही हूँ पतित पावन गंगा। मेरी शोभा बढ़ाने मेरे किनारों पर कई तीर्थ स्थान बने हैं। मैं ही जन जन को पावन करती हूँ।
वेदों के अनुसार मैं देवताओं की नदी हूँ। मैं पहले स्वर्ग में बहा करती थी, मेरा नाम अमृत था। एक दिन मेरे भक्त ने मेरी कड़ी तपस्या कर मुझे भू लोक पर आने को विवश कर दिया।राजा सगर के वंश की तप-परंपरा के कारण ही मुझे विवश हो, धरती पर आना पड़ा।
मैं आज आप सभी को मेरी धरती पर आने की महान् कथा सुनाती हूँ, मेरी यह कहानी सिर्फ रोचक ही नहीं बल्कि रोमांचक भी है।
बात बहुत पुरानी है। सगर नाम के प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा थे। उन्हें 100 अश्वमेघ यज्ञ परे करने का गौरव प्राप्त था। अंतिम यज्ञ के लिए जब उन्होंने श्यामवर्ण का अश्व छोड़ा तो इंद्र का सिंहासन तक हिलने लगा था। सिंहासन छिन जाने के भय से इंद्र ने उस अश्व को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। राजा सगर ने अपने 60,000 पुत्रों को अश्व की खोज के लिए भेजा। काफी खोज के
बाद वे जब कपिल मुनि के आश्रम पहुँचकर अपने अश्व को बंधा पाया, तो यह देख राजकुमारों ने कपिल महर्षि का अपमान कर दिया। क्रोधित कपिल मुनि ने सभी के सभी 60,000 राजकुमारों को भस्म कर डाला।
राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने जब कपिल मुनि को प्रसन्न किया और अपने चाचाओं की मुक्ति का उपाय पूछा, जब मुनि ने बताया कि स्वर्ग से गंगा भू-लोक पर उतरेगी और तुम्हारे चाचाओं के भस्म को स्पर्श करेगी, तभी उनकी मुक्ति संभव है। फिर क्या था लग गया अंशुमान घोर तप करने। पर वह सफल न हो सका।
फिर उसके पुत्र दिलीप का अथक् श्रम भी सार्थकन हुआ। फिर दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से मैं प्रसन्न होकर पृथ्वी पर आना स्वीकार किया। साथ ही भगीरथ की तपस्या से मैं प्रसन्न होकर मैंने उसे वरदान दिया कि इस धरती पर मुझे तुम्हारे नाम से यानि भागीरथी के नाम से भी जाना जाएगा।
फिर मैं अपने वादेनुसार धरती पर प्रकट होकर भगीरथ की तपस्या को सफल बनाया और उनके परदादाओं के भस्मों के स्पर्श कर उन्हें मुक्ति भी दिलवाई।
हिमालय की गोद में एक एकांत स्थान पर एक छोटी सी घाटी बनी है, जो लगभग 1.5 कि.मी. चौड़ी है। इसे चारों ओर बर्फ से ढके हुए ऊंचे ऊंचे पर्वत शिखर हैं। जिस कारण वहाँ बड़ी ठंड भी होती है। यहीं एक गुफा भी है जिसे गोमुख कहते हैं। यहीं से मेरा उद्भव होता है।
यह गुफा ऊंची और चौड़ी है। कभी-कभी इसके किनारों से बर्फ के बड़े बड़े टुकड़े टूटकर गिरते हैं और मैं अपने तेज बहाव में उन्हें बालू मिश्रित घाटी की ओर पहुंचा देती हैं।
मैं गाती, नाचती, कूदती हुई मेरी धारागंगोत्री के पास से गुजरती है, वहीं एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी बन गया है। इसी तरह देवप्रयाग में मेरा मिलन अलकनंदा से होता है। जिससे मेरी गति और अधिक बढ़ जाती है।
यहीं मैं अपने पिता हिमराज की गोद से उतरती हूँ जिसे हरिद्वार का पुण्य तीर्थ कहा जाता है। इसी से कुछ ऊपर मैं ऋषिकेश में मैं लक्ष्मण झूला के साथ, खेलती हूं और नीचे से गुजर जाती हैं। यहीं पर कुछ प्राचीन मंदिर भी हैं।
हरिद्वार से अपनी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हुई मैं प्रयाग, काशी के तटों को पवित्र करती हुई बंगाल जा पहुँचती हैं। फिर हुगली नदी के मुहाने के पास दक्षिण पहुँच दामोदर नदी से मिलती हूँ। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य देखने लायक होता
इसी तरह मेरी कहानी बड़ी लंबी है। मेरे कई नाम भी हैं जिसमें से मुख्यतः मैं मंदाकिनी, सुरसरु, भागीरथी, विष्णुपदी, देवापगा, हरिनदी हैं। मेरे हर एक नाम के पिछे अपना एक इतिहास व कथा है।
मुझे भारतीय संस्कृति के प्रतिक के रूप में गौरव प्राप्त है।
Last week, my excitement hit a fever pitch for the long-awaited release of Harry Potter and the Deathly Hallows Part I! I lined up at midnight with all the Pottermaniacs (those enlightened enough to recognize the genius behind J.K. Rowling’s creation) and it didn’t disappoint.
To tide myself and the rest of you fans over until the final film is released, here are some Harry Potter themed lesson ideas.
मैं रोटी हूँ। देखने व सुनने में ही मैं कितनी सुन्दर लगती हूँ। प्रायः मुझे पाने के लिए हर कोई उत्सुक होता है। चाहे कोई कितना भी धनवान, बलवान, शौर्य वीर ही क्यों न हो, पर मेरे सेवन बिना कोई नहीं रह सकता। मानव या फिर कोई भी जीव ही क्यों न हो, पेट भरने के लिए मेरा प्रयोग ही करता है।मुझे गर्व है कि लोग मुझे पाने के लिए किसी भी हद तक गुजर जाते हैं, आज के रावण के वंशज यानि भ्रष्टाचार, काला बजारी आदि लोग मुझे पाने के लिए ही तो करते हैं। हाँ, आज मैं आप सबको मेरी जीवन यात्रा के बारे में बताती हैं कि मैं इस रूप में कैसे आई। शायद यह सुन आप मेरे बलिदान से कुछ सीख सकें।
जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि मेरा जन्म खेतों में हुआ। धरती मेरी माँ है। अपनी धरती माँ की गोद में मेरा पालन-पोषण होता है। हवा जो कि मेरे मामा हैं, मुझे पालने में झुलाते हैं। पक्षियाँ जो मेरी मौसी हैं, मुझे लोरियाँ सुनाती हैं। मैं पौधों की बालियों में इन सब को देख मस्ती से झूमती रहती हूँ। मेरे साथ आगे इस संसार में होने वाले छल-कपट से बेखबर हो बढ़ती जाती हैं। वर्षा का पानी पीती हूं, चाँदनी का आनंद लेती हूँ।
यौवन की दहलीज पर पहुँची तो मेरे साथ छल होना शुरु हो गया। मेरी खुशी किसी से देखी नहीं गई और मुझे काटने के लिए वह तैयार हो गए।
मुझे किसान ने अपने कूर हाथों से काट कर मुझे अपने परिवार से अलग कर दिया। यह देख मेरा दिल ही बैठ गया। मैं सदमें से अभी उभर ही रही थी कि अत्याचारों का मुझ पर पहाड़ ही टूट पड़ा। मुझे और मेरे (मुझ जैसे कुछ) साथियों को बैलों से कुचलवाया गया। मैं अपने साथियों के साथ उनके पैरो के नीचे दब गई। मैंने खूब विलाप किया, पर किसी ने मेरी परवाह नहीं की।
फिर मानव ने अपनी फितरतनुसार मुझसे सहानुभूति दिखाई जो कि उसके षड्यंत्र का एक हिस्सा मात्र था, मुझे साफ-सुथरा कर एक जगह रखा गया। मैं बेचारी उनकी चाल में फंस अपने दानों को ऐसे चमकाने लगी जैसे कोई सोने के कण हों। जिसे देख मानव की आंखें चौंधिया गई और फिर मुझे बोरों में कैद कर दिया गया। दोपहर की तेज धूप जिसके साथ मैं खेली थी अब उसके लिए मेरे नयन तरसने लगे।
फिर मुझे नीलाम कर दिया गया। बोली लगाने वाले मुझे कैसी कैसी निगाहों से परखने लगे, मुझे बड़ा कष्ट हुआ। मेरी बोली लगाई गई। मैं उस एक दिन की मानो बेताज रानी थी। फिर मुझे मेरे नए घर भेज दिया गया। जहाँ फिर कुछ समय के बाद मेरा प्रदर्शन होने लगा। वही तो वह जगह है जहाँ से तुम मुझे खरीद लाए हो। फिर मेरा घर दोबारा बदला। आगे तो तुम जानते ही हो कि मुझे वहाँ से लाने के बाद मुझे अच्छे से नहलाया गया। मुझे साफ-सुथरा कर चक्की में पिसने के लिए भेज दिया गया जहाँ मेरे रूप को बदल दिया गया। पिसने के लिए मुझे दो पाटों के बीच में डालकर मेरे ऊपर हथौड़े, छुरी-कांटे चलाए गए। मैं इन सब से डरकर अपने रूप में बदलाव लाते हुए अपने आप को आटे के रूप में बदल डाला।
उस आटे को फिर तुम अपने साथ लाकर डब्बों में भरकर अपने किचन की शान बढ़ाने लगे। रोज चुरक-चुरक कर थोड़ा-थोड़ा कर मुझे पानी के साथ मिलाकर मुझे बेलकर तुम मेरा वास्तविक रूप देने लगे। अपने इस रूप में आने के लिए तुमने सुन तो लिया कि मुझे कैसी-कैसी यातना झेलनी पड़ी। फिर तुम भी तो अपने साथ लाकर मेरे सारे शरीर को जला देते हो, मुझे तेज आँच में सेकते हो। पर तुम्हारी भूख शांत करके मैं अपने आप को धन्य समझती हूँ और अपनी खुशी दिखाते हुए गर्म-गर्म तवे पर भी खुशी से फूल जाती हूँ। यही है मेरी कहानी।
Here grade-specific samples of this week’s video writing prompts based on a clip from Charlie Brown Thanksgiving.
3-5: Food Frenzy Food is a big part of Thanksgiving. While traditional Thanksgiving feasts include turkey, stuffing and pumpkin pie, the holiday could use some new and exciting additions to the menu. Snoopy tries some creative options for his Thanksgiving dinner. Now it’s your turn.
Create a new dish that you think would commemorate the holiday. Describe what it is made of and why you think Thanksgiving would be better with your dish on the table.
मैं सड़क हूँ, मेरे कई रूप आप सब को देखने को मिल सकते हैं। कहीं मैं अपने विशाल रूप में हूं तो कहीं अपने छोटे रूप में। चाहे कोई भी हो, सभी मेरा प्रयोग करते हैं। मैं कभी अपने आप को प्रयोग करने वाले से यह नहीं पूछती कि क्या वह हिन्दू है, या फिर मुसलमान, सिख है या फिर ईसाई। मैं अपने कर्म को ही अपना धर्म समझती हूँ। सभी मुझ पर से गुजरकर ही अपने अपने लक्ष्य को पाते हैं।
मैं ही हूँ जो कस्बे से गाँव को, गाँव से शहर को और शहर को महानगर से जोड़ती हूँ। मानव के साथ हर जीव जैसे पशु, पक्षी, कीड़े-मकौड़े आदि भी मेरा भरपूर प्रयोग करते हैं।समय परिवर्तन के साथ-साथ मुझ में भी काफी परिवर्तन आने लगे। जहाँ पहले मैं अपने कच्चे रूप में थी वहाँ पर भी मुझे आज पक्का रूप दे दिया गया है। अब मुझे साफ सुथरा, आकर्षक रूप मिल चुका है। अब मेरे शरीर पर मिट्टी की एक भी झरीं नहीं दिखाई देने लगी। मैं अब बिल्कुल चिकनी, सुन्दर बन चुकी हूँ।
मुझ पर चलने से लोगों को अपना लक्ष्य और मुझे उनकी सेवा करने का सुख मिल जाता है। मेरी यही तपस्या से भगवान ने मुझमें एक अद्भुत शक्ति प्रदान कर डाली है। मैं कभी थकती नहीं और किसी से डरती नहीं। चाहे मुझे पर हाथी चले या चींटी रेंगे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं अपने आप में एक बल हूँ।
मुझ पर कारें, बसें आदि वाहन भी तेजी से गुजरते रहते हैं। जितना मजा वाहन वाले को मेरे ऊपर से गुजरने में मिलता है उतना ही मजा मुझे उसे राह देने से मिलता है।
मुझ में पहचान की अद्भुत क्षमता है, मैं जान लेती हूँ कि मेरा प्रयोग कौन कर रहा है, क्या वह पुरुष है या फिर स्त्री। जीव है या फिर जन्तु या फिर कोई मशीन। मैं मात्र गुजरने की आहट और पैरों की चाप से समझ जाती हूँ कि मेरा प्रयोगकर्ता कौन है।
मैं बच्चों के साथ बच्चा बन उनके साथ मस्ती भरी इठलाती चाल का आनंद लेती हूं, तो वहीं बूढ़ों का सहारा बन उन्हें संभालती हूँ।
यहां तक कि मैं योगी और भोगी दोनों का अंतर पहचान लेती हूँ।
मेरा जन्म अनादि काल से इस संसार में मानव के जन्म के साथ ही हुआ है। जबतक इस धरती पर मानव हैं मैं भी उनकी परछाई बन रहूंगी। मुझे विश्वास है समय के साथ-साथ मानव मुझ में बदलाव भी लाता रहेगा।
मैं भले ही इस संसार में निर्जीव समझी जाती हैं, पर मुझमें चेतना की कोई कमी नहीं। मैं तो सारे देश, विश्व, संसार में भाईचारे का नारा देते हुए अपने आप को फैला लेती हैं। स्वयं दूसरों के पैरों के नीचे रहकर भी खुश हैं। काश मेरे इस करनी का मानव महत्व समझ मेरा ध्यान रखे।
पर आज का मानव इतना बेईमान हो चुका है कि वह मुझे बनाने तक में धांधली करने लगा है, यहाँ तक कि वह जानता है कि आने वाले समय में मेरा प्रयोग उसके बच्चों द्वारा ही किया जाएगा पर फिर भी वह नहीं संभलता।
लोग नशे में धूत, अहं में डूबे वाहन चलाते हैं एक दूसरे से ठकराते हैं और अपने प्राण त्याग देते हैं पर मनुष्य अपनी गलती छोड़ अपनी आदत के अनुसार अपनी करनी किसी और पर ढकेल देता है और मैं खूनी सड़क के नाम से बदनाम हो जाती हूं। जरा आप मेरे द्वारा सहे जा रहे कष्टों के बारे में सोचें, मैं तेज बारिश हो या फिर तेज धूप सबकुछ सहते हुए भी अपने कर्म में लगी रहती हूँ फिर भी मुझे ही कष्ट मिलता है, मैं आपके सामने यह प्रश्नछोड़ती हूँ, आप विचार कर मुझे अपनाएँ।
all the amazing teachers – for what they do in the classroom and for sharing their wisdom with us on TeachHUB.
We try to thank our members every week with our Teacher Spotlight feature. This week’s spotlight teacher is Scott Bolden. Check him out!
Mr. Scott Bolden
Eagleville School Eagleville, Tennessee
How did you know you wanted to be a teacher? It started when I was in the first grade. My parents tell me that I came home from school during just the second week of first grade and told them I wanted to be a first grade teacher just like Miss Peggy. I always wanted to help students learn to read and find a love for learning just like she had done for myself and so many other lives she touched. I actually got to fulfill that dream. I am know teaching first grade at Eagleville School where Miss Peggy taught me.
मैं रुपया हैं। मुझे सभी लोग प्यार करते हैं। मुझे पाने के लिए लोग सदैव सब कुछ करने तैयार रहते हैं। मेरा आकर्षण ही कुछ ऐसा कि लोग कुछ भी कर गुजरें। मैं अगर चाहूँ तो राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता हैं। हर जगह सिर्फ मेरा ही बोल-बाला है। आइए, मैं आज आपको अपनी कथा सुनाता हूँ।
मेरा जन्म धरती माता के गर्भ से हुआ है। मैं वर्षों तक धरती माता की गोद में ही विश्राम करता रहा। पहले का मेरा रूप आज के इस रूप से बिल्कुल भिन्न था। मेरा बहुत बड़ा परिवार हुआ करता था। हम सब साथ मिल-जुलकर रहते थे।समय बीता, एकदिन कुछ मानव रूपी दानवने खान की खुदाई का कार्य शुरू कर दिया, जैसे ही उनकी खुदाई शुरु हुई मेरा तो दिल ही काँप उठा। उनसे बात न बनी तो बड़ी-बड़ी मशीनों से हमारी खुदाई शुरु कर दी गई। अंतः हमने हार मान कर ऊपर आना ही ठीक समझा।
फिर क्या मानव रूपी दानवों ने हमें बड़ी-बड़ी गाड़ियों में लाद कर एक बहुत बड़े भवन की ओर ले जाने लगे। वहीं कुछ रसायन से हमारी धुलाई की गई। हम सब कुछ सहन करते गए।
फिर हमें टकसाल भेज दिया गया, वहाँ हमें मिट्टी में डाल पिघलाया गया और उसके बाद साँचों में डाल नया रूप दिया गया। हमारा नया नामकरण किया गयारुपया। हमें अपने इस नए रूप पर गर्व होने लगा था।
फिर हमें थैलों में डाल एक मजबूत कमरे में जिसे मानव बैंक कहता है, वहाँ पहुँचाया गया, यहाँ के बाद हमारे जीवन में भी आजादी आने वाली थी।
एक दिन हमारा नया मालिक एक सेठ बैंक पहुँचा तो हमें उसे सौंप दिया गया। मैं खुश हो गया कि अब मैं खुली हवा में सांस ले सकता हूँ पर यह क्या… |
सेठ तो बड़ा कंजूस निकला, उसने हमारी कैद और बढ़ा दी, हमें अपनी मजबूत तिजोरी में ताले में बंद कर दिया।
फिर क्या मैं अपने जीवन से निराश हो गया और प्रभु स्मरण करने लगा कि अचानक मैंने देखा कि कुछ डाकू उस सेठ के घर डाका डालने आ पहुँचे हैं उन्होंने मुझे उस सेठ की कैद से आजाद करवाया और खुले हाथों मझे खर्च करने लगे। मैं भी उन्हें अपनी इस आजादी के बदले सुख-चैन के सारे साधन दिलाता चला गया।
पर अफसोस, मेरे कुछ भाई-बंधु अभी भी किसी न किसी सेठ की कैद में रह गए थे।
मैं आपको एक बात जरूर बताना चाहूँगा, आप लोग जितना मुझे रोलिंग (चलन) में लोगे मैं उतना ही बढ़ता जाऊंगा, एक जगह मुझे कैद कर देने से मैं घटता जाता हूँ, मेरा स्वभाव ही है मैं जितना चलँगा, उतना ही बदूंगा।
समय के साथ मैंने अपने में बदलाव आया आज मैं सिर्फ सिक्के के रूप में ही नहीं कागज के रूप में आने लगा हूँ।
पर शायद किसी की मुझे नजर लग गयी कि लोग आज कल मेरी जगह क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि नवीनतम् रूपों का इस्तेमाल करने लगे।
देखा, आपने मेरी करुण व साहसपूर्ण गाथा अब आप मेरे भाग्य पर हँसना नहीं, आप जितना मेरा ध्यान रखेंगे मैं वादा करता हूँ कि मैं भी आपका उससे दुगुना
As teachers, we are always in a race to cover required content, but is winning that race really teaching our students the skills they need?
Many educators might face the dilemma of skills vs. content when it comes to classroom curriculum. With strict state standards in place and limited class time, we are forced to choose between spending more time teaching a wide variety of content, or focusing on hands-on activities that teach skill.
मैं गुलाब हूँ। लोग मुझे पुष्पराज भी कहते हैं। क्यों कि मैं हर किस्म के फूलों से भिन्न और अधिक खुशबूदार हूँ। मैं यह गर्व से कह सकता हूँ कि मेरा जीवन भारतीय दर्शन और चिंतन के अनुरुप है। क्योंकि भारतीय दर्शन कहता है कि मनुष्य का जीवन कठिनाइयों के बीच से होता हुआ गुजरता है। मैं भी तो कांटों से बीच ही जन्म लेता हूँ और उनसे बचते हुए बड़ा होता हूँ और अपनी कोमलता बनाए रखता हूँ। मैं भी कई रंगों में कई संदेश देता हूँ जैसे कि मैं लाल रंग वाले रूप के माध्यम से क्रांति और प्रेम का संदेश देता हूँ, सफेद रंग के रूप में शांति और सादगी को संदेश देता हूँ, पीले रंग के रूप में सविचार और मन की निर्मलता का संदेश देता
मैं अपने प्रशंसकों में कोई भेदभाव नहीं करता, मैं सभी स्तर के लोगों को एक समान देखता हूँ। मजदूरों की जीवन-शैली तो मेरी ही जीवन शैली जैसी है। जिस तरह मजदूर कठिनाइयों से घिरे रहते हैं, मैं भी कांटों के बीच ही रहता हूँ। बड़े-बड़े धनी अपनी आपको निर्धन समझते हैं अगर मैं उनकी पुष्पवाटिका में न रहूँ। कई लोग तो मुझे गुलदस्ते के रूप में एक-दूसरे को उपहार स्वरूप देते हैं।आज कल के युग में मेरी जगह नकली कागज या प्लास्टिक के फूलों ने ले ली है। पर संतोष है उन्होंने मेरा वास्तविक रूप नहीं बदला।
हां, मैं अगर पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. जाकिर हुसैन का नाम ना लें तो यह ठीक नहीं होगा, उन्होंने सदैव जीवनभर मुझे अपनी छाती से लगाकर जो अतिशय प्यार एवं सम्मान मुझे दिया है मैं जीवन भर उनका कृतज्ञ रहूँ तो भी कम है।
हाँ, महिलाएं भी मुझे अपना सौंदर्य बढ़ाने का माध्यम मान मुझे सम्मान सहित अपने सिर पर बैठाकर घूमती हैं।
एक बात मैं आपको यहाँ बताना जरूरी समझता हूँ वह यह कि मैं सिर्फ आँख को सुन्दरता के माध्यम से और नाक को सुगंध के माध्यम से ही तृप्त नहीं करता बल्कि अगर आप मुझे सुखाकर रख लें तो मैं एक औषधि का काम भी करता हूँ, आप मेरा जल अपनी आंखों में तकलीफ होने पर डाल लें तो मैं आपको ठंडक महसूस कराता हूँ।
और हाँ, अगर आप रसगुल्ले पर मेरे एक-दो बूंद का छिड़काव कर उसकी चाश्नी में मेरी कुछ बूंद मिलाकर खाएं तो मैं आपको ऐसा स्वादहूँगा की आप जिंदगी भर भूल नहीं सकते।
कवियों और लेखकों ने तो मुझे जो सम्मान दिया है वह मैं कभी भूल ही नहीं सकता। उन्होंने तो मुझे अपनी रचनाओं में स्थान दे डाला। कुछ ने मुझे सराहा तो कुछ ने मुझे फटकारा भी।
पर मैं अपने जीवन के उस पल को कभी नहीं भूल सकता जब एक भक्त अपनी भक्ति प्रकट करते हुए मुझे भगवान, अल्ला, वाहे गुरु के चरणों में अर्पित करता है। और एक माता अपनी रोती हुई संतान के चेहरे पर खुशी लाने के लिए मुझे उसे भेंट करती है। और हाँ मैं उस प्रेमी को कैसे भूल सकता हूँ जो मेरे माध्यम से अपनी प्रेमिका को संदेश भेजता है।
As teachers, we often spend countless hours grading papers and writing comments in margins, only to have our students look at the grade and then toss the paper in the wastebasket.
While we must evaluate our students’ work, we also need to develop opportunities for our students to think about their work and use our corrective feedback to develop next steps for meeting the learning targets we have set. read more
हमारे भारत को गाँवों का देश भी कहा जाता है। भारत की 85 प्रतिशत जनता गावों में रहती है, अतः अगर हम कहें की भारत की आत्मा, भरत के गाँवों में ही रहती है तो कोई गलत नहीं होगा। गाँव भारतीय जीवन के दर्पण भी माने जाते हैं। गाँव ही भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रतीक हैं।
भारतीय गाँव प्रकृति की अनुपम भेटों में से एक है। प्राकृतिक सौंदर्य-सुषमा के घर हैं, भारत के निवासियों के लिए अन्न, फल-फूल, साग-सब्जी, दूध-घी आदि गाँव से ही आते हैं अर्थात् सेना को सैनिक, पुलिस को सिपाही और कल-कारखानों के मजदूर आदि भी अत्याधिक गाँवों से ही मिलते हैं।गाँवों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है अशिया। स्वतंत्रता के पश्चात् गाँवों में प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध किया गया था किन्तु हाई स्कूल और कॉलेज काफी दूर कस्बों या नगरों में होने के कारणआपस में जुड़नसके। इस कारण ग्रामीण की आधी आबादी अनपढ़ ही रह गयी। गाँवों में अगर हम देखें तो आज भी अज्ञानता का पूरा बोलबाला है।
वही अज्ञानता के कारण ही सेठ-साहूकार, नेता, अधिकारी ग्रामवासियों को लूटते हैं। देते तो वो सिर्फ पाँच हैं पर अंगूठा लगवाते हैं दस पर, बेचारा ग्रामीण उम्र भर ब्याज भरता ही रहता है ब्याज तो व्याज असल तक तो पहुँच भी न पाता है।
भारतीय गाँव सभ्यता और आधुनिक सुख-सुविधा से अभी भी काफी दूर है। कुछ पक्के मकानों को छोड़कर अभी भी गाँव में हमें कच्चे मकान और झोंपड़ियाँ वहीं शान से सीना ऊंचा कर खड़ी हैं। वहाँ पेयजल की कमी भी है, आज भी मल-मूत्र विसर्जन के लिए वहाँ कोई विधिवत् निकासी नहीं है।
गाँवों में गड्ढे बहुत होते हैं जहाँ कचरा उड़कर जमा होता है और साथ ही वह सड़ते हुए दुर्गध पैद्य करता रहता है। कई गाँवों में तो बिजली अभी भी नहीं है। कई गाँवों में तो बिजली के खंभे पहुंच चुके हैं पर पता नहीं बिजली कब तक पहुँचेगी। कई भारतीय गाँवों में तो अभी तक चिकित्सालय, प्रशिक्षित डॉक्टर पहुँच भी नहीं पाए हैं जिस कारण वहीं नीम हकीम का राज चल रहा है, जो फायदा तो करता ही है पर खतरा-ए-जान के होने से कोई इंकार भी नहीं कर सकता है। यहाँ तक तो ठीक है पर आज भी कई भारतीय गाँवों में तो जादू-टोना आज भी ग्रामवासियों में स्वस्थ रहने की औषध है।
गाँव में पंडित, मौलवी आदि की पूजा की जाती है। धर्मभीरु गाँव वासियों के लिए कर्मकाण्ड के नाम पर खूब शोषण करता है। बेचारे ग्रामवासी परंपराओं और रूढ़ियों में उसी प्रकार बंधे हुए हैं, जिस प्रकार नाचने वाला बंदर मदारी के हाथों कैद होता है।
भारतीय गांव जहाँ अब तक शारीरिक तथा मानसिक दुर्बलता के घर थे, अब वहाँ पर भी नई चेतना, नई ज्योति, नया जीवन भी आया है। सरकार ने वहाँ आर्थिक शोषण से मुक्ति हेतु सहकारी बैंक स्थापित किए हैं। सूदखोर जमींदारों की जमीन वापिस लेकर किसानों में बाँट दी गई है। शिक्षा के विकास हेतु समय-समय पर कई शैक्षिक आयोजन किए जाते हैं। कई समाज सेवी संस्थाएँ गाँव-गाँव जाकर मुफ्त शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था भी करती है।
आजकल तो स्वस्थ्य व सफल फसल हेतु किसानों को भी प्रशिक्षण दिए जाने लगे हैं, सीधे माल बेचने की व्यवस्था भी की गई है जिससे जमींदारों को अनैतिक रूप से मिलने वाले मोटे मुनाफे से रोका जा सके। सरकार ने पहल करते हुए गाँव और शहर के बीच पक्की सड़क बनवा दी जिससे फसल समय पर बाजार पहुँच उचित मूल्य पा सके। अब तो किसानों को ऋण देकर टैक्टर, फसल हेतु बीज, खाद आदि भी उपलब्ध हो रहा है।
कृषि उन्नति हेतु कृषि विश्वविद्यालय भी स्थापित हो गए हैं, जहाँ किसान कभी भी अपनी समस्या के निवारण हेतु पहुँच सकता है।
स्वंतत्रता के पश्चात् ग्राम-पंचायतों का पुनर्गठन भी हुआ। पंचायती राज्य के तीन आधार बने- ग्राम पंचायत, क्षेत्र समिति तथा जिलापरिषद्- ये तीन संस्थाएँ ग्राम विकास की उत्तरदायी बनीं, गांवों की सामाजिक और आर्थिक उन्नति का माध्ययम भी यही हैं। जिस कारण अशिक्षा भी वहाँ से कोसो दूर होती जा रही है। जागरूकता के कारण आज का भारतीय गाँव, शहर से किसी भी मुकाबले पीछे नहीं रह गया है। पर हाँ अगर किसी को भारतीय संस्कृति को देखना है तो उसे किसी भी भारतीय गाँव में जाना ही पड़ेगा। भले ही गाँव शहर में बदल चुके हैं पर उनकी सादगी, सीधापन नहीं बदला है।
विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की अगर हम बात करें तो भारत का पहला स्थान आता है। भारत संसार का एक प्राचीनतम विशाल देश है। इस भाँति इसको संस्कृति भी उदार, प्राचीन और गौरवशालिनी है। संस्कृति का संबंध मानवों की आत्मा और मन से होता है किन्तु सभ्यता का संबंध उसकी बाहरी वेश-भूषा, खानपान और उठने-बैठने से होता है।
भारत संसार का महान् देश है। यहाँ की सिर्फ संस्कृति ही विश्व पर अपनी छाप नहीं छोड़ती बल्कि यहाँ के ऋषि-मुनि जो वनों, नदी-तटों और रमणीय पर्वतों की कन्दराओं में बैठे ज्ञान की खोज करते रहते हैं उन्हीं की इस खोज ने भारतीय संस्कृति का मार्ग प्रकाशित किया है। आज भी भारतीय संस्कृति का मूल आदर्श आत्मा का ज्ञान ही है। इसमें संसार के भौतिक तत्त्वों के प्रति कोई मोह नहीं है।पहले संत-महापुरुषों के सत्संग केवल भारत में ही हुआ करते थे पर भारतीय संस्कृति का चस्का विदेशियों को ऐसा लगा कि वह विशेष तौर से हमारे संतोंमहात्माओं को अपने देश में बुलवा कर सत्संग करवाने लगे हैं।
समय-समय पर देश में होने वाले धार्मिक आंदोलनों ने ही संस्कृति को और उदार बनाया है। बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त तथा वैष्णव मत-प्रचारकों ने ही भारतीय संस्कृति में अनेक तत्त्व जोड़े हैं जिनमें मुख्यतः सहनशीलता, अहिंसा, परोपकार आदि गुणों का नाम भी उल्लेखनीय है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता जो हमें कहीं और किसी देश में देखने को नहीं मिलती है कि यहाँ भारत देश में सब धर्मों एवं सम्प्रदायों की शिक्षा को एक साथ लेकर चलना और सामूहिक रूप से देश को एक मानना। तभी तो भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में रामायण, पुराण आदि ग्रंथ पूजे जाते हैं।
संस्कृति के तत्त्व के संबंध में अगर कहा जाए तो हम पाएंगे कि भारतीय संस्कृति चार तत्त्व में विद्यमान है, वह है- चरित्र, विज्ञान, साहित्य और धर्म।
भारतीय संस्कृति में प्रेय और श्रेय के दोनों रूप स्वीकृत हैं। प्रेय से तात्पर्य है लोक में कर्म करते हुए अभ्युदय को प्राप्त करना और श्रेय से तात्पर्य है आत्मिक उन्नति को प्राप्त करना।
भारतीय संस्कृति, साहित्य के माध्यम से विदेशों में भी प्रचारित हो चुकी है। यही कारण है कि आज विदेशी विश्वविद्यालयों में भी भारतीय दर्शन पर पठन-पाठन हो रहा है।
भारतीय संस्कृति की कई विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता तो यही है कि यहाँ सभी समान भाव से आचरण करते हैं साथ ही सभी की विचारधाराओं का सम्मान किया जाता है। दूसरी विशेषता उदारता से संबंधित है। भारतीय जीवन की शक्ति ही उदारता है। सबके प्रति खुले मन से व्यवहार करना यहाँ के जनजीवन का मूलभूत गुण है। साहिष्णुता के गुण से भारतीय संस्कृति का महत्त्व लोक-प्रसिद्धि पा चुका है। तीसरी विशेषता है यहाँ कि शान्ति की जो आज विश्व में कहीं पर भी नहीं है, यही कारण है कि उसी शान्ति की खोज में कई विदेशी लोग भारत आते हैं।
आज विश्व के सभी देश दूसरे देशों में सांस्कृतिक संगठनों की स्थापना करने में लगे हैं। हमारी भारत सरकार ने भी कदम बढ़ाते हुए विदेशों में अपने सांस्कृतिक प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं, जो समय-समय पर विदेशों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्या करते हैं। इस पद्धति से अन्य देशों के साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध मधुर होते जा रहे हैं।
एक बात तो हम दावे से कह सकते हैं कि संसार का कोई भी देश संस्कृति के | बिना जीवित रह ही नहीं सकता, अगर हम संस्कृति को देश की आत्मा कहें तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा।
One teaching objective frequently used by administrators and educational evaluators is the old adage “Teach bell-to-bell.” Sometimes, however, this wise advice is easier given than done.
Teachers find themselves with five or even ten vacant minutes at the end of class, and they ask themselves, “What now?” While some may opt to allow students additional “study time” or “early homework time,” such a plan usually goes awry, and students begin chattering, antagonizing one another, and generally become disruptive in the absence of an actual purpose.
A better answer to the “dead time” issue comes in the form of Exit Slips:
वैसे तो हर किसी के जीवन में की प्रकार के ऋतु आते हैं। ऋतु चाहे कोई भी । हो अगर वह साथ में खुशी लाए तो ही अच्छा लगता है।
भारतवर्ष की अगर हम बात करें तो यहाँ छह प्रकार की अतुओं का वर्णन मिलता है। पर ऋतुराज के रूप में बसंत ऋतु को जो सम्मान मिलता है वह शायद ही किसी और को मिला हो।ऋतुराज वसंत आनंद एवं जवानी का प्रतीक माना जाता है। वसंत ऋतु का आगमन होते ही शिशिर से ठिठुरते तन-मन में नवीन स्फूर्ति, आनंद एवं उल्लास का संचार हो जाता है। इसके मादक स्पर्श से कोई अछूता नहीं रहता। इसकी महिमा का गुणगान तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने भी अपनी गीता में किया है।
ऐसा माना जाता है कि वसंत ऋतु का आगमन होते ही प्रकृति के कण-कण में । छिपा श्री कृष्ण का रूप, वैभव, ऐश्वर्य विराट रूप में प्रकट होने लगता है। चारों दिशाओं से आती कोयल की कहू-कहू की आवाज स्वयं श्री कृष्ण के बाँसुरी वादन को परिणाम माना जाता है।
वैसे तो चैत और बैसाख वसंत ऋतु के मुख्य माह माने जाते हैं लेकिन माघ की शुक्ल पंचमी या वसंत पंचमी के दिन से ही वसंत ऋतु अपने शुभागमन की सूचना दे देता है। इस दिन भारत के कई राज्यों में वसंतोत्सव भी मनाया जाता है।
वसंत ऋतु में प्रकृति समशीतोष्ण रहती है अर्थात् न तो इसमें ज्यादा ठंड होती है और न ही ज्यादा गर्मी, इसलिए अमीर हो या गरीब सभी इस का समान रूप से आनंद लेते हैं। जब वसंत ऋतु की वसंती हवा हमें स्पर्श करती है तो हमारा रोम-रोम पुलकित हो उठता है।
पतझड़ की मार से वीरान दिखने वाले पेड़-पौधे भी बसंत का स्पर्श पाते ही नए-नए पल्लवों तथा पुष्पों से लद जाते हैं। विभिन्न प्रकार की पुष्पलताओं पर कई रंग बिरंगे फूल खिल उठते हैं जो किसी अन्य ऋतु में नहीं दिख पाते। ऐसे फूलों से सजी प्रकृति रानी को देख ऐसा लगता है मानो, उसने नया परिधान धारण कर लिया है। और रंग-बिरंगे पुष्पों को अपने आँचल में समेटे इतरा रही हो।
ऋतुराज वसंत का वर्णन हमें सिर्फ भारतीय साहित्य में ही नहीं बल्कि विदेशी साहित्य में भी देखने को मिलता है। जयदेव ने वसंत के लिए अपनी कलम से निम्न पंक्तियों को जन्म दिया है
ललित लवंग-लता परिशीलन कोमल मलय समीरे,
मधुकर-निकर करम्बित कोकिल कुंजित कुंज कुटीरे।
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने वसंत के लिए कहा है कि
वसंत आता नहीं, ले आया जाता है।
वसंत ऋतु का आगमन मानव को एक संदेश देता है और प्रकृति के एक शाश्वत सत्य को उद्घाटित भी करता है और साथ ही कहता है कि- हे मानव, मैं तुम्हारे जीवन में आनंद और खुशियाँ अवश्य लेकर आऊंगा, क्योंकि तुम मेरा स्वागत बड़ी निडरता के साथ शिशिर की कड़कड़ाती ठंड को झेलते हुए करते हो। ठीक उसी तरह जैसे हर रात की सुबह जरूर होती है और हर दुख के बाद सुख अवश्य आता है।
Congratulations teachers, we made it! First marking period grades are in and we are closing in on the first semester. However, as it always happens, there were a few teachers who have more than half of their students failing.
To keep teachers reflecting on how well each lesson is delivered, we’re trying to implement a new policy of authentically assessing students for any lesson objective we write.
भारत एक ऐसा गौरवशाली देश है जिसने अपने में कई उपलब्धियों को समेट रखा है। सारे विश्व में जो किसी को नहीं मिल सकता वह केवल भारत में ही मिल सकता है। भारत के पास कई ऐसे रत्न हैं जिसका मोल शायद ही कोई लगा सके।
विश्व के महान आश्चर्यों में से एक है ताजमहल। यह विश्व में अपनी अभूतपूर्व कलाकृति के लिए जाना जाता है।
ताजमहल का निर्माण आगरा में यमुना नदी के तट पर अपनी पत्नी की याद में तत्कालीन मुगल सम्राट शाहजहाँ ने सन् 1654 ई. में बनवाया था। इतिहास में लिखा है कि इसे बनाने में लगभग 22 वर्ष का समय लगा जिसे 20,000 कारीगरों ने बनाया था और उस समय लगभग 3 करोड़ का खर्च आया था।
कहा यह भी जाता है कि जैसे ही ताजमहल का निर्माण कार्य सफल हुआ, शाहजहाँ ने उसे बनाने वाले कारीगरों को कतार में खड़ा कर सबके हाथ काट डाले ताकि इस तरह की अद्वितीय कला का नमूना कहीं और न बन सके।
इसका निर्माण सफेद संगमरमर के पत्थरों से कराया गया। ये पत्थर नागौर के मकराने से विशेष रूप से मंगवाए गए। इसमें जो लाल रंग के पत्थर लगे हैं, वे धौलपुर और फतेहपुर सीकरी से मंगवाए गए थे। पीले और काले पत्थर नरबाद और चारकोह से आए थे। साथ ही इसमें जो कीमती पत्थर व सोने-चाँदी का जो इस्तेमाल हुआ है, वह पूरे देशों के सम्राटों से प्राप्त किया हुआ है।
अगर हमें ताजमहल का वास्तविक रूप देखना है तो हमें चाँदनी रात का इंतजार करना होगा, क्योंकि उसे रात वह अन्य रातों के मुकाबले अत्याधिक सुन्दर लगता है। ताजमहल के मुख्य भवन के बाहर बहुत ऊंचा और सुंदर दरवाजा है, जिसे बुलंद दरवाजा कहते हैं। इसे बनाने के लिए लाल रंग के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। इसके भीतर प्रवेश करने के लिए उन दरवाजों से प्रवेश करना पड़ता है जिस पर कुरान-शरीफ की आयतें लिखी गयी हैं। आगे पहुँचने पर भव्य उद्यान के बीचों-बीच ताजमहल का मुख्य द्वार है। बीचोंबीच एक सुंदर झील भी है। जो इसकी शोभा में चार चाँद लगाती है।
कहा जाता है कि शरद् पूर्णिमा की रात ताजमहल के पत्थरों का रंग अपनेआप बदल जाता है। सभी लाल और हरे रंग के पत्थर इस रात को हीरे की तरह चमकने लगते हैं।
अब तक ताजमहल अपने 358 वर्ष पूरे कर चुका है। जब ताजमहल सन् 2004 में अपने 350 वर्ष पूरे कर चुका था तो उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे वर्ष विभिन्न तरह के आयोजनों द्वारा अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए उस वर्ष को ताज महोत्सव का नाम दिया।
दर्शकों का सम्मान करते हुए सर्वोच्चन्यायालय द्वारा ताजमहल के रात्रिकालीन दर्शन पर जो प्रतिबंध लगा था उसे हटा लिया गया है।
ताजमहल अपने सौंदर्य, प्रेम और आश्चर्य के कारण आज विश्वभर में जाना जाता है, इसकी एक झलक पाने लोग हजारों-लाखों मील दूर से आते हैं।
With only a few short weeks before break, it’s tempting to let school run on autopilot until party time. This valuable learning time doesn’t have to go to waste or feel like a punishment.
To make these days count instead of countdown, here are a few tips and tricks to keep the energy and learning alive while having some pre-holiday fun.
प्राय: देखा जाता है कि कुछ व्यक्ति समुचित सहायता, प्रेरणा और अनुकूल वातावरण मिलने पर भी आगे नहीं बढ़ पाते। ऐसे व्यक्ति हष्ट-पुष्ट तो होते हैं, अच्छा खाते, पहनते भी हैं परंतु जीवन में कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते। जिसके लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं। वे संघर्षों से दूर भागते हैं और किसी भी भयानक परिस्थिति का सामना नहीं कर पाते।
इसके विपरीत कुछ व्यक्ति व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो होते तो दुबलेपतले हैं पर कठिन से कठिन परिस्थितियों का भी सामना डटकर करते हैं। वे दिन-बदिन सफलता की राह पर आगे बढ़ते जाते हैं।इन दोनों तरह के व्यक्ति के मध्य कोई फर्क नहीं रहता, रहता है तो बस इतना कि एक के साथ एक अद्भुत शक्ति होती है और एक के पास वह शक्ति होते हुए भी नहीं होती।
आखिर यह शक्ति है क्या, इसका जवाब है वह शक्ति कुछ और नहीं बल्कि उसका खुद का मन अर्थात् उसका मानसिक बल है।
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार मनुष्य में प्रायः तीन प्रकार की शक्तियां विद्यमान रहती हैं। यहाँ हम शारीरिक तथा मानसिक शक्ति पर ही विचार करेंगे। शारीरिक शक्तिकी दृष्टि से देखें तो विश्व के सभी मनुष्यों के बीच थोड़ा-बहुत फर्क पाया जाता है। पर मानसिक शक्ति सबकी एक समान सेती है। बस फर्क होता है तो यह कि कोई उसे विकसित कर लेता है तो कोई उसे संकीर्ण बने रहने देता है। शरीर तो एक यंत्र के समान है जिसमें कोई न कोई खराबी आती ही रहती है पर हाँ अगर हम अपनी मानसिक शक्ति को इतना प्रबल कर लें तो यह खराबी भी ज्यादा समय तक नहीं रह सकती है।
उदाहरण के तौर पर हम देखते हैं कि कुछ मनुष्य थोड़ा सा कार्य करके ही थक जाते हैं और कुछ घंटों कार्य करते हुए भी नहीं थकते। इसका कारण है उनकी अपनी ही मानसिक शक्ति। एक व्यक्ति में यह संकीर्ण रूप से रहती है तो वह जल्द ही हार मान लेता है जबकि किसी दूसरे में यह विकसित रूप से रहती है तो वह उसे समय-समय पर बल देते हुए कार्य के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। जिससे वह थकान महसूस नहीं करता।
अगर हम किसी भी महापुरुष का जीवन-चरित्र पढ़े तो उनके द्वारा किए गए कल्पनातीत कार्यों को जानकर हमें बहुत आश्चर्य होता है। हम यह सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि वह कौन सी शक्ति थी, जिससे उन्होंने ऐसे अद्भुत कार्य कर डाले। विचार-विमर्श करने पर हमें पता चलता है कि उन लोगों की मानसिक शक्ति इतनी प्रबल थी कि वह उसके बलबूते पर असंभव से असंभव कार्य को सरलता से पूर्ण कर लेते थे। इसीलिए तो किसी महापुरुष ने सच ही कहा है –
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
कार्य सफल सब पाइए, मन ही के परतीत।।
इस दोहे पर अगर हम गौर करें तो हमे पता चलेगा कि मन के हारने से ही व्यक्ति की भी हार हो जाती है और मन के जीतने से ही व्यक्ति की भी जीत हो जाती है। कठिन से कठिन कार्य भी सफल हो सकते हैं अगर हम अपने मन को विकसित कर लें, तो।
मानव ने अपने मन के परताप से परमात्मा को भी दिव्य रूप में प्रकट होने के लिए विवश कर दिया था। किसी महापुरुष ने तो यहाँ तक कह दिया है कि जिस व्यक्ति का मन हार चुका होता है वह व्यक्ति मर चुका होता है। मनुष्य को अपने संघर्षों से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
अगर हम कहें कि मनुष्य की मानसिक शक्ति वास्तव में उसकी इच्छा शक्ति है तो यह गलत नहीं होगा। मानव की इच्छा शक्ति जितनी प्रबल होगी, उसका मन भी उतना ही सुदृढ़ होगा।
मनुष्य चाहे तो वह अपनी इच्छा शक्ति के माध्यम से मृत्यु को भी पछाड़ सकता है। भीष्म पितामह इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। इसलिए हमें अपने मन को कभी हारने नहीं देना चाहिए।
We had our first Chicago snow storm this weekend which meant digging out my car, an unpleasant drive to work and basically feeling soggy all morning. But I am determined to maintain a romanticized winter wonderland mentality this year. To stay optimistic, I’m focusing on the upside of snow.
1. It’s pretty (esp. through the window while you’re warm and cozy next to a fire drinking cocoa). 2. Snowball fights and snowman building 3. Shoveling is great cardio. 4. Snow days!!!! 5. And, finally, seasonally sensational learning opportunities.
Educational technology is changing the way we teach and the objectives of classroom assignments. Online resources continue to emerge that offer new and exciting ways to teach and bring about new teaching standards. Online sharing is one way to meet collaboration standards and objectives for 21st Century learning.
It is important for all students to see the power of online collaboration and to learn the rules about collaborating with others.
With so many lightning-fast connections at our doorstep, we find ourselves within reach of some of the most powerful learning resources that have ever existed on Earth. The quantity of choices intimidates many. However, the beauty of having so many choices, the beauty of digital media itself is its inherent flexibility and potential to serve all learners.
Why should we not make it a priority to improve our own flexibility as educators and learners at every available opportunity?
As December rolls by, the holiday hype has most likely invaded your classroom. The energy of your students is on the rise as they shift focus from their science homework to their holiday break plans.
Why not capitalize on your students’ holiday spirit with these Christmas and winter holiday activities!
As educators, we spend countless hours in professional development studying methods for improving teen literacy and planning ways to integrate literacy into our daily lessons.
Choosing the right books to read with or to your students can be tricky. I’ve found several nonfiction books that provide meaningful science lessons and engage adolescent minds equally well.
Since 1776 the United States has grown from a nation of relatively few religious differences to one of countless religious groups. This expanding pluralism challenges the public schools to deal creatively and sensitively with students professing many religions and none.
The following questions and answers concern religious holidays and public education, a subject often marked by confusion and conflict. Teachers and school officials, as well as parents and students, should approach this discussion as an opportunity to work cooperatively for the sake of good education rather than at cross purposes.
K-2: Transform Your House They made the store look like a present, a castle and even a sweater. If you could transform your house, what would you make it look like? Draw a picture of your house “dressed up” and write what it is beneath the picture.
6-8: Modernize Traditions for the 21st Century This is a technologically-advanced approach to a ribbon cutting ceremony for a new store. Think of other traditional ceremonies, like receiving a diploma at graduation, 4th of July fireworks celebrations, passing the Olympic torch, awarding statues at the Oscars or even a wedding. In at least two paragraphs, describe an updated version of the ceremony using technology to add some pizazz.
निबंध का शीषर्क महाकवि अलामा इकबाल की कविता से लिया गया है, वे ऊर्दू के एक प्रसिद्ध शायर भी थे।
यह पंक्ति एक राष्ट्रीय आंदोलन के समय पढ़ी गई थी। यह सिर्फ राष्ट्रीय आंदोलन तक ही सीमित न रहकर आज कई मायनों में सभी के लिए उपयोगी है। इस कविता, शायरी के एक एक शब्द समस्त देशवासियों के रग-रग में देशभक्ति का संचार करते हैं साथ ही एक अनोखी ऊर्जा प्रदान करते हैं जिसकी मदद से देशवासी साम्प्रदायिकता की भावना से ऊपर उठकर स्वतंत्रता-संग्राम में कूद पड़ते हैं।मजहब एक पवित्र अवधारणा है। यह अत्यंत सूक्ष्म, भावनात्मक सूझ, विश्वास और श्रद्धा है। मूलतः अध्यात्म के क्षेत्र में ईश्वर, पैगम्बर आदि के प्रति मन की श्रद्धा या विश्वास पर आधारित धारणात्मक प्रक्रिया ही मजहब है। यह बाह्य-आडंबरों, बैरभाव, अंधविश्वास आदि से ऊपर है। इसी बात को ही इकबाल जी के अलावा तकरीबन सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने कहा है।
इस सूक्ति के माध्यम से हमें संदेश मिलता है कि धर्म परस्पर बैर रखने को प्रोत्साहित नहीं करता, अपितु परस्पर मेल-मिलाप और भाई-चारे का संदेश देता है। कोई भी मजहब हो, हमें वह यही सिखाता है कि लड़ाई-झगड़े से दूर रहकर आत्म-संस्कार के द्वारा प्राणियों का हिस-साधना करना। साथ ही मजहब यह भी स्पष्ट करता है कि भले ही कोई भी मज़हब वाले ऊपर वाले को किसी भी नाम से पुकारे, पर पुकार सब की वह एक ही सुनता है।
मजहब के नाम पर लड़ाना-भिड़ाना तो केवल कुछ स्वार्थी लोगों की चाल थी।
इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो हम देखेंगे कि लोग यह जानते थे कि हम सभी एक-दूसरे के साथ भाई-चारे के साथ रहेंगे तो ही अखण्ड रहेंगे, वे जानते थे कि एकता में ही बल होता है फिर भी मजहब के नाम पर कत्लेआम हुआ और भारत माँ को टुकड़ों में विभाजित कर दिया गया।
इतिहास से नजर हटाकर अगर हम वर्तमान में मनन करें तो क्या आज भी मजहब के नाम पर दंगे फसाद नहीं होते? सदियों पुराना अयोद्धा मामला आज तक नहीं सुलझ पाया है, इसका कारण क्या हमें पता नहीं।
देश को मजहब आदि का तमंचा दिखा कर कुछ स्वार्थी लोग अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु देश को खण्ड-खण्ड में बाँट देना चाहते हैं। ताकि वह समय आने पर अपनी स्वार्थ की सीमा को बढ़ा सकें।
हाल ही में मजहब के नाम पर देश-विभाजन की माँग किसी से छिपी नहीं है। इतिहास स्वयं साक्षी है कि किस प्रकार कुछ पथभ्रष्टों व स्वार्थी लोगों ने मजहब के नाम पर अंधविश्वास फैलाते हुए स्वयं ईसा को, सलीब को, कीले ठोककर सूली पर लटका डाला। फिर भी उन देवदूतों को सलाम करना चाहिए जो जाते जाते भी प्रभू से उन सूली पर चढ़ाने वालों के लिए ही सुख, समृद्धि और शांति की कामना करते रहे।
महात्मा गांधी, गुरु तेगबहादूर आदि महापुरुषों को भी मजहब का नाम लेकर ही मारागया था।
मजहब धीरे-धीरे एक ऐसा ज्वलंत विषय बनता जा रहा है कि उस पर कोई चर्चा करने से भी हिचकिचा रहा है। सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन जैसे लेखक इस बात का प्रमाण ।
अगर हम किसी भी मजहब की कोई भी धार्मिक पुस्तक को उठा कर देखें तो उसमें अपने-अपने तरीकों से भले ही अपने-अपने पूजनीयों की वंदना की गई है पर अंततः सन मानते तो एक ही को हैं, चाहे उसके कितने भी नाम हो, वास्तविकता तो एक ही है। धर्म सदैव से सबको जोड़ने का काम करता आया है, न कि तोड़ने का। पूरी पंक्ति इस प्रकार है
अभ्यास का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। अभ्यास से जीवन में आशा के अनुरूप परिवर्तन आते रहते हैं। अभ्यास से यदि मूर्ख व्यक्ति भी चाहे तो समझदार बन सकता है।
जन्म से ही हर कार्य में कुशल व प्रवीण कम ही व्यक्ति होते हैं। हजारों में एकाध का नंबर आता है जो बिना किसी अभ्यास के ही कर कार्य में सफल हो जाते हैं। इसका भी शास्त्रीय अध्ययन करें तो यह उसके पिछले जन्म के पुण्य या परिश्रम या अभ्यास का ही प्रताप माना जा सकता है। खैर,… ।
मानव जीवन में प्रायः यह देखा गया है कि निरंतर अभ्यास से ही कार्य में कुशलता आती है। इसीलिए जीवन का निष्कर्ष किसी महापुरुष ने कुछ इस तरह से दिया है –
करत-करत अभ्यास के जड़पति होता सुजान।
रस्सी आवत-जात है, छोड़ देत सिला पर निसान।।
अब इस दोहे की अगर हम व्याख्या करने बैठेंगे तो निबंध की यह पुस्तक ही छोटी पड़ जाएगी। संक्षिप्त में हम इस का अर्थ समझ लेते हैं कि जिस तरह से बावड़ी की शिला पर बार-बार रस्सी बाल्टी से बंधी नीचे-ऊपर होती रहती है तो एक समय ऐसा आता है कि वह शिला भी रस्सी से हार मान अपने पर उसका निशान ले लेती है, यह एक सत्य कहावत है। उसी तरह अगर व्यक्ति भी बार-बार अभ्यास करे तो एक समय ऐसा आता है जब मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी समझदार बन जाता है।
यहाँ हम महाकवि वाल्मीकि का उदाहरण देखेंगे, महाकवि बनने से पहले वे एक मूर्ख व्यक्ति और डाकू थे। पर उनकी किस्मत जो वे राम-राम के स्थान पर उसका उल्टा मरा-मरा का उच्चारण अक्सर किया करते थे। एक दिन उनकी मुलाकात एक प्रतापी विद्वान से हुई जिसने उन्हें अकी गलती का अहसास करवाया और अभ्यास से राम-राम का उच्चारण करवाने लगा।
इसका फल यह निकला कि जो व्यक्ति राम-राम तक नहीं बोल पाता था उसने समय आने पर रामायण जैसा विशाल ग्रंथ ही लिख डाला।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमें देखने को मिलेंगे, अगर हम आज के इस युग की बात करें तो हम स्वर कोकिला लता मंगेशकर की बात करेंगें। एक समारोह में उन्होंने बताया था कि उनकी रूचि संगीत में नहीं थी पर अपने परिवार के लिए उन्होंने संगीत का अभ्यास जो शुरु किया तो अभ्यास करते करते वे आज संगीत की मल्लिका ही बन बैठी।
आप किसी भी सफल व्यक्ति की जीवनी पढ़ें, हर सफल उद्यमी के पीछे भी अभ्यास का ही सहारा होता है।
हम इतना जरूर कह सकते हैं कि जिन-जिन ने निरंतर अभ्यास किया है, उनउन के सभी कार्य सफल हुए हैं।
आपका अपना जीवन भी एक उदाहरण है, कभी-न-कभी अपने भी अपने जीवन में अभ्यास का महत्व परखा होगा, फिर चाहे वह परीक्षा के दौरान पढ़ने से हो या बचपन में साइकिल चलाना सिखने से हो।।
इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि अभ्यास से ही सफलता का मार्ग सशक्त किया जा सकता है। अभ्यास ही सफलता प्राप्त करने की सीढ़ी है। यही जीवन का मूल मंत्र है इसीलिए तो अंग्रेजी में एक कहावत
हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं प्रधानमंत्री होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
किसी भी राष्ट्र का शासनाध्यक्ष होना मतलब कांटों का ताज पहनना। विपत्तियों का पहाड़ उठाना, जलते अंगारों पर चलना, आग के दरिया में कूदना, खाई के बीचोंबीच चलना आदि के बराबर होता हैबेनजीर भुट्टो, हिटलर, गद्दाफी आदि इसके साक्षात् प्रमाण हैं। अगर हम अपने भारत देश को ही ले लें तो श्री लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि की असामयिक मृत्यु इसके प्रमाण हैं।
भारत के संविधान में प्रधानमंत्री का पद सर्वोच्च बताया गया है। प्रत्येक नागरिक का हक इस पद पर हो सकता है, सभी इस पद के जोख़िम को जानते हुए भी इस पर बैठने लालायित रहते हैं। अतः अगर मुझे भी मौका मिले तो मैं भी पीछे नहीं हदूंगा। भला मैं अपने प्यारे भारतीयों का दिल तो नहीं तोड़ सकता हूँ।
सत्तासीन होकर मैं एक राष्ट्रभक्त की तरह हर पल राष्ट्र की उन्नति व विकास के बारे में ही सोचूंगा। भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, सरदार पटेल आदि मेरे आदर्श रहेंगे।
जैसा कि हम सब जानते हैं, भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, समानता प्रजातंत्र का ही मूलमंत्र है। आज भारत के समक्ष कई चुनौतियाँ हैं, जो समस्या बन मुँह उठाए खड़ी हैं। बेरोजगारी, निर्धनता, भूखमरी आदि इसके साक्षात् प्रमाण हैं।
अतः प्रधानमंत्री बनते ही सर्वप्रथम मैं इन चुनौतियों से निपटूगा, यही मेरा प्रथम कर्तव्य होगा। इनके अलावा अशिक्षा, जातीयता, संप्रदायिकता एवं आतंकवाद आदि को भी जड़ से उखाड़ फेंकने को प्राथमिकता दूंगा। मैं देश-विदेश का भ्रमण कर हर संपन्न देश से कुछ न कुछ रहस्य सीख अपने भारत में लौटुंगा और देश को सभी अन्य देशों से समृद्ध बनाने का लक्ष्य रचूँगा। मेरी समझ से अगर देश से अशिक्षा को मिटा दिया जाए तो अपने आप ही हर समस्या का निदान संभव हो जाएगा।
मैं शिक्षा के क्षेत्र में नए-नए शोध करवाकर नई पद्धति से भारत में अशिक्षा को मिटाने का प्रयास करूंगा।
हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को मैं और भी समृद्ध बनाने के हर संभव प्रयास करूंगा। जैसा कि हम जानते हैं की हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है, मैं नए-नए शोध द्वारा इसे विज्ञान की सहायता से और सफल बनाने का भरपूर प्रयास करूंगा। साथ ही हरित क्रांति लाऊंगा।
बेरोजगारी मिटाने हेतु घर-घर कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दूंगा। हर किसी को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहने की शिक्षा दूंगा, गौ-पालन पर सबका ध्यान आकर्षित कर श्वेत क्रांति लाने का प्रयास करूंगा।
संक्षेप में अगर कहूँ तो मैं इस देश से बेरोजगारी मिटाने का प्रयास करूंगा।
मैंने अपने जीवन में जो अनुभव किया वह यह कि जातियता, भाई-चारे की सबसे बड़ी समस्या है, इस हेतु भी मैं अपने देश में विभिन्न जागरूकता अभियान चलाते हुए, अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रोत्साहित करूगा साथ ही अन्य को इस हेतु प्रेरणा भी दूंगा।
समय-समय पर अन्य देश के राजनेताओं को अपने देश बुलवाकर उन्हें सम्मानित करूंगा साथ ही भारत देश में इंवेस्टमैंट हेतु आग्रह करूंगा। इससे हमारे कई फायदे होंगे, एक तो वो हम से दबे रहेंगे और साथ ही हमारे देश के कई नौजवानों को रोजगार का अवसर भी मिल जाएगा।
अगर अन्य नेताओं का सहयोग मिले तो मैं इस देश का नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी सफल प्रयास करूंगा, हर नेता की तनख्वाह इतनी बड़ा दूंगा कि वो भ्रष्टाचार के बारे में विचार भी नहीं करेंगे। क्योंकि मैंने देखा है कि अगर पेट भरा हो तो आदमी रसमल्लाई भी त्याग देता है।
आंतकवाद को तो जड़ से मिटाना मैं अपने कार्यकालका लक्ष्य रखेंगा। आगे आपलोगों की मर्जी अगर आप मुझे बहुमत देने तैयार हैं तो अगामी चुनाव मैं लड़ ही लेता हूँ।
हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं शिक्षक होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही था कि मैं शिक्षक बनूं। क्यों कि देशभक्ति तो मेरे अंदर कूट-कूट कर भरी हुई है। मैं जड़ से ही अपने देश को मजबूत बनाना चाहता हूँ। अपने राष्ट्र के भावी कर्णधारों तथा मनु की संतानों को शिक्षा के माध्यम से मानवता का पाठ पढ़ाना और अपने विद्यार्थियों को वास्तविक मनुष्य बनाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य होता।मैं गुरु-शिष्य के संबंधों का निर्वाह भली-भाँति करूगा। मैं महात्मा बुद्ध को अपना आदर्श बनाते हुए उनकी ये बातें सदैव याद रखूगा कि गुरु को आकाशम होना चाहिए, शिलाधर्मी नहीं।।
मैं आचार्य चाणक्य को अपना आदर्श मानकर अपने शिष्यों को ठीक चंद्रगुप्त की तरह रंक से राजा बनाने का सफल प्रयास करूंगा।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि जो गुण एक आदर्श शिक्षक में होने चाहिए, वह सब मुझमें हैं। मैं शिक्षण को एक नौकरी समझकर नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझ कर करूंगा।
मैं न तो अपने शिक्षण के समय अत्याधिक सख्ती करूंगा न ही अत्याधिक नरमी, जैसे कि आप सभी जानते हैं मैंने अभी हाल ही में अपनी पढ़ाई की है मैं एक विद्यार्थी मन से ताजा-ताजा परिचित हूँ। मुझे उनके मन में चल रहे शिक्षक के खिलाफ़ गलतफहमी सब पता है, मैं सर्वप्रथम उसे मिटाकर आपस में दोस्तों की तरह रहते हुए, जहाँ नरमी की आवश्यकता है, वहाँ नरमी का प्रयोग करूंगा और जहाँ सख्ती की आवश्यकता है, वहाँ सख्ती का प्रयोग करूंगा।
मैं केवल सिलेबस को खत्म करने के लिए नहीं पढ़ाते हुए अपने छात्रों को समाज के प्रति उदार, दयावान, सबकी मदद करने जैसे नैतिक पाठों को प्रमुखता के साथ पढ़ाऊंगा। मैं केवल थ्योरी ही में नहीं बल्कि प्रैक्टिकल में विश्वास रखते हुए उन्हें सभी
जैसा कि मैं पहले कह चूका हूँ कि मैं अपने छात्रों के साथ केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में व्यवहार करूंगा, साथ ही उनके जीवन के हर क्षेत्र में उनकी मदद करने सदैव तैयार रहँगा, जितना मुझसे संभव होगा मैं उनके लिए जीवन के हर क्षेत्र के दरवाजे खुले कर दूगां, जितना मुझे पता होगा मैं उतना उनमें बाहूँगा, मैं सदैव नई-नई जानकारियाँ हासिल करता रहूँगा, ताकि मेरे छात्रों को मैं सभी जानकारियों से आवगत करा सकें।
मैं किसी भी छात्र के बीच भेद-भाव की भावना को नहीं आने दूंगा। क्योंकि सभी छात्र मेरे लिए एक समान थे, एक समान हैं और एक समान रहेंगे। मैं धन, जाति, संप्रदाय आदि को बीच में नहीं आने दूंगा, साथ ही उन को भी आपस में एकता का पाठ पढ़ाते हुए मिल-जुलकर रहने की सलाह दूंगा।
मैं सदैव उनसे मीठा बोलूंगा और साथ ही उन्हें भी मीठा बोलने के लिए प्रोत्साहित करूंगा।
मैं समय-समय पर अपने विद्यार्थियों को अन्य विद्यालय ले जाकर सेमिनार आदिका आयोजन करवाता रहूँगा ताकि आपस में उनके विचारों का आदने-प्रदान हो और वह बाहरी जीवन से भी आवगत हो सकें।
अंतमें मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि यदि जीवन में मुझे कभी भी शिक्षक बनने का मौका मिला तो मैं समाज में अपने लिए एक आदर्श शिक्षक के रूप में पहचान अवश्य बनाऊंगा। साथ ही देश को एक अच्छे नागरिक और भावी कर्णधार श्रद्धा स्वरूप भेंट करूंगा।
क्या आप जानते हैं? हिन्दी की 47 बोलियों के नाम –
1981 की जनगणना में भारत में विभिन्न बोलियों का हिन्दी भाषा के । ! साथ परिगणन – अवधी, बधेली, छत्तीसगढ़ी, बागड़ी-राजस्थानी, बनजारी, भद्रभाषा, भरमौरी / गदी, भोजपुरी, बज्रभाषा, बुंदेली/बुंदेलखंडी, चूराठी, चंबियाली, ढूंढाड़ी, गढ़वाली, गोजरी, हाडौती, हरियाणवी, जौनसारी, कांगडी, खडी बोली, खोट्टा, कुल्ची, कुमाउनी, कुरमलीथार, लबानी, लमानी/लंबादी, लडिया, लोधी, मागधी । मगही, मैथिली, मालवी, मंडिआली, मारवाड़ी, मेवाती,नागपुरिया, निमाड़ी, पडारी, पहाडी, पंचपरगनि, पंगवाली, पवारी / पोवारी, राजस्थानी, सदन/ सदरी, मोड़वारी, सुगली, सुरगुजिया, सूरजपुरी।
हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं करोड़पति होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही है कि मैं करोड़पति बनूं। क्यों कि आज के भौतिक युग में धनाढ्य होना गौरव तथा सम्मान दोनों की ही बात है। परंतु यह तो सच है कि व्यक्ति केवल अपने सौभाग्य से ही नहीं बल्कि अपने कर्म से भी करोड़पति बन सकता है। प्राचीन काल में तो अगर किसी व्यक्ति के पास एक वक्त की रोटी भी अगर खाने के लिए है तो वह किसी करोड़पति से कम नहीं होता था। पर आज के इस युग की बात करें तो धन के बिना जीवन निरर्थक सा लगता है। अधिक धन प्राप्त करने की लालसा में हर कोई लगा है चाहे वह नैतिकता के आधार पर हो या फिर अनैतिकता के आधार पर ऐसे माहौल में अगर हम चाहते हैं कि आगे रहें तो हमें भी करोड़पति बनना चाहिए नहीं तो हमें कोई पूछेगा तक नहीं।अक्सर मैं सोचा करता हूँ कि अगर मैं करोड़पति होता तो कितना अच्छा होता, हाँ मैं एक बात पहले ही आपको बता दें कि मैं सिर्फ नैतिकता के मार्ग पर चलकर ही करोड़पति बनना चाहँगा, भले कुछ समय अधिक लग जाए पर संतोष तो रहेगा। आज के इस प्रतिस्पर्धा वाले युग में करोड़पति बनना कोई मुश्किल काम नहीं है, बस आपको समय के साथ बदलना होगा।
जैसे ही मैं करोड़पति बन जाऊंगा, सर्वप्रथम मैं एक ऐसी संस्था की स्थापना करूंगा जो हर किसी जरूरतमंद के कोई-न-कोई काम आए। जैसे योग्य छात्रछात्राओं के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था करना, विवाह योग्य युवक-युवतियाँ जिनका धनाभाव के कारण विवाह में विलंभ हो रहा, उन्हें आर्थिक मदद देकर, सैल करूंगा। साथ ही कई ऐसी धर्मशालाओं, गौशालाओं आदि का निर्माण करवाऊंगा जिससे सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि हर किसी की अध्यात्मिक तृप्ति हो सके।
घर से बेघर किए जाने वाले वृद्धों के लिए मैं वृद्धाश्रम बनवाऊंगा। अनाथ बच्चों के लिए अनाथालयों का निर्माण करवाऊंगा साथ ही वहाँ उन्हें उनके भावी जीवन में आने वाले संकटों से लड़ने के लिए सक्षम बनाऊंगा, ताकि वह अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें। साथ ही धन के अभाव से अपना उचित समय पर इलाज न करवा सकने वाले व्यक्तियों के लिए मुफ्त में उपयोगी औषधियाँ उपलब्धकरवाऊंगा।
पौष्टिक आहार न मिल पाने से जो गरीबों के बच्चों में रोग पैदा हो रहे हैं, उसे दूर करने हेतु निर्धनों में पौष्टिक आहार बटवाऊंगा।
मैं अपने ही देश में विभिन्न शोध-संस्थाओं का निर्माण करवाऊंगा जिसके माध्यम से हमारे देश का पैसा हमारे देश में ही रह सके, जैसे कि कुछ तरह के रोगों का इलाज हमारे देशवासियों को बाहर देश जाकर करवाना पड़ता है जिससे समय व धन दोनों का व्यय अधिक होता है। अगर वही सब कुछ यहाँ हमारे ही देश में होने लग जाए तो समय व धन दोनों की ही बचत हो सकेगी।
वैसे एक बात मैं यहाँ साफ कर दें। मैं यह सब कार्य कोई घमंड से नहीं करूंगा बल्कि सेवाभाव से बिना किसी नाम कमाने के स्वार्थ के लिए करूंगा।
मैं अपने देश के लिए ऐसा कुछ करना चाहूँगा, जिससे वह समृद्ध बन सके। साथ ही सारे नागरिक खुशहाल व स्वस्थ रह सकें।
मैं अपने ही देश में कुछ ऐसे प्रॉजेक्ट्रेस शुरू करवाऊंगा जिससे अधिकतम से अधिकतम लोगों को रोजगार मिल सके और वह अपने ही देश में रहकर तरक्की करें। खुद भी समृद्ध हों और अपने देश को भी समृद्ध बनाएं।
मैं किसी की मदद करते समय कभी भी उसकी जाति, धर्म, वर्ग आदि का भेदभाव नहीं करूंगा क्योंकि मैंने बचपन से ही अपने माँ-बाप से सीखा है कि हम सभी भारतीय एक ही धर्म के हैं और हमारा धर्म है भारतीयता।
अंत में मैं इतना जरूर कहूंगा कि जितना हो सकेगा मैं अपने धन का प्रयोग अच्छे कामों में ही खर्च करना चाहूँगा। जिससे मैं अपना तो जीवन आनंदमयी बना सर्केगा साथ ही अपने आसपास का वातावरण भी सुखद बना लूंगा।
पर्यावरण से तात्पर्य है- हमारे चारों ओर का वातावरण, जहाँ हम रहते हैं, घूमते-फिरते हैं तथा जीवन व्यतीत करते हैं। इसी वातावरण में हम श्वास लेते हैं। यदि पर्यावरण प्रदूषित हो तो जीवन बीमारियों और कठिनाइयों से भर जाता है। पर्यावरण की रक्षा के लिए हम महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यदि हर नागरिक सजग हो तो पर्यावरण प्रदूषित होगा ही नहीं। प्रदूषित वातावरण इंसानों के लिए ही नहीं जानवरों और पक्षियों के लिए भी खतरनाक है। वृक्ष पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करते हैं। वृक्षों द्वारा छोड़ी गई वायु जैसे ऑक्सीजन मनुष्य तथा पर्यावरण के लिए फेफड़ों का कार्य करती है। हमें चाहिए कि हम खूब पौधे व वृक्ष लगाएँ। जितने अधिक वृक्ष होंगे, उतनी ही पर्यावरण की रक्षा होगी। यदि कोई वृक्ष काटता है तो हमें उसकी शिकायत करनी चाहिए क्योंकि वृक्ष काटना अपराध है।
ओ पापी मानव! क्यों पाप किए जाता है?
अपनी ही माँ को तू निर्वस्त्र किए जाता है।
पेड़ काट कर तू धरती की लाज मिटाता जाता है।
जिस आँचल ने तुझको पाला, उसे फाड़ता जाता है।
हमारे पर्यावरण की रक्षा के लिए हम सभी को मिलकर संकल्प लेना चाहिए। सब के संयुक्त प्रयास से पर्यावरण को दूषित होने से आसानी से बचाया जा सकता है। गाड़ियों द्वारा होने वाले प्रदूषित वातावरण से बचने के लिए गाड़ियों की नियमित रूप से जाँच की जानी आवश्यक है। इसकी जानकारी सभी नागरिकों को समान रूप से दी जानी चाहिए। वाहनों का प्रदूषण चेक होने पर उसे नियंत्रित किया जा सकता है।
हमें चाहिए कि हम अधिक से अधिक वक्ष लगाएँ और दूसरों को भी वक्षारोपण करने के लिए प्रेरित करें। वृक्षों का कटान रोकने की दिशा में सुदृढ़ प्रयास करें। किंतु केवल वृक्षारोपण करके ही अपने कर्तव्य की इति नहीं माननी चाहिए बल्कि वृक्षों की देखभाल का पूरा दायित्व भी वहन करना चाहिए। जब तक हमारे द्वारा रोपे गए वृक्ष | बड़े न हो जाएँ तब तक उनकी वृधि के लिए हमें प्रयत्नशील रहना चाहिए। इसके अलावा नदियों में कूड़ा-करकट, फूल, पूजा सामग्री, जली हुई लकड़ी, मूर्तियाँ आदि न तो स्वयं डालें, न ही और किसी को डालने दें। हमें लोगों में जागरुकता लानी होगी कि इन कार्यों से पर्यावरण प्रदूषित होता है। नदी, तालाबों पर कपड़े धोने व जानवरों के नहलाने से लोगों को रोकना चाहिए ताकि पर्यावरण प्रदूषित न हो। बड़ी फैक्टरियों की बची हुई गंदगी, बचा तेल, कूड़ा-करकट आदि को नदियों में बहाए जाने पर रोक लगानी चाहिए। यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो हमें उसे रोकने का प्रयास करना चाहिए। यदि फिर भी कोई हमारी बात न सुने तो हमें अधिकारियों से या पुलिस से इसकी शिकायत करनी चाहिए।
वृक्षारोपण का अर्थ है- नए-नए वृक्षों को लगाना। वृक्षारोपण एक सामाजिक दायित्व है। पेड़-पौधों के साथ मानव का पुराना संबंध है। यदि ध्यान से देखा जाए तो वृक्षों के अभाव में जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पेड़-पौधे मनुष्य की अनेक प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तथा उनका पालन-पोषण भी करते हैं। वृक्षारोपण केवल सौंदर्य एवं सुरक्षा का साधन ही नहीं अपितु हमारे जीवन के लिए अति आवश्यक है।वृक्षहीन धरती के स्वरूप की हम कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि यदि धरती से वृक्ष समाप्त हो जाएँगे तो मनुष्य सहित दूसरे जीव-जंतु भी समाप्त हो जाएँगे क्योंकि हम अपनी प्रत्येक छोटी-बड़ी आवश्यकताओं, यहाँ तक की साँस लेने के लिए अति आवश्यक प्राण वायु के लिए भी वृक्षों पर आश्रित हैं। वन प्राकृतिक सुषमा के घर हैं। लकड़ी व जड़ी-बूटियों की खान हैं, जिनसे जीवन-रक्षक औषधियाँ बनती हैं। बाँस व फर की लकड़ी से कागज बनता है। वन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। पर्यटन व्यवसाय राष्ट्रीय आय का स्रोत भी माना जाता है। वन विविध वनस्पतियों के स्थायी घर हैं। वृक्ष जलवायु की विषमता को दूर करते हैं। ऋतु-परिवर्तन में इनका अहम् योगदान है। वृक्ष प्रदूषण के नाशक हैं। फल-फूल के साथ छाया प्रदान करने वाले हैं। पक्षियों की विश्राम-स्थली हैं। बाढ़ को नियंत्रित करते हैं। अनगिनत गुणों की खान होने के कारण आज वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण की आवश्यकता बढ़ती जा रही है।
सच्चा मित्र वही है जो मित्र के दु:ख में काम आता है। वह मित्र के कण जैसे दु:ख को भी मेरु के समान भारी मानकर उसकी सहायता करता है। एक सच्चा मित्र प्राणों से भी अधिक मूल्यवान होता है। मित्रता के अभाव में जीवन सूना हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- “सच्ची मित्रता में उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है। अच्छी-से-अच्छी माता का सा धैर्य और कोमलता होती है।” गोस्वामी तुलसीदास ने सच्चे मित्र के विषय में कहा है-
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी,
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।
निज दुःख गिरि सम रजे करि जाना,
मित्रक दु:ख रज मेरु समाना।।
सच्चा मित्र हमारे लिए प्रेरक, सहायक और मार्गदर्शक का काम करता है। जब भी हम निराश होते हैं, मित्र हमारी हिम्मत बढ़ाता है। जब हम परास्त होते हैं, वह उत्साह देता है। सच्चा मित्र हमारे लिए शक्तिवर्धक औषधि बनकर सामने आता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से भी बचाता है और सन्मार्ग की ओर अग्रसर करता है। सच्चा मित्र | सरलता से नहीं मिलता। इसलिए मित्र का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए। केवल बाहरी चमक-दमक, वाक्प टुता अथवा आर्थिक स्थिति को देखकर ही मित्र का चयन कर लेना उचित नहीं है, इसके लिए उसके व्यवहार, आचरण तथा अन्य बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है। सच्चा मित्र सच्चरित्र, विनम्र, सदाचारी तथा विश्वास पात्र होना चाहिए, क्योंकि सच्ची मित्रता मनुष्य के लिए वरदान है। किसी ने ठीक ही कहा है- ‘सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ।’
निबंध नंबर : 02
मेरा सच्चा मित्र
Mera Sacha Mitra
मित्रता का यह सिद्धान्त है कि मित्र कम भले ही हों, लेकिन जो भी हों विश्वासपात्र हों। ऐसे मित्र सर्वत्र नहीं मिल पाते, ढूंढ़ने पर ही मिलते हैं। अगर आपके पास मित्रों पर उड़ाने के लिए पर्याप्त पैसा हो, तो सैकड़ों मित्र बन जाएंगे। और अगर आप गरीबी में जीवन बिता रहे हों तो बहुत कम लोगों को आपकी चिन्ता होगी।
दुनिया में ऐसे बहुत से व्यक्ति होंगे जो आपके प्रति सद्भावना रखते होंगे, लेकिन उन्हें मित्रता के योग्य नहीं माना जा सकता। उनमें से बहुत-से स्वार्थी भी हो सकते हैं, जो मौका पड़ने पर बड़ी आसानी से मुंह फेर सकते हैं।
सच्चे मित्र की पहचान किसी विपत्ति या दुःख के समय ही हो सकती है। सुख व समृद्धि के समय तो सैकड़ों लोग मित्र होने का दावा करते रहते हैं, लेकिन परेशानी या दुःख के समय बहुत गिने-चुने लोग ही पास दिखाई देंगे। वही ऐसे लोग हैं जिन्हें सच्चे अर्थों में दोस्त कहा जा सकता है। बहुत-से लोग बेहद स्वार्थी होते हैं और वे अपना मतलब सिद्ध करना अच्छी तरह जानते हैं। उनके मन में सहानुभूति या सद्भावना का नाम लेश-मात्र भी नहीं होता। वे तो बस औरों का शोषण करना जानते हैं, इसलिए अच्छे मित्र के लिए हमें काफी भटकना पड़ता है।
मेरे कुल चार मित्र ऐसे हैं जो मुसीबत के समय कसौटी पर खरे उतरे हैं। उनमें भी श्री गोविन्द लाल सबसे अधिक विश्वासपात्र सिद्ध हुए। एक बार की बात है, मैं बस में सफर कर रहा था, कि अचानक मेरी जेब कट गई। वह मेरे साथ थे। उन्होंने बडी बहादुरी के साथ आगे बढ़कर जेबकतरे को पकड़ लिया और उससे मेरा मनीबैग छीनकर मुझे दे दिया। उसके बाद उस जेबकतरे को पुलिस चौकी ले जाकर उन्होंने पुलिस के हवाले कर दिया। इस तरह उन्होंने मेरा धन और जीवन दोनों की रक्षा की। उस दिन के बाद से हम दोनों अभिन्न मित्र हो गए। वे एक धनी पिता की सन्तान हैं। उनके पिता एक बहुत बड़ी फैक्ट्री के मालिक हैं, लेकिन वे बड़े वीर, स्पष्टवक्ता और ईमानदार भी हैं।
मैं न तो झूठ बोलता हूँ और न झूठ बोलने वालों को पसन्द करता हूँ। श्री गोविन्द लाल एक सच्चे इन्सान हैं और सच्चाई में ही उनका विश्वास है। संयोग से वह मेरे सहपाठी भी हैं।
पढ़ने में वह मुझसे काफी कमजोर हैं, इसलिए हर रोज शाम को मैं उनकी सहायता खुले दिल से करने को तत्पर रहता हूँ। हम लोग घूमने-फिरने भी साथ-साथ जाते हैं। गोविन्द लाल को कहानी सुनाने का बहुत शौक है। मुझे भी वे अजीबो-गरीब कहानियां सुनाते रहते हैं। वह मेरे घर भी आते हैं और मेरी मां उन्हें सगे बेटे के तरह स्नेह करती हैं।
श्री गोविन्द लाल अपनी पढ़ाई के प्रति बेहद मुस्तैद हैं, लेकिन पढ़ाई में मेरी मदद की उन्हें बड़ी आवश्यकता पड़ती है। चूंकि मेरी दृष्टि में वह छल-कपट से दूर एक निश्छल इन्सान हैं, इसलिए मैं भी हरदम उनकी मदद के लिए तैयार रहता हूँ। मैं भी प्रायः उनके घर जाता रहता हूँ और हम दोनों घण्टों साथ-साथ रहते हैं।
शिक्षा का महत्त्व • साक्षरता अभियान • अभियान में कठिनाइयाँ • संचार माध्यमों का सहयोग
शिक्षा कामधेनु के समान है जो मनुष्य की सभी इच्छाओं को प्रतिफलित करती है। शिक्षा के महत्त्व एवं आवश्यकता को देखते हुए प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह समय से पढ़-लिखकर परिवार एवं देश की उन्नति में सहयोग दे। किंतु भारत की पराधीनता ने शिक्षा के क्षेत्र के विकास में अनेक रुकावटें खड़ी कर दी, जिससे भारत की अधिकतर प्रौढ़ जनसंख्या अशिक्षित एवं निरक्षर रह गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी शिक्षण संस्थाओं की कमी एवं धनाभाव के कारण सबके लिए शिक्षा जुटा पाने में सरकार के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं, फिर प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए अभियान आरंभ करना आसान नहीं था और प्रौढ वर्ग के अशिक्षित होने के कारण देश की प्रगति की गति भी | अत्यंत धीमी थी। अतः सरकार ने 2 अक्तूबर सन् 1978 को प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षित करने के लिए एक अभियान
आरंभ किया, जिसमें 15 वर्ष से 35 वर्ष तक के स्त्री-पुरुषों को साक्षर एवं शिक्षित बनाने का निर्णय लिया गया। इस आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष किसी न किसी आजीविका अर्जन कार्य से संबंधित होते हैं। अतः इसको ध्यान में रखकर सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं ने सायंकालीन कक्षाएँ एवं विद्यालय खोले हैं। स्त्रियों की सुविधा के लिए दोपहर को भी कक्षाएँ लगाई जाती हैं।ऐसी शिक्षा चाहिए हमें करे भारत का नव-निर्माण
जिस शिक्षा से मिट जाए, जन मानस में फैला अंधकार
साक्षरता अभियान के अंतर्गत जनसंचार माध्यमों- दूरदर्शन एवं आकाशवाणी भी प्रौढों को प्रोत्साहित करने | के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा ‘पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों’ तथा ‘पढ़-लिख, लिख-पढ बन होशियार’, जैसे गीतों द्वारा प्रौढ़ों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। ये अत्यंत सराहनीय कार्य हैं। स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व हमारे देश में शिक्षा-व्यवस्था अत्यंत खराब थी, शिक्षण संस्थाएँ नगण्य थीं, बहुत कम थीं. अतः सब उनका लाभ नहीं उठा पाते थे। इसीलिए भारत की अधिकतर जनसंख्या अशिक्षित थी जिससे देश की प्रगति भी अत्यंत धीमी थी। आजकल ‘एक से एक को शिक्षा’ जैसे कार्यक्रम चलाकर प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है, सफल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरों में यह अभियान अत्यंत सफल रहा है। प्रौढ शिक्षा को सफल बनाने के लिए इसे राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना आवश्यक है।
अनुशासन का अर्थ • विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का महत्त्व • दोनों एक-दूसरे के पूरक
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता होती है, क्योंकि अनुशासन के बिना शासन संभव नहीं। ‘अनुशासन’ का शाब्दिक अर्थ है-नियंत्रक द्वारा बनाए गए नियमों का अनुगमन करना अर्थात् पीछे-पीछे चलना, यदि और स्पष्ट रूप से कहें तो अनुशासन का अर्थ “व्यक्ति के विभिन्न क्रिया-कलापों को एक सीमा में बाँधना है, जो समाज, राष्ट्र, राज्य, संस्था एवं स्वयं उसके लिए कल्याणकारी हों।” विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का विशेष महत्त्व है। आज के नागरिक कल के नेता हैं, उन्हें ही देश की पतवार सँभालनी है। अतः विद्यार्थियों का समुचित विकास आवश्यक है। वास्तव में विद्यार्थी-जीवन का आदर्श ही अनुशासन है, क्योंकि यही जीवन का निर्माण-काल है।यही तुम्हारा समय ज्ञान संचय करने का,
संयमशील, सुशील सदाचारी बनने का।
यह सब संभव हो सकता यदि अनुशासन हो,
मन में प्रेम, बड़ों का आदर, श्रद्धा का आसन हो ।।
हर समय कुछ-न-कुछ सीखने के लिए विद्यार्थी-जीवन ही सर्वोत्तम अवस्था है। जो विद्यार्थी प्रारंभिक अवस्था से अनुशासन का पालन करते हैं, उन्हें कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। किसी ने ठीक ही कहा हैअनुशासन सफलता की कुंजी है। अनुशासनहीनता मनुष्य को स्वार्थी एवं आलसी बना देती है। हमारा सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक विकास रुक जाता है। अनुशासनहीनता के कारण ही समाज में अपराधीकरण बढ़ता है। विद्यार्थियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। वे माता-पिता एवं गुरुजनों की अवज्ञा करने लगते हैं। आज उन्हें देश-समाज आदि की चिंता नहीं है, उन्हें किसी से सहानुभूति भी नहीं है और उनका आचरण दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा है।
प्रस्तावना • मनोरंजन के साधन के रूप में • शिक्षा के माध्यम के रूप में • निष्कर्ष
टेलीविज़न की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह हमारे मनोरंजन का आधुनिकतम एव सरा साधन है। इसने हमारे दैनिक जीवन, रहन-सहन पर भी प्रभाव डाला है। इस पर अनेक प्रकार के रोचक कार्यक्रमटेलीफ़िल्में, धारावाहिक, चित्रहार, चित्रगीत, संगीत, नाटक, कवि-सम्मेलन एवं खेल-जगत आदि कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, जिनसे हमारा पर्याप्त मनोरंजन होता है। दूरदर्शन शिक्षा का सशक्त माध्यम है। इस पर औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों प्रकार की शिक्षाएँ दी जा रही हैं। स्कूली विद्यार्थियों के लिए नियमित पाठों का प्रसारण किया जाता है। प्रयोगात्मक ढंग से पाठों को सुरुचिपूर्ण तरीके से समझाया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के माध्यम से विद्यार्थियों को प्रतिदिन किसी-न-किसी विषय के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने विषय की नवीन-से-नवीन जानकारी प्राप्त होती है। दूरदर्शन पर राष्ट्रीय चैनलों के अतिरिक्त अन्य प्राइवेट चैनलों की भरमार है जिन पर अनेक रुचिकर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। कुछ कार्यक्रम सीधे विद्यार्थी वर्ग से न जुड़े होकर भी उनके ज्ञान का विस्तार करते हैं; जैसे-कौन बनेगा करोड़पति, फैमिली फ़ॉर्म्युन आदि । बोर्नविटा क्विज आदि कार्यक्रम तो विशेष रूप से विद्यार्थियों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने के लिए ही बनाए गए हैं।
चमत्कार विज्ञान जगत् का, और मनोरंजन जन साधन
चारों ओर हो रहा जग में, आज दूरदर्शन का अभिनंदन
दूर्भाग्य से दूरदर्शन ने विद्यार्थियों की पढ़ने की आदतों पर बुरा प्रभाव डाला है, जिससे उनकी चिंतन-मनन की क्षमता को ठेस पहुँची है और वे अच्छाई-बुराई में अंतर करना भूल गए हैं। वे केवल क्षणिक-चित्रों और शब्द-६ वनियों के जाद में बँधकर रह गए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि छात्र आवश्यकता से अधिक दूरदर्शन के कार्यक्रमों का अवलोकन न करें। प्रतिदिन अधिक-से-अधिक एक घंटा ही कार्यक्रमों को देखें और अपनी चिंतन-मनन की शक्ति को ठेस न पहुँचाएँ । नियमित अभ्यास ही उन्हें लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर करेगा।
समय की परख ० समय के सम्मान से ही सफलता • समय की पालक प्रकृति
एक बार महात्मा गांधी से किसी ने पूछा कि “जीवन की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं–शिक्षा, शक्ति । अथवा धन को।” उत्तर मिला-“ये वस्तुएँ जीवन को सफल बनाने में सहायक अवश्य हैं, परंतु सबसे महत्त्वपूर्ण । है-समय की परख। जिसने समय की परख करना सीख लिया उसने जीने की कला सीख ली।” जो लोग उचित समय पर उचित कार्य करने की योजना बनाते हैं, वे ही समय के महत्त्व को जानते हैं। जो व्यक्ति समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है। समय कभी रुकता नहीं है, वह सम्मान माँगता है। जो जाति समय का सम्मान करना जानती । है, वह अपनी शक्ति कई गुना बढ़ा लेती है और विश्व की प्रमुख सत्ता बन बैठती है। फ्रैंकलिन के अनुसार-समय का सदुपयोग करने से जीवन में निश्चितता आती है, सब कार्य सुचारु रूप से होते चले जाते हैं। प्रत्येक कार्य के लिए समय मिल जाता है, चित्त शांत एवं प्रसन्न रहता है। धरती, सूर्य, चाँद-तारे, यहाँ तक कि संपूर्ण प्रकृति समय का पालन करती है तो मनुष्य को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। जीवन का एक-एक पल मूल्यवान है। समय मनुष्य का सबसे बड़ा धन है। युद्ध में एक मिनट खो देना सब कुछ खो देना है। अंग्रेजी की एक कहावत है कि “समय तथा समुद्र की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं।” इस संसार में सबसे अमूल्य है समय। जो इसे नष्ट करता है वह स्वयं नष्ट हो जाता है।
है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें, सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल, पर्वत झुक जाया करते हैं। ।
इस संसार में सभी वस्तुओं को घटाया और बढ़ाया जा सकता है, पर समय को नहीं। समय किसी के अधीन नहीं। न वह रुकता है और न वह किसी की प्रतीक्षा करता है । कबीर के अनुसार जो लोग दिन खा-पीकर और रात सो कर गुजार देते हैं वे हीरे जैसे अनमोल जीवन को कौड़ियों के मूल्य बेच देते हैं। ऐसे लोग, अंत में पछताते रह जाते हैं। समय एक ऐसा देवता है यदि वह प्रसन्न हो जाए तो इंसान को उन्नति के शिखर तक पहुँचा देता है, यदि नाराज़ हो जाए तो इंसान को पतन के गर्त में गिरा देता है। अतः इस मूल्यवान समय का हमें हमेशा सदुपयोग करना चाहिए ।
माता-पिता संतान के जन्मदाता ही नहीं, सब कुछ होते हैं। भारतीय परंपरा तो माँ के चरणों में स्वर्ग मानती है ।भारतीय परम्परा मई अभिभावकों की अहम् भूमिका रही है-बच्चे के व्यक्तित्व-निर्माण में। आज भारतीय जीवन में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से भौतिकवादी बुधिप्रधान दृष्टिकोण व्याप्त हो रहा है। सामाजिक परिवेश में परिवर्तन आ रहा है। आज माता-पिता की संतान से आकांक्षाएँ भारतीय मूल से परिवर्तित रूप में प्रकट हो रहा है। संतान भी पाश्चात्य प्रभाव से प्रभावित होकर अधिकारों का रोना रो रही हैं, कर्तव्य नाम की चीज तो आज की संतान के शब्दकोश में है ही नहीं। माता-पिता को संतान की शिक्षा-प्राप्ति में अहम भूमिका निभानी होती है। माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा से संबंधित सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ-साथ उनको स्वतंत्र-चिंतन, कार्य-पद्धति तथा व्यवहार की छूट देनी होगी।
अपरिपक्व बुधि को परिपक्व होने में अपना संयम-पूर्ण योगदान देना होगा। आज की व्यस्त जिंदगी में अभिभावकों को समय निकालकर भौतिक सुखों के साथ अपनी मौजूदगी का अहसास बच्चों में भरना होगा। अपनी आवश्यकता थोपने के स्थान पर अहसास की भावना भरनी होगी। विचारों में समन्वय करना होगा। प्रसाद जी ने मानो माता-पिता को यही संदेश देते हुए कहा है-आँसु के भीगे अंचल पर, मन का सब कुछ रखना होगा।
तुमको अपनी स्मित रेखा से, यह संधि पत्र लिखना होगा।।
वास्तव में पाश्चात्य सभ्यता ‘मैं’ की उपासिका है। वह व्यक्ति के मूल्य को अंकित करती है परिवार के नहीं। जबकि भारतीय संस्कृति पूरे विश्व को परिवार समझने की पक्षधर है। दोनों सभ्यताओं में अंतर ही आज की समस्याओं की जड है। माता-पिता ने जीवन की दौड़ में दौड़कर ‘अनुभव’ के जो रत्न प्राप्त किए हैं, आज की संतान उन रत्नों से लाभ नहीं उठाना चाहती। वह स्वयं गलत या सही अनुभव करना चाहती है। इसलिए माता-पिता को अपने अनुभव बताने चाहिए, लादने नहीं।
‘नैतिकता’ से अभिप्राय है-आचरण की शुद्धता तथा आदर्श मानवीय मूल्यों को अपनाना। सत्य, अहिंसा, प्रेम, सौहार्द, बड़ों का सम्मान, अनुशासन-पालन, दुर्बल एवं दीन-हीनों पर दया तथा परोपकार आदि गुणों को अपनाना ही नैतिकता का वरण करना है। सभी प्राणियों में ईश्वर का नूर देखना, न्याय-पथ पर चलना, शिष्टाचार का पालन करना- कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनका वर्णन प्रत्येक धर्मग्रंथ में मिलता है। धर्म-प्रवर्तकों एवं महान पुरुषों के जीवन से भी हमें नैतिकता को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, गांधीजी, मदर टेरेसा, विवेकानंद, महावीर स्वामी सभी ने प्राणिमात्र से प्रेम करने की शिक्षा दी है। बेवजह किसी को कष्ट न देना, अहिंसा का पालन करना, रोगियों, असहायों एवं अपाहिजों की सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। ‘जीवों पर दया करो’, ‘पर्यावरण की रक्षा करो’, ‘अहिंसा परम धर्म है’, ‘अपने पड़ोसी से प्रेम करो’, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, ‘जियो और जीने दो’, आदि विभिन्न धर्मों के ऐसे सूक्ति-वाक्य हैं जो हमें नैतिक मार्ग पर अग्रसर होने की निरंतर प्रेरणा देते हैं। बोर्डमैन के अनुसार-कर्म को बोओ और आदत की फसल काटे,
आदत को बोओ और चरित्र की फसल काटो,
चरित्र को बोओ और भाग्य की फसल काटो।
नैतिकता को अपनाने से अभिप्राय उपर्युक्त मानवीय मूल्यों को सम्मानपूर्वक अपनाने से है। वर्तमान समय में भौतिकवाद का बोलबाला है। भौतिक उन्नति की ओर अग्रसर मानव ने नैतिक मूल्यों को ताक़ पर रख दिया है। परिणामस्वरूप समाज में आतंक, भ्रष्यचार, हिंसा एवं अपराध बढ़ रहे हैं। भौतिक सुखों के लिए अनैतिकता और अराजकता को बढ़ावा देकर रावण की लंका का ही निर्माण किया जा सकता है, परंतु स्वर्ग के समान सुख, शांति एवं समृधि तो नैतिकता के बल पर ही स्थापित की जा सकती है। अत: आज के परिवेश में नैतिक शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा को शिक्षण संस्थाओं में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में नैतिक शिक्षा को स्थान नहीं दिया गया है। प्राथमिक स्तर से ही नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करके विद्यार्थियों के राष्ट्रीय चरित्र एवं नैतिक चरित्र के निर्माण में सहयोग देना चाहिए तथा इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी। बल देना चाहिए क्योंकि कोई शिक्षा तब तक कारगर सिद्ध नहीं होती जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाए। शिक्षक वर्ग को भी नैतिक गुणों को अपनाना चाहिए क्योंकि उनके आचरण एवं चरित्र का सीधा प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ता है।
निबंध नंबर :- 02
नैतिक-शिक्षा का महत्त्व
Naitik Shiksha ka Mahatva
आधानिक युग में नैतिकता और उसके रक्षक-संर्वद्धक तत्त्वों का पूर्णतया हास बलिक सीहो चका है। नैतिकता किस चिड़िया का नाम होता या हो सकता है, आम खास किसी को इस का अहसास या ज्ञान तक नहीं रह गया है। लगता है, नैतिकता नामक पटिया को मार और भून कर लोग खा तो चुके ही हैं, हज्म तक कर चुके हैं और वह भी बिना किसी डकार लिए। इस का मुख्य कारण स्वतंत्रता प्राप्त करने वाली पीढ़ी के समाप्त हो जाने के बाद मचने वाली लूट-पाट, आपाधापी और आदर्शहीनता ही है। इस से भी बड़ा कारण है उस तरह का राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा का सर्वथा अभाव और नैतिकता और उसके मूल्यों को जगाए रखने की अवगत प्रेरणा बनी रहा करती है। पर नहीं, हमारे नेतृवर्ग ने स्वतंत्र भारत में इस सब की व्यवस्था करने के दायित्व निर्वाह की ओर कतई कोई ध्यान नहीं दिया। नैतिकता और नैतिक शिक्षा का महत्त्व इस तथ्य से भली भांति परिचित रहते हुए भी सर्वथा भुला दिया गया कि राष्ट्र-निर्माण और सुरक्षा के लिए एक प्रकार के राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता रहा करती है। वह नैतिक जागृति रहने पर ही संभव हुआ करता है।
उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में ही सहज ही देखा, परखा और समझा जा सकता है कि किसी भी युग में नैतिक शिक्षा का क्या महत्त्व हुआ करता है। उसकी कितनी अधिक आवश्यकता हुआ करती है। आज हमारा देश जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, जिस तरह की अपसंस्कृति और मूल्यहीनता का शिकार होकर अनवरत हीन बल्कि निकृष्टतम अमानवीय मनोवृत्तियों का अखाड़ा बन कर रह गया है, इसमें नैतिक शिक्षा का महत्त्व एवं आवश्यकता और भी बढ़ गई है। आज जिस प्रकार की शिक्षा स्कूलों-कॉलेजों में दी जा रही है, वह साक्षर तो जरूर बना देती है, सुशिक्षित क्या मात्र शिक्षित भी नहीं बना पाती। ऐसे में उसके द्वारा नैतिक मानों-मल्यों की रक्षा तो क्या करना, वह व्यक्ति का साधारण मनुष्य तक बने रहने की प्रेरणा भी दे पाने में असमर्थ है। इसी कारण आज यह बात बड़ी तीव्रता से अनुभव की जा रही है कि बाकी शिक्षा के साथ-साथ, बाल्क उस से भी पहले नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करना बड़ा ही आवश्यक है।
आज भारत में जिधर भी दृष्टिपात कर के देखिए, चारों ओर कई प्रकार के भ्रष्टाचारी का एकाधिकार छा रहा है। नैतिकता और साँस्कतिक आयोजनों की आड़ में अनैतिकता और अनाचार का पोषण कर उसे हर प्रकार से बढ़ावा दिया जा रहा है। हर तरफ भ्रष्ट मूल्यों वालों का बोल बाला हो रहा है पश्चिम की भौंडी नकल के फलस्वरूप अपसंस्कृति अपमूल्यों, नग्नता का प्रचार इतना बढ़ गया है कि उसका कहीं कोई किनारा तल दिखाई नहीं देता। चारों ओर कामुकता, हिंसा और वासना का नंगा नाच हो रहा है। सुनहरे सपने बेचने वाले सौदागरों ने माँस-मज्जागत लज्जा तक का अपहरण कर के मानवता की उदात भावनाओं को शरे-आम नंगा कर के खड़ी कर दिया है। सहज मानवीय सम्बन्ध तक दरारे जाकर भुरभुराने लगे और टूट का गिर पड़ने को उतावले नजर आ रहे हैं। अराजक और माफिया-गिरोहों को धार्मिक, सांप्रदायिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाने के कारण अच्छाई भरा आचरण तो क्या करना, उसका नाम तक ले पाना सुरक्षित नहीं समझा जाता। व्यापारिक दृष्टिकोण और आर्थिक तत्त्वों की प्रधानता ने मानवीयता का गला घोंट कर रख दिया है। फलतः चारों ओर एक प्रकार की कृत्रिमता. मात्र औपचारिकता का ही साम्राज्य छा रहा है। ऐसे वातावरण की सफलता पर प्रहार करने की क्षमता केवल आत्मिक स्तर तक नैतिक बन कर ही किया जा सकता है। नैतिक बनने – के लिए उस तरह की शिक्षा की स्पष्ट आवश्यकता तो है ही, सभी तरह के उपलब्ध उपकरणों – मानवीय मूल्यों को शुद्ध करना भी परमावश्यक है।
नैतिक शिक्षा व्यक्ति को उदार मानव तो बनाया ही करती है, एक तरह का राष्ट्रीय – चरित्र बनाने और विकसित करने में भी सहायक हो सकती है। उसके विकसित होने पर ही अपसंस्कृति, आरोपित और आयातित मूल्यों से छूटकारा पाकर अपनी संस्कृति. अपने राष्ट्रीय तत्त्वों, मल्यों एवं मानो को विकसित कर के समग्र राष्ट्रीयता का उदात तथा उच्च स्थितियों तक पहुँचाया जा सकता है। नैतिक मूल्यो-मानों को विकसित किए। बिना अन्य सभी प्रकार के विकास एक प्रकार से व्यर्थ ही हैं। उनका वास्तविक लाभ वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता कि जिन के लिए सारे आयोजन किए जाते हैं। इतना ही नहीं नैतिक शिक्षा द्वारा नैतिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों का विकास किए बिना राष्ट्र की सुरक्षा तक को निश्चित कर पाना संभव नहीं कहा माना जा सकता।
कभी भारत का सारे संसार में जो गुरुवत् मान-सम्मान किया जाता था, वह उसके उदात मानवीय मूल्यों के कारण ही किया जाता था। लेकिन आज देश-विदेश सभी जगह प्रत्येक स्तर पर भारतीयता को हेय एवं त्याज्य माना जाने लगा है। उसकी आवाज का कहीं कोई मूल्य एवं महत्त्व नहीं रह गया। नेतृवर्ग ने विदेशों से ऋण-पर-ण लेकर यहाँ की अस्मिता का दीवालियापन तो घोषित कर ही दिया है, भिखारी जैसा भी बना दिया है। इस प्रकार की विषमताओं पर नैतिक बल और साहस अर्जित कर के ही पार पाया जा सकता है। इसके लिए सब से पहले तो राष्ट्र के नेतृत्व या नेतृ वर्ग को नैतिक रूप से शिक्षित बनाना परम आवश्यक है, बाद में समूचे राष्ट्र जन को जितनी जल्दी यह कार्य आरम्भ कर दिया जाएगा, उतना ही राष्ट्र और राष्ट्र जन का हित-साधन संभव हो पाएगा। कहावत भी है कि शुभस्य शीघ्रम, अर्थात् शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिए।
हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”
हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”
वे शुद्ध पायलट बनना चाहते थे। वैज्ञानिक बन गये। उनके पिता उन्हें कलक्टर बनाना चाहते थे। पर वे राष्ट्रपति बन गये। यानी कुछ भी न उनकी मर्जी का हुआ न उनके पिता की मर्जी की। फिर भी उन्होंने बेमर्जी के जो कुछ किया उससे देश का गौरव बढ़ा और वे भारतरत्न’ बन गये। इसके बीच बहत कुछ बदलता गया, लेकिन नहीं बदली ती उनकी सादगी डा. अबुल फाफिर जैनुल आबेदिन अब्दुल कलाम यानी डी. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु में रामेश्वरम जिले के धनुष कोडि गाँव में 15 अक्तूबर, सन् 1931 ई.को हुआ।प्राथमिक शाला की पढ़ाई पूरी करने के बाद डा. कलाम को हायर सेकेंड्री की पढ़ाई के लिए रामनाथपुरम जाना पड़ा। यहाँ के स्क्वार्टज मिशनरी हाई स्कूल से हायर सेकेंड्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। लेकिन हायर सेकेंड्री तक की पढ़ाई तो जैसे-तैसे हो गयी, मगर आगे की पढ़ाई के लिए उनके घरवालों के पास कोई आर्थिक जुगाड़ नहीं था। लेकिन कलाम के दादाजी जिन्हें कलाम अब्बू’ कहकर बुलाया करते थे, ने एक तरकीब
निकाली। उन्होंने घर में पड़े लकड़ी के कुछ तख्तों को निकाला और उनसे एक छोटी नाव बनवाई। इस नाव को उन्होंने किराये पर देना शुरू किया और इससे वसूल होने वाले किराये से अब्दल कलाम की पढ़ाई का खर्च पूरा होने लगा।
इस तरह हायर सेकेंड्री के बाद डांवाडोल हो रही पढ़ाई को आधार मिला और अदल कलाम आगे की पढ़ाई के लिए त्रिचुरापल्ली के सेंट जोसफ कॉलेज गये। छुट्टियों में कलाम दसरे छात्रों की ही तरह अपने घर चले जाया करते थे और इन छुट्टियों में वह अपने पिता के काम में हाथ बंटाते थे। एक दिन जब वह पिताजी के साथ अखबारों की छंटनी कर के थे कि उनकी नजर अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ में छपे एक लेख पर पड़ी, जिसका शीर्षक था-‘स्पिटफायर’ यानी ‘मंत्र बाण’ दरअसल यह प्राचीन भारतीय अस्त्र का नाम था। जिसका इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध में गठबंधन सेनाओं (मित्र राष्ट्र) ने किया था। वास्तव में यह आग्नेयास्त्र मिसाइल ही था, जिसको पढ़कर अब्दुल कलाम अन्दर तक उत्तेजित हो गये थे और सोचने लगे थे कि काश! हिन्दुस्तान के पास इस तरह के आग्नेयास्त्र होते। बाद में उनके जीवन की सफलता की सारी कहानी इसी सपने का विस्तार है।
बी.एससी. प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके पास उसी तरह का संकट था जैसे कि हायर सेकेंड्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद आया था। लेकिन इस बार पढ़ाई जारी रखने का जिम्मा उन्होंने खुद अपने ऊपर लिया। इसके लिए उन्होंने न केवल ट्यूशन को अपना जरिया बनाया। बल्कि बीच-बीच में मद्रास से छपने वाले अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ के लिए विज्ञान पर कुछ लेख और फीचर भी लिखे। बी.एससी. के बाद कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने प्रथम श्रेणी में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया। शायद यह बात बहुत लोगों को पता न हो कि कलाम साहब ने पी-एच.डी नहीं की। उनके नाम के पहले जो डॉक्टर शब्द लगा है वह मानद उपाधि के चलते लगा है।
पढ़ाई खत्म करने के बाद जब अब्दुल कलाम ने कैरियर की शुरुआत की, तो भारी दुविधा में फंस गये, क्योंकि उन दिनों वैज्ञानिकी के छात्रों की यूरोप और अमरीका में अच्छी खासी मांग थी। हाँ पैसा भी इतना मिलता था जिसकी सामान्य हिन्दुस्तान के लोग तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे। अपनी आत्मकथा कृति ‘माई जर्नी’ में कलाम साहब ने लिखा है-जीवन के वे दिन काफी कसमसाहटभरे थे। एक तरफ विदेशों में शानदार कैरियर था, तो दूसरी तरफ देश-सेवा का आदर्श बचपन के सपनों को सच करने का मौका चुनाव करना कठिन था कि आदेशों की ओर चला जाये या मालामाल होने के अवसर को गले लगाया जाये। लेकिन अन्ततः मैंने तय किया कि पैसों के लिए विदेश नहीं जाऊँगा। कैरियर की परवाह के लिए देश-सेवा का अवसर नहीं आँवाऊँगा। इस तरह 1958 में मैं डी.आर.डी.ओ डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) से जुड़ गया।”
डा. कलाम की पहली तेनाती डी.आर.डी.ओ. के हैदराबाद केन्द्र में हुई। पाँच सालों तक वे यहाँ पर महत्त्वपूर्ण अनुसंधानों में सहायक रहे। उन्हीं दिनों चीन ने भारत पर हमला कर दिया: 1962 के इस युद्ध में भारत को करारी हार शिकस्त झेलनी पड़ी। युद्ध के तुरन्त बाद निर्णय लिया गया कि देश की सामरिक शक्ति को नये हथियारों से सुसज्जित किया जाय। अनेक योजनाएँ बनीं, जिनके जनक डा. कलाम थे। लेकिन 1963 में उनका हैदराबाद से त्रिवेन्द्रम तबादला कर दिया गया। उनका यह तबादला विक्रम साराभाई स्पेस रिसर्च सेंटर में हुआ, जो कि इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन) का सहयोगी संस्थान था। डा. कलाम ने 1990 तक इस केन्द्र में काम किया। अपने इस लम्बे सेवाकाल में उन्होंने देश को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचाया। उन्हीं के नेतृत्व में भारत कृत्रिम उपग्रहों के क्षेत्र में पहली कतार के देशों में शामिल हुआ | डा. कलाम एस. एल. बी. -3 परियोजना के निदेशक थे। 1979 में जब एस.एल.वी-3 की एक प्रायोगिक अपने ऊपर ले ली। अपने 44 साल के कैरियर में उनका हमेशा एक ही ध्येय वाक्य रहा है ‘विजन मिशन एंड गोल; अर्थात् दृष्टिकोण ध्येय और लक्ष्य
हम देशवासियों की ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह आपको चिरायु प्रदान कर आपको और अधिक देशसेवा के लिए सक्षम और योग्य बनाये।
Many of us feel a bit helpless to help others out during these coronavirus social distancing and isolation times. This also true for kids and young people. There are actions they can take as part of their home schooling. They can participate in civic engagement and activism activities.
Civic engagement is defined as “working to make a difference in the civic life of one’s community and developing the combination of knowledge, skills, values and motivation to make that difference (https://youth.gov/youth-topics/civic-engagement-and-volunteering).”
Quite frequently, not only do state standards permit teachers and schools to support student activism, but they encourage student activism as a means by which to develop civic understanding. Although standards vary from state to state, many of them are modeled on the National Council for the Social Studies (NCSS) College, Career, and Civic Life (C3) Framework for Social Studies State Standards (NCSS, 2013), which specifically endorses student activism: “Civics is not limited to the study of politics and society; it also encompasses participation in classrooms and schools, neighborhoods, groups, and organizations . . . In civics, students learn to contribute appropriately to public processes and discussions of real issues. Their contributions to public discussions may take many forms, ranging from personal testimony to abstract arguments. They will also learn civic practices such as voting, volunteering, jury service, and joining with others to improve society. Civics enables students not only to study how others participate, but also to practice participating and taking informed action themselves” (https://kappanonline.org/student-activism-civics-school-response-singer/).
Civic engagement and activism in normal times has benefits, but in these times of coronavirus and social distancing-isolation, the benefits are amplified as such engagement can move young people from feelings of helplessness to feelings of empowerment.
Even in social isolation, there are actions young people and kids can do. The following activity guide can provide ideas and give some structure to civics activity engagement.
The following PDF has links with more information about how to do that challenge:
Due to Coronavirus, many schools are moving online, and teaching through Zoom meetings. If it is only being used to present content to students, then why not just record videos and have students watch them on their own? The value of Zoom meetings is that the educator can create synchronous interactive conversations and activities. My goal is to have all my students actively engaged throughout the meeting. Below are some the activities I have used during my. teacher education Zoom meetings although they can be adapted for any age group and age level (3rd grade and up), and in training professionals. Along with the tools that come with Zoom, I also use online web tools and applications to increase interactivity and engagement. All tools I describe below are free and work on any device, any browser.
Whole Group Discussions
Whole group discussions should be just that – discussions. I believe that the teacher can use this forum for short lectures but, again, they should be short as the power of synchronous Zoom meetings is that it permits interactivity and active learning. Questions about class content can be posed with student responses elicited through verbal responses and/or through the Zoom group chat.
A favorite whole group activity I do is to have a group video viewing party. For this activity, I begin with a short overview of the video and a question of what they should look for during the video. Student responses are put in the chat during and/or after the video.
Whole group activities and discussions can also be used for Breakout Groups follow-up to share what they discussed and did. In this case, I inform the Breakout Groups to decide on a spokesperson or two to report to the whole group.
Breakout Groups
One of the best tools in Zoom is the ability to put students into smaller, self-contained breakout groups. Some ways to use the Breakout Rooms include:
To discuss a prompt or questions provided by the teacher or another student.
To do online research about a given topic.
To discuss a real life scenario or case study. This can be done in a jigsaw strategy whereby different groups are given different case studies. When they are brought back into the whole group, each Breakout Group shares their thoughts and conclusions.
To create projects using some of the web tools such as Google Slides, webbing tools, or comics that I discuss later. Time is then given to each group to share what they produced with the rest of the class in a whole group setting.
Quizzes
My students of all ages, kids and adults, absolutely love the competitive, real time quizzes – Kahoot and Quizziz. Both of these online tools – applications have huge archives of teacher created quizzes. They also let teachers create their own and remix the quizzes other teachers have created.
Kahoot
Kahoot! is a game-based learning platform, used as educational technology in schools and other educational institutions. Its learning games, “Kahoots”, are multiple-choice quizzes that allow user responses.
Mentioned Kahoot and any student who has played it just lights up. I like using it at the beginning of a session prime students about what they will be exploring during the session or in the middle to re-energize them.
Quizziz
Quizziz offers self-paced quizzes to students. During my Zoom sessions, I do live Quizziz quizzes where the students answer quiz questions on their own yet compete with one another. It is similar to Kahoot but Kahoot is teacher directed, it displays the questions and answers on the teacher’s device; whereas Quizizz is student directed, it displays all the information on the student’s device.
Polling
Polling web tools can get real time information about students’ opinions, thoughts, and ideas which can be shared with them immediately.
Google Form
Google Forms can be used for student surveys and polling. More information about how to do this can be found at How to Make a Survey With Google Docs Forms. What I really love about using Google Forms for surveys and polls is that immediate feedback can be presented to the students through the response tab.
I like using Google Forms to check in with students and to inquire about what topics they would like to discuss.
An example I did recently was polling the student teachers with who I work about special education services at their respective schools (see screenshots below).
Web Tools
There are lots of free, relatively easy-to-use web tools that students can use in Breakout Groups to create products about a class topic. The benefits of doing so include:
Students get to be creative during the synchronous meeting.
Creating products with visual elements helps deepen the learning.
Students have fun during the synchronous meeting.
Community is built as students work together on such tasks.
Before I give them their task and send them into their Breakout Groups, I give a screen share tutorial on how to use the tool. There are also lots of online video tutorials that can be shared with students.
As mentioned above, the smaller Breakout Groups share what they did with the whole group. To insure that the others pay attention, I ask them to share in the chat the favorite thing or what they learned from the smaller group presentations.
Shared Google Slides and Docs
Having students help create a shared Google slide show is one of my favorite activities. Individual or small groups are asked to take a slide of a shared Google Slide presentation to report on a given topic. I give some broad guidelines including finding and adding both content and images. The following video explains this process.
Below is an example that focuses on classroom management. In Breakout Groups, they were give a topic. Breakout groups 1 and 2 were given the topic. , groups 3 and 4 Classroom Environment, and 5 and 6 Instructional Strategies. They were given several online articles as references and also encouraged to use their own experiences.
Padlet – A Collaborative Sticky Note Board
Padlet is a website and app that allows kids to curate information onto virtual bulletin boards using a simple drag-and-drop system. Students, alone or in groups, can start with a template or a blank page and add videos, text, links, documents, images — basically anything — to the wall and organize it, like a page full of Post-it notes (https://www.commonsense.org/education/website/padlet).
I typically use Padlet as a whole group activity. What I like about it is that the students can easily see the responses, images, links that their classmates have posted.
For example, I love starting my first Zoom meeting with the Padlet: Time to Take a Selfie Icebreaker developed by Catlin Tucker. Below is one I did with a group of teachers with whom I worked.
I have also created and used Padlets for partner interviews, where they posted the results of their partner interviews, SEL strategies, technology in the classroom, classroom management, and collaborating with the community.
Collaborative Webbing – Mind Mapping
“A mind map is a diagram for representing tasks, words, concepts, or items linked to and arranged around a central concept or subject using a non-linear graphical layout that allows the user to build an intuitive framework around a central concept (https://www.mindmapping.com/mind-map.php).
I like to use Coggle in Zoom Breakout Groups. Coggle is an online tool for creating and sharing mind maps and flow charts. It works online in your browser. It is easy to use and permits real time collaborative.
To collaborate, one of the group members starts a Coggle and then invites others by clicking on the + sign in the upper right hand corner and sends email invites.
Below is an example the student teachers did in a breakout about SEL strategies for the classroom.
Comic Creator
Students can be asked to create a comic strip in their Breakout Groups to depict a given topic. My favorite is comic creator is Storyboard That but it has a bit of a learning curve for those who are less technology savvy. Although Make Belief Comix lacks some of the tools and options that Storyboard That has, it is much easier for students to use, so I have moved to using Make Belief Comix in my Zoom meetings. For more technology savvy groups, though, I recommend Storyboard That.
Once back in the whole group. students do a screen share of their product and explain it’s content to the rest of the group. For example, a here is a comic about differentiating instruction using Storyboard That.
As mentioned earlier, Breakout Groups then do a show and tell of their mind maps, comics. The following video shows how to do a screen share. The teacher needs to make sure they have “All Participants” enabled under the sharing settings.
I, like many of you, have gone into a somewhat involuntary social distancing and isolation (mostly) due to my school and health club closures and recommendation to stay away from crowds. It’s just my cats and I (gives new meaning to home alone). Having a plan to engage my mind and body is of utmost importance. I am sharing my plan of activities, which are almost all free, as it may give other educators some ideas. If you have additional ideas, please share them in the comments.
Working Remotely with My Gifted Elementary Students
I work with gifted students one day a week. Our state and thus my district made an extremely quick decision to close the schools – heard last Thursday night and was told to send home with students Chromebooks along with lessons on Friday, a half day. Obviously most of the teachers didn’t have time to develop lesson plans and learning activities. I met with my learners quickly on Friday, as so much was going on, and asked them to check in with a shared Google doc and our Google Classroom. What follows are the general tasks they are being asked to do during our regularly scheduled gifted day.
Writing Children’s Book Narrative – Prior to the school closing, my learners spent quite a bit of time learning how to write a children’s book using a Dr. Seuss type of writing style (yes, I know he is controversial but I like his writing style). The goal is to have them write their stories, illustrate them with cut out shapes made with a Cricut or a laser cutter, and then create Makey Makey Talking Books out of them. They just reached the point of writing their own narratives when the school closed. I asked each of them to share their stories with me via a Google doc. They were instructed to add to their stories during our hiatus, that I would provide feedback and suggestions directly on their shared Google docs. Then when we return, we can jump into creating the illustrations.
Newsela – For those who don’t know, Newsela is best-in-class library of high-interest, cross-curricular current news and nonfiction texts.. They have offered all teachers access to Newsela ELA, Newsela Social Studies, Newsela Science and the SEL Collection for FREE for the rest of the school year. At home, my learners are being asked to do the same thing they do in class – pick an article of personal interest, read it, and take the quiz where they need to get at least 3 out of 4 correct. If they don’t, they need to choose another article to read and follow the same procedure.
Prodigy Math Game – For those who don’t know, Prodigy is no-cost math game where kids can earn prizes, go on quests and play with friends — all while learning math. With Prodigy math homework is disguised as a video-game. My learners love it. I typically don’t give them class time to play it as I prefer hands-on, learner-to-learner interactive math activities. Since they will be at home, I asked them to play it for an hour during our typical gifted days to keep up with and improve their math skills.
Code.org – My 4th graders have working through the Code.org Course F . They were asked to continue working on this through our hiatus while my 5th and 6th graders were asked to join and work on the Code.org CS in Algebra.
Maker Camp – https://makercamp.com/project-paths/ and the Maker Stations Home Pack (see download below) : Since we do a lot of making in my gifted classes, I am requesting that my learners pick a project or two to try at home. It has been posted as an assignment via Google Classroom and they have been asked to post pictures of it. I will later (at school or at home depending how long the school closing lasts) ask them to blog about their processes.
Here is their schedule that I posted in Google Classroom for them.
The online applications – Newsela, Prodigy, and Code.org – have teacher dashboards so I can track progress and give them feedback. For their writing, I can give feedback directly on their Google docs, and for their maker projects, they are to post pictures to Google classroom.
Professional Development – Virtual Style
I plan on doing some PD in my pajamas – in other words, virtual style.
Attending SomeVirtual Conferences
2020 Share My Lesson Virtual Conference – is a free virtual conference from March 24-26, with over over 30 webinars focusing on instructional strategies across the curriculum, social-emotional learning, activism, STEM, and trauma-informed practices. This is a fantastic conference. I attend every year. The sessions and presenters from professional organizations are top notch!
CUE Spring Conference – Computer-Using Educators (CUE) is a California-based non-profit that offers a premiere educational technology conference each spring. This year, because of coronavirus, they are going virtual offering sessions from March 19 through April 5. There is a $75 fee for the virtual conference.
Taking Some Online Classes
The Power of Mathematics Visualization – There is a nominal fee for this course but it looks good and might help me develop some interesting strategies for teaching mathematics to my gifted students.
Code Academy Pro – They are offering Pro free to students and teachers. It’ll give me an opportunity to learn some advanced code.
Doing Some Maker Projects
Because I use lots of maker education projects in my gifted education classes and our school has a new STEAM lab, this forced hiatus is giving me the opportunity to try out some new projects including:
My Physical Health
I work out in group fitness classes several days a week. It verges on addiction. When I don’t get to do so, I get stressed out. Plus, it provides me with needed social interactions. So when my health club decided to limit their services, I became distraught. Luckily, though, I live in Santa Fe, New Mexico, so I plan to go on lots of hikes and am fixing up my bicycle to ride – hoping that the weather permits it. I am going to do online fitness classes. Oh, and, of course, cleaning my house from top to bottom will add an other fitness element. I absolutely know my physical workouts and health will positively affect my mental health.
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