कुछ इसी प्रकार से राजनेताओं की पोल खुली जब मजदूरों से असीम सांत्वना रखने वाले राजनेता देश के श्रम मंत्री का नाम नहीं कह पाए। इस बात से कोई फ़र्क नही पड़ता कि इस समय वह संसद के किस भाग में विराजित है लेकिन क्या सरकार अथवा विपक्ष की इसमें कोई जवाबदेही नही?
कुछ दिनों पहले एक मार्मिक चित्र पूरे देशभर में वायरल था। एक छोटा बच्चा बिहार के मुज्जफरपुर रेलवे स्टेशन पर अपनी मां के मृत शव के साथ खेलता हुआ पाया गया। उसकी श्रमिक मां भूख और गर्मी से प्रताड़ित हो कर अंत में अपने जीवन से हाथ धो बैठी। ऐसे अनेक दृश्य पिछले 3 महीनों से देश के अलग अलग शहरों से प्रतिदिन हमारे सोशल मीडिया पर आ रहें हैं।
कहीं मज़दूर सड़कों पर भीषण गर्मी में पैदल चल रहे हैं तो कहीं आय से कई गुना अधिक पैसे देकर ट्रकों से अपने घर जाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस तरह के मामलों के बाद भी सरकार इन श्रमिकों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई। राज्य और केंद्र दोनों ही दरवाजों से मजदूरों को केवल मायूसी ही मिली। महामरी के इस दौर ने एक बहुत ही कड़वे सच से पर्दा उठा दिया है कि इस देश के विकास में श्रमिकों की अहम भूमिका तो है लेकिन उनके निजी विकास में किसी को कोई रुचि नही।
हमारे श्रम मंत्री श्री संतोष कुमार गंगवार इस दौर में भी मीडिया से गायब हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में श्रमिक कानूनों में किए गए बदलावों पर भी उन्होंने कोई आपत्ती नही जताई। न्यूज़ चैनलों पर बैठकर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों से आए प्रवक्ताओं ने पूरे उत्साह से मजदूरों को अपना समर्थन दिया और बड़े ही उत्तम तरीके से आरोप प्रत्यारोप के खेल को निभाया परन्तु कोई भी मुख्य समस्या पर स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाया।
दूसरे मुद्ददों की तरह ये भी चुनावी रैलियों में राजनेताओं की जय जयकार करवाने के लिए छोड़ दिया गया। श्रमिकों के लिए चलाई गई ट्रेनें भी परेशानी का सबब बन गई। मुंबई से गोरखपुर जाने वाली गाड़ी ओडिशा पहुंच गई तो किसी ट्रेन को पटना पहुंचते हुए 60 घंटे लग गए। ट्रेनों में दिए गए भोजन में चीटियां होना, कई घंटो कड़ी गर्मी में बिना जल के सफ़र करना ऐसी कई परेशानियों का सामना करते हुए ये श्रमिक अपने घर पहुंच भी गए तो फ़िर सरकार के क्वारांटाइन सेंटर में इन्हे लचड़ व्यवस्था में गुज़ारा करना पड़ रहा है। बिहार में जितनी मौतें अस्पतालों में नहीं हुई उससे अधिक तो उनके क्वारांटाइन सेन्टर में भूख से हो रही है।
इतने हादसों के बाद जब उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 8 करोड़ होने के बावजूद इन मजदूरों की कोई आवाज़ नहीं है। स्थिति सामान्य होने पर ये फिर से पलायन को मजबूर होंगे और अपनी जीविका के लिए फिर से महानगरों का रुख करेंगे किन्तु क्या सरकार और विपक्ष अपनी जवाबदेही तय करेंगे? क्या आगे फिर ऐसी स्तिथि का उपाय किया जाएगा? क्या ये गरीब तबका अपने लिए आवाज़ उठा पाएगा? क्या मजदूर संघ और जटिल तरीके से श्रमिकों का पक्ष रख सकेंगे या फिर ये अधिकारों की लड़ाई भी अदालत और सरकारी मेजों पर केवल कागज़ मात्र रह जाएगी।
“हम श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करेंगे परन्तु हम श्रम मंत्री का नाम नहीं जानते “~~एक संवेदनशील राजनेता
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