सच्चा मित्र

सच्चा मित्र वही है जो मित्र के दु:ख में काम आता है। वह मित्र के कण जैसे दु:ख को भी मेरु के समान भारी मानकर उसकी सहायता करता है। एक सच्चा मित्र प्राणों से भी अधिक मूल्यवान होता है। मित्रता के अभाव में जीवन सूना हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- “सच्ची मित्रता में उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है। अच्छी-से-अच्छी माता का सा धैर्य और कोमलता होती है।” गोस्वामी तुलसीदास ने सच्चे मित्र के विषय में कहा है-
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी,
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।
निज दुःख गिरि सम रजे करि जाना,
मित्रक दु:ख रज मेरु समाना।।
सच्चा मित्र हमारे लिए प्रेरक, सहायक और मार्गदर्शक का काम करता है। जब भी हम निराश होते हैं, मित्र हमारी हिम्मत बढ़ाता है। जब हम परास्त होते हैं, वह उत्साह देता है। सच्चा मित्र हमारे लिए शक्तिवर्धक औषधि बनकर सामने आता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से भी बचाता है और सन्मार्ग की ओर अग्रसर करता है। सच्चा मित्र | सरलता से नहीं मिलता। इसलिए मित्र का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए। केवल बाहरी चमक-दमक, वाक्प टुता अथवा आर्थिक स्थिति को देखकर ही मित्र का चयन कर लेना उचित नहीं है, इसके लिए उसके व्यवहार, आचरण तथा अन्य बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है। सच्चा मित्र सच्चरित्र, विनम्र, सदाचारी तथा विश्वास पात्र होना चाहिए, क्योंकि सच्ची मित्रता मनुष्य के लिए वरदान है। किसी ने ठीक ही कहा है- ‘सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ।’
निबंध नंबर : 02
मेरा सच्चा मित्र
Mera Sacha Mitra 
मित्रता का यह सिद्धान्त है कि मित्र कम भले ही हों, लेकिन जो भी हों विश्वासपात्र हों। ऐसे मित्र सर्वत्र नहीं मिल पाते, ढूंढ़ने पर ही मिलते हैं। अगर आपके पास मित्रों पर उड़ाने के लिए पर्याप्त पैसा हो, तो सैकड़ों मित्र बन जाएंगे। और अगर आप गरीबी में जीवन बिता रहे हों तो बहुत कम लोगों को आपकी चिन्ता होगी।
दुनिया में ऐसे बहुत से व्यक्ति होंगे जो आपके प्रति सद्भावना रखते होंगे, लेकिन उन्हें मित्रता के योग्य नहीं माना जा सकता। उनमें से बहुत-से स्वार्थी भी हो सकते हैं, जो मौका पड़ने पर बड़ी आसानी से मुंह फेर सकते हैं।
सच्चे मित्र की पहचान किसी विपत्ति या दुःख के समय ही हो सकती है। सुख व समृद्धि के समय तो सैकड़ों लोग मित्र होने का दावा करते रहते हैं, लेकिन परेशानी या दुःख के समय बहुत गिने-चुने लोग ही पास दिखाई देंगे। वही ऐसे लोग हैं जिन्हें सच्चे अर्थों में दोस्त कहा जा सकता है। बहुत-से लोग बेहद स्वार्थी होते हैं और वे अपना मतलब सिद्ध करना अच्छी तरह जानते हैं। उनके मन में सहानुभूति या सद्भावना का नाम लेश-मात्र भी नहीं होता। वे तो बस औरों का शोषण करना जानते हैं, इसलिए अच्छे मित्र के लिए हमें काफी भटकना पड़ता है।
मेरे कुल चार मित्र ऐसे हैं जो मुसीबत के समय कसौटी पर खरे उतरे हैं। उनमें भी श्री गोविन्द लाल सबसे अधिक विश्वासपात्र सिद्ध हुए। एक बार की बात है, मैं बस में सफर कर रहा था, कि अचानक मेरी जेब कट गई। वह मेरे साथ थे। उन्होंने बडी बहादुरी के साथ आगे बढ़कर जेबकतरे को पकड़ लिया और उससे मेरा मनीबैग छीनकर मुझे दे दिया। उसके बाद उस जेबकतरे को पुलिस चौकी ले जाकर उन्होंने पुलिस के हवाले कर दिया। इस तरह उन्होंने मेरा धन और जीवन दोनों की रक्षा की। उस दिन के बाद से हम दोनों अभिन्न मित्र हो गए। वे एक धनी पिता की सन्तान हैं। उनके पिता एक बहुत बड़ी फैक्ट्री के मालिक हैं, लेकिन वे बड़े वीर, स्पष्टवक्ता और ईमानदार भी हैं।
मैं न तो झूठ बोलता हूँ और न झूठ बोलने वालों को पसन्द करता हूँ। श्री गोविन्द लाल एक सच्चे इन्सान हैं और सच्चाई में ही उनका विश्वास है। संयोग से वह मेरे सहपाठी भी हैं।
पढ़ने में वह मुझसे काफी कमजोर हैं, इसलिए हर रोज शाम को मैं उनकी सहायता खुले दिल से करने को तत्पर रहता हूँ। हम लोग घूमने-फिरने भी साथ-साथ जाते हैं। गोविन्द लाल को कहानी सुनाने का बहुत शौक है। मुझे भी वे अजीबो-गरीब कहानियां सुनाते रहते हैं। वह मेरे घर भी आते हैं और मेरी मां उन्हें सगे बेटे के तरह स्नेह करती हैं।
श्री गोविन्द लाल अपनी पढ़ाई के प्रति बेहद मुस्तैद हैं, लेकिन पढ़ाई में मेरी मदद की उन्हें बड़ी आवश्यकता पड़ती है। चूंकि मेरी दृष्टि में वह छल-कपट से दूर एक निश्छल इन्सान हैं, इसलिए मैं भी हरदम उनकी मदद के लिए तैयार रहता हूँ। मैं भी प्रायः उनके घर जाता रहता हूँ और हम दोनों घण्टों साथ-साथ रहते हैं।

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों

  • शिक्षा का महत्त्व • साक्षरता अभियान • अभियान में कठिनाइयाँ • संचार माध्यमों का सहयोग
शिक्षा कामधेनु के समान है जो मनुष्य की सभी इच्छाओं को प्रतिफलित करती है। शिक्षा के महत्त्व एवं आवश्यकता को देखते हुए प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह समय से पढ़-लिखकर परिवार एवं देश की उन्नति में सहयोग दे। किंतु भारत की पराधीनता ने शिक्षा के क्षेत्र के विकास में अनेक रुकावटें खड़ी कर दी, जिससे भारत की अधिकतर प्रौढ़ जनसंख्या अशिक्षित एवं निरक्षर रह गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी शिक्षण संस्थाओं की कमी एवं धनाभाव के कारण सबके लिए शिक्षा जुटा पाने में सरकार के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं, फिर प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए अभियान आरंभ करना आसान नहीं था और प्रौढ वर्ग के अशिक्षित होने के कारण देश की प्रगति की गति भी | अत्यंत धीमी थी। अतः सरकार ने 2 अक्तूबर सन् 1978 को प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षित करने के लिए एक अभियान
आरंभ किया, जिसमें 15 वर्ष से 35 वर्ष तक के स्त्री-पुरुषों को साक्षर एवं शिक्षित बनाने का निर्णय लिया गया। इस आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष किसी न किसी आजीविका अर्जन कार्य से संबंधित होते हैं। अतः इसको ध्यान में रखकर सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं ने सायंकालीन कक्षाएँ एवं विद्यालय खोले हैं। स्त्रियों की सुविधा के लिए दोपहर को भी कक्षाएँ लगाई जाती हैं।ऐसी शिक्षा चाहिए हमें करे भारत का नव-निर्माण
जिस शिक्षा से मिट जाए, जन मानस में फैला अंधकार
साक्षरता अभियान के अंतर्गत जनसंचार माध्यमों- दूरदर्शन एवं आकाशवाणी भी प्रौढों को प्रोत्साहित करने | के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा ‘पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों’ तथा ‘पढ़-लिख, लिख-पढ बन होशियार’, जैसे गीतों द्वारा प्रौढ़ों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। ये अत्यंत सराहनीय कार्य हैं। स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व हमारे देश में शिक्षा-व्यवस्था अत्यंत खराब थी, शिक्षण संस्थाएँ नगण्य थीं, बहुत कम थीं. अतः सब उनका लाभ नहीं उठा पाते थे। इसीलिए भारत की अधिकतर जनसंख्या अशिक्षित थी जिससे देश की प्रगति भी अत्यंत धीमी थी। आजकल ‘एक से एक को शिक्षा’ जैसे कार्यक्रम चलाकर प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है, सफल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरों में यह अभियान अत्यंत सफल रहा है। प्रौढ शिक्षा को सफल बनाने के लिए इसे राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना आवश्यक है।

विद्यार्थी और अनुशासन

  • अनुशासन का अर्थ • विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का महत्त्व • दोनों एक-दूसरे के पूरक
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता होती है, क्योंकि अनुशासन के बिना शासन संभव नहीं। ‘अनुशासन’ का शाब्दिक अर्थ है-नियंत्रक द्वारा बनाए गए नियमों का अनुगमन करना अर्थात् पीछे-पीछे चलना, यदि और स्पष्ट रूप से कहें तो अनुशासन का अर्थ “व्यक्ति के विभिन्न क्रिया-कलापों को एक सीमा में बाँधना है, जो समाज, राष्ट्र, राज्य, संस्था एवं स्वयं उसके लिए कल्याणकारी हों।” विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का विशेष महत्त्व है। आज के नागरिक कल के नेता हैं, उन्हें ही देश की पतवार सँभालनी है। अतः विद्यार्थियों का समुचित विकास आवश्यक है। वास्तव में विद्यार्थी-जीवन का आदर्श ही अनुशासन है, क्योंकि यही जीवन का निर्माण-काल है।यही तुम्हारा समय ज्ञान संचय करने का,
संयमशील, सुशील सदाचारी बनने का।
यह सब संभव हो सकता यदि अनुशासन हो,
मन में प्रेम, बड़ों का आदर, श्रद्धा का आसन हो ।।
हर समय कुछ-न-कुछ सीखने के लिए विद्यार्थी-जीवन ही सर्वोत्तम अवस्था है। जो विद्यार्थी प्रारंभिक अवस्था से अनुशासन का पालन करते हैं, उन्हें कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। किसी ने ठीक ही कहा हैअनुशासन सफलता की कुंजी है। अनुशासनहीनता मनुष्य को स्वार्थी एवं आलसी बना देती है। हमारा सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक विकास रुक जाता है। अनुशासनहीनता के कारण ही समाज में अपराधीकरण बढ़ता है। विद्यार्थियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। वे माता-पिता एवं गुरुजनों की अवज्ञा करने लगते हैं। आज उन्हें देश-समाज आदि की चिंता नहीं है, उन्हें किसी से सहानुभूति भी नहीं है और उनका आचरण दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा है।

विद्यार्थियों पर टीवी का प्रभाव

  • प्रस्तावना • मनोरंजन के साधन के रूप में • शिक्षा के माध्यम के रूप में • निष्कर्ष
टेलीविज़न की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह हमारे मनोरंजन का आधुनिकतम एव सरा साधन है। इसने हमारे दैनिक जीवन, रहन-सहन पर भी प्रभाव डाला है। इस पर अनेक प्रकार के रोचक कार्यक्रमटेलीफ़िल्में, धारावाहिक, चित्रहार, चित्रगीत, संगीत, नाटक, कवि-सम्मेलन एवं खेल-जगत आदि कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, जिनसे हमारा पर्याप्त मनोरंजन होता है। दूरदर्शन शिक्षा का सशक्त माध्यम है। इस पर औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों प्रकार की शिक्षाएँ दी जा रही हैं। स्कूली विद्यार्थियों के लिए नियमित पाठों का प्रसारण किया जाता है। प्रयोगात्मक ढंग से पाठों को सुरुचिपूर्ण तरीके से समझाया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के माध्यम से विद्यार्थियों को प्रतिदिन किसी-न-किसी विषय के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने विषय की नवीन-से-नवीन जानकारी प्राप्त होती है। दूरदर्शन पर राष्ट्रीय चैनलों के अतिरिक्त अन्य प्राइवेट चैनलों की भरमार है जिन पर अनेक रुचिकर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। कुछ कार्यक्रम सीधे विद्यार्थी वर्ग से न जुड़े होकर भी उनके ज्ञान का विस्तार करते हैं; जैसे-कौन बनेगा करोड़पति, फैमिली फ़ॉर्म्युन आदि । बोर्नविटा क्विज आदि कार्यक्रम तो विशेष रूप से विद्यार्थियों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने के लिए ही बनाए गए हैं।

चमत्कार विज्ञान जगत् का, और मनोरंजन जन साधन
चारों ओर हो रहा जग में, आज दूरदर्शन का अभिनंदन
दूर्भाग्य से दूरदर्शन ने विद्यार्थियों की पढ़ने की आदतों पर बुरा प्रभाव डाला है, जिससे उनकी चिंतन-मनन की क्षमता को ठेस पहुँची है और वे अच्छाई-बुराई में अंतर करना भूल गए हैं। वे केवल क्षणिक-चित्रों और शब्द-६ वनियों के जाद में बँधकर रह गए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि छात्र आवश्यकता से अधिक दूरदर्शन के कार्यक्रमों का अवलोकन न करें। प्रतिदिन अधिक-से-अधिक एक घंटा ही कार्यक्रमों को देखें और अपनी चिंतन-मनन की शक्ति को ठेस न पहुँचाएँ । नियमित अभ्यास ही उन्हें लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर करेगा।

समय का सदुपयोग

  • समय की परख ० समय के सम्मान से ही सफलता • समय की पालक प्रकृति
एक बार महात्मा गांधी से किसी ने पूछा कि “जीवन की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं–शिक्षा, शक्ति । अथवा धन को।” उत्तर मिला-“ये वस्तुएँ जीवन को सफल बनाने में सहायक अवश्य हैं, परंतु सबसे महत्त्वपूर्ण । है-समय की परख। जिसने समय की परख करना सीख लिया उसने जीने की कला सीख ली।” जो लोग उचित समय पर उचित कार्य करने की योजना बनाते हैं, वे ही समय के महत्त्व को जानते हैं। जो व्यक्ति समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है। समय कभी रुकता नहीं है, वह सम्मान माँगता है। जो जाति समय का सम्मान करना जानती । है, वह अपनी शक्ति कई गुना बढ़ा लेती है और विश्व की प्रमुख सत्ता बन बैठती है। फ्रैंकलिन के अनुसार-समय का सदुपयोग करने से जीवन में निश्चितता आती है, सब कार्य सुचारु रूप से होते चले जाते हैं। प्रत्येक कार्य के लिए समय मिल जाता है, चित्त शांत एवं प्रसन्न रहता है। धरती, सूर्य, चाँद-तारे, यहाँ तक कि संपूर्ण प्रकृति समय का पालन करती है तो मनुष्य को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। जीवन का एक-एक पल मूल्यवान है। समय मनुष्य का सबसे बड़ा धन है। युद्ध में एक मिनट खो देना सब कुछ खो देना है। अंग्रेजी की एक कहावत है कि “समय तथा समुद्र की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं।” इस संसार में सबसे अमूल्य है समय। जो इसे नष्ट करता है वह स्वयं नष्ट हो जाता है।
है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें, सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल, पर्वत झुक जाया करते हैं। ।
इस संसार में सभी वस्तुओं को घटाया और बढ़ाया जा सकता है, पर समय को नहीं। समय किसी के अधीन नहीं।  न वह रुकता है और न वह किसी की प्रतीक्षा करता है । कबीर के अनुसार जो लोग दिन खा-पीकर और रात सो कर गुजार देते हैं वे हीरे जैसे अनमोल जीवन को कौड़ियों के मूल्य बेच देते हैं। ऐसे लोग, अंत में पछताते रह जाते हैं। समय एक ऐसा देवता है यदि वह प्रसन्न हो जाए तो इंसान को उन्नति के शिखर तक पहुँचा देता है, यदि नाराज़ हो जाए तो इंसान को पतन के गर्त में गिरा देता है। अतः इस मूल्यवान समय का हमें हमेशा सदुपयोग करना चाहिए ।

माता-पिता की शिक्षा में भूमिका

माता-पिता संतान के जन्मदाता ही नहीं, सब कुछ होते हैं। भारतीय परंपरा तो माँ के चरणों में स्वर्ग मानती है ।भारतीय परम्परा मई अभिभावकों की अहम् भूमिका रही है-बच्चे के व्यक्तित्व-निर्माण में। आज भारतीय जीवन  में पाश्चात्य सभ्यता के  प्रभाव से भौतिकवादी बुधिप्रधान दृष्टिकोण व्याप्त हो रहा है। सामाजिक परिवेश में परिवर्तन आ रहा है। आज माता-पिता की संतान से आकांक्षाएँ भारतीय मूल से परिवर्तित रूप में प्रकट हो रहा है। संतान भी पाश्चात्य प्रभाव से प्रभावित होकर अधिकारों का रोना रो रही हैं, कर्तव्य नाम की चीज तो आज की संतान के शब्दकोश में है ही नहीं। माता-पिता को संतान की शिक्षा-प्राप्ति में अहम भूमिका निभानी होती है। माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा से संबंधित सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ-साथ उनको स्वतंत्र-चिंतन, कार्य-पद्धति तथा व्यवहार की छूट देनी होगी।
अपरिपक्व बुधि को परिपक्व होने में अपना संयम-पूर्ण योगदान देना होगा। आज की व्यस्त जिंदगी में अभिभावकों को समय निकालकर भौतिक सुखों के साथ अपनी मौजूदगी का अहसास बच्चों में भरना होगा। अपनी आवश्यकता थोपने के स्थान पर अहसास की भावना भरनी होगी। विचारों में समन्वय करना होगा। प्रसाद जी ने मानो माता-पिता को यही संदेश देते हुए कहा है-आँसु के भीगे अंचल पर, मन का सब कुछ रखना होगा।
तुमको अपनी स्मित रेखा से, यह संधि पत्र लिखना होगा।।
वास्तव में पाश्चात्य सभ्यता ‘मैं’ की उपासिका है। वह व्यक्ति के मूल्य को अंकित करती है परिवार के नहीं। जबकि भारतीय संस्कृति पूरे विश्व को परिवार समझने की पक्षधर है। दोनों सभ्यताओं में अंतर ही आज की समस्याओं की जड है। माता-पिता ने जीवन की दौड़ में दौड़कर ‘अनुभव’ के जो रत्न प्राप्त किए हैं, आज की संतान उन रत्नों से लाभ नहीं उठाना चाहती। वह स्वयं गलत या सही अनुभव करना चाहती है। इसलिए माता-पिता को अपने अनुभव बताने चाहिए, लादने नहीं।

नैतिक शिक्षा का महत्व

‘नैतिकता’ से अभिप्राय है-आचरण की शुद्धता तथा आदर्श मानवीय मूल्यों को अपनाना। सत्य, अहिंसा, प्रेम, सौहार्द, बड़ों का सम्मान, अनुशासन-पालन, दुर्बल एवं दीन-हीनों पर दया तथा परोपकार आदि गुणों को अपनाना ही नैतिकता का वरण करना है। सभी प्राणियों में ईश्वर का नूर देखना, न्याय-पथ पर चलना, शिष्टाचार का पालन करना- कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनका वर्णन प्रत्येक धर्मग्रंथ में मिलता है। धर्म-प्रवर्तकों एवं महान पुरुषों के जीवन से भी हमें नैतिकता को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, गांधीजी, मदर टेरेसा, विवेकानंद, महावीर स्वामी सभी ने प्राणिमात्र से प्रेम करने की शिक्षा दी है। बेवजह किसी को कष्ट न देना, अहिंसा का पालन करना, रोगियों, असहायों एवं अपाहिजों की सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। ‘जीवों पर दया करो’, ‘पर्यावरण की रक्षा करो’, ‘अहिंसा परम धर्म है’, ‘अपने पड़ोसी से प्रेम करो’, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, ‘जियो और जीने दो’, आदि विभिन्न धर्मों के ऐसे सूक्ति-वाक्य हैं जो हमें नैतिक मार्ग पर अग्रसर होने की निरंतर प्रेरणा देते हैं। बोर्डमैन के अनुसार-कर्म को बोओ और आदत की फसल काटे,

आदत को बोओ और चरित्र की फसल काटो,
चरित्र को बोओ और भाग्य की फसल काटो।
नैतिकता को अपनाने से अभिप्राय उपर्युक्त मानवीय मूल्यों को सम्मानपूर्वक अपनाने से है। वर्तमान समय में भौतिकवाद का बोलबाला है। भौतिक उन्नति की ओर अग्रसर मानव ने नैतिक मूल्यों को ताक़ पर रख दिया है। परिणामस्वरूप समाज में आतंक, भ्रष्यचार, हिंसा एवं अपराध बढ़ रहे हैं। भौतिक सुखों के लिए अनैतिकता और अराजकता को बढ़ावा देकर रावण की लंका का ही निर्माण किया जा सकता है, परंतु स्वर्ग के समान सुख, शांति एवं समृधि तो नैतिकता के बल पर ही स्थापित की जा सकती है। अत: आज के परिवेश में नैतिक शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा को शिक्षण संस्थाओं में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में नैतिक शिक्षा को स्थान नहीं दिया गया है। प्राथमिक स्तर से ही नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करके विद्यार्थियों के राष्ट्रीय चरित्र एवं नैतिक चरित्र के निर्माण में सहयोग देना चाहिए तथा इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी। बल देना चाहिए क्योंकि कोई शिक्षा तब तक कारगर सिद्ध नहीं होती जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाए। शिक्षक वर्ग को भी नैतिक गुणों को अपनाना चाहिए क्योंकि उनके आचरण एवं चरित्र का सीधा प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ता है।
निबंध नंबर :- 02
नैतिक-शिक्षा का महत्त्व
Naitik Shiksha ka Mahatva 
आधानिक युग में नैतिकता और उसके रक्षक-संर्वद्धक तत्त्वों का पूर्णतया हास बलिक सीहो चका है। नैतिकता किस चिड़िया का नाम होता या हो सकता है, आम खास किसी को इस का अहसास या ज्ञान तक नहीं रह गया है। लगता है, नैतिकता नामक पटिया को मार और भून कर लोग खा तो चुके ही हैं, हज्म तक कर चुके हैं और वह भी बिना किसी डकार लिए। इस का मुख्य कारण स्वतंत्रता प्राप्त करने वाली पीढ़ी के समाप्त हो जाने के बाद मचने वाली लूट-पाट, आपाधापी और आदर्शहीनता ही है। इस से भी बड़ा कारण है उस तरह का राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा का सर्वथा अभाव और नैतिकता और उसके मूल्यों को जगाए रखने की अवगत प्रेरणा बनी रहा करती है। पर नहीं, हमारे नेतृवर्ग ने स्वतंत्र भारत में इस सब की व्यवस्था करने के दायित्व निर्वाह की ओर कतई कोई ध्यान नहीं दिया। नैतिकता और नैतिक शिक्षा का महत्त्व इस तथ्य से भली भांति परिचित रहते हुए भी सर्वथा भुला दिया गया कि राष्ट्र-निर्माण और सुरक्षा के लिए एक प्रकार के राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता रहा करती है। वह नैतिक जागृति रहने पर ही संभव हुआ करता है।
उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में ही सहज ही देखा, परखा और समझा जा सकता है कि किसी भी युग में नैतिक शिक्षा का क्या महत्त्व हुआ करता है। उसकी कितनी अधिक आवश्यकता हुआ करती है। आज हमारा देश जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, जिस तरह की अपसंस्कृति और मूल्यहीनता का शिकार होकर अनवरत हीन बल्कि निकृष्टतम अमानवीय मनोवृत्तियों का अखाड़ा बन कर रह गया है, इसमें नैतिक शिक्षा का महत्त्व एवं आवश्यकता और भी बढ़ गई है। आज जिस प्रकार की शिक्षा स्कूलों-कॉलेजों में दी जा रही है, वह साक्षर तो जरूर बना देती है, सुशिक्षित क्या मात्र शिक्षित भी नहीं बना पाती। ऐसे में उसके द्वारा नैतिक मानों-मल्यों की रक्षा तो क्या करना, वह व्यक्ति का साधारण मनुष्य तक बने रहने की प्रेरणा भी दे पाने में असमर्थ है। इसी कारण आज यह बात बड़ी तीव्रता से अनुभव की जा रही है कि बाकी शिक्षा के साथ-साथ, बाल्क उस से भी पहले नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करना बड़ा ही आवश्यक है।
आज भारत में जिधर भी दृष्टिपात कर के देखिए, चारों ओर कई प्रकार के भ्रष्टाचारी का एकाधिकार छा रहा है। नैतिकता और साँस्कतिक आयोजनों की आड़ में अनैतिकता और अनाचार का पोषण कर उसे हर प्रकार से बढ़ावा दिया जा रहा है। हर तरफ भ्रष्ट मूल्यों वालों का बोल बाला हो रहा है पश्चिम की भौंडी नकल के फलस्वरूप अपसंस्कृति अपमूल्यों, नग्नता का प्रचार इतना बढ़ गया है कि उसका कहीं कोई किनारा तल दिखाई नहीं देता। चारों ओर कामुकता, हिंसा और वासना का नंगा नाच हो रहा है। सुनहरे सपने बेचने वाले सौदागरों ने माँस-मज्जागत लज्जा तक का अपहरण कर के मानवता की उदात भावनाओं को शरे-आम नंगा कर के खड़ी कर दिया है। सहज मानवीय सम्बन्ध तक दरारे जाकर भुरभुराने लगे और टूट का गिर पड़ने को उतावले नजर आ रहे हैं। अराजक और माफिया-गिरोहों को धार्मिक, सांप्रदायिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाने के कारण अच्छाई भरा आचरण तो क्या करना, उसका नाम तक ले पाना सुरक्षित नहीं समझा जाता। व्यापारिक दृष्टिकोण और आर्थिक तत्त्वों की प्रधानता ने मानवीयता का गला घोंट कर रख दिया है। फलतः चारों ओर एक प्रकार की कृत्रिमता. मात्र औपचारिकता का ही साम्राज्य छा रहा है। ऐसे वातावरण की सफलता पर प्रहार करने की क्षमता केवल आत्मिक स्तर तक नैतिक बन कर ही किया जा सकता है। नैतिक बनने – के लिए उस तरह की शिक्षा की स्पष्ट आवश्यकता तो है ही, सभी तरह के उपलब्ध उपकरणों – मानवीय मूल्यों को शुद्ध करना भी परमावश्यक है।
नैतिक शिक्षा व्यक्ति को उदार मानव तो बनाया ही करती है, एक तरह का राष्ट्रीय – चरित्र बनाने और विकसित करने में भी सहायक हो सकती है। उसके विकसित होने पर ही अपसंस्कृति, आरोपित और आयातित मूल्यों से छूटकारा पाकर अपनी संस्कृति. अपने राष्ट्रीय तत्त्वों, मल्यों एवं मानो को विकसित कर के समग्र राष्ट्रीयता का उदात तथा उच्च स्थितियों तक पहुँचाया जा सकता है। नैतिक मूल्यो-मानों को विकसित किए। बिना अन्य सभी प्रकार के विकास एक प्रकार से व्यर्थ ही हैं। उनका वास्तविक लाभ वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता कि जिन के लिए सारे आयोजन किए जाते हैं। इतना ही नहीं नैतिक शिक्षा द्वारा नैतिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों का विकास किए बिना राष्ट्र की सुरक्षा तक को निश्चित कर पाना संभव नहीं कहा माना जा सकता।
कभी भारत का सारे संसार में जो गुरुवत् मान-सम्मान किया जाता था, वह उसके उदात मानवीय मूल्यों के कारण ही किया जाता था। लेकिन आज देश-विदेश सभी जगह प्रत्येक स्तर पर भारतीयता को हेय एवं त्याज्य माना जाने लगा है। उसकी आवाज का कहीं कोई मूल्य एवं महत्त्व नहीं रह गया। नेतृवर्ग ने विदेशों से ऋण-पर-ण लेकर यहाँ की अस्मिता का दीवालियापन तो घोषित कर ही दिया है, भिखारी जैसा भी बना दिया है। इस प्रकार की विषमताओं पर नैतिक बल और साहस अर्जित कर के ही पार पाया जा सकता है। इसके लिए सब से पहले तो राष्ट्र के नेतृत्व या नेतृ वर्ग को नैतिक रूप से शिक्षित बनाना परम आवश्यक है, बाद में समूचे राष्ट्र जन को जितनी जल्दी यह कार्य आरम्भ कर दिया जाएगा, उतना ही राष्ट्र और राष्ट्र जन का हित-साधन संभव हो पाएगा। कहावत भी है कि शुभस्य शीघ्रम, अर्थात् शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिए।

भाग्य और पुरुषार्थ

हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”

भाग्य और पुरुषार्थ

हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”

डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

वे शुद्ध पायलट बनना चाहते थे। वैज्ञानिक बन गये। उनके पिता उन्हें कलक्टर बनाना चाहते थे। पर वे राष्ट्रपति बन गये। यानी कुछ भी न उनकी मर्जी का हुआ न उनके पिता की मर्जी की। फिर भी उन्होंने बेमर्जी के जो कुछ किया उससे देश का गौरव बढ़ा और वे भारतरत्न’ बन गये। इसके बीच बहत कुछ बदलता गया, लेकिन नहीं बदली ती उनकी सादगी  डा. अबुल फाफिर जैनुल आबेदिन अब्दुल कलाम यानी डी. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु में रामेश्वरम जिले के धनुष कोडि गाँव में 15 अक्तूबर, सन् 1931 ई.को हुआ।प्राथमिक शाला की पढ़ाई पूरी करने के बाद डा. कलाम को हायर सेकेंड्री की पढ़ाई के लिए रामनाथपुरम जाना पड़ा। यहाँ के स्क्वार्टज मिशनरी हाई स्कूल से हायर सेकेंड्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। लेकिन हायर सेकेंड्री तक की पढ़ाई तो जैसे-तैसे हो गयी, मगर आगे की पढ़ाई के लिए उनके घरवालों के पास कोई आर्थिक जुगाड़ नहीं था। लेकिन कलाम के दादाजी जिन्हें कलाम अब्बू’ कहकर बुलाया करते थे, ने एक तरकीब

निकाली। उन्होंने घर में पड़े लकड़ी के कुछ तख्तों को निकाला और उनसे एक छोटी नाव बनवाई। इस नाव को उन्होंने किराये पर देना शुरू किया और इससे वसूल होने वाले किराये से अब्दल कलाम की पढ़ाई का खर्च पूरा होने लगा।
इस तरह हायर सेकेंड्री के बाद डांवाडोल हो रही पढ़ाई को आधार मिला और अदल कलाम आगे की पढ़ाई के लिए त्रिचुरापल्ली के सेंट जोसफ कॉलेज गये। छुट्टियों में कलाम दसरे छात्रों की ही तरह अपने घर चले जाया करते थे और इन छुट्टियों में वह अपने पिता के काम में हाथ बंटाते थे। एक दिन जब वह पिताजी के साथ अखबारों की छंटनी कर के थे कि उनकी नजर अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ में छपे एक लेख पर पड़ी, जिसका शीर्षक था-‘स्पिटफायर’ यानी ‘मंत्र बाण’    दरअसल यह प्राचीन भारतीय अस्त्र का नाम था। जिसका इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध में गठबंधन सेनाओं (मित्र राष्ट्र) ने किया था। वास्तव में यह आग्नेयास्त्र मिसाइल ही था, जिसको पढ़कर अब्दुल कलाम अन्दर तक उत्तेजित हो गये थे और सोचने लगे थे कि काश! हिन्दुस्तान के पास इस तरह के आग्नेयास्त्र होते। बाद में उनके जीवन की सफलता की सारी कहानी इसी सपने का विस्तार है।
बी.एससी. प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके पास उसी तरह का संकट था जैसे कि हायर सेकेंड्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद आया था। लेकिन इस बार पढ़ाई जारी रखने का जिम्मा उन्होंने खुद अपने ऊपर लिया। इसके लिए उन्होंने न केवल ट्यूशन को अपना जरिया बनाया। बल्कि बीच-बीच में मद्रास से छपने वाले अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ के लिए विज्ञान पर कुछ लेख और फीचर भी लिखे। बी.एससी. के बाद कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने प्रथम    श्रेणी में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया। शायद यह बात बहुत लोगों को पता न हो कि कलाम साहब ने पी-एच.डी नहीं की। उनके नाम के पहले जो डॉक्टर शब्द लगा है वह मानद उपाधि के चलते लगा है।
पढ़ाई खत्म करने के बाद जब अब्दुल कलाम ने कैरियर की शुरुआत की, तो भारी दुविधा में फंस गये, क्योंकि उन दिनों वैज्ञानिकी के छात्रों की यूरोप और अमरीका में अच्छी खासी मांग थी। हाँ पैसा भी इतना मिलता था जिसकी सामान्य हिन्दुस्तान के लोग तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे। अपनी आत्मकथा कृति ‘माई जर्नी’ में कलाम साहब ने लिखा है-जीवन के वे दिन काफी कसमसाहटभरे थे। एक तरफ विदेशों में शानदार कैरियर था, तो दूसरी तरफ देश-सेवा का आदर्श बचपन के सपनों को सच करने का मौका चुनाव करना कठिन था कि आदेशों की ओर चला जाये या मालामाल होने के अवसर को गले लगाया जाये। लेकिन अन्ततः मैंने तय किया कि पैसों के लिए विदेश नहीं जाऊँगा। कैरियर की परवाह के लिए देश-सेवा का अवसर नहीं आँवाऊँगा। इस तरह 1958 में मैं डी.आर.डी.ओ डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) से जुड़ गया।”
डा. कलाम की पहली तेनाती डी.आर.डी.ओ. के हैदराबाद केन्द्र में हुई। पाँच सालों तक वे यहाँ पर महत्त्वपूर्ण अनुसंधानों में सहायक रहे। उन्हीं दिनों चीन ने भारत पर हमला कर दिया: 1962 के इस युद्ध में भारत को करारी हार शिकस्त झेलनी पड़ी। युद्ध के तुरन्त बाद निर्णय लिया गया कि देश की सामरिक शक्ति को नये हथियारों से सुसज्जित किया जाय। अनेक योजनाएँ बनीं, जिनके जनक डा. कलाम थे। लेकिन 1963 में उनका हैदराबाद से त्रिवेन्द्रम तबादला कर दिया गया। उनका यह तबादला विक्रम साराभाई स्पेस रिसर्च सेंटर में हुआ, जो कि इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन) का सहयोगी संस्थान था। डा. कलाम ने 1990 तक इस केन्द्र में काम किया। अपने इस लम्बे सेवाकाल में उन्होंने देश को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचाया। उन्हीं के नेतृत्व में भारत  कृत्रिम उपग्रहों के क्षेत्र में पहली कतार के देशों में शामिल हुआ | डा. कलाम एस. एल. बी. -3 परियोजना के निदेशक थे। 1979 में जब एस.एल.वी-3 की एक प्रायोगिक अपने ऊपर ले ली। अपने 44 साल के कैरियर में उनका हमेशा एक ही ध्येय वाक्य रहा है ‘विजन मिशन एंड गोल;  अर्थात् दृष्टिकोण ध्येय और लक्ष्य  
हम देशवासियों की ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह आपको चिरायु प्रदान कर  आपको और अधिक देशसेवा के लिए सक्षम और योग्य बनाये।

भाई दूज पर हिन्दी में निबंध

प्रस्तावना- दीपावली हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्योहार है और पांच दिवसीय त्योहार के पांचवे दिन मनाया जाता है, का पर्व। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित पर्व है, जिसे बड़ी श्रद्धा और परस्पर प्रेम के साथ मनाया जाता है। रक्षाबंधन के बाद, भाईदूज ऐसा दूसरा त्योहार है, जो भाई बहन के अगाध प्रेम को समर्पित है।कैसे मनाते हैं- भाई दूज का पर्व दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन वि‍वाहिता बहनें भाई बहन अपने भाई को भोजन के लिए अपने घर पर आमंत्रित करती है, और गोबर से भाई दूज परिवार का निर्माण कर, उसका पूजन अर्चन कर भाई को प्रेम पूर्वक भोजन कराती है। बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लंबी उम्र की कामना करती है। भाई दूर से जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं जिनके आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग तरह ये मनाया जाता है।
भाई दूज की कथा- सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया।
इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर मांगने को कहा। तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज ‘तथास्तु’ कहकर यमपुरी चले गए। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता।
मान्यता– भाई दूज को लेकर यह मान्यता प्रचलित है, कि इस दिन भाई को तिलक लगाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराने से परस्पर तो प्रेम बढ़ता ही है, भाई की उम्र भी लंबी होती है। चूंकि इस दिन यमुना जी ने अपने भाई यमराज से वचन लिया था, उसके अनुसार भाई दूज मनाने से यमराज के भय से मुक्ति मिलती है, और भाई की उम्र व बहन के सौभाग्य में वृद्धि होती है।

उपसंहार- भाई का प्रेम है सबसे अलग। बहन के प्रति बचपन से ही चिंतित रहने वाले भाई के प्रति प्रेम प्रकट करने का इससे अच्छा अवसर दूसरा नहीं। जितना महत्व रक्षा बंधन को दिया जाता है उतना ही महत्व भाई दूज को भी दिया जाना चाहिए। बहन को चाहिए कि भाई को अपने घर बुलाकर उसे भोजन कराएं तथा लंबी उम्र की कामना के साथ छोटा-सा ही सही, पर उपहार जरूर दें।

नरक चतुर्दशी पर निबंध

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार की कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को और के नाम से भी जानते हैं। दीपावली के एक दिन पहले आने वाली इस चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहते हैं
इस दिन के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अत्याचारी राक्षस का वध किया था। नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता है। प्रागज्योतिषपुर के राजा भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुंदर कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा था। भगवान श्रीकृष्‍ण ने उन सभी को मुक्त कराया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई गई थी।
दूसरी कथा के अनुसार पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा रंति देव को जब यमदूत नरक ले जाने लगे तो उन्होंने कहा मैंने तो कोई पाप नहीं किया फिर क्यों नरक ले जा रहे हो? यमदूतों ने कहा कि एक बार आपके द्वार से एक विप्र भूखा ही लौट गया था, यह उसी पाप कर्म का फल है। तब रंति देव ने कहा कि मुझे इसके प्रायश्चित का एक वर्ष दीजिए। यमदूतों ने एक वर्ष दिया तो राजा ऋषियों के पास पहुंचे और उन्होंने इस पाप से छूटने का उपाय पूछा। तब ऋषियों ने बताया कि कार्तिक मास की चतुर्दशी को व्रत रखने के बाद ब्राह्मण भोज कराएंगे तो आप इस पाप से मुक्त हो जाएंगे। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।
नरक चतुर्दशी के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौंदर्य की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता हैं कि जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय होने से बाद नहाता हैं उसे वर्ष भर में किए गए अच्छे कार्यों का फल नहीं मिलता है।
इस दिन को यम के नाम से भी जानते हैं। इसीलिए इस दिन शाम होने के बाद घर में और उसके चारों ओर दीये जलाए जाते हैं और यमराज से अकाल मृत्यु से मुक्ति और स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं।कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दीया जला कर पूरे घर में घूमाता है और फिर उसे लेकर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दीये को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घूमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।
इस दिन को काली चौदस भी कहते हैं। काली चौदस की रात माता काली की पूजा होती है। दरअसल पूरे भारतवर्ष में रूप चतुर्दशी का पर्व यमराज के प्रति दीप प्रज्ज्वलित कर, यम के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए मनाया जाता है, लेकिन बंगाल में मां काली के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है, जिसके कारण इस दिन को काली चौदस कहा जाता है। इस दिन मां काली की आराधना का विशेष महत्व होता है। काली मां के आशीर्वाद से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सफलता मिलती है।

इंदिरा गांधी पर हिन्दी निबंध

भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। एक ऐसी महिला जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। यही वजह है कि उन्हें लौह महिला के नाम से संबोधित किया जाता है।श्रीमती इंदिरा गांधी का जन्म नेहरू खानदान में हुआ था। वह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की इकलौती पुत्री थीं। आज इंदिरा गांधी को सिर्फ इस कारण नहीं जाना जाता कि वह पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी थीं बल्कि इंदिरा गांधी अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए ‘विश्व राजनीति’ के इतिहास में हमेशा जानी जाती रहेंगी।

इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम था- ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी’। उन्हें एक घरेलू नाम भी मिला था जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप ‘इंदु’ था। उनके पिता का नाम जवाहरलाल नेहरू और दादा का नाम मोतीलाल नेहरू था। पिता एवं दादा दोनों वकालत के पेशे से संबंधित थे और देश की स्वाधीनता में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। माता का नाम कमला नेहरू था।

इंदिराजी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से काफी संपन्न था। उनका इंदिरा नाम उनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरू ने रखा था। जिसका मतलब होता है कांति, लक्ष्मी एवं शोभा। इस नाम के पीछे की वजह यह थी कि उनके दादाजी को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें मां लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है।

इंदिरा के अत्यंत प्रिय दिखने के कारण पंडित नेहरू उन्हें ‘प्रियदर्शिनी’ के नाम से संबोधित किया करते थे। चूंकि जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, इस कारण सुंदरता उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुई थी। इंदिरा को उनका ‘गांधी’ उपनाम फिरोज गांधी से विवाह के बाद मिला था।
इंदिरा गांधी को बचपन में भी एक स्थिर पारिवारिक जीवन का अनुभव नहीं मिल पाया था। इसकी वजह यह थी कि 1936 में 18 वर्ष की उम्र में ही उनकी मां कमला नेहरू का तपेदिक के कारण एक लंबे संघर्ष के बाद निधन हो गया था और पिता हमेशा स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त रहे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू शिक्षा का महत्व काफी अच्छी तरह समझते थे। यही कारण है कि उन्होंने पुत्री इंदिरा की प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध घर पर ही कर दिया था। बाद में एक स्कूल में उनका दाखिला करवाया गया। 1934-35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद इंदिरा ने शांतिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर के बनाए गए ‘विश्व-भारती विश्वविद्यालय’ में प्रवेश लिया।
इसके बाद 1937 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। बचपन से ही इंदिरा गांधी को पत्र पत्रिकाएं तथा पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था जो स्कूल के दिनों में भी जारी रहा। इसका एक फायदा उन्हें यह मिला कि उनके सामान्य ज्ञान की जानकारी सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उन्हें देश दुनिया का भी काफी ज्ञान हो गया और वह अभिव्यक्ति की कला में निपुण हो गईं। विद्यालय द्वारा आयोजित होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिता में उनका कोई सानी नहीं था।

बावजूद इसके वह हमेशा ही एक औसत दर्जे की विद्यार्थी रहीं। अंग्रेजी के अतिरिक्त अन्य विषयों में वह कोई विशेष दक्षता नहीं प्राप्त कर सकीं। लेकिन अंग्रेजी भाषा पर उन्हें बहुत अच्छी पकड़ थी। इसकी वजह थी पिता पंडित नेहरू द्वारा उन्हें अंग्रेजी में लिखे गए लंबे-लंबे पत्र, चूंकि पंडित नेहरू अंग्रेजी भाषा के इतने अच्छे ज्ञाता थे कि लॉर्ड माउंटबेटन की अंग्रेजी भी उनके सामने फीकी लगती थी।


स्वयं उन्होंने भी अपने पिता पंडित मोतीलाल नेहरू का आदेश माना था। उन्होंने कई प्रकार से इंदिरा को समझाने का भी प्रयास किया लेकिन इंदिरा की जिद कायम रही। तब कोई भी रास्ता निकलता न देखकर नेहरू जी ने अपनी हामी भर दी। शादी के बाद 1944 में उन्होंने राजीव गांधी और इसके दो साल के बाद संजय गांधी को जन्म दिया। शुरुआत में तो उनका वैवाहिक जीवन ठीक रहा लेकिन बाद में उसमें खटास आ गई और कई सालों तक उनका रिश्ता हिचकौले खाता रहा। इसी दौरान 8 सितंबर 1960 को जब इंदिरा अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गई हुईं थीं तब फिरोज गांधी की मृत्यु हो गई।

इंदिरा गांधी को परिवार के माहौल में राजनीतिक विचारधारा विरासत में प्राप्त हुई थी। 1941 में ऑक्सफोर्ड से भारत वापस आने के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं। सन् 1947 के भारत विभाजन के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित करने तथा पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए चिकित्सा संबंधी देखभाल प्रदान करने में मदद की। उनके लिए प्रमुख सार्वजनिक सेवा का यह पहला मौका था। धीरे-धीरे पार्टी में उनका कद काफी बढ़ गया।

42 वर्ष की उम्र में 1959 में वह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी बन गईं। इस पर कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था। फिर 27 मई 1964 को नेहरू के निधन के बाद इंदिरा चुनाव जीतकर सूचना और प्रसारण मंत्री बन गईं।

11 जनवरी 1966 को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के बाद 24 जनवरी 1966 को श्रीमती इंदिरा गांधी भारत की तीसरी और प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद तो वह लगातार तीन बार 1967-1977 और फिर चौथी बार 1980-84 देश की प्रधानमंत्री बनीं।


16 वर्ष तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी के शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव आए। लेकिन 1975 में आपातकाल 1984 में सिख दंगा जैसे कई मुद्दों पर इंदिरा गांधी को भारी विरोध-प्रदर्शन और तीखी आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी थी।

बावजूद इसके रूसी क्रांति के साल में पैदा हुईं इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को परास्त किया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया। लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को उन्हें अपने अंगक्षक की ही गोली का शिकार होना पड़ा और वह देश की एकता और अखंडता के लिए कुर्बान हो गईं।

गाय पर हिन्दी निबंध

भूमिका : का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है।

अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। बच्चों को विशेष तौर पर गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है क्योंकि भैंस का दूध जहां सुस्ती लाता है, वहीं गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है। माना जाता है कि भैंस का बच्चा (पाड़ा) दूध पीने के बाद सो जाता है, जबकि गाय का बछड़ा अपनी मां का दूध पीने के बाद उछल-कूद करता है।

गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्‍डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है।
गाय की शारीरिक संरचना : गाय का एक मुंह, दो आंखें, दो कान, चार थन, दो सींग, दो नथुने तथा चार पांव होते हैं। पांवों के खुर गाय के लिए जूतों का काम करते हैं। गाय की पूंछ लंबी होती है तथा उसके किनारे पर एक गुच्छा भी होता है, जिसे वह मक्खियां आदि उड़ाने के काम में लेती है। गाय की एकाध प्रजाति में सींग नहीं होते।
गायों की प्रमुख नस्लें : गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्‍यत: सहिवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गीर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्ल में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी अधिक देती है। भारतीय गाय छोटी होती है, जबकि विदेशी गाय का शरीर थोड़ा भारी होता है।
गाय के रंग : गाय कई रंगों जैसे सफेद, काला, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है।

गाय का धार्मिक महत्व : भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।

प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है। कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। इसी कारण उनका एक नाम गोपाल भी है।

निष्कर्ष : दुर्भाग्य से शहरों में जिस तरह पॉलिथिन का उपयोग किया जाता है और उसे फेंक दिया जाता है, उसे खाकर गायों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में सभी को गंभीरता से विचार करना होगा ताकि हमारी ‘आस्था’ और ‘अर्थव्यवस्था’ के प्रतीक गोवंश को बचाया जा सके। गाय आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कुल मिलाकर गाय का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है।
परिचय : भारत के पहले प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 इलाहाबाद में हुआ था। उनकाजन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
उनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू था, जो एक धनाढ्य परिवार के थे और माता का नाम स्वरूपरानी था। पिता पेशे से वकील थे। जवाहरलाल नेहरू उनके इकलौते पुत्र थे और 3 पुत्रियां थीं। नेहरू जी को बच्चों से बड़ा स्नेह और लगाव था और वे बच्चों को देश का भावी निर्माता मानते थे।शि‍क्षा : जवाहरलाल नेहरू को दुनिया के बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लंदन से पूरी की थी। उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। हैरो और कैम्ब्रिज में पढ़ाई कर 1912 में नेहरूजी ने बार-एट-लॉ की उपाधि ग्रहण की और वे बार में बुलाए गए।

पंडित नेहरू शुरू से ही गांधीजी से प्रभावित रहे और 1912 में कांग्रेस से जुड़े। 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू घायल हुए और 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्होंने 6 माह जेल काटी। 1935 में अलमोड़ा जेल में ‘आत्मकथा’ लिखी। उन्होंने कुल 9 बार जेल यात्राएं कीं। उन्होंने विश्वभ्रमण किया और अंतरराष्ट्रीय नायक के रूप में पहचाने गए।योगदान : उन्होंने 6 बार कांग्रेस अध्यक्ष के पद (लाहौर 1929, लखनऊ 1936, फैजपुर 1937, दिल्ली 1951, हैदराबाद 1953 और कल्याणी 1954) को सुशोभित किया। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में नेहरूजी 9 अगस्त 1942 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, जहां से 15 जून 1945 को रिहा किए गए। नेहरू ने पंचशील का सिद्धांत प्रतिपादित किया और 1954 में ‘भारतरत्न’ से अलंकृत हुए नेहरूजी ने तटस्थ राष्ट्रों को संगठित किया और उनका नेतृत्व किया।

सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जब भावी प्रधानमंत्री के लिए कांग्रेस में मतदान हुआ तो सरदार वल्लभभाई पटेल और आचार्य कृपलानी को सर्वाधिक मत मिले थे। किंतु महात्मा गांधी के कहने पर दोनों ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू 1947 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आजादी के पहले गठित अंतरिम सरकार में और आजादी के बाद 1947 में भारत के प्रधानमंत्री बने और 27 मई 1964 को उनके निधन तक इस पद पर बने रहे।

‘स्वाधीनता और स्वाधीनता की लड़ाई को चलाने के लिए की जाने वाली कार्रवाई का खास प्रस्ताव तो करीब-करीब एकमत से पास हो गया। …खास प्रस्ताव इत्तफाक से 31 दिसंबर की आधी रात के घंटे की चोट के साथ, जबकि पिछला साल गुजरकर उसकी जगह नया साल आ रहा था, मंजूर हुआ।’ -लाहौर अधिवेशन में स्वतंत्रता प्रस्ताव पारित होने के बारे में नेहरू की ‘मेरी कहानी’ से।

उपसंहार : पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान करना और योजनाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू करना उनके मुख्य उद्देश्य रहे।

बाल दिवस पर हिन्दी निबंध

हर साल को मनाया जाता है। इसी दिन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ था, उन्हें बच्चों से बेहद लगाव और प्रेम था। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रति वर्ष उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहबाद में हुआ था। नेहरू जी का बच्चों से बड़ा स्नेह था और वे बच्चों को देश का भावी निर्माता मानते थे। बच्चों के प्रति उनके इस स्नेह भाव के कारण बच्चे भी उनसे बेहद लगाव और प्रेम रखते थे और उन्हें चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे। यही कारण है कि नेहरू जी के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।


14 नवंबर की तारीख को नेहरू जयंती या फिर बाल दिवस के नाम से जाना जाता है। यह दिन पूरी तरह से बच्चों को समर्पित है। इस दिन विशेष रूप से बच्चों के लिए स्कूल व अन्य संस्थानों में कार्यक्रम एवं खेल-कूद से जूड़े आयोजन होते हैं। बच्चे देश का भविष्य हैं, वे ऐसे बीज के समान हैं जिन्हें दिया गया पोषण उनका विकास और गुणवत्ता निर्धारित करेगा। यही कारण है कि इस दिन बच्चों से जुड़े विभिन्न मुद्दों जैसे शिक्षा, संस्कार, उनकी सेहत, मानसिक और शारीरिक विकास हेतु जरूरी विषयों पर विचार विमर्श किया जाता है।

कई स्कूलों व संस्थानों में बाल मेला एवं प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, ताकि बच्चों की क्षमता और प्रतिभा को और बढ़ावा मिले। इस दिन विशेष रूप से गरीब बच्चों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने एवं बाल श्रृम एवं बाल शोषण जैसे गंभीर मुद्दों पर भी विचार विमर्श किया जाता है।

बच्चे नाजुक मन के होते हैं और हर छोटी चीज या बात उनके दिमाग पर असर डालती है। उनका आज, देश के आने वाले कल के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उनके क्रियाकलापों, उन्हें दिए जाने वाले ज्ञान और संस्कारों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी है। बच्चों को सही शिक्षा, पोषण, संस्कार मिले य‍ह देशहित के लिए बेहद अहम है, क्योंकि आज के बच्चे ही कल का भविष्य है।

प्रदूषण एक समस्या निबंध हिन्दी में

स्तावना : विज्ञान के इस युग में मानव को जहां कुछ वरदान मिले है, वहां कुछ अभिशाप भी मिले हैं। प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप हैं जो विज्ञान की कोख में से जन्मा हैं और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबूर हैं।

प्रदूषण का अर्थ : प्रदूषण का अर्थ है -प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना। न शुद्ध वायु मिलना, न शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना, न शांत वातावरण मिलना।

प्रदूषण कई प्रकार का होता है! प्रमुख प्रदूषण हैं – वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण ।वायु-प्रदूषण : महानगरों में यह प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चौबीसों घंटे कल-कारखानों का धुआं, मोटर-वाहनों का काला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है। मुंबई की महिलाएं धोए हुए वस्त्र छत से उतारने जाती है तो उन पर काले-काले कण जमे हुए पाती है। ये कण सांस के साथ मनुष्य के फेफड़ों में चले जाते हैं और असाध्य रोगों को जन्म देते हैं! यह समस्या वहां अधिक होती हैं जहां सघन आबादी होती है, वृक्षों का अभाव होता है और वातावरण तंग होता है।जल-प्रदूषण : कल-कारखानों का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है। बाढ़ के समय तो कारखानों का दुर्गंधित जल सब नाली-नालों में घुल मिल जाता है। इससे अनेक बीमारियां पैदा होती है।ध्वनि-प्रदूषण : मनुष्य को रहने के लिए शांत वातावरण चाहिए। परन्तु आजकल कल-कारखानों का शोर, यातायात का शोर, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों, लाउड स्पीकरों की कर्णभेदक ध्वनि ने बहरेपन और तनाव को जन्म दिया है।

प्रदूषणों के दुष्परिणाम: उपर्युक्त प्रदूषणों के कारण मानव के स्वस्थ जीवन को खतरा पैदा हो गया है। खुली हवा में लम्बी सांस लेने तक को तरस गया है आदमी। गंदे जल के कारण कई बीमारियां फसलों में चली जाती हैं जो मनुष्य के शरीर में पहुंचकर घातक बीमारियां पैदा करती हैं। भोपाल गैस कारखाने से रिसी गैस के कारण हजारों लोग मर गए, कितने ही अपंग हो गए। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण न समय पर वर्षा आती है, न सर्दी-गर्मी का चक्र ठीक चलता है। सुखा, बाढ़, ओला आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है।

प्रदूषण के कारण : प्रदूषण को बढ़ाने में कल-कारखाने, वैज्ञानिक साधनों का अधिक उपयोग, फ्रिज, कूलर, वातानुकूलन, ऊर्जा संयंत्र आदि दोषी हैं। प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना भी मुख्य कारण है। वृक्षों को अंधा-धुंध काटने से मौसम का चक्र बिगड़ा है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली न होने से भी प्रदूषण बढ़ा है।

सुधार के उपाय : विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से बचने के लिए चाहिए कि अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं, हरियाली की मात्रा अधिक हो। सड़कों के किनारे घने वृक्ष हों। आबादी वाले क्षेत्र खुले हों, हवादार हों, हरियाली से ओतप्रोत हों। कल-कारखानों को आबादी से दूर रखना चाहिए और उनसे निकले प्रदूषित मल को नष्ट करने के उपाय सोचना चाहिए।

नए साल पर हिन्दी निबंध

वैसे तो पूरी दुनिया में नया साल अलग-अलग दिन मनाया जाता है और भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में भी नए साल की शुरुआत अलग-अलग समय होती है। लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत मानी जाती है, क्योंकि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 31 दिसंबर को एक वर्ष का अंत होने के बाद 1 जनवरी से नए कैलेंडर वर्ष की शुरुआत होती है।इसलिए इस दिन को पूरी दुनिया में नया साल शुरू होने के उपलक्ष्य में पर्व की तरह मनाया जाता है।नया साल नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य और की उम्मीद देता है, इसलिए सभी लोग खुशी से इसका स्वागत करते है। ऐसा माना जाता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो पूरा साल इसी उत्साह और खुशियों के साथ बीतेगा।


हालांकि हिन्दू पंचांग के अनुसार नया साल 1 जनवरी से शुरू नहीं होता। हिन्दू नववर्ष का आगाज गुड़ी पड़वा से होता है। लेकिन 1 जनवरी को नया साल मनाना सभी धर्मों में एकता कायम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है, क्योंकि इसे सभी मिलकर मनाते हैं। 31 दिसंबर की रात से ही कई स्थानों पर अलग-अलग समूहों में इकट्ठा होकर लोग नए साल का जश्न मनाना शुरू कर देते हैं और रात 12 बजते ही सभी एक दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते हैं।

नया साल एक नई शुरुआत को दर्शाता है और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देता है। पुराने साल में हमने जो भी किया, सीखा, सफल या असफल हुए उससे सीख लेकर, एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

जिस प्रकार हम पुराने साल के समाप्त होने पर दुखी नहीं होते बल्‍कि नए साल का स्वागत बड़े उत्साह और खुशी के साथ करते हैं, उसी तरह जीवन में भी बीते हुए समय को लेकर हमें दुखी नहीं होना चाहिए। जो बीत गया उसके बारे में सोचने की अपेक्षा आने वाले अवसरों का स्वागत करें और उनके जरिए जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करें।

नए साल की खुशी में कई स्थानों पर पार्टी आयोजित की जाती है जिसमें नाच-गाना और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ-साथ मजेदार खेलों के जरिए मनोरंजन किया जाता है। कुछ लोग धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कर ईश्वर को याद कर नए साल की शुरुआत करते हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल

वल्लभभाई झावेरभाई पटेल, सरदार पटेल के नाम से लोकप्रिय थे। का को हुआ था। सरदार पटेल एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आजार भारत के पहले गृहमंत्री थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान था, जिसके कारण उन्हें भारत का भी कहा जाता है।31 अक्टूबर 1875 गुजरात के नाडियाद में सरदार पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबा देवी था। सरदार पटेल अपने तीन भाई बहनों में सबसे छोटे और चौथे नंबर पर थे।शिक्षा : सरदार वल्लभ भाई पटेल की शिक्षा का प्रमुख स्त्रोत स्वाध्याय था। उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की और उसके बाद पुन: भारत आकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की।


में भागीदारी : सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। सरदार पटेल द्वारा इस लड़ाई में अपना पहला योगदान खेड़ा संघर्ष में दिया गया, जब खेड़ा क्षेत्र सूखे की चपेट में था और वहां के किसानों ने अंग्रेज सरकार से कर में छूट देने की मांग की। जब अंग्रेज सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया, तो सरदार पटेल, महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्ररित किया। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और किसानों को कर में राहत दे दी गई।

यूं पड़ा नाम सरदार पटेल : सरदार पटेल को सरदार नाम, बारडोली सत्याग्रह के बाद मिला, जब बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें पह ले बारडोली का सरदार कहा गया। बाद में सरदार उनके नाम के साथ ही जुड़ गया।

योगदान : आजादी के बाद ज्यादातर प्रांतीय समितियां सरदार पटेल के पक्ष में थीं। गांधी जी की इच्छा थी, इसलिए सरदार पटेल ने खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से दूर रखा और जवाहर लाल नेहरू को समर्थन दिया। बाद में उन्हें उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री का पद सौंपा गया, जिसके बाद उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों तो भारत में शामिल करना था। इस कार्य को उन्होंने बगैर किसी बड़े लड़ाई झगड़े के बखूबी किया। परंतु हैदराबाद के ऑपरेशन पोलो के लिए सेना भेजनी पड़ी।चूंकि भारत के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा गया। 15 दिसंबर 1950 को भारत का उनकी मृत्यु हो गई और यह लौह पुरुष दुनिया को अलविदा कह गया।

क्रिसमस डे पर हिन्दी में निबंध

भारत त्योहारों का देश है, जहां सभी समुदायों के लोग मिल-जुलकर विभिन्न प्रकार के त्योहार मनाते हैं। दिवाली, होली, राखी की ही तरह भी एक खास पर्व है। यह वैसे तो क्रिश्चियन समुदाय के लोगों का पर्व है लेकिन अन्य धर्मों के लोग भी इसे मनाते हैं। इस दिन स्कूलों में छुट्टी होती है, वहीं घर के अलावा मोहल्ले और शहरों के मॉल में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है और बच्चों के लिए विभिन्न आयोजन किए जाते हैं।क्रिश्चियन समुदाय के लोग हर साल के दिन मनाते हैं। यह ईसाइयों का सबसे बड़ा त्योहार है। इसी दिन प्रभु ईसा मसीह या जीसस क्राइस्ट का जन्म हुआ था इसलिए इसे ‘बड़ा दिन’ भी कहते हैं।

क्रिसमस के 15 दिन पहले से ही मसीह समाज के लोग इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं। लगभग 1 सप्ताह तक छुट्‍टी रहती है और इस दौरान बाजारों की रौनक बढ़ जाती है। घर और बाजार रंगीन रोशनियों से जगमगा उठते हैं।
क्रिसमस के कुछ दिन पहले से ही चर्च में विभिन्न कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं, जो न्यू ईयर तक चलते रहते हैं। मसीह गीतों की अंताक्षरी खेली जाती है, विभिन्न प्रकार के गेम्स खेले जाते हैं, प्रार्थनाएं की जाती हैं आदि। ईसाई समुदाय के लोग इस दिन के लिए अपने घरों की सफाई करते हैं, नए कपड़े खरीदते हैं और विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाते हैंइस दिन के लिए विशेष रूप से चर्चों को सजाया जाता है और प्रभु यीशु मसीह की जन्म गाथा को नाटक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। कई जगह क्रिसमस की पूर्व रात्रि गि‍‍‍‍रिजाघरों में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा की जाती है, जो रात के 12 बजे तक चलती है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाइयां देते हैं और खुशियां मनाते हैं।

क्रिसमस की सुबह गि‍‍‍‍रिजाघरों में विशेष प्रार्थना सभा होती है। कई जगह क्रिसमस के दिन मसीह समाज द्वारा जुलूस निकाला जाता है जिसमें प्रभु यीशु मसीह की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। सिर्फ ईसाई समुदाय ही नहीं, अन्य धर्मों के लोग भी इस दिन चर्च में मोमबत्तियां जलाकर प्रार्थना करते हैं।
क्रिसमस पर बच्चों के लिए सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र होता है सांताक्लॉज, जो लाल और सफेद कपड़ों में बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार और चॉकलेट्स लेकर आता है। यह एक काल्पनिक किरदार होता है जिसके प्रति बच्चों का विशेष लगाव होता है। ऐसा कहा जाता है कि स्वर्ग से आता है और लोगों को मनचाही चीजें उपहार के तौर पर देकर जाता है। यही कारण है कि कुछ लोग सांताक्लॉज की वेशभूषा पहनकर बच्चों को भी खुश कर देते हैं।
इस दिन आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है और इसकी विशेष साज-सज्जा की जाती है और इसी के माध्यम से सभी एक-दूसरे को उपहार भी देते हैं। इस त्योहार में केक का विशेष महत्व है। केक क्रिसमस का विशेष व्यंजन है। इसके बिना क्रिसमस अधूरा होता है। मीठे व मनमोहक केक काटकर खिलाने का रिवाज बहुत पुराना है।

इस दिन चर्च और अपने घरों में क्रिसमस ट्री को सजाने और केक बनाने का बेहद महत्व है। घर पर आने वाले मेहमानों एवं मिलने-जुलने वाले लोगों को केक खिलाकर मुंह मीठा किया जाता है और क्रिसमस की बधाई दी जाती

बड़ा दिन (क्रिसमस) पर पढ़ें हिन्दी में निबंध

bada din essay: हर साल के दिन क्रिश्चियन समुदाय के लोग का त्योहार मनाते हैं। क्रिसमस का त्योहार ईसा मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। क्रिसमस क्रिश्चियन समुदाय का सबसे बड़ा और खुशी का त्योहार है, इस कारण इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है।
* क्रिसमस के 15 दिन पहले से ही मसीह समाज के लोग इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं।

* घरों की सफाई की जाती है, नए कपड़े खरीदे जाते हैं, विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।* क्रिसमस के कुछ दिन पहले से ही चर्च में विभिन्न कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं जो न्यू ईयर तक चलते रहते हैं।

* इन कार्यक्रमों में प्रभु यीशु मसीह की जन्म गाथा को नाटक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। मसीह गीतों की अंताक्षरी खेली जाती है, विभिन्न प्रकार के गेम्स खेले जाते है, प्रार्थनाएं की जाती हैं आदि।
* कई जगह क्रिसमस के दिन मसीह समाज द्वारा जुलूस निकाला जाता है। जिसमें प्रभु यीशु मसीह की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं।

* कई जगह क्रिसमस की पूर्व रात्रि, गि‍‍‍‍रिजाघरों में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा की जाती है जो रात के 12 बजे तक चलती है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाइयां देते हैं और खुशियां मनाते हैं।* इस दिन अन्य धर्मों के लोग भी चर्च में मोमबत्तियां जलाकर प्रार्थना करते हैं।

* क्रिसमस की सुबह गि‍‍‍‍रिजाघरों में विशेष प्रार्थना सभा होती है।

* क्रिसमस का विशेष व्यंजन केक है, केक बिना क्रिसमस अधूरा होता है।

* इस दिन लोग चर्च और अपने घरों में क्रिसमस ट्री सजाते हैं।

बच्चों को चॉकलेट्स और गिफ्ट्स देते हैं।
ईसाईयों में बहुत ज्यादा त्योहार होते भी नहीं है, उनके लिए यही सबसे बड़ा दिन होता है, इसलिए भी क्रिसमस को बड़ा दिन कहा जाने लगा।

अटल बिहारी वाजपेयी पर हिन्दी निबंध

प्रस्तावना : पूर्व प्रधानमंत्री और ‘भारतरत्न’ अटल बिहारी वाजपेयी देश के एकमात्र ऐसे राजनेता थे, जो 4 राज्यों के 6 लोकसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके थे। उत्तरप्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधीनगर, मध्यप्रदेश के ग्वालियर और विदिशा और दिल्ली की नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी इकलौते नेता हैं।जन्म व शिक्षा : अटल बिहारी वाजपेयी का जन्‍म 25 दिसंबर 1924 को हुआ, इस दिन को भारत में ‘बड़ा दिन’ कहा जाता है। उनके पिता पंडित कृष्णबिहारी वाजपेयी अध्यापन का कार्य करते थे और माता कृष्णादेवी घरेलू महिला थीं।अटलजी अपने माता-पिता की 7वीं संतान थे। उनसे बड़े 3 भाई और 3 बहनें थीं। अटलजी के बड़े भाइयों को अवधबिहारी वाजपेयी, सदाबिहारी वाजपेयी तथा प्रेमबिहारी वाजपेयी के नाम से जाना जाता है।

अटलजी बचपन से ही अंतर्मुखी और प्रतिभा संपन्न थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिक्षा मंदिर, गोरखी, बाड़ा, विद्यालय में हुई। यहां से उन्होंने 8वीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। जब वे 5वीं कक्षा में थे, तब उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था। उन्हें विक्टोरिया कॉलेज में दाखिल कराया गया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की।

कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था। आरंभ में वे छात्र संगठन से जुड़े। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख कार्यकर्ता नारायण राव तरटे ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में कार्य किया।राजनीतिक जीवन : वाजपेयी 1942 में राजनीति में उस समय आए, जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके भाई 23 दिनों के लिए जेल गए। 1951 में आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ पार्टी का गठन हुआ तो श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं के साथ अटलबिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका रही।

वर्ष 1952 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, पर सफलता नहीं मिली। वे उत्तरप्रदेश की एक लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उतरे थे, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार सफलता 1957 में मिली थी। 1957 में जनसंघ ने उन्हें 3 लोकसभा सीटों- लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। लखनऊ में वे चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई, लेकिन बलरामपुर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर वे लोकसभा में पहुंचे।

वाजपेयी के असाधारण व्‍यक्तित्‍व को देखकर उस समय के वर्तमान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा। वाजपेयी तीसरे लोकसभा चुनाव 1962 में लखनऊ सीट से उतरे, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी। इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य चुने गए। बाद में 1967 में फिर लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। इसके बाद 1967 में ही उपचुनाव हुआ, जहां से वे जीतकर सांसद बने।

इसके बाद 1968 में वाजपेयी जनसंघ के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष बने। उस समय पार्टी के साथ नानाजी देशमुख, बलराज मधोक तथा लालकृष्‍ण आडवाणी जैसे नेता थे। 1971 में 5वें लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी मध्यप्रदेश के ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव में उतरे और जीतकर संसद पहुंचे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में 1977 और फिर 1980 के मध्यावधि चुनाव में उन्होंने नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

1984 में अटलजी ने मध्यप्रदेश के ग्वालियर से लोकसभा चुनाव का पर्चा दाखिल कर दिया और उनके खिलाफ अचानक कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को खड़ा कर दिया जबकि माधवराव गुना संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते थे। सिंधिया से वाजपेयी पौने 2 लाख वोटों से हार गए।

वाजपेयीजी ने एक बार जिक्र भी किया था कि उन्होंने स्वयं संसद के गलियारे में माधवराव से पूछा था कि वे ग्वालियर से तो चुनाव नहीं लड़ेंगे? माधवराव ने उस समय मना कर दिया था, लेकिन कांग्रेस की रणनीति के तहत अचानक उनका पर्चा दाखिल करा दिया गया। इस तरह वाजपेयी के पास मौका ही नहीं बचा कि वे दूसरी जगह से नामांकन दाखिल कर पाते। ऐसे में उन्हें सिंधिया से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वाजपेयी 1991 के आम चुनाव में लखनऊ और मध्यप्रदेश की विदिशा सीट से चुनाव लड़े और दोनों ही जगहों से जीते। बाद में उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी।1996 में हवाला कांड में अपना नाम आने के कारण लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर से चुनाव नहीं लड़े। इस स्थिति में अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ सीट के साथ-साथ गांधीनगर से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगहों से जीत हासिल की। इसके बाद वाजपेयी ने लखनऊ अपनी कर्मभूमि बना ली। वे 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव लखनऊ सीट से जीतकर सांसद बने।

आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी और वे मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार में विदेश मामलों के मंत्री बने। विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले ऐसे नेता थे जिन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासंघ को हिन्‍दी भाषा में संबोधित किया। इसके बाद जनता पार्टी अंतरकलह के कारण बिखर गई और 1980 में वाजपेयी के साथ पुराने दोस्‍त भी जनता पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए।

वाजपेयी भाजपा के पहले राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बने और वे कांग्रेस सरकार के सबसे बड़े आलोचकों में शुमार किए जाने लगे। 1994 में कर्नाटक तथा 1995 में गुजरात और महाराष्‍ट्र में पार्टी जब चुनाव जीत गई, तो उसके बाद पार्टी के तत्कालीन अध्‍यक्ष लालकृष्‍ण आडवाणी ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया था।

वाजपेयीजी 1996 से लेकर 2004 तक 3 बार प्रधानमंत्री बने। 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने, हालांकि उनकी सरकार 13 दिनों में संसद में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं करने के चलते गिर गई।

1998 के दोबारा लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्‍यादा सीटें मिलीं और कुछ अन्‍य पार्टियों के सहयोग से वाजपेयीजी ने एनडीए का गठन किया और वे फिर प्रधानमंत्री बने। यह सरकार 13 महीनों तक चली, लेकिन बीच में ही जयललिता की पार्टी ने सरकार का साथ छोड़ दिया जिसके चलते सरकार गिर गई। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से सत्‍ता में आई और वे इस पद पर 2004 तक बने रहे। इस बार वाजपेयीजी ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लंबे समय से बीमार रहने के कारण अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में भर्ती रहे, जहां उनका लंबा इलाज चला और 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

हिन्दी निबंध: युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद

वर्तमान में भारत के युवा जि‍स महापुरुष के विचारों को आदर्श मानकर उससे प्रेरित होते हैं, युवाओं के वे मार्गदर्शक और भारतीय गौरव हैं स्वामी विवेकानंद।भारत की गरिमा को वैश्विक स्तर पर सम्मान के साथ बरकरार रखने के लिए के कई उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। 
 
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।
 
सन्‌ 1884 में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।
 
रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।
 
स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।
 
गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।
 
25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।
 
सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।
 
फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।
 
‘अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा’ यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।
 
4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

मकर संक्रांति पर हिन्दी में निबंध, पढ़ें रोचक जानकारी

प्रस्तावना : मकर संक्रांति हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। यह त्योहार, सूर्य के उत्तरायन होने पर मनाया जाता है। इस पर्व की विशेष बात यह है कि यह अन्य त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं, बल्कि हर साल 14 जनवरी को ही मनाया जाता है, जब सूर्य उत्तरायन होकर मकर रेखा से गुजरता है।कब मनाया जाता है यह त्योहार : मकर संक्रांति का संबंध सीधा पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से है। जब भी सूर्य मकर रेखा पर आता है, वह दिन 14 जनवरी ही होता है, अत: इस दिन मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है।



कभी-कभी यह एक दिन पहले या बाद में यानी 13 या 15 जनवरी को भी मनाया जाता है लेकिन ऐसा कम ही होता है।

कैसे मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्योहार : इस दिन सुबह जल्दी उठकर तिल का उबटन कर स्नान किया जाता है। इसके अलावा तिल और गुड़ के लड्डू एवं अन्य व्यंजन भी बनाए जाते हैं। इस समय सुहागन महिलाएं सुहाग की सामग्री का आदान प्रदान भी करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे उनके पति की आयु लंबी होती है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है और तमिलनाडु में इसे पर्व के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व मनाया जाता है, वहीं असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है।

मकर संक्रांति की खासियत : हर प्रांत में इसका नाम और मनाने का तरीका अलग-अलग होता है। अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के पकवान भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन दाल और चावल की खिचड़ी इस पर्व की प्रमुख पहचान बन चुकी है। विशेष रूप से गुड़ और घी के साथ खिचड़ी खाने का महत्व है। इसके अलावा तिल और गुड़ का भी मकर संक्राति पर बेहद महत्व है।धर्म-ज्योतिष की नजर से मकर संक्रांति : ज्योतिष की दृष्ट‍ि से देखें तो इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य के उत्तरायण की गति प्रारंभ होती है। सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत-पर्व के रूप में मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। वर्षभर में बारह राशियों मेष, वृषभ, मकर, कुंभ, धनु इत्यादि में सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं और जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति होती है।

दान का महत्व : सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। मकर संक्रांति को स्नान और दान का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन तीर्थों एवं पवित्र नदियों में स्नान का बेहद महत्व है साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल एवं राशि अनुसार दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं।

महाभारत के अनुसार : महाभारत में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही माघ शुक्ल अष्टमी के दिन स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।

उपसंहार : इन सभी मान्यताओं के अलावा मकर संक्रांति पर्व एक उत्साह और भी जुड़ा है। इस दिन पतंग उड़ाने का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन कई स्थानों पर पतंगबाजी के बड़े-बड़े आयोजन भी किए जाते हैं। लोग बेहद आनंद और उल्लास के साथ पतंगबाजी करते हैं।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस पर हिन्दी में निबंध

विश्व इतिहास में 23 जनवरी 1897 का दिन स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक का जन्म हुआ था। सुभाषचंद्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावती देवी के यहां हुआ था।उनके पिता ने अंगरेजों के दमन चक्र के विरोध में ‘रायबहादुर’ की उपाधि लौटा दी। इससे सुभाष के मन में अंगरेजों के प्रति कटुता ने घर कर लिया। अब सुभाष अंगरेजों को भारत से खदेड़ने व भारत को स्वतंत्र कराने का आत्मसंकल्प ले, चल पड़े राष्ट्रकर्म की राह पर।


आईसीएस की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद सुभाष ने आईसीएस से इस्तीफा दिया। इस बात पर उनके पिता ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- ‘जब तुमने देशसेवा का व्रत ले ही लिया है, तो कभी इस पथ से विचलित मत होना।’दिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने कहा था – मेरी यह कामना है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में ही हमें स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना है। हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद से है। धीरे-धीरे कांग्रेस से सुभाष का मोह भंग होने लगा।16 मार्च 1939 को सुभाष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुभाष ने आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में ‘भारतीय स्वाधीनता सम्मेलन’ के साथ हुई।

5 जुलाई 1943 को ‘आजाद हिन्द फौज’ का विधिवत गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में शहीद यतीन्द्र दास के स्मृति दिवस पर नेताजी ने अत्यंत मार्मिक भाषण देते हुए कहा- ‘अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी बलिदान मांगती है। आप मुझे खून दो, मैं आपको आजादी दूंगा।’ यही देश के नौजवानों में प्राण फूंकने वाला वाक्य था, जो भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाला, भारत मां का दुलारा सदा के लिए, राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमर हो गया।

26 जनवरी हिन्दी निबंध : ‘गणतंत्र दिवस’ भारत का राष्ट्रीय पर्व

प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाने वाला गणतंत्र दिवस, भारत का राष्ट्रीय पर्व है, जिसे प्रत्येक भारतवासी पूरे उत्साह, जोश और सम्मान के साथ मनाता है। राष्ट्रीय पर्व होने के नाते इसे हर धर्म, संप्रदाय और जाति के लोग मनाते हैं।26 जनवरी सन 1950 को हमारे देश को पूर्ण स्वायत्त गणराज्य घोषित किया गया था और इसी दिन हमारा संविधान लागू हुआ था। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को भारत का गणतंत्र दिवस मनाया जाता है और चूंकि यह दिन किसी विशेष धर्म, जाति या संप्रदाय से न जुड़कर राष्ट्रीयता से जुड़ा है, इसलिए देश का हर बाशिंदा इसे राष्ट्रीय पर्व के तौर पर मनाता है।


खास तौर से सरकारी संस्थानों एवं शिक्षण संस्थानों में इस दिन ध्वजारोहण, झंडा वंदन करने के पश्चात राष्ट्रगान जन-गन-मन का गायन होता है और देशभक्ति से जुड़े विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।

देशाक्ति गीत, भाषण, चित्रकला एवं अन्य प्रतियोगिताओं के साथ ही देश के वीर सपूतों को याद भी किया जाता है और वंदे मातरम, जय हिन्दी, भारत माता की जय के उद्घोष के साथ पूरा वातावरण देशभक्ति से ओतप्रोत हो जाता है।

भारत की राजधानी दिल्ली में गणंतंत्र दिवस पर विशेष आयोजन होते हैं। देश के प्रधानमंत्री द्वारा इंडिया गेट पर शहीद ज्योति का अभिनंदन करने के साथ ही उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं।इस दिन विशेष रूप से दिल्ली के विजय चौक से लाल किले तक होने वाली परेड आकर्षण का प्रमुख केंद्र होती है, जिसमें देश और विदेश के गणमान्य जनों को आमंत्रित किया जाता है। इस परेड में तीनों सेना के प्रमुख राष्ट्रीपति को सलामी दी जाती है एवं सेना द्वारा प्रयोग किए जाने वाले हथियार, प्रक्षेपास्त्र एवं शक्तिशाली टैंकों का प्रदर्शन किया जाता है एवं परेड के माध्यम से सैनिकों की शक्ति और पराक्रम को बताया जाता है।

गांव से लेकर शहरों तक, राष्ट्रभक्ति के गीतों की गूंज सुनाई देती है और प्रत्येक भारतवासी एक बार फिर अथाह देशभक्ति से भर उठता है। बच्चों में इस दिन को लेकर बेहद उत्साह होता है। इस दिन आयोजित कार्यक्रमों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थ‍ियों का सम्मान एवं पुरस्कार वितरण भी किया जाता है और मिठाई वितरण भी विशेष रूप से होता है।

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

प्रस्तावना : प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है, जो उस देश के स्वतंत्र देश होने का संकेत है। का तिरंगा है, जो तीन रंगों – केसरिया, सफेद और हरे रंग से बना है और इसके केंद्र में नीले रंग से बना अशोक चक्र है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था।यह 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘तिरंगे’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है।भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।


तिरंगे का विकास : यह जानना अत्यंत रोचक है कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्वतंत्रता के राष्ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्यता दी गई। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों से गुजरा। हमारे राष्ट्रीय ध्वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं :-

प्रथम राष्ट्रीय ध्वज 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

तृतीय ध्वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड़ लिया। डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है।
गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्वि करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था।

22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्त भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना।

राष्ट्रीय ध्वज के रंग : भारत के राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।

अशोक चक्र : इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है।

उपसंहार : भारतीय राष्ट्रीय ध्वज भारत के नागरिकों की आशाएं और आकांक्षाएं दर्शाता है। यह हमारे राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। पिछले पांच दशकों से अधिक समय से सशस्त्र सेना बलों के सदस्यों सहित अनेक नागरिकों ने तिरंगे की शान को बनाए रखने के लिए निरंतर अपने जीवन न्यौछावर किए हैं।

महात्मा गांधी पर हिन्दी में निबंध

महात्मा गांधी का को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। मोहनदास की माता का नाम पुतलीबाई था जो करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थीं। मोहनदास अपने पिता की चौथी पत्नी की अंतिम संतान थे। महात्मा गांधी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेता और ‘राष्ट्रपिता’ माना जाता है।

गांधी जी का परिवार- गांधी की मां पुतलीबाई अत्यधिक धार्मिक थीं। उनकी दिनचर्या घर और मंदिर में बंटी हुई थी। वह नियमित रूप से उपवास रखती थीं और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा सुश्रुषा में दिन-रात एक कर देती थीं। मोहनदास का लालन-पालन वैष्णव मत में रमे परिवार में हुआ और उन पर कठिन नीतियों वाले जैन धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा। जिसके मुख्य सिद्धांत, अहिंसा एवं विश्व की सभी वस्तुओं को शाश्वत मानना है। इस प्रकार, उन्होंने स्वाभाविक रूप से अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए उपवास और विभिन्न पंथों को मानने वालों के बीच परस्पर सहिष्णुता को अपनाया।
विद्यार्थी के रूप में गांधी जी – मोहनदास एक औसत विद्यार्थी थे, हालांकि उन्होंने यदा-कदा पुरस्कार और छात्रवृत्तियां भी जीतीं। वह पढ़ाई व खेल, दोनों में ही तेज नहीं थे। बीमार पिता की सेवा करना, घरेलू कामों में मां का हाथ बंटाना और समय मिलने पर दूर तक अकेले सैर पर निकलना, उन्हें पसंद था। उन्हीं के शब्दों में – ‘बड़ों की आज्ञा का पालन करना सीखा, उनमें मीनमेख निकालना नहीं।’

उनकी किशोरावस्था उनकी आयु-वर्ग के अधिकांश बच्चों से अधिक हलचल भरी नहीं थी। हर ऐसी नादानी के बाद वह स्वयं वादा करते ‘फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा’ और अपने वादे पर अटल रहते। उन्होंने सच्चाई और बलिदान के प्रतीक प्रह्लाद और हरिश्चंद्र जैसे पौराणिक हिन्दू नायकों को सजीव आदर्श के रूप में अपनाया। गांधी जी जब केवल तेरह वर्ष के थे और स्कूल में पढ़ते थे उसी वक्त पोरबंदर के एक व्यापारी की पुत्री कस्तूरबा से उनका विवाह कर दिया गया।युवा गांधी जी – 1887 में मोहनदास ने जैसे-तैसे ‘मुंबई यूनिवर्सिटी’ की मैट्रिक की परीक्षा पास की और भावनगर स्थित ‘सामलदास कॉलेज’ में दाखिल लिया। अचानक गुजराती से अंग्रेजी भाषा में जाने से उन्हें व्याख्यानों को समझने में कुछ दिक्कत होने लगी। इस बीच उनके परिवार में उनके भविष्य को लेकर चर्चा चल रही थी। अगर निर्णय उन पर छोड़ा जाता, तो वह डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन वैष्णव परिवार में चीर-फाड़ की इजाजत नहीं थी। साथ ही यह भी स्पष्ट था कि यदि उन्हें गुजरात के किसी राजघराने में उच्च पद प्राप्त करने की पारिवारिक परंपरा निभानी है तो उन्हें बैरिस्टर बनना पड़ेगा और ऐसे में गांधीजी को इंग्लैंड जाना पड़ा।

यूं भी गांधी जी का मन उनके ‘सामलदास कॉलेज’ में कुछ खास नहीं लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को सहज ही स्वीकार कर लिया। उनके युवा मन में इंग्लैंड की छवि ‘दार्शनिकों और कवियों की भूमि, संपूर्ण सभ्यता के केन्द्र’ के रूप में थी। सितंबर 1888 में वह लंदन पहुंच गए। वहां पहुंचने के 10 दिन बाद वह लंदन के चार कानून महाविद्यालय में से एक ‘इनर टेंपल’ में दाखिल हो गए।

1906 में टांसवाल सरकार ने दक्षिण अफीका की भारतीय जनता के पंजीकरण के लिए विशेष रूप से अपमानजनक अध्यादेश जारी किया। भारतीयों ने सितंबर 1906 में जोहेन्सबर्ग में गांधी के नेतृत्व में एक विरोध जनसभा का आयोजन किया और इस अध्यादेश के उल्लंघन तथा इसके परिणामस्वरूप दंड भुगतने की शपथ ली। इस प्रकार सत्याग्रह का जन्म हुआ, जो वेदना पहुंचाने के बजाए उन्हें झेलने, विद्वेषहीन प्रतिरोध करने और बिना हिंसा किए उससे लड़ने की नई तकनीक थी।

इसके बाद दक्षिण अफीका में सात वर्ष से अधिक समय तक संघर्ष चला। इसमें उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन गांधी के नेतृत्व में भारतीय अल्पसंख्यकों के छोटे से समुदाय ने अपने शक्तिशाली प्रतिपक्षियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। सैकड़ों भारतीयों ने अपने स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाले इस कानून के सामने झुकने के बजाय अपनी आजीविका तथा स्वतंत्रता की बलि चढ़ाना ज्यादा पसंद किया।

गांधी जब भारत लौट आए- सन् 1914 में गांधी जी भारत लौट आए। देशवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें महात्मा पुकारना शुरू कर दिया। उन्होंने अगले चार वर्ष भारतीय स्थिति का अध्ययन करने तथा उन लोगों को तैयार करने में बिताए जो सत्याग्रह के द्वारा भारत में प्रचलित सामाजिक व राजनीतिक बुराइयों को हटाने में उनका साथ दे सकें।फरवरी 1919 में अंग्रेजों के बनाए रॉलेट एक्ट कानून पर, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए जेल भेजने का प्रावधान था, उन्होंने अंग्रेजों का विरोध किया। फिर गांधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा कर दी। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा राजनीतिक भूचाल आया, जिसने 1919 के बसंत में समूचे उपमहाद्वीप को झकझोर दिया।

इस सफलता से प्रेरणा लेकर महात्‍मा गांधी ने भारतीय स्‍वतंत्रता के लिए किए जाने वाले अन्‍य अभियानों में सत्‍याग्रह और अहिंसा के विरोध जारी रखे, जैसे कि ‘असहयोग आंदोलन’, ‘नागरिक अवज्ञा आंदोलन’, ‘दांडी यात्रा’ तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’। गांधी जी के इन सारे प्रयासों से भारत को 15 अगस्‍त 1947 को स्‍वतंत्रता मिल गई।

उपसंहार – मोहनदास करमचंद गांधी भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनीतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। राजनीतिक और सामाजिक प्रगति की प्राप्ति हेतु अपने अहिंसक विरोध के सिद्धांत के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।

महात्मा गांधी के पूर्व भी शांति और अहिंसा की के बारे में लोग जानते थे, परंतु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गांधी जयंती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की है।

गांधी जी के बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि- ‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी धरती पर कभी आया था।

वेलेंटाइन डे यानी प्रेम दिवस पर हिन्दी में निबंध

प्रत्येक वर्ष 14 फरवरी के दिन वेलेंटाइन डे मनाया जाता है। वेलेंटाइन डे को प्रेम दिवस के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन प्रेमी युगलों के लिए एक उत्सव की तरह होता है, जब खास तौर से अपने प्रिय को प्रेम अभिव्यक्त किया जाता है।वेलेंटइन डे इतिहास : वेलेंटइन डे की शुरुआत अमेरिका में की याद में हुई थी। सर्वप्रथन यह दिन अमेरिेका में ही मनाया गया, फिर इंग्लैंड में इसे मनाने की शुरुआत हुई। इसके बाद यह पूरे विश्व में धीरे-धीरे मनाया जाने लगा।कुछ देशों में इसे अलग-अलग नामों के साथ भी मनाया जाता है। चीन में इसे ‘नाइट्स ऑफ सेवेन्स’ वहीं जापान व कोरिया में ‘वाइट डे’ के नाम से जाना जाता है और पूरा फरवरी माह प्रेम का महीना माना जाता है। भारत में वेलेंटाइन डे मनाने की शुरुआत सन 1992 के लगभग हुई थी, जिसके बाद इसका चलन यहां भी शुरू हो गया।


सेंट वेलेंटाइन कौन थे : वेलेंटाइन-डे मूल रूप से सेंट वेलेंटाइन की याद में मनाया जाता है। हालांकि सेंट वेलेंटाइन के बारे में ऐतिहासिक तौर पर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं। 1969 में कैथोलिक चर्च ने कुल ग्यारह सेंट वेलेंटाइन के होने की पुष्टि की और 14 फरवरी को उनके सम्मान में पर्व मनाने की घोषणा की। इनमें सबसे महत्वपूर्ण वेलेंटाइन रोम के सेंट वेलेंटाइन माने जाते हैं।

वहीं 1260 में संकलित की गई ‘ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन’ नामक पुस्तक में भी सेंट वेलेंटाइन का जिक्र किया गया है जिसके इसके अनुसार रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था। उसके अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती। इसी के चलते उसने आदेश जारी किया कि उसका कोई भी सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। लेकिन संत वेलेंटाइन ने इस आदेश का न केवल वि‍रोध किया बल्कि शादी भी की।

यह विरोध एक आंधी की तरह फैला और सम्राट क्लॉडियस के अन्य सैनिकों और अधिकारियों ने भी विवाह किए। इस बात से गुस्साए क्लॉडियस ने 14 फरवरी सन् 269 को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया।

रंग-रंगीले त्योहार ‘होली’ पर हिन्दी में निबंध

भारत का रंग-रंगीला होली, प्यारभरे रंगों से सजा यह पर्व हर धर्म, संप्रदाय व जाति के बंधन खोलकर भाईचारे का संदेश देता है। इस दिन सारे लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भूलकर गले लगते हैं और एक-दूजे को गुलाल लगाते हैं।होली एक ऐसा रंग-बिरंगा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग पूरे उत्साह और मस्ती के साथ मनाते हैं। बच्चे और युवा रंगों से खेलते हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है। होली के साथ अनेक कथाएं जुड़ी हैं। होली मनाने के एक रात पहले होली को जलाया जाता है।


इसके पीछे एक लोकप्रिय पौराणिक कथा है। भक्त प्रह्लाद के पिता हरिण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे। वे विष्णु के विरोधी थे जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त थे। उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति करने से रोका। जब वे नहीं माने तो उन्होंने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। प्रह्लाद के पिता ने अपनी बहन होलिका से मदद मांगी।
होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठी परंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई।

यह कथा इस बात का संकेत करती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते हैं और अगले दिन सब लोग एक-दूसरे पर गुलाल, अबीर और तरह-तरह के रंग डालते हैं। यह त्योहार रंगों का त्योहार है।इस दिन लोग प्रात:काल उठकर रंगों को लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाते हैं और उनके साथ जमकर होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता है। वे एक दिन पहले से ही बाजार से अपने लिए तरह-तरह की पिचकारियां व गुब्बारे लाते हैं। बच्चे गुब्बारों व पिचकारी से अपने मित्रों के साथ होली का आनंद उठाते हैं।

होली के दिन सभी लोग बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे से परस्पर गले मिलते हैं। घरों में औरतें एक दिन पहले से ही मिठाई, गुझिया आदि बनाती हैं व अपने पास-पड़ोस में आपस में बांटती हैं। कई लोग होली की टोली बनाकर निकलते हैं और उन्हें हुर्रियारे कहा जाता है। ब्रज की होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाने की होली, काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है।
आजकल अच्छी क्वालिटी के रंगों का प्रयोग नहीं होता और त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले रंग खेले जाते हैं। यह सरासर गलत है। इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहना चाहिए। बच्चों को भी सावधानी रखनी चाहिए। बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही होली खेलना चाहिए। दूर से गुब्बारे फेंकने से आंखों में घाव भी हो सकता है। रंगों को भी आंखों और अन्य अंदरुनी अंगों में जाने से रोकना चाहिए।

यह मस्तीभरा पर्व मिल-जुलकर मनाना चाहिए तभी हम सभी इस त्योहार का असली आनंद उठा पाएंगे। इस पर्व के संबंध में ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी दुश्मनी, कटुता को भूला कर एक-दूसरे के गले मिलते हैं और मिठाइयों के साथ उत्साहपूर्वक इस त्योहार को मनाते हैं। होली से रंगपंचमी तक इस त्योहार का आनंद और उत्साह सभी जगह देखने को मिलता है।

छत्रपति शिवाजी महाराज पर हिन्दी में निबंध

परिचय : एक बहादुर, बुद्धिमानी, शौर्यवीर और दयालु शासक थे। उनका जन्म 19 फरवरी 1627 को मराठा परिवार में महाराष्ट्र के शिवनेरी में हुआ। शिवाजी के पिता शाहजी और माता जीजाबाई थीं। माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण-स्वभाव और व्यवहार में वीरंगना नारी थीं।इसी कारण उन्होंने बालक शिवा का पालन-पोषण रामायण, महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरात्माओं की उज्ज्वल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। बचपन में शिवाजी अपनी आयु के बालक इकट्ठे कर उनके नेता बनकर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे।

दादा कोणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था। धर्म, संस्कृति और राजनीति की भी उचित शिक्षा दिलवाई थी। उस युग में परम संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए।

परिवार एवं गुरु : छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निंबालकर के साथ हुआ था। उनके पुत्र का नाम संभाजी था। संभाजी शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी थे जिसने 1680 से 1689 ई. तक राज्य किया। संभाजी में अपने पिता की कर्मठता और दृढ़ संकल्प का अभाव था। संभाजी की पत्नी का नाम येसुबाई था। उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजाराम थे। शिवाजी के समर्थ गुरु रामदास का नाम भारत के साधु-संतों व विद्वत समाज में सुविख्यात है।

शिवाजी का पराक्रम : युवावस्था में आते ही उनका खेल वास्तविक कर्म शत्रु बनकर शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले आदि भी जीतने लगे। जैसे ही शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अपना अधिकार जमाया, वैसे ही उनके नाम और कर्म की सारे दक्षिण में धूम मच गई, यह खबर आग की तरह आगरा और दिल्ली तक जा पहुंची। अत्याचारी किस्म के यवन और उनके सहायक सभी शासक उनका नाम सुनकर ही मारे डर के बगलें झांकने लगे।

शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर के शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी न बना सके तो उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार किया। पता चलने पर शिवाजी आग बबूला हो गए। उन्होंने नीति और साहस का सहारा लेकर छापामारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद कराया। तब बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मुर्दा पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खां को भेजा। उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारना चाहा, पर समझदार शिवाजी के हाथ में छिपे बघनख का शिकार होकर वह स्वयं मारा गया। इससे उसकी सेनाएं अपने सेनापति को मरा पाकर वहां से दुम दबाकर भाग गईं।छत्रपति शिवाजी महाराज एक भारतीय शासक थे जिन्होंने मराठा साम्राज्य खड़ा किया था इसीलिए उन्हें एक अग्रगण्य वीर एवं अमर स्वतंत्रता-सेनानी स्वीकार किया जाता है। वीर शिवाजी राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक एवं परिचायक थे। इसी कारण निकट अतीत के राष्ट्रपुरुषों में महाराणा प्रताप के साथ-साथ इनकी भी गणना की जाती है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती महाराष्ट्र में वैसे तो 19 फरवरी को मनाई जाती है लेकिन कई संगठन शिवाजी का जन्मदिवस‍ हिन्दू कैलेंडर में आने वाली तिथि के अनुसार मनाते हैं। उनकी इस वीरता के कारण ही उन्हें एक आदर्श एवं महान राष्ट्रपुरुष के रूप में स्वीकारा जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज का 3 अप्रैल 1680 ई. में तीन सप्ताह की बीमारी के बाद रायगढ़ में स्वर्गवास हो गया।

उपसंहार : यूं तो शिवाजी पर मुस्लिम विरोधी होने का दोषारोपण किया जाता है, पर यह सत्य इसलिए नहीं कि क्योंकि उनकी सेना में तो अनेक मुस्लिम नायक एवं सेनानी थे तथा अनेक मुस्लिम सरदार और सूबेदारों जैसे लोग भी थे। वास्तव में शिवाजी का सारा संघर्ष उस कट्टरता और उद्दंडता के विरुद्ध था, जिसे औरंगजेब जैसे शासकों और उसकी छत्रछाया में पलने वाले लोगों ने अपना रखा था।

यदि मैं सीमान्त सिपाही होता

प्रस्तावना : भारत विशाल देश है। इसलिए इसका सीमांत भी अधिक विस्तृत है। इसके सीमांत के छोरों में बड़े-बड़े पहाड़, जंगल, मरुस्थल, नगर और सागर आदि हैं। चीन, पाकिस्ताने, बंगलादेश, नेपाल, बर्मा और तिब्बत आदि देशों की भूपटियाँ इसके सीमान्त छोरों पर पड़ती हैं।
सीमान्त की महत्ता : सुरक्षा की दृष्टि से सीमांत छोरों की अधिक महत्ता है; क्योंकि इन्हीं से परदेशियों का देश के भीतर प्रवेश करने का डर रहता है। इसके अलावा यदि सीमान्त के राष्ट्रों से किसी कारणवश शत्रुता हो जाए, तो ये हर प्रकार से चिन्ता का विषय बन जाते हैं, ऐसी स्थिति में शत्रु राष्ट्रों से अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सीमान्त की ओर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। वहाँ पर सुरक्षा सैनिक लगाने पड़ते हैं। हमारे सीमान्त छोर बड़े ही मुसीबत वाले हैं। चीन और पाकिस्तान आदि देश छेड़छाड़ करते रहते हैं। इसलिए हम इनकी ओर पड़ने वाली विस्तृत भूपट्टियों पर शस्त्रों से सज्जित सेना को सतर्क रखते हैं। इससे हमें रक्षा में बहुत साधन लगाने पड़ रहे हैं। हमारे नेता बराबर शांति और मैत्री की अपील करते हैं। शिमला-समझौते पर चलने के लिए कहते हैं; किन्तु पाकिस्तान ऐसा हठधर्मी राष्ट्र है कि उस पर कुछ प्रभाव पड़ता ही नहीं। यह दिनोंदिन शत्रुता की ओर अग्रसर हो रहा है। कोई नहीं जानता कि इसकी शत्रुता व हठधर्मी का कहाँ अंत होगा ?
देश का एक सीमांत छोर : हमारे देश का राजस्थान का सीमांत छोर बहुत ही पास पड़ता है। यह क्षेत्र मरुस्थली होते हुए भी पाकिस्तान की दुष्टता से आतंकित है। कभी-कभी पाकिस्तानी सैनिक हमारे गाँवों में घुस कर पशुओं को हाँक ले जाते हैं। कभी-कभी चोरी से फसलें भी काट ले जाते हैं। कभी-कभी छोटा-मोटा हमला भी कर देते हैं। फलतः गाँवों में आतंक फैला रहता है। हमारे ग्रामीण डरे से रहते हैं। हमारे सिपाही भी कंधों पर बंदूक रखे, रात-दिन सीमान्त के आसपास बसे हुए ग्रामों की रक्षा करते हैं। कभी-कभी इनकी शत्रु सैनिकों से मुठभेड़ भी हो जाती है।
सीमांत के सिपाही का फर्ज : सीमांत के सिपाही का फर्ज है। कि वह शत्रु के सैनिकों को छेड़छाड़ करने पर और सीमा का अतिक्रमण करने पर बंदी बनाए तथा आक्रमण करने की स्थिति में गोलियों से भून दे। यदि आवश्यकता पड़े, तो देश की रक्षार्थ अपनी आहुति दे दे।
मेरी आकांक्षा : मेरी चिर अभिलाषा है कि मेरी नियुक्ति सीमांत पर हो जाए। मैं जैसलमेर की सीमा पर अपने फर्ज को पूरा करना चाहता हूँ। मैं बहुत दिनों से सेना में रह कर देश की सेवा कर रहा हूँ। मैं सदैव अधिकारियों से प्रार्थना करता रहता हूँ कि मेरी नियुक्ति सीमांत पर कर दें। काश ! ऐसा हो जाए।
उपसंहार : मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सीमांत की धरती बलिदान के लिए पुकार रही है। यदि इच्छा पूर्ण हो जाए, तो मैं उन पाकिस्तानी दस्युओं को मजा चखाऊँ जो रात्रि में घुसकर भारतीय पशुओं को चुरा कर ले जाते हैं। देखें, वह दिन कब आता है ?

यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता

प्रस्तावना : शिक्षा ही राष्ट्र की बहुमुखी प्रगति का मूल स्रोत है। इसलिये हर राष्ट्र के कर्णधार शिक्षा को बहुत महत्त्व देते आए हैं। विदेशी शासकों ने हमारे राष्ट्र पर स्थायी रूप से शासन हेतु यहाँ की शिक्षा प्रणाली इस प्रकार की बनायी थी, जिससे हम परतन्त्रता की प्रवृत्ति को ही सदैव के लिए अंगीकार करें।
आधुनिक शिक्षा प्रणाली के दोष : हमारा राष्ट्र स्वतन्त्र हुआ। उसके शासन की बागडोर हमारे कर्णधारों ने सम्भाली । अनेक प्रकार से सुधार किए; पर शिक्षा प्रणाली वैसी की वैसी ही रही। उनी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अब इस स्वतन्त्र राष्ट्र को 54 व वर्ष चल रहा है  तंब भी शिक्षा में कोई विशेष परिवर्तन दृष्टिगत नहीं हो रहा है।
विद्यालय एवं महाविद्यालयों की संख्या अधिक अवश्य हुई; पर शिक्षा का स्तर ज्यों का त्यों ही रहा। देखा जाए तो माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा बिल्कुल ही अपूर्ण है। इस पर भी उसका व्यय दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। पाठ्य पुस्तकों का शीघ्रातिशीघ्र परिवर्तन और शुल्क की बढ़ोतरी शिक्षार्थियों की कमर तोड़ रही है। विद्यालयों में विषयों और पाठ्य पुस्तकों का इतना आधिक्य होता जा रहा है कि शिक्षार्थी रट-रटकर परेशान हो जाते हैं। इस प्रकार के अध्ययन से बुद्धि क्षीण व शिथिल रह जाती है। स्वतन्त्र भारत में शिक्षा की ऐसी स्थिति देखकर मेरा रोम-रोम क्षुब्ध हो उठता है। कभी-कभी सोच उठता हूँ कि इससे अच्छा प्रबन्ध, तो मैं ही शिक्षा मन्त्री होकर कर सकता। यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता तो भारतीय शिक्षा के लिये निम्नलिखित उपाय करता।
प्राथमिक शिक्षा : हमारे देश में ऐसे बच्चों की संख्या विशेष है जो निर्धनता के कारण विद्यालय का मुख नहीं देख पाते हैं। मैं उनकी परिस्थितियों का अवलोकन कर उन्हें पढ़ने के लिये अवश्य बाधित ही नहीं करता; अपितु प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर देता। हमारे देश में हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है, फिर वे ही निर्धनता के अभिशाप के कारण इससे वंचित क्यों रहें ? प्राथमिक विद्यालयों में शारीरिक दण्ड का निषेध करा देता और इस पर भी अध्यापक वर्ग दण्ड देता हुआ पाया जाता, तो उसे नौकरी से विमुक्त कर देता। प्राथमिक कथाओं में शिशुओं की अवस्था एवं बुद्धि का ध्यान रखकर वैसी ही सरल एवं शिक्षाप्रद पुस्तक रख पाता जिनसे कि बुद्धि का समुचित विकास होता । मान्टेसरी शिक्षा पद्धति पर विशेष बल देता और गाँधी जी द्वारा चालित बेसिक शिक्षा को ग्रामों में विशेष रूप से चलवाता। छोटे-छोटे विद्यालयों का वातावरण प्यार भरा होना चाहिए, जिनसे नन्हे-मुन्ने घर से अधिक इन्हें चाहने लगे।
माध्यमिक शिक्षा : हमारे देश की पुरातन सभ्यता एवं संस्कृति जगत प्रसिद्ध है। इसकी सुरक्षा के लिए माध्यमिक शिक्षा में लड़के और लड़कियों के लिए पृथक्-पृथक् विद्यालरा अनिवार्य हैं। यहाँ पर भी पुस्तकों की संख्या कम ही रखवाता। मेरी इच्छा है कि हमारे देश में ऐसी शिक्षा का प्रचलन रहे कि विद्यार्थी शारीरिक श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से न देखें । उन्हें शिक्षा के साथ हस्तकला भी सिखाई जाए ताकि बुद्धि के विकास के साथ-साथ शरीर भी उन्नत हो सके। अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करा देता और अंकगणित को भी ऐच्छिक विषय बनवा देता। संगीत, नृत्य, बुनाई, कताई, बढ़ईगीरी, पुस्तक बाँधना, छपाई, दर्जीगीरी, चित्रकला, रेडियो इन्जीनियरी, हस्तकला और अन्य शिल्पकला आदि अनेक प्रकार के विषयों पर बल देता। नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, इतिहास तथा संस्कृत आदि विषय भी इनके साथ रहते। विद्यार्थी इच्छानुसार विषयों का चयन करते। बालिकाओं की शिक्षा में विशेष रूप से भिन्नता होती। उनके विषय में कला और दस्तकारी तथा गृह विज्ञान पर विशेष जोर दिया जाता और उनके अन्य विषय ऐच्छिक होते।
प्रौढ़ शिक्षा : प्रौढ़ शिक्षा भी हमारे देश में बहुत आवश्यक है। इसकी महत्ता को समझते हुए मैं उसके लिए संध्याकालीन विद्यालयों की स्थापना कराता। उनके पठन-पाठन के लिए विशेष प्रकार की पुस्तकों का आयोजन करता। उनके लिए ऐसे पुस्तकालय खुलवाता जहाँ पर बैठकर प्रौढ़ जनता अपनी सुविधा से समाचारपत्र तथा मनोरंजन की पुस्तकों का अवलोकन कर सकती। उनके अध्ययन के लिए विशेष प्रकार से प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करवाता । इसके अतिरिक्त समस्त राज्यों की उच्च कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिये प्रौढ़ शिक्षा के शिक्षण का भी आयोजन करवाता ताकि उन्हें पता चल जाता कि प्रौढों को कैसे शिक्षा दी जाती है? अवकाश के समय में उन्हें सामूहिक रूप में देश के कोने-कोने के भिजवाने का आयोजन कराता ताकि वे प्रौढों को उनके समयानुकूल पढ़ाते।
उच्च शिक्षा : मेधावी शिक्षार्थियों के लिये उच्च शिक्षा अनिवार्य है। इसके साथ ही समूचे राष्ट्र में उद्योग धन्धे वाले उच्च महाविद्यालयों की प्रचुर संख्या में स्थापना करवाता ताकि शिक्षार्थियों को अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् किसी की दासता न करनी पड़े। वे स्वतन्त्र रूप से अपनी आजीविका के साधन जुटा सकें। वे अपनी-अपनी कला की प्रगति के साथ-साथ राष्ट्र को भी प्रगतिशील बना सकें। महिलाएँ भी उच्च शिक्षा में पुरुषों का साथ देतीं।
उपसंहार : यदि आज मैं शिक्षा मंत्री होता, तो देश में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च सभी तरह की शिक्षा पद्धतियों में वस्तुतः आमूलचूल परिवर्तन करता। मैं समझता हूँ कि उत्तम ढंग की शिक्षण पद्धति से ही राष्ट्र प्रगति के शिखर पर पहुँच सकता है।

शहीदी जोड़ मेला – फतहगढ़ साहिब

चण्डीगढ़-सरहिंद सड़क पर स्थित फतहगढ़ साहिब सिखों के दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबज़ादों की अद्वितीय शहीदी और बलिदान के लिए जगत प्रसिद्ध स्थान है। यहां साहिबजादा जोरावर सिंह तथा साहिबज़ादा फतहसिंह अपनी बाल्यावस्था में ही मुगलों के साथ टक्कर लेते हुए।   देश और कौम के लिए शहीद हो गए थे। उस समय इन साहिबज़ादों की आयु क्रमशः मात्र नौ वर्ष तथा सात वर्ष की थी।   उनकी महान् शहादतों की स्मृति में यहां प्रत्येक वर्ष पौष माह की एकादशी से चतुर्दशी तिथि तक (दिसम्बर माह में) शहीदी जोड़ मेला आयोजित किया जाता है।  जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं। इस पवित्र कस्बे का नाम फतहगढ़ साहिब, साहिबजादा फतहसिंह के नाम पर रखा गया है। फतहगढ़ साहिब सरहिंद से केवल पांच किलोमीटर तथा चण्डीगढ़ से 48 किलोमीटर दूर है।
सन् 1701 में मुगल सेना ने आनंदपुर साहिब की घेराबंदी कर ली थी। उस समय वहां स्वयं श्रीगुरु गोबिंद सिंह तथा उनका परिवार ठहरा हुआ।  था।जब मुगल सेना इस अविराम घेराबंदी से कोई लाभ न उठा सकी तो उन्होंने एक चाल चली मुगलों ने गुरुजी के समक्ष एक प्रस्ताव रखा कि यदि वह आनंदपुर साहिब का किला छोड़ दें तो वे घेराबंदी समाप्त करके अपनी सेना वापिस ले जाएंगे तथा उन पर आक्रमण नहीं करेंगे गुरुजी ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया किन्तु जब गुरुजी किले से बाहर निकल आए तब मुगलों की नीयत बदल गई तथा उन्होंने सरसा नदी, जो उस समय बाढ़ के कारण लबालब भरी हुई थी।  के किनारे गुरुजी पर हमला बोल दिया।
इस हमले में माता गुजरी जी (गुरु जी की माता) तथा छोटे साहिबज़ादे जोरावर सिंह तथा फ़तह सिंह गुरुजी से बिछुड़ गएमाता गुजरी जी तथा दोनों साहिबज़ादे ‘खेड़ीगांव’ में अपने एक नौकर गंगू के घर ठहर गए पर गंगू एक सच्चा अनुचर न निकला उसने इनाम के लालच में, तथा मुगलों के भय से मोरिण्डा के शासक के पास खबर भिजवा दीउन तीनों को कैद करके सरहिंद के गवर्नर के पास भेज दिया गया।
यह घटना 9 पौष 1761 की है। अगले दिन 10 पौष को दोनों बालकों को गवर्नर के सामने पेश किया गया।   ।, जिसने उन्हें लालच दिया कि यदि वे इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें तो उन्हें मुक्त कर दिया जाएगा, अन्यथा। उनकी हत्या कर दी जाएगी। जब साहिबजादों पर उसकी बात का कोई प्रभाव न पड़ा, तब इस निर्दयी ने उन दोनों को एक दीवार में जीवित चिनवा देने का आदेश दे दिया। जब यह दीवार साहिबज़ादों के गले तक पहुंची तो वे लगभग बेहोश हो चुके थे, तभी यह दीवार अचानक स्वयं ही चटककर धराशायी हो गई जब साहिबज़ादों को पुनः चेतना आई तो 12-13 पौष को उनको फिर वही इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए बाध्य किया गया। परन्तु उन वीर बालकों ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया परिणामस्वरूप दोनों साहिबज़ादों को शहीद कर दिया गया। जब उनकी दादी, माता गुजरी जी को इस हृदय विदारक घटना के विषय में पता चला तो उन्होंने भी तत्काल अपने प्राण त्याग दिए। इन महान् शहादतों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने यहां पर सर्वप्रथम 1888 में शहीदी जोड़ मेला आयोजित किया गया। जो कि अब प्रत्येक वर्ष बड़ी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है

हाथी के साथी

हो जाने की वजह बन जाती है।
सहायक सामग्रीसी.डीदृश्य – जानवरों की लाश पर भी अत्याचार पशुपक्षियों पर होनेवाले अत्याचार पर आधारित कोई रपट ,स्लाइड । वर्तमानकालिक क्रियाओं का चार्ट या स्लाइड
हाथियों का झुंड
रपट के प्रस्तुतीकरण के साथ कक्षा शुरू करें 
बंदरों का खौफ: छत से कूदी महिला
फरीदाबाद: 10 मई : बंदर के भय से सेक्टर-21 सी. में महिला ने दो मंजिले मकान से छलाँग लगा दी। जिससे उसके चेहरे व नाक की हड्डियाँ टूट गईं । गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना से सेक्टरवासी बंदरों से खौफजदा है। इससे पहले भी यहाँ अनेक हादसे हो चुके हैं। बंदरों के आतंक से निजाद पाने के लिए स्थानीय लोग शिकायत करेंगे। बंदरों को पकड़ने में निगम को नाकाम बताते हुए लोगों ने अब निगमायुक्त से बंदरों को मारने की अनुमति लेने का फैसला किया है ताकि इस समस्या से खुद निपटा जा सके। (खौफ: भय, निजाद: रक्षा)

 ? महिला ने दुमंजिले मकान से क्यों छलाँग लगा दी?
नगर में बंदरों का आतंक क्यों हो रहा है?
स्थानीय लोगों ने किसकी अनुमति लेने का प्रयास किया हैक्या यह उचित है?
उत्तर बताने का अवसर दें।

  • भारी मात्रा में जंगल की कटाई से जानवरों के बेघर हो जानाप्रकृति का असंतुलन होना आदि समस्याएँ आ जाती हैं।

    इस ओर संकेत करते हुए मिलानी की घटना हाथी के साथी” पढ़ें।
पहला अंतर – (यह एक….मर गया)
 वाचन प्रक्रिया ।
 छात्र सस्वर वाचन। वाचन का आकलन।
 ? जंगल के हाथी कैसे बेघर हो गए?
 ? किसी के बेघर हो जाने पर क्या होता है?

गाँव में हाथी का आक्रमण

 ? जंगली जानवरों के बेघर हो जाने से क्या होता है?
 ? “रौंद डालना”, “गुस्सा उतारना” आदि से आप ने क्या समझा है?
 उदा: हाथी ने महावत को रौंद डाला।
इस प्रकार के अन्य उदाहरण देकर अर्थ और प्रसंग समझा दें। ऊपर के प्रश्नों के उत्तर लिखें।
 ? पशु-पक्षियों को मारना कानूनी जुर्म है।
    क्या आप कानून से परिचित हैं? ( स्रोत पुस्तक के अधिनियम प्रस्तुत करें-स्लाइड शो ।)
 “ज़ोर से बिजली का झटका लगा और वह मर गया।” इसके समान कोई घटना मालूम है तो प्रस्तुत करें।

अगला अंतर – (खबर मिलते ही…..उसे सताना नहीं छोड़ा।)

हाथी के दाँत निकाले गए!

वाचन प्रक्रिया और उसका आकलन ।
? हाथी की लाश से गाँववालों का व्यवहार कैसा था?
? अपने साथी की लाश को हाथियों ने कैसे दफनाया?
? हाथी के मामले में नियमपालक उसके वंचक बन गए हैं। यह कहाँ तक सही है?
? अगर गाँववालों की जगह आप होते तो हाथी की लाश से कैसा व्यवहार करते?
हाथी के बेघर होने में मानव समाज का असंगतिपूर्ण विकास कहाँ तक जिम्मेदार है? टिप्पणी तैयार करें।
? मनुष्य जंगल की कटाई क्यों करते हैं?
? इससे जंगली जानवरों की कैसी हालत होती है?
? जंगली जानवरों के बेघर होने से मानव को क्या नुकसान होता है?
? इसपर मानव की जिम्मेदारी कहाँ तक है?

  • लेखन प्रक्रिया
रपट तैयार करें– (पाठ्यपुस्तक पृ. 21.)
छात्र चित्रवाचन करेंप्रसंग पहचानें।
चित्र में आप क्या देखते हैं?
इन जानवरों की हालत कैसी है?
क्या मानव का जानवरों से ऐसा व्यवहार उचित हैक्योंटिप्पणी तैयार करें।
पाठ्यपुस्तिका की मैंने क्या किया” शीर्षक पर दी गई जाँच सूची का इस्तेमाल करें।
भाषा की बात – विशेषण
प्रक्रिया
खंड का वाचन करें। (पाठ्यपुस्तक पृ. 21)
रेखांकित शब्द किसकी सूचना दे रहे हैं?
?यहाँ क्रिया का व्यापार किस काल में हो रहा है?
इन कालरूपों में क्या अंतर है?
किसकिस प्रसंगों में ऐसे क्रियारूपों का प्रयोग होता है?
वर्तमानकालिक क्रियाओं का चार्ट या स्लाइड दिखाएँ।
इस इकाई के पाठों से वर्तमानकालिक क्रियारूप छाँटें और उनका प्रयोग समझें।
भाषा की बात उद्घोषणा
उद्घोषणा का ध्यानपूर्वक वाचन करें।
उसका आशयग्रहण करें। संबोधनसमयस्थानतिथिकार्य आदि पर ध्यान रखें।
संक्षिप्त एवं स्पष्ट भाषा शैली से परिचय पाएँ।
उद्घोषणा प्रस्तुत करने का अवसर छात्रों को दें।
अध्यापक नमूना प्रस्तुत करें।
उद्घोषणा तैयार करें।
स्कूल के कई कार्यक्रमों से किसी एक का चयन करें।
कार्यक्रम पूर्ण रूप से तैयार करें।
समयस्थानतिथिकार्य जोड़ें।
संबोधन पर ध्यान दें।
संक्षिप्त एवं स्पष्ट भाषा शैली से उद्घोषणा तैयार करें।
भाषा की बात – विश्लेषण
दीप्ती की डायरी टी.बीपृ. 23 पढ़ें।
डायरी ध्यान से पढ़ेंरेखांकित क्रियारूपों पर ध्यान दें।
रेखांकित क्रियाएँ किस काल की सूचना देती हैं?
अन्य उदाहरण दें।
इकाई के पाठों से भविष्यत्कालीन क्रियारूप छाँटकर लिखें।
विश्लेषण– पोस्टर
पोस्टर का वाचन करें।
कार्यक्रम पहचानें।
कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए क्याक्या करेंगे?
इन बातों पर चर्चा करें।
प्रदर्शनी कैसे चलाएँगे?
किनकिन साहित्यकारों के चित्र इकट्ठा करेंगे?
कौनकौनसी प्रतियोगिताएँ चलाएँगे?
कवितापाठ का मूल्याँकन कौन करेंगे?
सार्वजनिक सम्मेलन में स्वागत भाषणअध्यक्षीय भाषणकृतज्ञता ज्ञापन आदि कौनकौन करेंगे?
उद्घाटन करने के लिए किसको आमंत्रित करेंगे?

पारिभाषिक शब्दावली टी.बीपृ. 25.
पारिभाषिक शब्दों से परिचय पाएँ।
ये पारिभाषिक शब्द किस विभाग से संबंधित हैं?
संचार संबंधी अन्य दो पारिभाषिक शब्द लिखें।

अतिरिक्त कार्य
पत्नी POSTMAN आया है।
डाकियाएक REGISTERED LETTER है।
पतिकहाँ से है?
डाकियातिरुवनंतपुरम से। यहाँ हस्ताक्षर कीजिए।
पतिइनमें नया STAMP लगाया गया है।
पत्नीएक INLAND LETTER CARD मिलेगा जी?
डाकियानहीं जीडाकघर में जाइए।

हमने क्या किया?
  • रपट द्वारा प्रवेश प्रक्रिया चलाई
  • समस्या निर्धारित की
  • अंकित वाचन कराया
  • टिप्पणी तैयार कराई
  • रपट लिखवाई
  • वर्तमानकालिक क्रियारूपों की अवधारणा बनाई
  • उद्घोषणा लिखवाई
  • पोस्टर तैयार कराया
  • पारिभाषिक शब्दों का परिचय दिया

एकल अभिनय अथवा एक-पात्रीय नाटक

रंगमंच अभिनेता का माध्यम है, किन्तु दुर्भाग्यवश रंगमंच में अभिनेता की अलग पहचान नहीं बन पायी | इस पहचान के बिना रंगमंचकी पहचान भी संभव नहीं है | ‘एकल अभिनय’ पूरी तरह अभिनेता का रंगमंच है | यह एक अभिनेता को उसके द्वारा अर्जित अनुभव, कार्यदक्षता और कल्पनाशीलता के प्रदर्शन का स्वतंत्र अवसर उपलब्ध करता है और उसे उसकी जादुई शक्ति के साथ रंगमंच पर प्रतिष्ठापित भी करता है | एकल नाट्य (या एकल अभिनय) किसी भी स्तर पर सामूहिकता का निषेध नहीं करता, बल्कि यह सामुदायिक जीवन का अंग है, क्योंकि यह व्यापक दर्शक समुदाय को सम्बोधित होता है |
ऊपरी तौर पर ‘एकल अभिनय’ भले ही सरल लगता हो; किन्तु वास्तव में, यह ‘समूह-अभिनय’ से ज्यादा जटिल है और कल्पनाशीलता तथा नाट्य-कौशल में सिद्धहस्त अभिनेता की माँग करता है | समूह अभिनय में, जहाँ अनेक अभिनेताओं की क्रिया-प्रतिक्रिया के संघर्ष से नाट्य प्रभाव की सृष्टि होती है; वहीं एकल अभिनय में, अभिनेता के भीतर यह नाट्य-व्यापार घटित होता है, जो उसकी शारीरिक क्रिया द्वारा मंच पर साकार होता है | एकल अभिनय,
मूल-धारा के समूह अभिनय के विरुद्ध नहीं है; बल्कि यह उसे सम्पुष्ट करता है, बल प्रदान करता है; सबसे अधिक यह रंगमंच की अनिवार्य इकाई अभिनेता को विशेष पहचान देता है, उसके प्रति दर्शकों की आस्था को शक्ति प्रदान करता है | इसप्रकार यह रंगमंच के नायक ‘अभिनेता’ को पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है | बांग्ला रंगमंच में, एकल अभिनय की परम्परा काफी वर्षों से है और तृप्ति मित्र-साँवली मित्र के प्रयोग का भारतीय रंगमंच में उच्च-मूल्यांकन किया जाता है | बाऊल एक तरह का एकल नाट्य ही है | महान बांग्ला अभिनेता शांति गोपाल द्वारा अंतर्राष्ट्रीय-स्तर पर चर्चित ‘लेनिन’, ‘कार्लमार्क्स’, ‘सुभाषचंद्र’, ‘राममोहन रॉय’ आदि पर मंचित जात्रा; एक हद तक, उनका एकल अभिनय ही था | इधर कुछ वर्षों से; हिन्दी, कन्नड़, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओं में एकल अभिनय के अनेक अभिनव प्रयोग किये गए हैं | पटना में ‘नटमंडप’ द्वारा इस सिलसिले को पिछले कुछ वर्षों से गंभीरता से आगे बढाया गया है | बिहार के अन्य कतिपय रंगकर्मियों द्वारा भी एकल अभिनय के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये गए हैं | रंगमंच के लिए किसी नाट्य प्रयोग की प्रासंगिकता, उसके द्वारा संपूर्ण नाट्य प्रभाव की सृष्टि और नाट्यकला का आस्वाद करा पाने की उसकी क्षमता में अन्तर्निहित है | इसलिए, एकल अभिनय एक सामान्य नाट्य मंचन जैसा ही है, जिसमें एक-अकेले अभिनेता के अतिरिक्त, किसी दूसरे अभिनेता की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती और इसकी सफलता भी इसी में है कि दर्शक को किसी भी क्षण किसी अन्य अभिनेता के न होने का अहसास न हो | एकल अभिनय को, रंगमंच के एक ‘फॉर्म’ अथवा शैली के रूप में दर्शकों की स्वीकृति भी मिल रही है और यह रंगमंच के हित में है|

नोम चोमस्की एक अमेरिकी भाषाविद्, दार्शनिक, संज्ञानात्मक वैज्ञानिक, तार्किक, राजनीतिक आलोचक और कार्यकर्ता है

नोम चोमस्की 7 दिसंबर 1928 को फिलाडेल्फिया में पैदा हुआ था और कई वर्षों के लिए भाषा विज्ञान के एक प्रोफेसर की गई है. उन्होंने पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय से 1955 में एक डॉक्टर की डिग्री को सुरक्षित करने में सक्षम था. यह वह भाषा विज्ञान में majored कि कि विश्वविद्यालय में किया गया.

चोमस्की पहले भी भाषा विज्ञान के एक विद्वान था, जो उसकी हिब्रू पिता द्वारा भाषा के क्षेत्र के लिए शुरू की गई थी.

उन्होंने यह भी एक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, संज्ञानात्मक वैज्ञानिक, दार्शनिक और कई पुस्तकों के सम्मानित लेखक माना जाता है. यह लोगों को राजनीतिक क्षेत्र में एक उदारवादी समाजवादी के रूप में उसे वर्णन करने के लिए शुरू किया है कि 1960 के आसपास थी.

उन्होंने कहा कि भाषाई दुनिया पर एक बड़ा प्रभाव है और वह लोगों को एक नई भाषा सीखने के लिए पर जोर डालने में निभाई भूमिका होने के लिए, तथापि, जमा किया गया है.

वे वृद्धि के रूप में अच्छी तरह से चोमस्की पदानुक्रम के रूप में जाना जाता है जो उनके सिद्धांत, और अधिक शक्ति के साथ अलग अलग वर्गों में निर्धारित व्याकरण बिताते हैं. उत्पादक व्याकरण और सार्वभौमिक व्याकरण का उनका विचार भी चोम्स्की और अन्य भाषाविद् के बीच विभाजनकारी का हिस्सा था.

उनका काम भी ऐसे इम्यूनोलॉजी, विकासवादी मनोविज्ञान, और कृत्रिम बुद्धि के अनुसंधान के साथ ही कम्प्यूटरीकृत है कि भाषा के अनुवाद के रूप में विशेषज्ञता के अन्य क्षेत्रों को प्रभावित किया है.

चोमस्की अपने अन्य समकक्षों की तुलना में एक अलग तरह के प्रकाश में भाषा के अध्ययन का दरवाजा खटखटाया. उनके सार्वभौमिक व्याकरण सिद्धांत है कि सभी मनुष्यों शेयर भाषाई नियमों की एक आंतरिक सेट है कि प्राथमिक सिद्धांत पर बल दिया. यह वह एक भाषा सीखने की शुरुआत चरणों बुलाया.

यह कुछ विशिष्ट नियम, दी जब किसी भी भाषा के उत्पादक व्याकरण, उचित व्याकरण की दृष्टि से एक वाक्य फार्म का गठबंधन होगा कि शब्दों की गणना करेगा कि तथ्य यह है कि पहचान की Naom चोमस्की था. सही ढंग से संपर्क किया जब वे एक ही नियम वाक्य की आकारिकी पर जोर देना होगा.

चोमस्की के उत्पादक व्याकरण के इस सिद्धांत के पहले संस्करण परिवर्तनकारी व्याकरण था. बेशक, उत्पादक व्याकरण संज्ञानात्मक व्याकरण और कार्यात्मक सिद्धांतों के समर्थकों से कुछ आलोचनाओं प्राप्त करता है.

समापन

चोमस्की मन दूसरों को यह ऋण देने से भाषा विज्ञान के साथ क्या करना था कि लगा. वह एक भाषाई वातावरण में रखा जाता है जब एक बच्चे का उदाहरण देकर प्रेफसस इस बोली जाती हैं कि शब्दों के लिए अनुकूल करने के लिए एक सहज क्षमता है करने में सक्षम है.

ब्लॉग में contact पेज कैसे जोडे

हर Blog और Website के लिए Contact, About, Privacy policy Pages बहुत important होते हैं ।
इनकी मदद से Audience आपसे अच्छी तरह से connect रहती है और आपके बारे में और भी ज्यादा जानकारी प्राप्त करती है ।
अगर कोई व्यक्ति आपसे contact करना चाहता है तो वो आपकी site पर contact Us page की मदद से आपसे संपर्क कर सकता है ।
About us page की help से readers को post Author और Admin के बारे में अधिक जानने में मदद मिलती है ।
इस तरह के pages हर website के जरूरी है
अगर आप अपनी site को professional look देना चाहते हो तो आपको site पर इस तरह के pages जरूर add करने होगें ।
Google भी इन pages को पसंद करता है इससे site trustable हो जाती है ।
Contact Page हर Website के लिए important होता है इससे site के visitors आपसे contact कर सकते हैं, कोई कंपनी advertising के लिए आपसे संपर्क करना सकती है ।
यह एक Brand के लिए बहुत जरूरी है ।
अगर आप Contact page पर ज्यादा जानकरी देना नहीं चाहते तो आप एक Callable Contact page बना सकते हैं ।


Callable Link क्या है ?

Normally जब हम किसी web url पर click करते है तो किसी site का कोई पेज open है ।
लेकिन जब हम किसी callable link पर क्लिक करते हैं तो Direct Email Send, Call या Massage Editor Open हो जाता है
जिसमें Receiver person का email या phone पहले से लिखा रहता है हमें केवल वहां अपना message type करके send पर क्लिक करना होता है ।
Example :- Click Here

आप अपने blog में भी इस तरह का Page Add कर सकते हैं इससे जब भी कोई व्यक्ति इस पर क्लिक करेगा वह direct email send पर पहुंच जाएगा ।
अपनी इस पोस्ट में मैं आपको बताउंगा कि blogspot में Callable contact page कैसे add करें ।

माय आईडिया अप्प डाउनलोड फ्री डेटा ऑफर

आजकल लोगों Internet pack हर स्मार्टफोन यूजर्स की जरूरत बन चुका है क्योंकि इंटरनेट से हम काफी काम आसानी से कर सकते हैं ।
आज मैं आपको एक ऐसी ट्रिक के बारे में बताने वाला हूं जिससे आप फ्री में 512 MB 2G/3G/4G data प्राप्त कर सकते हैं ये ट्रिक केवल आईडिया यूजर्स के लिए है ।
Free Idea 512 Mb Data trick
Free 512 MB Idea Internet कैसे प्राप्त करें 100% Working Trick

आईडिया कंपनी ने अपने ग्राहकों की सुविधा के लिए एक Mobile App बनाया है – My Idea App
इस app से आप अपने Idea account की पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, आप अपने talktime, Data pack, VAS, Offers आदि की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं आप इससे ऑनलाइन recharge भी कर सकते है इसमे आपको की तरह के आकर्षक ऑफर्स भी मिलेगे ।


Idea अपने users को पहली बार इस App को download करने पर Free 512 MB 2G/3G/4G data दे रही है ।
Free 512 MB idea data प्राप्त करने के लिए नीचे दिए simple steps follow करें –
Step.1 – सबसे पहले नीचे क्लिक करके My Idea app Download और Install करें ।



Step.2 – अब My Idea app open करें ।
Step.3 – अब इसमें अपना Idea no. डालें ।
Step.4 – अब आपके नंबर पर एक OTP आएगा वैसे तो ये Automatic Verify हो जाएगा लेकिन अगर ऐसा न हो तो आप इसे idea app में enter करें और Next पर क्लिक करें ।
अब आपका Idea Account open हो जाएगा और आपके नंबर पर 512 Mb 2G/3G/4G data प्राप्त हो जाएगा जिसकी Validity 5 Days होगी ।
आप My Idea App पर अपने अन्य नंबरों से भी sigh up करके उन पर भी Free 512 Mb data प्राप्त कर सकते हैं 
इस एप्प की मदद से आप अपने Account information, Recharge history, Recharge, Data packs, offers etc. की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ।
अगर आपको यह जानकारी पसंद आयी तो इसे social media पर भी शेयर करें 

साइट का रेफरल लिंक कैसे बनाए

आजकल इन्टरनेट पर कई तरह के Refer and earn और affiliate programs चल रहे है हर बेवसाइट एडमिन चाहता है कि उसकी साइट पर अधिक से अधिक यूजर्स जुड़े ।
इसके लिए कई लोग अपनी साइट पर रेफर एंड अर्न सर्विस चालू कर रहे हैं ताकि उनकी site अधिक famous हो सके ।
आप भी अपनी site के लिए refer and earn program start कर सकते हैं इसमे अगर कोई व्यक्ति अपने referral link को शेयर करे और इससे जो traffic आपको प्राप्त होगा उसके बदले आपको व्यक्ति को pay करना होगा ।
इससे आपकी site अधिक famous होगी और traffic, earning भी increase होगी ।
Refer and earn start करने के लिए आपको जरूरत होगी site के referral links की, जिसका उपयोग प्रोग्राम यूजर्स कर सके और आप traffic को track कर सकें ।
आज मैं आपको एक ऐसी सिम्पल ट्रिक बताने वाला हूं जिससे आप अपनी साइट के free unlimited referral links create कर पाएंगे ।

व्हाट्सएप्प डाउनलोड और इंस्टाॅल कैसे करे ?

Internet पर सबसे अधिक use होने वाली sites मे Social media sites का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है ।
दुनियाभर मे करोड़ो लोग अपने रोजमर्रा का काफी समय Social media पर व्यतीत करते हैं ।
Social media की list में WhatsApp बहुत popular social media मे से एक है WhatsApp पर लगभग 1 अरब यूजर्स मौजूद है और इनकी संख्या तेजी से बढती ही जा रही है ।
यह अपने end to end encryption की security के कारण बहुत ही popular हो चुका है ।
कुछ समय पहले फेसबुक ने इसे 19 बिलियन डॉलर मे खरीद लिया है 
आज अपनी इस पोस्ट मे मैं आपको बताउंगा कि व्हाट्सएप का नया वर्जन कैसे डाउनलोड करें और इस पर अकाउंट कैसे बनायें ?

WhatsApp kaiser banaye


Latest WhatsApp version kaise download kare ?

WhatsApp पर नए नए फीचर्स लांच होते रहते है जिनका उपयोग करने के लिए हमे WhatsApp का Latest version download करना होता है ।
नया वर्जन डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए स्टेप्स फाॅलो करें –
Step.1 – अपने मोबाइल में Google play store open करें ।
अगर आपने यहा login नही किया है तो सबसे पहले अपने Gmail id से login करें ।
Step.2 – अब यहां WhatsApp को search करें ।
Step.3 – इसके बाद आप install पर click करके WhatsApp install कर सकते है ।
अगर आपके मोबाइल मे पहले से यह डाउनलोड है तो यहा open या update का option दिखाई देगा ।
अगर WhatsApp का new version officially launch हो गया होगा तो आपको यहां Update का option दिखेगा ।
इसपर क्लिक करके आप अपना WhatsApp अपडेट कर सकते हैं ।
Step.3 – अगर आपने WhatsApp update किया है तो आपको दोबारा account बनाने की कोई जरूरत नही ।
लेकिन अगर आपने इसे पहली बार install किया है तो आपको इस पर account बनाना होगा ।

इसके लिए WhatsApp open करें ।
Step.4 – अब Agree and Continue पर क्लिक करें ।
Step.5 – अब अपनी country select करें और अपना Mobile No. डालें फिर Next पर क्लिक करें ।
Step.6 – अब आपके No. पर एक OTP आएगा वैसे ये Automatically Enter हो जाता है लेकिन अगर न हो तो आप ये 6 digit का OTP enter करें ।
Step.7 – अब अपना Profile Photo Select करें और Name डालें ।
Step.8 – अब बैकअप का option आएगा
अगर आप अपने WhatsApp chats का back अपनी Google drive में सेव करना चाहते हैं तो Week, Month या year में से चुने ।
और अगर आप बैकअप लेना नही चाहते तो NEVER चुनें ।
अब आपका WhatsApp Ready हो चुका है आपके मोबाइल Contact no. में से जिन नंबरों पर WhatsApp ID बनी होगी वे show होने लगेंगे ।
आप उनपर क्लिक करके उन्हे मैसेज भेज सकते है और चैटिंग कर सकते हैं ।
अगर आप किसी व्यक्ति को अपने WhatsApp पर जोडना चाहते हैं तो आपको बस उनका WhatsApp no. अपने मोबाइल में सेव करना होगा और WhatsApp को refresh करना होगा ।
इस तरह आप WhatsApp पर अपने family members, Friends और Relatives से जुड़ सकते हैं ।

रिसेट कैसे करें ?

आजकल android mobiles का use बहुत बढ गया है करोड़ो लोगो इसका उपयोग कर रहे हैं और लगातार यह संख्या बढती ही जा रही है ।
कई बार हम मोबाइल में कई तरह के features और app install कर लेते हैं जिससे Phone के system पर bad effect पड़ता है और मोबाइल की स्पीड slow हो जाती है और ये hang भी होने लगता है ।
फिर हम इसका उपाय ढूंढने लगते हैं कि मोबाइल को सही स्थिति में कैसे लाएं ।
इसका उपाय है कि मोबाइल के unusable apps को uninstall कर दिया जाए ।
लेकिन इसके बाद भी कुछ वायरस और फाइल मोबाइल मे रह जाते है ।
जिससे मोबाइल पूरी तरह से ठीक नही होता और कुछ प्रोब्लम रह जाती है ।
ऐसे में केवल एक रास्ता बचता है कि मोबाइल को रिसेट कर दिया जाए ।
यहां मैं आपको बताउंगा कि Android Mobile को कैसे Reset/Format करते हैं ?

Mobile Reset kaise kare


Android phone को Reset करने से कई फायदे होते हैं –
● मोबाइल पूरी तरह से फ्रेश हो जाएगा ।
● मोबाइल बिल्कुल अपनी नयी स्थिति में आ जाएगा ।
● मोबाइल से Virus हट जाएगा ।
● मोबाइल Hang नहीं होगा ।
इसके अलावा अगर आप मोबाइल किसी को बेच रहे हैं तो अपना मोबाइल Reset करने के बाद ही उसे बेचे ।
क्योंकि इसमे आपका जरूरी डाटा सेव होता है जिसका उपयोग करके कोई भी आपकी जानकारी का गलत उपयोग कर सकता है ।
इसलिए इसे बेचने से पहले अपना डाटा बेकअप लेकर किसी अन्य जगह सेव कर लें और इसे mobile Format कर दें जिससे मोबाइल से सारा डाटा delete हो जाए ।
(मोबाइल Reset करने पर आपका पूरा डाटा delete हो जाता है जैसे – Mobile memory, Music, Photos, Apps, Settings, No. & Messeges
इसलिए अपने जरूरी data का backup ले लें)
अपने मोबाइल को Reset करने के लिए नीचे दिए simple steps follow करें –
Step.1 – सबसे पहले मोबाइल ऑन करें और Settings में जाएं ।
Step.2 – इसके बाद मोबाइल Backup and Reset में जाएं ।
Step.3 – अब यहां Automatic Backup को Tick ✔ करें और Factory Data Reset पर click करें ।
Step.4 – अब Reset Device पर click करें दें ।
इसके बाद आपका Mobile Reset (Format) हो जाएगा ।
Reset होने के बाद मोबाइल बिल्कुल नयी स्थिति में आ जाएगा, पूरी तरह fresh
अब आप अपने मोबाइल को आसानी से Use कर सकते हैं और अब इसमे Hang होने की problem भी नहीं आयेगी ।

आईडिया सिम को आधार से वेरिफाई कैसे करें (Step by Step)

मोबाइल नंबर को अपने आधार कार्ड से लिंक कराना बहुत ही जरूरी हो गया है ।
अगर आप 31 मार्च 2018 से पहले अपना नंबर आधार कार्ड से लिंक और वेरिफिकेशन नही करवाते हैं तो आपका मोबाइल नंबर बंद हो जाएगा ।
इसलिए अगर आप अपने नंबर को चालू रखना चाहते हैं तो जल्दी से जल्दी अपना सिम को आधार कार्ड से वेरिफाई और लिंक करवाये ।


यहां मैं आपको बताउंगा कि आईडिया मोबाइल नंबर को आधार कार्ड से लिंक कैसे करें ?

Verify SIM with Aadhaar


आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि मोबाइल को आधार से जोड़ने से क्या होगा ?
सरकार ने यह नियम सोच समझ के निकाला है इसे करने से कई फायदे होगें –
● कोई भी व्यक्ति आपकी जानकारी का गलत उपयोग करके सिम नहीं निकाल पाएगा क्योंकि इसमें आपका Biometric Finger लगेगा ।
● अगर कोई गलत दस्तावेज का उपयोग कर फर्जी मोबाइल नंबर उपयोग कर रहा है तो 31 मार्च के बाद वह सिम बंद हो जाएगी ।
● इससे फर्जी नंबर से होने वाले गलत उपयोग पर रोक लगेगी ।
इसलिए मोबाइल नंबर को वेरिफाई कराना बहुत जरूरी है ।


Idea Mobile Number Aadhaar Card se kaise link kare ?

यहाँ मैं आपको आधार वेरिफाई कराने के 2 तरीके बताउंगा ।
(1) Method :-

आवश्यक चीजें –
● आधार कार्ड
● वह नंबर जिसे वेरिफाई करना है ।
● वह मोबाइल नंबर जो आधार कार्ड बनाते समय लिंक हुआ था और जो आधार में Registered है ।
Steps –
● सबसे पहले जिस मोबाइल नंबर को वेरिफाई करना है उससे 14546 पर काॅल करें ।
● अब अपनी भाषा चुनें ।
● अब अपना 12 अंक का आधार नंबर डालें ।
● अब जो नंबर आपके आधार को बनाते समय लिंक हुआ था उस पर OTP प्राप्त होगा ।
● यह ओटीपी डालें ।
[ काॅल के समय पुष्टि करने के लिए 1 दबाएं ]
इसके बाद 24 घंटे बाद आपके नंबर पर एक Conformation SMS आएगा जिसका reply आपको 3 घंटे के अंदर करना होगा ।
Reply देकर Verification Confirm करने के लिए 12345 पर RV Y भेजें ।
अब आपका मोबाइल नंबर आधार कार्ड से Verify हो जाएगा ।
(2) Method :-
जरूरी चीजें –
● आधार कार्ड
● मोबाइल नंबर जिसे वेरिफाई करना है ।
● इसके अलावा वह व्यक्ति जिसका आधार कार्ड है ।

कुमार गंधर्व द्वारा लिखित भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर

प्रश्न – लता जी की गायकी की क्या विशेषताएं है ?
उत्तर –
1 सुरीला पन
2 कोमलता और निर्मलता
3 मधुरता का संगम और शास्त्र शुद्धता
जो लता जी के  स्वर में पवित्रता तल्लीनता है किसी भी अन्य में ऐसी तल्लीनता नहीं है |
प्रश्न – कुमार गंधर्व ने लता को बेजोड़ गायिका क्यों कहा ?
उत्तर –
कुमार गंधर्व के अनुसार लता मंगेशकर भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ है | उनके मुकाबले खड़ी होने
वाली एक भी गायिका नजर नहीं आती उनसे पहले नूरजहां का सिक्का चलता था | परंतु लता ने
उन्हें बहुत पीछे छोड़ दिया | पिछले 50 वर्षों से वे गायिका के क्षेत्र में पूरी तरह छाई हुई है यद्यपि
इस लंबी अवधि में अनेक गायिकाएं उभरी किंतु लता का स्थान सदैव उनके ऊपर बना रहा 50
साल के बाद भी आज उनका स्वर पहले की तरह कोमल सुरीला मनभावन बना हुआ है | लता
बेजोड़ इसलिए भी है कि उनके गान में गानपन  पूरी तरह मौजूद है | शास्त्रीय संगीत से परिचित
होती हुई भी सुगम संगीत में गाती हैं | अपनेतथा अपने सुरीले पन और गूंज से सभी श्रोताओं को
सीधे प्रभावित करती हैं उनके गानों को सुनकर देश के आम गायकों और श्रोताओं की संगीत
अभिरुचि परिष्कृत हुई है |
प्रश्न – नाद में उच्चारण का क्या अर्थ है यह लता के गायन में किस प्रकार प्रकट हुआ है ?
उत्तर –
नाद में उपचार का अर्थ है उच्चारण में गूंज का होना |  लता के गायन में यह विशेषता है कि
उनकी एक शब्द की गूंज दूसरे शब्द की गूंज में इस तरह मिल जाती है कि दोनों एक दूसरे
में लीन हो जाते हैं | यह विशेषता केवल लता के स्वर में ही है |


प्रश्न – शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में क्या अंतर है ?
उत्तर –
शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत दोनों का लक्ष्य आनंद प्रदान करना है |
फिर भी दोनों में बहुत अंतर है शास्त्रीय संगीत मे ताल का पूरा ध्यान रखा जाता है,
जबकि चित्रपट संगीत में आधे ताल का उपयोग होता है चित्रपट संगीत में गीत और
आघात को ज्यादा महत्व दिया जाता है | सुलभता तथा लोच को आद्र स्थान सुलभता
तथा लोच को अग्र स्थान दिया जाता है उसे शास्त्रीय संगीत की भी उत्तम जानकारी होना
आवश्यक है क्योंकि 3:30 मिनट के गाए हुए चित्रपट संगीत और खानदानी शास्त्रीय
संगीत की तीन-साढ़े 3 घंटे की महफिल का कलात्मक आनंद मूल्य एक ही है |

प्रश्न – कुमार गंधर्व ने लता मंगेशकर को बेजोड़ गायिका माना है क्यों ?
उत्तर –
क्योंकि लता मंगेशकर के मुकाबले में कोई भी गायिका नहीं है | नूरजहां अपने समय
की प्रसिद्ध चित्रपट संगीत की गायिका थी परंतु  लता की गायकी ने उसे पीछे छोड़
दिया लता जी पिछले 50 वर्षों से एक छत्र राज कायम किया हुआ इतने लंबे समय
के बावजूद उनके स्वर पहले की तरह कोमल सुरीला में मनभावन है |
इसके कई कारण है –
i) गायन में जो गान पन है वह किसी गायिका में नहीं मिलता |
ii) उच्चारण में शुद्धता वह नाद का संगम और भावों में जो निर्मलता
है अन्य गायिकाओं में नहीं है |
iii) एक तो लता जी की सुरीली आवाज ईश्वर की देन थी ऊपर से उन्होंने मेहनत
से उसे और निखार दिया |
iv) लता जी शास्त्रीय संगीत से परिचित है परंतु फिर भी सुगम संगीत में गाती
थी उनके गानों को सुनकर देश-विदेश में लोग दीवाने होते हैं उन्होंने आम व्यक्ति
की संगीत के प्रति अभिरुचि को परिष्कृत किया

– कुंई निर्माण से संबंधित निम्न शब्दों के बारे में जानकारी दें?

i) पालर पानी
यह पानी का एक रुप है यह पानी सीधे बरसात से मिलता है यह पानी नदियों तालाबों
कृत्रिम जिलों बड़े-बड़े गड्ढों में रुक जाता है | इस पानी को प्रयोग में नहीं लाया जा
सकता इस पानी का वाष्पीकरण जल्दी होता है काफी पानी जमीन के अंदर चला जाता
है और अधिकांश पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है |

ii) पाताल पानी
जो पानी भूमि में जाकर  भूजल में मिल जाता है उसे पताल पानी कहते हैं | इसे को पंप
ट्यूबवेलों आदि के द्वारा निकाला जाता है |

iii) रेजानी पानी
यह पानी धरातल से नीचे उतरता है परंतु धरातल में नहीं मिलता है | यह पार्लर पानी
और पताल पानी के बीच का है वर्षा की मात्रा नापने में इंच या सेंटीमीटर नहीं बल्कि
रेजा शब्द का उपयोग होता है | रेज का माप धरातल में समाई वर्षा को ना पता है |
रेजानी पानी खड़िया पट्टी के कारण पताली पानी से अलग बना रहता है तथा इसे कुइयो
के माध्यम से इकट्ठा किया जाता है |

निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुइयो पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है लेखक ने ऐसा क्यों कहा ?

राजस्थान में खड़िया पत्थर की पट्टी पर ही कुइयो  का निर्माण किया जाता है | कुंई का
निर्माण गांव समाज की सार्वजनिक जमीन पर होता है | परंतु उसे बनाने और उसमें पानी
लाने का हक उसका अपना हक है | सार्वजनिक जमीन पर बरसने वाला पानी ही बाद में
वर्ष भर नमी की तरह सुरक्षित रहता है | इसी नमी से साल भर कुइयो में पानी भरता है
नमी की मात्रा वहां हो चुकी वर्षा से तय हो जाती है |

अतः उस क्षेत्र में हर  नई कुंई का अर्थ है पहले से तय नमी का बंटवारा इस कारण निजी
होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र से में बनी कुइयो पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है |
यदि वह अंकुश ना हो तो लोग घर घर कई-कई कुईया बना ले और सब को पानी नहीं
मिलेगा बहुत जरूरत पड़ने पर समाज अपनी स्वीकृति देता है |


चेजारा के साथ गांव – समाज के व्यवहार मैं पहले की तुलना में आ ज क्या फर्क है पाठ के आधार पर बताइए ?

चेजारा अर्थात चिनाई करने वाला | कुंई  के निर्माण में यह लोग दक्ष होते हैं | इनका उस
समय विशेष ध्यान रखा जाता था | कुंई खोदने पर इन विदाई के समय तरह-तरह की भेंट
दी जाती थी इसके बाद भी उनका संबंध गांव से जुड़ा रहता था और पूरा वर्ष उन को
सम्मानित किया जाता था | फसल की कटाई के समय इन्हें अलग से फसल का हिस्सा
दिया जाता था तीज त्यौहार विवाह जैसे अवसरों पर उनका सम्मान किया जाता था |
इस प्रकार इनको भीग्रामीण समाज में सम्मान के साथ जीने का अवसर मिलता था और
उनके कार्य को सराहा भी जाता था | वर्तमान समय में इनका सम्मान उतना नहीं रहा जितना
कि पहले था | उनको काम की मजदूरी देकर संबंध खत्म कर दिए जाते हैं | अब सिर्फ
मजदूरी देकर काम करवा लिया जाता है अब स्थिति पूर्णता बदल गई है |

राजस्थान में कुंई किसे कहते हैं ? इसकी गहराई और व्यास तथा सामान्य कुओं की गहराई और व्यास में क्या अंतर है ?

राजस्थान में   रेत बहुत होती है | वर्षा का पानी रेत में समा जाता है जिस से नीचे की सतह
पर नमी फैल जाती है | यह नमी खड़िया मिट्टी की परत के ऊपर तक रहती है | इस नमी
क्यों पानी के रूप में बदलने के लिए 4 या 5 हाथ के व्यास की जगह को 30 से 60 हाथ
की गहराई तक खोदा जाता है | खुदाई के साथ-साथ चिनाई भी की जाती है | इस चिनाई
के बाद खड़िया की पट्टी पर रिस रिस कर कर पानी  इकट्ठा हो जाता है | इसी तंग गहरी
जगह को कई कहा जाता है यह कुएं का स्त्रीलिंग रूप है | यह कुएं से केवल व्यास में छोटी
होती है परंतु गहराई में लगभग समान ही होती है | आम कुए का व्यास 15 से 20 साल का
होता है हाथ का होता है , परंतु कुंई का व्यास चार या पांच हाथ का होता है | क्षेत्र के
आधार पर कुइयां की गहराई में अंतर आ जाता है |

आरोह प्रथम अध्याय गद्य भाग

प्रश्न – कहानी का कौन सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?
उत्तर –
कहानी का नायक वंशीधर हमें सर्वाधिक प्रभावित करता है | वह इमानदार कर्तव्यपरायण
धर्मनिष्ठ व्यक्ति है | सके पिता उसे बेईमानी का पाठ पढ़ाते हैं घर की दयनीय दशा का
हवाला भी देते हैं परंतु वह इन सब के विपरीत ईमानदारी का व्यवहार करता है वह स्वाभिमानी
है | अदालत में उसके खिलाफ गलत फैसला लिया गया परंतु उसने स्वाभिमान नहीं खोया
उसकी नौकरी भी छीन ली गई परंतु उसकी चारित्रिक दृढ़ता हमें प्रभावित करती हैं |
आखिरकार पंडित अलोपीदीन भी उसकी इस दृढ़ता पर मुग्ध हो जाते हैं | उसे वह अपनी
सारी जायदाद का आजीवन मैनेजर बना देते हैं |


कहानी का दूसरा पात्र अलोपीदीन भी हमें प्रभावित करता है | पंडित अलोपीदीन मृदुभाषी
वाक्पटु और दूरदृष्टि का स्वामी है साधन संपन्न और समाज में प्रतिष्ठित है | जो गुण वंशीधर
में है वह पंडित अलोपीदीन में नहीं है | कहानी के अंत में अलोपीदीन सभी पाठकों के मन पर
अपनी एक अनूठी छाप छोड़ता है कि वह दरोगा मुंशी दर को अपने यहां पूरी जायदाद का
मैनेजर बनाकर और अलोपीदीन एक निपुण व्यवसाई भी है | भलीभांति समझने वाला अति
कुशल व्यापारी था मैं अपने सभी कार्य को येन केन प्रकारेण करवा लेता था| पकड़े जाने पर
भी उसने अदालत के माध्यम से अपनी रक्षा कर ली थी | रक्षा ही नहीं किया अपितु वंशीधर
को नौकरी से भी निकलवा दिया| लक्ष्मी का उपासक का और ईमानदारी का कायल था |
हमें कहानी में दो ही पात्र प्रभावित करते है |

प्रश्न – सत्यवादी होते हुए भी वंशीधर अकेले क्यों पड़ गए थे ?
उत्तर –
सत्यवादी होते हुए भी वंशीधर अदालत में बिल्कुल अकेले पड़ गए थे क्योंकि वह सत्यवादी
और कर्तव्यपरायण व्यक्ति थे | अदालत में सभी व्यक्ति किसी न किसी कारण अलोपीदीन के
एहसानों के तले दबे हुए थे | इन सभी ने उससे किसी न किसी प्रकार की कृपा दया अवश्य
प्राप्त की हुई थी | वह सब अलोपीदीन को बचाने में लगे हुए थे | अदालत में सत्य की शक्ति
रिश्वत के बोझ के तले दब के रह गई |

प्रश्न – नमक का दरोगा पाठ का प्रतिपाद्य बताइए ?
उत्तर –
नमक का दरोगा प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी है | जिसमें यथार्थवाद का एक मुकम्मल उदाहरण
है | यह कहानी धन के ऊपर धर्म की जीत है धन और धर्म को कर्म क्षेत्र सद्वृत्ति और असद
वृत्ति  बुराई और अच्छाई असत्य और सत्य कहा जा सकता है | कहानी में इन का प्रतिनिधित्व
क्रमशा पंडित अलोपीदीन और मुंशी वंशीधर नामक पात्रों ने किया है | ईमानदार कर्म योगी
मुंशी वंशीधर को खरीदने में असफल रहने के बाद पंडित अलोपीदीन अपने धन की महिमा
का उपयोग कर उन्हें नौकरी से हटवा देते हैं | लेकिन अंत में सत्य के आगे उनका सिर झुक
जाता है | अंत में सरकारी विभाग से बर्खास्त वंशीधर को बहुत उनके वेतन और भत्ते के साथ
अपनी सारी जायदाद का स्थाई मैनेजर नियुक्त करते हैं और गहरे अपराध से भरी हुई वाणी
से निवेदन करते हैं परमात्मा से यही प्रार्थना करता हूं कि आप को सदैव वही नदी के किनारे
वाला बेमुरौवत उद्दंड किंतु धर्मनिष्ठ दरोगा बनाए रखें |

कहानी के अंत में प्रसंग से पहले तक सभी घटनाएं प्रशासनिक  और न्यायिक व्यवस्था में
व्यापक भ्रष्टाचार तथा उस भ्रष्टाचार की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता को अत्यंत  साहसिक
तरीके से उजागर करती है | ईमानदार व्यक्ति के अभिमन्यु के साथ निहत्थे और अकेले पड़ जाने
के यथार्थ तस्वीर भी मिलती है | प्रेमचंद इस संदेश पर कहानी को खत्म नहीं करना चाहते थे
क्योंकि उस दौर में भी मानते थे कि ऐसा यथार्थवाद  हमको निराशावादी बना देता है | मानव
चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है हमको चारों तरफ बुराई ही बुराई नजर आने लगती
है इसलिए कहानी का अंत सत्य की जीत के साथ खत्म होता है | अंत में सच्चाई की जीत होती है |

मुख्य पात्र की विशेषताए
1 – वंशीधर                                                                                                             

– कर्तव्यनिष्                         
लालच नहीं करने वाला
कठोर तथा दृढ़ चरित्र
स्वाभिमानी
संवेदनशील
विचारवान
धर्म परायण
ईमानदार  


2 – अलोपीदीन
भ्रष्ट आचरण

धन का उपासक
प्रभावशाली व्यक्तित्व
व्यवहार कुशल तथा वाक्पटुता  
मानवीय गुणों का सम्मान करने वाला  


    व्याकरण पत्र लेखन

    पत्र दो प्रकार के होते हैं – अनौपचारिक पत्र और औपचारिक पत्र |

    _________________________________________________________

    अनौपचारिक पत्रों में पारिवारिक पत्र आते हैं और सामाजिक पत्र आते हैं | औपचारिक पत्रों
    में कार्यालय पत्र और व्यापारिक पत्र आते हैं | पारिवारिक पत्र में निजीपन और आत्मीयता
    वैशिष्ट्य रहती है | माता, पिता, पुत्र, पुत्री  में व अन्य परिवारजनों और संबंधियों को लिखे जाने
    वाले पत्र पारिवारिक पत्र कहलाते हैं | इन्हें व्यक्तिगत और घरेलू पत्र भी कह सकते हैं |

    लेखन हेतु जरूरी निर्देश :
    – सर्वप्रथम अंतर्देशीय ,पोस्टकार्ड यi सादे कागज के बाएं और शीर्ष पर पत्र लिखने वाले का
    पता और भेजने की तिथि लिखी जाती है |
    – बाई और संबोधन शब्द लिखा जाता है और संबोधन शब्द के बाद अल्पविराम लगाया
    जाता है |

    अभिवादन :
    – सूचक शब्द लिखा जाता है उसके बाद पूर्ण विराम लगाया जाता है |
    – अभिवादन सूचक शब्द के पूर्ण विराम के पश्चात उसी पंक्ति में पत्र का मुख्य विषय आरंभ
    होता है |

    समाप्ति :
    – मुख्य विषय की समाप्ति पर आशा है आप स्वस्थ होंगे, आनंद मंगल होंगे, कुशल मंगल
    होंगे, पत्र की प्रतीक्षा में आदि समापन वाक्यों का प्रयोग होता है |
    – पत्र के अंत में बाई और समापन सूचक शब्द भवदीय, सद्भावी, आपका अपना आदि के
    साथ अल्पविराम लगाकर नीचे पत्र के हस्ताक्षर के नाम को लिखा जा |

    उदाहरण के लिए पारिवारिक पत्र – अपने छोटे भाई को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते
    हुए पत्र लिखिए |

    परीक्षा भवन
    क ख ग
    10 सितंबर 2018

    प्रिय भाई !

    शुभ आशीर्वाद |
    कल ही पिताजी का पत्र प्राप्त हुआ यह जानकर बहुत कष्ट हुआ कि तुम अर्धवार्षिक परीक्षा
    में तीन विषयों में फेल हो गए हो और यह भी ज्ञात हुआ कि आप अपना अधिकतर समय मित्रों
    के साथ मौज मस्ती में व्यतीत करते हो और जिसका असर तुम्हारी पढ़ाई पर पढ़ रहा है |
    प्रिय भाई इस संसार में सबसे अमूल्य वस्तु समय है समय का आदर करने वाला व्यक्ति ही
    सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचता है और जो समय को नहीं पहचानता वह दर-दर की ठोकरें
    खाता है | बीता हुआ समय कभी लौट कर नहीं आता |

    इस समय तुम आप जिन कक्षा में पढ़ रहे हो यह तुम्हारे जीवन और भविष्य का एक निर्णायक
    मोड़ है | या तो तुम  सही दिशा में चले जाओगे या असफल होकर गुमनामी के अंधेरे में खो
    जाओगे | तुम्हारे कंधों पर अपना भविष्य बनाने की जिम्मेदारी नहीं हम सब के सपनों का भारी
    बोझ भी है | तुम्हें अपने लिए और हम सबके लिए समय के महत्व को पहचानना ही होगा आशा
    है | तुम अपनी बहन की बातों को गंभीरता से समझोगे और समय के महत्व को वार्षिक परीक्षा
    आने से पहले परिश्रम में जुड़ जाओगे | मैं तुम्हारे सामर्थ्यऔर दृढ़ निश्चय के बारे में भी खूब
    जानती हूं | जरूरत है तो बस समय का सदुपयोग करने की आशा है आप हमें निराश नहीं
    करोगे |

    शुभकामनाओं सहित |

    तुम्हारी बहन,
    ममता

    _________________________________________________________

    सामाजिक पत्र – सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने समाज का एक अभिन्न अंग
    होता है |

    लेखन हेतु जरूरी निर्देश :
    घर परिवार से बाहर वह अपने पड़ोसियों मित्रों सहयोगियो, परिचितों, हितैषियों और
    दूसरे स्थान पर सु ह्रदय से सामाजिक संबंधों से जुड़ा रहता है | विविध संस्कारों, लोका चारों,
    अनुष्ठानों आदि के अवसर पर सुख- दुख एवं हर्ष विषाद की सूचना अपने सगे – संबंधियों
    आदि को देने के लिए जो पत्र लिखे जाते हैं | वह सामाजिक पत्र कहलाते हैं | अवसर और
    प्रसंगानुसार के कई प्रकार के होते हैं |

    प्रारंभ :
    निमंत्रण पत्र, बधाई पत्र, शोक पत्र आदि समाजिक पत्रों का प्रारंभ हम आदरणीय, मान्यवर,
    प्रिय, महोदय आदि संबोधन से होता है |

    समाप्ति :
    अंत में अपने विनीत, भवदीय, तुम्हारा शुभचिंतक, कुछ भी लिख सकते हैं |

    उदाहरण के लिए सामाजिक पत्र – अपने मित्र को वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर बधाई
    पत्र लिखिए |

    परीक्षा भवन
    क ख ग
    10 सितंबर 2018

    प्रिय अतुल,

    सस्नेह नमस्कार |

    अभी अभी तुम्हारा पत्र मिला, पढ़ कर प्रसन्नता हुई कि तुमने राज्य स्तरीय वाद विवाद
    प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया है | मधुर यह बहुत बड़ी उपलब्धि है |

    ऐसी प्रतियोगिताओं के प्रति तुम्हारे रुझान में से मैं  परिचित हूं तुम्हारा शुद्ध उच्चारण, ओजस्वी
    वाणी ,शानदार प्रस्तुति मिलकर ही ऐसे कमाल करते हैं | जिला स्तरीय प्रतियोगिता में तो
    तुमने कई बार जीती हैं | लेकिन राज्य स्तरीय उपलब्धि तुम ने पहली बार प्राप्त की है मेरी
    और मेरे परिवार की हार्दिक बधाई स्वीकार करो | हम सभी तुम्हारी इस खुशी में शामिल है
    और गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं | ईश्वर से प्रार्थना कि तुम सफलता के शिखर पर पहुंचे
    पढ़ाई के साथ-साथ तुम्हारी यह कला तुम्हें भविष्य में ऊंचा मुकाम दिलाएगी | तुम्हारा स्वप्न
    रहा है | एक नामी वकील बनने का ऐसी उपलब्धियां तो तुम्हें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के
    लिए सबल देंगी |

    चाचा चाची जी को हम सब की ओर से शत-शत बधाई हो मिठाई तुमसे मिलने पर खाऊंगा |

    तुम्हारा अभिन्न मित्र
    सहदेव

    __________________________________________________________

    कार्यालय पत्र (औपचारिक पत्र)
    प्रारंभ :   
    – सबसे पहले पत्र प्रेषित करने वाले यानि व्यक्ति या संस्था का नाम व पता रहता है |
    – जिससे पत्र पाने वाला पत्र देखते ही समझ जाता कि यह पत्र कहां से आया पत्र प्रेशर के
    पास यदि दूरभाष है | तो पति के साथ दूरभाष संख्या भी लिखी रहती है |

    पत्र संख्या स्थान और दिनांक :
    – इसके पश्चात बाय सर बाय कानों मेंपत्र संख्या भी लिखी जाती है |
    प्राप्तकर्ता का नाम पदनाम और पता :
    – शीर्ष के नीचे बाईं ओर पत्र के प्राप्तकर्ता का पूरा नाम पद नाम तथा पता अंकित किया
    जाता है|
    विषय और शीर्षक :
    – पत्र प्राप्त करता के पदनाम के नीचे साधारणता संबोधन से पहले कभी कभी बाद में बाई
    और विषय लिखकर विराम चिन्ह लगा दिया जाता है |
    – संक्षेप में पत्र का विषय निर्देश भी कर दिया जाता है |
    संबोधन :
    – विषय का उल्लेख किया जाने के पश्चात पत्र में संबोधन के लिए प्राय महोदय / महोदया
    शब्द का प्रयोग किया जाता है सरकारी और औपचारिक पत्र में संबोधन के बाद अभिवादन
    की विशेषता नहीं पड़ती |
    पत्र की मुख्य सामग्री :
    – संबोधन के बाद पत्र की मुख्य सामग्री आती है |
    – संबोधन के बाद हास्य छोड़कर पत्र की मुख्य सामग्री प्रारंभ की जाती है पत्र की मुख्य
    सामग्री सामग्री का उल्लेख करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए |
    – दिनांक …………. देखें “या “ आप के पत्र संख्या  ………….. दिनांक ……..
    के संदर्भ में मुझे आपको सूचित करने का निर्देश हुआ कि ……….. आदि |
    – एक पत्र को एक ही विषय से संबंधित होना चाहिए |
    – पत्र में में उपयोग विराम चिन्ह आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए |
    पत्र का समापन :
    – विनम्र शब्दों में कार्य के शीघ्र यथाशीघ्र किए जाने के विषय में निवेदन किया जाना चाहिए
    कि आशा है |
    – आप मेरी समस्या पर शहर दया पूर्वक विचार करेंगे और अनु गृहीत करेंगे |
    – सधन्यवाद |
    अंत में हस्ताक्षर नाम पता जो भी संलग्न है |

    पुनश्च :
    – यदि कोई महत्वपूर्ण बात पत्र की मुख्य सामग्री से छूट गई हो या आ ना पाई हो तो उसका
    उल्लेख पुणे पुनश्च लिखकर किया जाता है |
    पृष्ठांकन संख्या अधिक उल्लेख कर सकते हैं |

    उदाहरण के लिए कार्यालय पत्र – हरियाणा सरकार के कृषि मंत्रालय के सचिव की
    ओर से जिला उपायुक्त को पत्र लिखें जिसमें बाढ़ से निपटने के सुझाव |

    कृषि मंत्रालय हरियाणा सरकार,
    चंडीगढ़ |
    पत्र संख्या – हरि (कृषि) ओ. ए. वन. 2018:167
    दिनांक – 15  जुलाई 2018

    प्रति,
    उपायुक्त,
    करनाल |
    विषय – करनाल जिले में बाढ़ से निपटने के सुझाव |

    महोदय,

    हरियाणा सरकार की ओर से मुझे आपको यह सूचित करने का निर्देश प्राप्त हुआ है
    कि करनाल जिले में आई बाढ़ से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं |

    राष्ट्रीय समाचार पत्र में इस बार के बारे में अनेक समाचार प्रकाशित हुए हैं | इस बात को
    लेकर हरियाणा सरकार की आलोचना की गई है कि सरकार की ओर से आवश्यक कदम नहीं
    उठाए जा रहे हैं | अतः आप इस दिशा में तत्काल आवश्यक कार्यवाही करें | बाढ़ से प्रभावित
    क्षेत्रों में तत्काल राहत सामग्री पहुंचाई जाए समाज के पिछड़े और गरीब लोगों से योग की
    आवश्यकता वस्तुएं मुफ्त बंटी जाएं जिनके मकान इस बार में गिर गया उनका तत्काल अनुदान
    की धनराशि भी दी जाए |

    इस बार में मलेरिया बीमारियां फैल सकती हैं स्वास्थ संबंधी सेवाओं का  सक्रिय किया जाए
    बाढ़ से प्रभावित रोगियों के मुफ्त उपचार की तत्काल व्यवस्था भी की जाए | बाढ़ से जो सरके
    टूट गई हैं | उनकी मरम्मत कराई जाए विशेषकर यमुना के बाद को मजबूत बनाने के लिए
    आवश्यक कदम उठाए जाएं बाढ़ के कारण जिन किसानों की फसलें नष्ट हो गई है | उनका
    सर्वेक्षण करके तत्काल एक रिपोर्ट कृषि मंत्रालय को भेजी जाए ताकि किसानों के लिए कुछ
    अतिरिक्त सुविधाओं की घोषणा की जा सके इस पत्र के साथ मुख्यमंत्री राहत कोष से
    ₹500000 का एक ड्राफ्ट भेजा जा रहा है |

    आशा है किस दिशा में आप शीघ्र और आवश्यक कदम उठाएंगे |

    भवदीय,
    सचिव
    कृषि मंत्रालय,
    हरियाणा सरकार |

    व्याकरण पत्र लेखन

    अनौपचारिक पत्रों में पारिवारिक पत्र आते हैं और सामाजिक पत्र आते हैं | औपचारिक पत्रों
    में कार्यालय पत्र और व्यापारिक पत्र आते हैं | पारिवारिक पत्र में निजीपन और आत्मीयता
    वैशिष्ट्य रहती है | माता, पिता, पुत्र, पुत्री  में व अन्य परिवारजनों और संबंधियों को लिखे जाने
    वाले पत्र पारिवारिक पत्र कहलाते हैं | इन्हें व्यक्तिगत और घरेलू पत्र भी कह सकते हैं |

    लेखन हेतु जरूरी निर्देश :
    – सर्वप्रथम अंतर्देशीय ,पोस्टकार्ड यi सादे कागज के बाएं और शीर्ष पर पत्र लिखने वाले का
    पता और भेजने की तिथि लिखी जाती है |
    – बाई और संबोधन शब्द लिखा जाता है और संबोधन शब्द के बाद अल्पविराम लगाया
    जाता है |

    अभिवादन :
    – सूचक शब्द लिखा जाता है उसके बाद पूर्ण विराम लगाया जाता है |
    – अभिवादन सूचक शब्द के पूर्ण विराम के पश्चात उसी पंक्ति में पत्र का मुख्य विषय आरंभ
    होता है |

    समाप्ति :
    – मुख्य विषय की समाप्ति पर आशा है आप स्वस्थ होंगे, आनंद मंगल होंगे, कुशल मंगल
    होंगे, पत्र की प्रतीक्षा में आदि समापन वाक्यों का प्रयोग होता है |
    – पत्र के अंत में बाई और समापन सूचक शब्द भवदीय, सद्भावी, आपका अपना आदि के
    साथ अल्पविराम लगाकर नीचे पत्र के हस्ताक्षर के नाम को लिखा जा |

    उदाहरण के लिए पारिवारिक पत्र – अपने छोटे भाई को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते
    हुए पत्र लिखिए |

    परीक्षा भवन
    क ख ग
    10 सितंबर 2018

    प्रिय भाई !

    शुभ आशीर्वाद |
    कल ही पिताजी का पत्र प्राप्त हुआ यह जानकर बहुत कष्ट हुआ कि तुम अर्धवार्षिक परीक्षा
    में तीन विषयों में फेल हो गए हो और यह भी ज्ञात हुआ कि आप अपना अधिकतर समय मित्रों
    के साथ मौज मस्ती में व्यतीत करते हो और जिसका असर तुम्हारी पढ़ाई पर पढ़ रहा है |
    प्रिय भाई इस संसार में सबसे अमूल्य वस्तु समय है समय का आदर करने वाला व्यक्ति ही
    सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचता है और जो समय को नहीं पहचानता वह दर-दर की ठोकरें
    खाता है | बीता हुआ समय कभी लौट कर नहीं आता |

    इस समय तुम आप जिन कक्षा में पढ़ रहे हो यह तुम्हारे जीवन और भविष्य का एक निर्णायक
    मोड़ है | या तो तुम  सही दिशा में चले जाओगे या असफल होकर गुमनामी के अंधेरे में खो
    जाओगे | तुम्हारे कंधों पर अपना भविष्य बनाने की जिम्मेदारी नहीं हम सब के सपनों का भारी
    बोझ भी है | तुम्हें अपने लिए और हम सबके लिए समय के महत्व को पहचानना ही होगा आशा
    है | तुम अपनी बहन की बातों को गंभीरता से समझोगे और समय के महत्व को वार्षिक परीक्षा
    आने से पहले परिश्रम में जुड़ जाओगे | मैं तुम्हारे सामर्थ्यऔर दृढ़ निश्चय के बारे में भी खूब
    जानती हूं | जरूरत है तो बस समय का सदुपयोग करने की आशा है आप हमें निराश नहीं
    करोगे |

    शुभकामनाओं सहित |

    तुम्हारी बहन,
    ममता

    _________________________________________________________

    सामाजिक पत्र – सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने समाज का एक अभिन्न अंग
    होता है |

    लेखन हेतु जरूरी निर्देश :
    घर परिवार से बाहर वह अपने पड़ोसियों मित्रों सहयोगियो, परिचितों, हितैषियों और
    दूसरे स्थान पर सु ह्रदय से सामाजिक संबंधों से जुड़ा रहता है | विविध संस्कारों, लोका चारों,
    अनुष्ठानों आदि के अवसर पर सुख- दुख एवं हर्ष विषाद की सूचना अपने सगे – संबंधियों
    आदि को देने के लिए जो पत्र लिखे जाते हैं | वह सामाजिक पत्र कहलाते हैं | अवसर और
    प्रसंगानुसार के कई प्रकार के होते हैं |

    प्रारंभ :
    निमंत्रण पत्र, बधाई पत्र, शोक पत्र आदि समाजिक पत्रों का प्रारंभ हम आदरणीय, मान्यवर,
    प्रिय, महोदय आदि संबोधन से होता है |

    समाप्ति :
    अंत में अपने विनीत, भवदीय, तुम्हारा शुभचिंतक, कुछ भी लिख सकते हैं |

    उदाहरण के लिए सामाजिक पत्र – अपने मित्र को वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर बधाई
    पत्र लिखिए |

    परीक्षा भवन
    क ख ग
    10 सितंबर 2018

    प्रिय अतुल,

    सस्नेह नमस्कार |

    अभी अभी तुम्हारा पत्र मिला, पढ़ कर प्रसन्नता हुई कि तुमने राज्य स्तरीय वाद विवाद
    प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया है | मधुर यह बहुत बड़ी उपलब्धि है |

    ऐसी प्रतियोगिताओं के प्रति तुम्हारे रुझान में से मैं  परिचित हूं तुम्हारा शुद्ध उच्चारण, ओजस्वी
    वाणी ,शानदार प्रस्तुति मिलकर ही ऐसे कमाल करते हैं | जिला स्तरीय प्रतियोगिता में तो
    तुमने कई बार जीती हैं | लेकिन राज्य स्तरीय उपलब्धि तुम ने पहली बार प्राप्त की है मेरी
    और मेरे परिवार की हार्दिक बधाई स्वीकार करो | हम सभी तुम्हारी इस खुशी में शामिल है
    और गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं | ईश्वर से प्रार्थना कि तुम सफलता के शिखर पर पहुंचे
    पढ़ाई के साथ-साथ तुम्हारी यह कला तुम्हें भविष्य में ऊंचा मुकाम दिलाएगी | तुम्हारा स्वप्न
    रहा है | एक नामी वकील बनने का ऐसी उपलब्धियां तो तुम्हें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के
    लिए सबल देंगी |

    चाचा चाची जी को हम सब की ओर से शत-शत बधाई हो मिठाई तुमसे मिलने पर खाऊंगा |

    तुम्हारा अभिन्न मित्र
    सहदेव

    __________________________________________________________

    कार्यालय पत्र (औपचारिक पत्र)
    प्रारंभ :   
    – सबसे पहले पत्र प्रेषित करने वाले यानि व्यक्ति या संस्था का नाम व पता रहता है |
    – जिससे पत्र पाने वाला पत्र देखते ही समझ जाता कि यह पत्र कहां से आया पत्र प्रेशर के
    पास यदि दूरभाष है | तो पति के साथ दूरभाष संख्या भी लिखी रहती है |

    पत्र संख्या स्थान और दिनांक :
    – इसके पश्चात बाय सर बाय कानों मेंपत्र संख्या भी लिखी जाती है |
    प्राप्तकर्ता का नाम पदनाम और पता :
    – शीर्ष के नीचे बाईं ओर पत्र के प्राप्तकर्ता का पूरा नाम पद नाम तथा पता अंकित किया
    जाता है|
    विषय और शीर्षक :
    – पत्र प्राप्त करता के पदनाम के नीचे साधारणता संबोधन से पहले कभी कभी बाद में बाई
    और विषय लिखकर विराम चिन्ह लगा दिया जाता है |
    – संक्षेप में पत्र का विषय निर्देश भी कर दिया जाता है |
    संबोधन :
    – विषय का उल्लेख किया जाने के पश्चात पत्र में संबोधन के लिए प्राय महोदय / महोदया
    शब्द का प्रयोग किया जाता है सरकारी और औपचारिक पत्र में संबोधन के बाद अभिवादन
    की विशेषता नहीं पड़ती |
    पत्र की मुख्य सामग्री :
    – संबोधन के बाद पत्र की मुख्य सामग्री आती है |
    – संबोधन के बाद हास्य छोड़कर पत्र की मुख्य सामग्री प्रारंभ की जाती है पत्र की मुख्य
    सामग्री सामग्री का उल्लेख करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए |
    – दिनांक …………. देखें “या “ आप के पत्र संख्या  ………….. दिनांक ……..
    के संदर्भ में मुझे आपको सूचित करने का निर्देश हुआ कि ……….. आदि |
    – एक पत्र को एक ही विषय से संबंधित होना चाहिए |
    – पत्र में में उपयोग विराम चिन्ह आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए |
    पत्र का समापन :
    – विनम्र शब्दों में कार्य के शीघ्र यथाशीघ्र किए जाने के विषय में निवेदन किया जाना चाहिए
    कि आशा है |
    – आप मेरी समस्या पर शहर दया पूर्वक विचार करेंगे और अनु गृहीत करेंगे |
    – सधन्यवाद |
    अंत में हस्ताक्षर नाम पता जो भी संलग्न है |

    पुनश्च :
    – यदि कोई महत्वपूर्ण बात पत्र की मुख्य सामग्री से छूट गई हो या आ ना पाई हो तो उसका
    उल्लेख पुणे पुनश्च लिखकर किया जाता है |
    पृष्ठांकन संख्या अधिक उल्लेख कर सकते हैं |

    उदाहरण के लिए कार्यालय पत्र – हरियाणा सरकार के कृषि मंत्रालय के सचिव की
    ओर से जिला उपायुक्त को पत्र लिखें जिसमें बाढ़ से निपटने के सुझाव |

    कृषि मंत्रालय हरियाणा सरकार,
    चंडीगढ़ |
    पत्र संख्या – हरि (कृषि) ओ. ए. वन. 2018:167
    दिनांक – 15  जुलाई 2018

    प्रति,
    उपायुक्त,
    करनाल |
    विषय – करनाल जिले में बाढ़ से निपटने के सुझाव |

    महोदय,

    हरियाणा सरकार की ओर से मुझे आपको यह सूचित करने का निर्देश प्राप्त हुआ है
    कि करनाल जिले में आई बाढ़ से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं |

    राष्ट्रीय समाचार पत्र में इस बार के बारे में अनेक समाचार प्रकाशित हुए हैं | इस बात को
    लेकर हरियाणा सरकार की आलोचना की गई है कि सरकार की ओर से आवश्यक कदम नहीं
    उठाए जा रहे हैं | अतः आप इस दिशा में तत्काल आवश्यक कार्यवाही करें | बाढ़ से प्रभावित
    क्षेत्रों में तत्काल राहत सामग्री पहुंचाई जाए समाज के पिछड़े और गरीब लोगों से योग की
    आवश्यकता वस्तुएं मुफ्त बंटी जाएं जिनके मकान इस बार में गिर गया उनका तत्काल अनुदान
    की धनराशि भी दी जाए |

    इस बार में मलेरिया बीमारियां फैल सकती हैं स्वास्थ संबंधी सेवाओं का  सक्रिय किया जाए
    बाढ़ से प्रभावित रोगियों के मुफ्त उपचार की तत्काल व्यवस्था भी की जाए | बाढ़ से जो सरके
    टूट गई हैं | उनकी मरम्मत कराई जाए विशेषकर यमुना के बाद को मजबूत बनाने के लिए
    आवश्यक कदम उठाए जाएं बाढ़ के कारण जिन किसानों की फसलें नष्ट हो गई है | उनका
    सर्वेक्षण करके तत्काल एक रिपोर्ट कृषि मंत्रालय को भेजी जाए ताकि किसानों के लिए कुछ
    अतिरिक्त सुविधाओं की घोषणा की जा सके इस पत्र के साथ मुख्यमंत्री राहत कोष से
    ₹500000 का एक ड्राफ्ट भेजा जा रहा है |

    आशा है किस दिशा में आप शीघ्र और आवश्यक कदम उठाएंगे |

    भवदीय,
    सचिव
    कृषि मंत्रालय,

    आरोह अध्याय दो काव्य भाग

    प्रश्न – मीरा कृष्ण की उपासना किस रूप में करती है यह रूप कैसा है ?
    उत्तर –   

    हम भक्ति को दो रूपों में देखते हैं सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति मीरा कृष्ण के सगुण

    रूप के उपासक थी | बचपन से ही कृष्ण भक्ति की भावना उनके अंदर जन्म ले चुकी थी
    वह श्री कृष्ण को ही अपना आराध्य मानती थी | मीरा के कृष्ण का रूप मन को मोहने
    वाला गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाला सिर के ऊपर मोर मुकट विराजमान श्री कृष्ण
    है | मीरा उन्हें अपने पति के रुप में देखती थी वह मीरा के लिए सर्वस्व है कृष्ण के
    अतिरिक्त मीरा संसार में किसी को भी अपना नहीं मानती वह स्वयं को उनकी दासी
    मानती हैं |

    प्रश्न – लोग मीरा को बावरी क्यों कहते हैं ?
    उत्तर –
    मीरा श्री कृष्ण  की भक्ति में अपनी सुध-बुध खो बैठी है | उसे किसी परंपरा या मर्यादा
    का कोई ध्यान नहीं है | कृष्ण भक्ति के लिए उसने अपना राजपरिवार भी छोड़ दिया
    विवाहिता होते हुए भी पांव में घुंघरू बांध कर कृष्ण की भक्ति में नाचती है | लोकलाज की
    चिंता किए बिना संतों के पास बैठी रहती है | भक्ति कि यह पराकाष्ठा बावले पन को
    दर्शाती है इसलिए लोग मीरा को बावरी कहते |


    प्रश्न – मीरा जगत को देखकर रोती क्यों है ?
    उत्तर –
    मीरा जगत  के स्वार्थी रूप को देखकर रो पड़ती है यह देखती है कि जीवन व्यर्थ ही
    जा रहा है | लोग संसारिक सुख दुख को असार मानते हैं जबकि उन्हें सच्चाई नहीं
    मालूम हु इस संसार में ही उलझे हुए हैं | लोग मीरा को बावरी कहते हैं मीरा संसार के
    लोगों को बावरा समझती है |


    प्रश्न – मीरा ने सहज मिले अविनाशी क्यों कहा है ?
    उत्तर –

    मीरा के अनुसार प्रभु अविनाशी हैं अर्थात अनश्वर हैं | उन्हें पाने के लिए मन में सहज

    भक्तिभाव की आवश्यकता है उन्हें पाने के लिए सच्चे मन से भक्ति करनी पड़ती है |
    इस भक्ति से प्रभु प्रसन्न होकर भक्तों को आसानी से मिल जाते है |

    व्याकरण रिपोर्ट / प्रतिवेदन

    रिपोर्ट शब्द अंग्रेजी से हिंदी में लिया गया है | यह पत्रकारिता से संबंधित है रिपोर्ट शब्द का अर्थ
    है | घटना की ठीक-ठीक सूचना सूचना देने या संवाद भेजने के कार्य को रिपोर्टिंग भी कहा जाता है |

    प्रतिवेदन को अंग्रेजी में रिपोर्ट या रिपोर्टिंग कहते हैं | यह एक प्रकार का लिखित विवरण होता है |
    जिसमें किसी संस्था सभा वन विभाग या विशेष आयोजन की तथ्यात्मक जानकारी दी जाती है |
    प्रतिवेदन कई प्रकार के होते हैं | अर्थात इन्हें कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है –
    – सभा, गोष्ठी या किसी सम्मेलन का प्रतिवेदन
    – संस्था का वार्षिक / मासिक प्रतिवेदन
    – व्यवसाय की प्रगति या स्थिति का प्रतिवेदन
    – जांच समिति द्वारा प्रतिवेदन

    प्रतिवेदन अर्थात रिपोर्ट लेखन के तत्व :
    1. तथ्यपरकता : रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित होती है यह किसीछोटी  घटना पर भी हो सकती है
    या बड़ी घटना पर भी |  जब तक रिपोर्टर तथ्यों को पाठकों के सामने नहीं लगता वह रिपोर्ट नहीं
    होती | इस में आंकड़ों तथा तथ्यों की जरूरत होती है |

    2. प्रत्यक्ष अनुभव : रिपोर्ट लेखन प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित होता है| रिपोर्टर घटनास्थल पर
    पहुंच कर घटना का जायजा लेता है | वह तथ्य एकत्रित करता है | तथा आसपास के माहौल की
    जांच करता है | प्रत्यक्ष अनुभव के बिना रिपोर्ट नहीं लिखी जा सकती |

    3. संक्षिप्तता : रिपोर्ट में संक्षिप्तता का गुण आवश्यक है यदि किसी घटना का विवरण बढ़ा
    चढ़ाकर किया जाता है तो वह निराश हो जाती है | पाठक को सिर्फ वोट को पड़ता है | जिसमें
    कम शपथ और अधिक जानकारी हो बड़ी रिपोर्ट जो उबाऊ हो जाती है |

    4. रोचकता क्रमबद्धता : रिपोर्ट में रोचकता और क्रमबद्धता जरूरी है यदि घटना को सिलसिलेवार
    वर्णन प्रस्तुत किया जाए सुविचारों की तारतम्यता टूटती है | इससे तथ्य  गड़बड़हो जाते हैं |
    इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में रोचकता होनी चाहिए | रिपोर्ट की शैली रोचक होनी चाहिए |

    रिपोर्ट के गुण :
    – रिपोर्ट पूरी तरह स्पष्ट और पूर्ण होनी चाहिए |
    – भाषा में अलंकार और मुहावरेदार नहीं होनी चाहिए| किसी भी वाक्य का एक से अधिक अर्थ
    नहीं निकलना चाहिए |
    – केवल महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश होना चाहिए |
    – प्रतिवेदन का एक शीर्षक भी होना चाहिए |
    – सभी तथ्य सत्य प्रमाणित और विश्वसनीय होने चाहिए |
    – प्रतिवेदन के अंत पर अर्थात रिपोर्ट के अंतर पर सभा दल संस्था के अध्यक्ष के हस्ताक्षर भी
    होने चाहिए |

    रिपोर्ट के 2 उदाहरण देखिए :

    1. बस स्टैंड पर हुए बम विस्फोट के आप प्रत्यक्षदर्शी हैं इसकी एक रिपोर्ट तैयार कीजिए |
                               बस स्टैंड में बम विस्फोट
    आज 5 अगस्त को प्रातः सुबह 8:00 बजे भीड़-भाड़ से भरे अति व्यस्त बस स्टैंड में बम विस्फोट
    हुआ | विस्फोट का जोरदार धमाका दूर दूर तक सुनाई दिया | उसके कारण उत्पन्न काला धुआं
    आकाश में देर तक छाया रहा | इससे 4 लोग घायल हो गए लेकिन किसी के जीवन की क्षति
    नहीं हुई विस्फोट के कारण कुछ खिड़कियों के शीशे टूट गए | उपस्थित सभी लोगों में भगदड़ मच
    गई और उससे हल्की चोटें भी आई पुलिस ने तत्काल विस्फोट स्थल को घेर लिया | वह कारणों
    की जानकारी प्राप्त कर रही है | विस्फोटक साइकिल के पीछे रखे थैले में विस्फोटक सामग्री के
    कारण हुआ | इस फोटो के पीछे आंतकवादियों का हाथ हो सकता है |  

    2.
                        सिलेंडर बदलने के दिन खत्म, सीधे रसोई में पहुंचेगी गैस पाइप
    अमेरिका जापान और ब्रिटेन जैसे विकसित राष्ट्रों को छोड़ दीजिए | पाकिस्तान तक की गृहिणियां
    कम से कम एक मामले में भारतीय गृहिणियों के सामने इतरा सकती हैं | उक्त देशों सहित विश्व
    के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में अब पाइपलाइन के जरिए रसोई गैस सीधे
    रसोईघर पहुंचाई जा  रही हैं | अब भारत सरकार ने भी भारतीयों  गृहिणियों को सिलेंडर बदलने
    के झंझट से मुक्ति देने के लिए सीधा रसोई घर तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय नीति लागू करने
    का फैसला किया है | पहले चरण में लगभग दो दर्जन शहरों में लागू किया जाएगा| उनमें उत्तर
    प्रदेश के भी पांच शहर है लखनऊ,  कानपुर, बरेली, आगरा, नोएडा |


    इसके अलावा महाराष्ट्र  के मुंबई के आसपास के शहर में नवी मुंबई | गुजरात में सूरत,
    अहमदाबाद, बड़ौदा को शामिल  किया जा सकता जा रहा है | कीमत निर्धारण पेट्रोलियम
    नियामक बोर्ड ही करेगा | योग्यता के आधार पर प्रवेश की अनुमति मिलेगी | बहुत संभव है कि
    जिस तरह से आधारित सिटी परिवहन व्यवस्था लागू की जा रही है उसी तर्ज पर घरों तक रसोई
    गैस पहुंचाने की  भी व्यवस्था की जाए | इस समय दिल्ली और उसके आसपास के कुछ इलाकों
    में इस तरह की योजना लागू की गई है | लेकिन पहली बार सरकार इस बारे में एक नीति बनाकर
    आगे का रास्ता खोलना चाहती हैं | पहले चरण की सफलता के बाद इसे धीरे-धीरे पूरे देश में लागू
    किया जाएगा | सबसे पहले तो उन्हें सिलेंडर में गैस का सिर दर्द खत्म होगा बेवक्त बेवक्त गैस
    खत्म होने की टेंशन भी नहीं रहेगी |

    यदि मैं पुलिस अधिकारी होता

    प्रस्तावना : वह क्या बनना चाहता है ? यह प्रश्न शैशवकाल से ही हर व्यक्ति के मन में उभर आता  है। मेरे मन रूपी आकाश में भी ऐसे ही प्रश्नों ने खूब चक्कर काटे हैं। मैंने तभी से पुलिस अधिकारी बनने का निश्चय कर लिया था। उसका रौबदार चेहरा और शानदार वर्दी हमेशा आकर्षित करती रहती थी; पर इंसान की सभी इच्छाएँ तो कभी पूर्ण नहीं हो पाती है। उनकी पूर्ति में कोई न कोई बाधा अवश्य आ जाती है। फिर मैं ठहरा एक व्यापारी का बेटा । मेरे भाग्य में तो पैतृकं व्यवसाय ही लिखा है। परिवार के हर सदस्य ने बार-बार यही मंत्र फूका है। मैं भी यही सोचता हूँ कि यदि उन सब की बात को ठुकरा कर यदि मैं पुलिस अधिकारी बन भी गया, तो समाज की सेवा में मेरा क्या योगदान रहेगा।
    वर्तमान समाज की दृष्टि में : आज के समाज में पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। इन लोगों को समाज के रक्षक के स्थान पर भक्षक माना जाता है। प्रायः देखा गया है कि भ्रष्ट पुलिस अधिकारी अपनी जेबें गरम करके असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देते पाए गए हैं। चोरी करना और डकैती डलवाना ही मानो इनका काम रह गया है। निर्दोष इनकी हवालात की सैर करते हैं और गुण्डे बेधड़क घूमते हैं। पैसे के आगे माँ बेटी की इज्जत भी तुच्छ समझी जाती है। इसीलिए अधिकांश लोग इन्हें वर्दीधारी गुंडों की संज्ञा देते हैं।
    यदि पुलिस अधिकारी बनता : यदि मेरी इच्छा पूर्ण हो जाती। और मुझे पुलिस अधिकारी की वर्दी मिल जाती, तो मैं समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाता। मैं अपने क्षेत्र से गुण्डों का सफाया कर देता। इस अभियान में मैं अपनी जान की भी प्रवाह नहीं करता। असामाजिक तत्त्व मुझसे सदा ही भयभीत रहते। मैं अपराधियों को कभी भी माफ नहीं करता और उनके कुकृत्यों का दंड दिलवा कर ही पीछा छोड़ता।
    यदि मैं पुलिस अधिकारी बनता, तो कदापि घूस नहीं लेता। जबकि आजकल पुलिस स्टेशन में बापू के चित्र के नीचे ही उनके आदर्शों को भुलाकर जेबें गरम की जाती हैं। निर्धन और दु:खी लोगों को बेवकूफ समझा जाता है तथा पलिस अधिकारी उनकी बात नहीं। सुनते। मैं सबसे पहले असहाय और निर्धन लोगों की शिकायतें सुनता तथा उन्हें दूर करने का भरसक प्रयास करता।
    पुलिस का आतंक : उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में पुलिस का आतंक दिन-दिन बढ़ता जा रहा है। मेरठ का माया त्यागी कापट पलिस की पाशविकता की अमिट गाथा बन गया है। बिहार की ग्रामीण महिलाओं का सामूहिक रूप से शील भंग करना पुलिस का जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। हाल ही में बनारस में निर्दोषों की तोड़ी गईं अस्थियाँ और उनके हथकरघे पुलिस की पाशविकता की कहानी कह रहे हैं। इतना ही नहीं, इनकी माँग की पूर्ति न करने पर निर्दोषों को पीट-पीट कर यमलोक पहुँचा दिया जाता है। घरों को लुटवाकर आग लगवा दी जाती है।
    उपसंहार : आज के युग में जनता भी उन्हें पसंद नहीं करती। उनकी गिद्ध दृष्टि के आगे अपने को असहाय समझती है; लेकिन मैं । पुलिस अधिकारी बनकर ऐसा नहीं होने देता। मैं महिला समाज को पूरा सम्मान दिलाता। अभद्र व्यवहार करने वालों को दण्डित करता। बनावटी मुठभेड़ों में निर्दोषों की हत्या नहीं करने देता। अपराधियों के लिए साक्षात् यमदूत बन जाता। इस तरह मैं स्वयं अन्य पुलिस अधिकारियों के लिए आदर्श बन जाता।

    कहां और कब करना चाहिए ?

    वर्तमान समय में कई लोगो ने blogging को अपना career बना लिया है और पूरी तरह से ब्लॉगिंग पर फोकस कर रहे हैं ।
    काम चाहे कुछ भी हो लेकिन चीज में कहीं न कहीं कुछ Investment करना पड़ता है ।
    Blogging में भी कुछ चीजों मे निवेश जरूरी है जो आपको और आपके ब्लॉग को successful बना देगा ।
    यहां मैं आपको बताऊंगा की Blog में कहां और कब invest करना चाहिए और कहां नहीं ।
    invest in google
    Blogging Me Kha invest Kare

    1. Domain & Hosting – सबसे पहले हमें Domain और Hosting में ही invest करना होता है ।
    आपका डोमेन ही आपका ब्रांड नेम है, यही आपकी पहचान बनेगा
    इसलिए अपने ब्लॉग के हिसाब से परफेक्ट डोमेन सिलेक्ट करें ।
    आप अपने ब्लॉग के niche के according domain name select करे ।
    अपने ब्लॉग के लिए सही Hosting भी select करें जहां आपको सभी important features मिल जाएं ।
    जिससे बाद में कोई problem न हो ।
    2. Design – हर Blog के लिए एक Perfect Design बहुत important होता है क्योंकि यही आपके ब्लॉग को Professional look देता है ।
    Blog के लिए सही Theme का चयन कर लें Theme select करते समय हर चीज पर ध्यान करें और Perfect Theme में invest करें ।
    क्योंकि अगर बाद में Design में किसी तरह की कमी आये तो आप दोबारा कोई दूसरी Theme select करेगे
    इससे आपके कुछ पैसे भी वेस्ट हो जाएगे और बार बार Theme change करने से blog पर भी bad SEO effect पड़ सकता है ।
    आप अपनी पसंद अनुसार best Theme बनवाने के लिए Developer से भी Contact कर सकते हैं ।
    3. Tutorials – आप Blogging, SEO, Marketing आदि सीखने के लिए Online Tutorials, Videos, ebooks में भी invest कर सकते हैं ।
    इससे आपको काफी कुछ सीखने को मिलेगा और आप सही तरीके से Blogging कर पाएगे ।
    4. SEO tools – आप Keywords Research, SEO analyse आदि के लिए SEO tools में भी invest कर सकते हैं ।
    Invest करने से पहले एक बार Free trial भी ले सकते हैं जिससे आपको Tool की Working और Quality के बारे मे भी पता चलेगा ।
    अगर आपकी Brand Website है तो आप SEO Expert की मदद ले सकते है लेकिन अगर आपका Blog है तो आपको खुद ही SEO करना चाहिए ।
    क्योंकि इससे आप खुद भी SEO techniques को सीख लेगे जो हर ब्लॉगर के लिए जरूरी है ।
    इसलिए शुरुआत मे चाहे तो आप किसी Expert की help ले सकते हैं लेकिन आपको खुद भी SEO पर ध्यान देना होगा ।
    आप इसके लिए SEO tools और Tutorials की मदद ले सकते हैं ।

    Other post : How to Stay Calm During Exam 

    5. Giveways – आजकल बहुत सी sites Giveways करके यूजर्स को attract करती हैं ।
    Giveways की मदद से आप कम बजट में ही अधिक Audience तक अपनी पहुंच बना सकते हैं।
    जैसे अगर आपका blog SEO से related है तो आप Giveways price में winner को SEO pdf, SEO tools या premium theme दे सकते हैं ।
    आपको Giveways का अधिक से अधिक promotion करना होगा जिससे इसे ज्यादा Audience join करे और आपका Blog अधिक famous हो ।
    लेकिन एक बात याद रखे जब आपका ब्लॉग audience के सामने लाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो तभी Giveways का use करें ।
    Because “First impressions is the last impression”

    6. Perfect Team – जब ब्लॉग अधिक famous हो जाता है तो इसे manage करना भी थोड़ा कठिन हो जाता है और इसमे अधिक समय भी लगता है ।
    ऐसे में आप अपनी Team create कर सकते है जिसके साथ मिलकर आप अपने ब्लॉग को एक नई दिशा दे सकते हैं ।
    इससे आप blog को आसानी से manage कर पाएगे ।
    आप अपनी Team में Content Creators, SEO experts, Developer, Marketing manager आदि लोगो को जोड़ सकते हैं ।
    Content creators का मतलब यहां केवल content Writers से नहीं बल्कि हर तरह के content से है
    Images, Videos आदि भी कंटेंट का ही हिस्सा है ।
    इनमे Videos creators & editors, Infographics maker भी आते हैं ।
    एक Perfect team के साथ मिलकर काम करने से आपकी कई मुश्किलें कम हो जाती है और बडे बडे काम भी आसन हो जाते हैं ।
    Final words : मैं आपसे यही कहूंगा कि कही भी Investment करने से पहले एक बार पूरी जानकारी जरूर ले ।
    बिना किसी जानकारी किसी भी चीज मे Invest न करें
    हर चीज मे जरूरत और बजट के हिसाब से ही Invest करें ।

    चेजारा के साथ गांव – समाज के व्यवहार मैं पहले की तुलना में आ ज क्या फर्क है पाठ के आधार पर बताइए ?

    चेजारा अर्थात चिनाई करने वाला | कुंई  के निर्माण में यह लोग दक्ष होते हैं | इनका उस
    समय विशेष ध्यान रखा जाता था | कुंई खोदने पर इन विदाई के समय तरह-तरह की भेंट
    दी जाती थी इसके बाद भी उनका संबंध गांव से जुड़ा रहता था और पूरा वर्ष उन को
    सम्मानित किया जाता था | फसल की कटाई के समय इन्हें अलग से फसल का हिस्सा
    दिया जाता था तीज त्यौहार विवाह जैसे अवसरों पर उनका सम्मान किया जाता था |
    इस प्रकार इनको भीग्रामीण समाज में सम्मान के साथ जीने का अवसर मिलता था और
    उनके कार्य को सराहा भी जाता था | वर्तमान समय में इनका सम्मान उतना नहीं रहा जितना
    कि पहले था | उनको काम की मजदूरी देकर संबंध खत्म कर दिए जाते हैं | अब सिर्फ
    मजदूरी देकर काम करवा लिया जाता है अब स्थिति पूर्णता बदल गई है |

    व्याकरण पत्र लेखन

    अनौपचारिक पत्रों में पारिवारिक पत्र आते हैं और सामाजिक पत्र आते हैं | औपचारिक पत्रों
    में कार्यालय पत्र और व्यापारिक पत्र आते हैं | पारिवारिक पत्र में निजीपन और आत्मीयता
    वैशिष्ट्य रहती है | माता, पिता, पुत्र, पुत्री  में व अन्य परिवारजनों और संबंधियों को लिखे जाने
    वाले पत्र पारिवारिक पत्र कहलाते हैं | इन्हें व्यक्तिगत और घरेलू पत्र भी कह सकते हैं |

    लेखन हेतु जरूरी निर्देश :
    – सर्वप्रथम अंतर्देशीय ,पोस्टकार्ड यi सादे कागज के बाएं और शीर्ष पर पत्र लिखने वाले का
    पता और भेजने की तिथि लिखी जाती है |
    – बाई और संबोधन शब्द लिखा जाता है और संबोधन शब्द के बाद अल्पविराम लगाया
    जाता है |

    अभिवादन :
    – सूचक शब्द लिखा जाता है उसके बाद पूर्ण विराम लगाया जाता है |
    – अभिवादन सूचक शब्द के पूर्ण विराम के पश्चात उसी पंक्ति में पत्र का मुख्य विषय आरंभ
    होता है |

    समाप्ति :
    – मुख्य विषय की समाप्ति पर आशा है आप स्वस्थ होंगे, आनंद मंगल होंगे, कुशल मंगल
    होंगे, पत्र की प्रतीक्षा में आदि समापन वाक्यों का प्रयोग होता है |
    – पत्र के अंत में बाई और समापन सूचक शब्द भवदीय, सद्भावी, आपका अपना आदि के
    साथ अल्पविराम लगाकर नीचे पत्र के हस्ताक्षर के नाम को लिखा जा |

    उदाहरण के लिए पारिवारिक पत्र – अपने छोटे भाई को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते
    हुए पत्र लिखिए |

    परीक्षा भवन
    क ख ग
    10 सितंबर 2018

    प्रिय भाई !

    शुभ आशीर्वाद |
    कल ही पिताजी का पत्र प्राप्त हुआ यह जानकर बहुत कष्ट हुआ कि तुम अर्धवार्षिक परीक्षा
    में तीन विषयों में फेल हो गए हो और यह भी ज्ञात हुआ कि आप अपना अधिकतर समय मित्रों
    के साथ मौज मस्ती में व्यतीत करते हो और जिसका असर तुम्हारी पढ़ाई पर पढ़ रहा है |
    प्रिय भाई इस संसार में सबसे अमूल्य वस्तु समय है समय का आदर करने वाला व्यक्ति ही
    सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचता है और जो समय को नहीं पहचानता वह दर-दर की ठोकरें
    खाता है | बीता हुआ समय कभी लौट कर नहीं आता |

    इस समय तुम आप जिन कक्षा में पढ़ रहे हो यह तुम्हारे जीवन और भविष्य का एक निर्णायक
    मोड़ है | या तो तुम  सही दिशा में चले जाओगे या असफल होकर गुमनामी के अंधेरे में खो
    जाओगे | तुम्हारे कंधों पर अपना भविष्य बनाने की जिम्मेदारी नहीं हम सब के सपनों का भारी
    बोझ भी है | तुम्हें अपने लिए और हम सबके लिए समय के महत्व को पहचानना ही होगा आशा
    है | तुम अपनी बहन की बातों को गंभीरता से समझोगे और समय के महत्व को वार्षिक परीक्षा
    आने से पहले परिश्रम में जुड़ जाओगे | मैं तुम्हारे सामर्थ्यऔर दृढ़ निश्चय के बारे में भी खूब
    जानती हूं | जरूरत है तो बस समय का सदुपयोग करने की आशा है आप हमें निराश नहीं
    करोगे |

    शुभकामनाओं सहित |

    तुम्हारी बहन,
    ममता

    _________________________________________________________

    सामाजिक पत्र – सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने समाज का एक अभिन्न अंग
    होता है |

    लेखन हेतु जरूरी निर्देश :
    घर परिवार से बाहर वह अपने पड़ोसियों मित्रों सहयोगियो, परिचितों, हितैषियों और
    दूसरे स्थान पर सु ह्रदय से सामाजिक संबंधों से जुड़ा रहता है | विविध संस्कारों, लोका चारों,
    अनुष्ठानों आदि के अवसर पर सुख- दुख एवं हर्ष विषाद की सूचना अपने सगे – संबंधियों
    आदि को देने के लिए जो पत्र लिखे जाते हैं | वह सामाजिक पत्र कहलाते हैं | अवसर और
    प्रसंगानुसार के कई प्रकार के होते हैं |

    प्रारंभ :
    निमंत्रण पत्र, बधाई पत्र, शोक पत्र आदि समाजिक पत्रों का प्रारंभ हम आदरणीय, मान्यवर,
    प्रिय, महोदय आदि संबोधन से होता है |

    समाप्ति :
    अंत में अपने विनीत, भवदीय, तुम्हारा शुभचिंतक, कुछ भी लिख सकते हैं |

    उदाहरण के लिए सामाजिक पत्र – अपने मित्र को वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर बधाई
    पत्र लिखिए |

    परीक्षा भवन
    क ख ग
    10 सितंबर 2018

    प्रिय अतुल,

    सस्नेह नमस्कार |

    अभी अभी तुम्हारा पत्र मिला, पढ़ कर प्रसन्नता हुई कि तुमने राज्य स्तरीय वाद विवाद
    प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया है | मधुर यह बहुत बड़ी उपलब्धि है |

    ऐसी प्रतियोगिताओं के प्रति तुम्हारे रुझान में से मैं  परिचित हूं तुम्हारा शुद्ध उच्चारण, ओजस्वी
    वाणी ,शानदार प्रस्तुति मिलकर ही ऐसे कमाल करते हैं | जिला स्तरीय प्रतियोगिता में तो
    तुमने कई बार जीती हैं | लेकिन राज्य स्तरीय उपलब्धि तुम ने पहली बार प्राप्त की है मेरी
    और मेरे परिवार की हार्दिक बधाई स्वीकार करो | हम सभी तुम्हारी इस खुशी में शामिल है
    और गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं | ईश्वर से प्रार्थना कि तुम सफलता के शिखर पर पहुंचे
    पढ़ाई के साथ-साथ तुम्हारी यह कला तुम्हें भविष्य में ऊंचा मुकाम दिलाएगी | तुम्हारा स्वप्न
    रहा है | एक नामी वकील बनने का ऐसी उपलब्धियां तो तुम्हें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के
    लिए सबल देंगी |

    चाचा चाची जी को हम सब की ओर से शत-शत बधाई हो मिठाई तुमसे मिलने पर खाऊंगा |

    तुम्हारा अभिन्न मित्र
    सहदेव

    __________________________________________________________

    कार्यालय पत्र (औपचारिक पत्र)
    प्रारंभ :   
    – सबसे पहले पत्र प्रेषित करने वाले यानि व्यक्ति या संस्था का नाम व पता रहता है |
    – जिससे पत्र पाने वाला पत्र देखते ही समझ जाता कि यह पत्र कहां से आया पत्र प्रेशर के
    पास यदि दूरभाष है | तो पति के साथ दूरभाष संख्या भी लिखी रहती है |

    पत्र संख्या स्थान और दिनांक :
    – इसके पश्चात बाय सर बाय कानों मेंपत्र संख्या भी लिखी जाती है |
    प्राप्तकर्ता का नाम पदनाम और पता :
    – शीर्ष के नीचे बाईं ओर पत्र के प्राप्तकर्ता का पूरा नाम पद नाम तथा पता अंकित किया
    जाता है|
    विषय और शीर्षक :
    – पत्र प्राप्त करता के पदनाम के नीचे साधारणता संबोधन से पहले कभी कभी बाद में बाई
    और विषय लिखकर विराम चिन्ह लगा दिया जाता है |
    – संक्षेप में पत्र का विषय निर्देश भी कर दिया जाता है |
    संबोधन :
    – विषय का उल्लेख किया जाने के पश्चात पत्र में संबोधन के लिए प्राय महोदय / महोदया
    शब्द का प्रयोग किया जाता है सरकारी और औपचारिक पत्र में संबोधन के बाद अभिवादन
    की विशेषता नहीं पड़ती |
    पत्र की मुख्य सामग्री :
    – संबोधन के बाद पत्र की मुख्य सामग्री आती है |
    – संबोधन के बाद हास्य छोड़कर पत्र की मुख्य सामग्री प्रारंभ की जाती है पत्र की मुख्य
    सामग्री सामग्री का उल्लेख करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए |
    – दिनांक …………. देखें “या “ आप के पत्र संख्या  ………….. दिनांक ……..
    के संदर्भ में मुझे आपको सूचित करने का निर्देश हुआ कि ……….. आदि |
    – एक पत्र को एक ही विषय से संबंधित होना चाहिए |
    – पत्र में में उपयोग विराम चिन्ह आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए |
    पत्र का समापन :
    – विनम्र शब्दों में कार्य के शीघ्र यथाशीघ्र किए जाने के विषय में निवेदन किया जाना चाहिए
    कि आशा है |
    – आप मेरी समस्या पर शहर दया पूर्वक विचार करेंगे और अनु गृहीत करेंगे |
    – सधन्यवाद |
    अंत में हस्ताक्षर नाम पता जो भी संलग्न है |

    पुनश्च :
    – यदि कोई महत्वपूर्ण बात पत्र की मुख्य सामग्री से छूट गई हो या आ ना पाई हो तो उसका
    उल्लेख पुणे पुनश्च लिखकर किया जाता है |
    पृष्ठांकन संख्या अधिक उल्लेख कर सकते हैं |

    उदाहरण के लिए कार्यालय पत्र – हरियाणा सरकार के कृषि मंत्रालय के सचिव की
    ओर से जिला उपायुक्त को पत्र लिखें जिसमें बाढ़ से निपटने के सुझाव |

    कृषि मंत्रालय हरियाणा सरकार,
    चंडीगढ़ |
    पत्र संख्या – हरि (कृषि) ओ. ए. वन. 2018:167
    दिनांक – 15  जुलाई 2018

    प्रति,
    उपायुक्त,
    करनाल |
    विषय – करनाल जिले में बाढ़ से निपटने के सुझाव |

    महोदय,

    हरियाणा सरकार की ओर से मुझे आपको यह सूचित करने का निर्देश प्राप्त हुआ है
    कि करनाल जिले में आई बाढ़ से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं |

    राष्ट्रीय समाचार पत्र में इस बार के बारे में अनेक समाचार प्रकाशित हुए हैं | इस बात को
    लेकर हरियाणा सरकार की आलोचना की गई है कि सरकार की ओर से आवश्यक कदम नहीं
    उठाए जा रहे हैं | अतः आप इस दिशा में तत्काल आवश्यक कार्यवाही करें | बाढ़ से प्रभावित
    क्षेत्रों में तत्काल राहत सामग्री पहुंचाई जाए समाज के पिछड़े और गरीब लोगों से योग की
    आवश्यकता वस्तुएं मुफ्त बंटी जाएं जिनके मकान इस बार में गिर गया उनका तत्काल अनुदान
    की धनराशि भी दी जाए |

    इस बार में मलेरिया बीमारियां फैल सकती हैं स्वास्थ संबंधी सेवाओं का  सक्रिय किया जाए
    बाढ़ से प्रभावित रोगियों के मुफ्त उपचार की तत्काल व्यवस्था भी की जाए | बाढ़ से जो सरके
    टूट गई हैं | उनकी मरम्मत कराई जाए विशेषकर यमुना के बाद को मजबूत बनाने के लिए
    आवश्यक कदम उठाए जाएं बाढ़ के कारण जिन किसानों की फसलें नष्ट हो गई है | उनका
    सर्वेक्षण करके तत्काल एक रिपोर्ट कृषि मंत्रालय को भेजी जाए ताकि किसानों के लिए कुछ
    अतिरिक्त सुविधाओं की घोषणा की जा सके इस पत्र के साथ मुख्यमंत्री राहत कोष से
    ₹500000 का एक ड्राफ्ट भेजा जा रहा है |

    आशा है किस दिशा में आप शीघ्र और आवश्यक कदम उठाएंगे |

    भवदीय,
    सचिव
    कृषि मंत्रालय,

    आरोह अध्याय दो गद्य भाग

    प्रश्न – मियां नसीरुद्दीन नानबाईयों  का मसीहा क्यों कहा जाता था?
    उत्तर –
    मियां नसीरुद्दीन कोई साधारण नानबाई नहींहै | वह खानदानी नानबाई हैं | उनके पास 56
    प्रकार की रोटियां बनाने का हुनर है | तुनकी और रुमाली जैसी महीन रोटियां बनाना जानते
    हैं | वह रोटी बनाने  को एक कला मानते हैं | वह अन्य नानबाईयों के मुकाबले में स्वयं को
    श्रेष्ठ इसलिए मानते हैं क्योंकि नानबाई का प्रशिक्षण अपने परिवार की परंपरा से प्राप्त
    किया | उनके पिता बरकत शाही नानबाई गढ़ैया वाले के नाम से प्रसिद्ध थे|और उनके बुजुर्ग
    दादा भी यही काम करते थे|वह बादशाह को नई-नई चीजें बनाकर खिलाते थे और उनकी
    प्रशंसा प्राप्त करते थे  मियां नसीरुद्दीन स्वयं 56 प्रकार की रोटियां बनाने के लिए प्रसिद्ध
    थे | इसलिए उन्हें नानबाई का मसीहा कहा जाता था |
    प्रश्न – लेखिका मियां नसरुद्दीन के पास क्यों गई थी ?
    उत्तर –
    लेखिका मियां नसरुद्दीन के पास इसलिए गई थी ताकि वे रोटी बनाने की कारीगरी को
    जानने तथा उसेप्रकाशित करने के उद्देश्य से उनके पास गई थी | पत्रकार की हैसियत से
    वहां गई थी उसने पूछा तो पता चला की यह खानदानी नानबाई मियां नसरुद्दीन की दुकान
    है | जो कि 56 प्रकार की रोटियां बना लेते हैं | उनकी कारीगरी के रहस्य को जानने के
    लिए उनके पास जाती हैं और उनको अलग-अलग तरह की रोटियां बनाने का प्रशिक्षण
    कहां से मिला यह सारे सवालात पूछती हैं |
    प्रश्न – बादशाह के नाम का प्रसंग आते ही लेखिका की बातों से मियां नसरुद्दीन की
    दिलचस्पी क्यों खत्म होने लगी?
    उत्तर –
    लेखिका ने जब मियां नसीरुद्दीन से उनके खानदानी नानबाई होने का रहस्य पूछा तो उन्होंने
    बताया कि उनके पिता शाही नानबाई गढ़ैया वाले के नाम से और दादा आला नानबाई के
    नाम से प्रसिद्ध थे|उनके बुजुर्ग बादशाह के लिए भी रोटियां बनाते थे | एक बार बादशाह ने
    उनके बुजुर्गों को ऐसी चीज बनाना बनाकर खिलाने के लिए कहा जो नाग से पक्के न पानी
    से बने उन्होंने ऐसी चीज बादशाह को बनाकर खिलाई और बादशाह भी कि जब लेखिका
    ने बादशाह का नाम पूछा तो वह नाराज हो गए | क्योंकि उन्हें बादशाह का नाम स्मरण ही
    नहीं था | बादशाह का  बावर्ची होने की बात उन्होंने अपने परिवार की बड़ाई करने के लिए
    गई थी | बादशाह का प्रसंग आती है बेरुखी दिखाने लग गए |
    प्रश्न – पाठ में मियां नसरुद्दीन का शब्द चित्र लेखिका ने कैसे खींचा
    उत्तर –
    लेखिका के अनुसार मियां नसरुद्दीन 70 वर्ष के हैं| वह चारपाई पर बैठे हुए बीड़ी का मजा
    ले रहे थे | मौसम की मार से उनका चेहरा  पक गया है | उनकी आंखों में काइयां भोलापन
    परेशानी पर मंजू हुए कारीगर के तेवर थे | अखबार वाले उन्हें निठल्ले लगते हैं और वह 56
    प्रकार की रोटियां बनाने में प्रसिद्ध भी हैं उन्होंने नाम भाइयों का परीक्षा प्रशिक्षण उन्होंने
    अपने पिता से लिया था जब बात उनके हाथ से निकल जाए तो वह खीज भी जाते थे |
    और पलट कर जवाब नहीं देते थे बात को पलट भी देते थे |

    आरोह अध्याय तीसरा गद्य भाग

    प्रश्न – पथेर पांचाली फिल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक क्यों चला ?
    उत्तर –
    पथेर पांचाली फिल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक इसलिए चला इसके कई कारण थे |
    1. इस फिल्म के फिल्मकार  सत्यजीत राय के पास पर्याप्त पैसे नहीं थे | पैसे खत्म होने के
    बाद फिर से पैसे जमा होने तक  शूटिंग स्थगित रखनी पड़ती थी |
    2. फिल्मकार स्वयं एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी करते थे और उसे नौकरी के काम से जब
    फुर्सत मिलती थी तब शूटिंग होती थी |
    3. बीचों-बीच पात्रों स्थानों दृश्य आदि की भी समस्याएं आ जाती थी |
    4. बारिश धूप अंधेरा प्रकाश उसकी भी समस्या आ जाती थी |
    5. आसपास  भीड़ वाले लोगों के कारण उत्पन्न समस्याएं | जैसे सुबोध दा, धोबी की समस्या,
    कुत्ते का मर जाना और एक पात्र मिठाई वाला मर जाता है | उसकी जगह पर वैसा ही मिलते
    जुलते आदमी की तलाश करने के कारण भी शूटिंग कुछ समय के लिए स्थगित करनी पड़ी |
    6. स्थान से संबंधित समस्याएं जैसे काश के फूल का नष्ट हो जाना कमरे में सांप निकल
    आना फिर से फूलों के लिए पूरा साल इंतजार करना |

    प्रश्न – किन दो  दृश्यों में दर्शक यह पहचान नहीं पाते कि उनकी शूटिंग में कोई तरकीब
    अपनाई गई है ?
    उत्तर –
    प्रथम दृश्य इस दृश्य में भूलो नामक कुत्ते को  अप्पू की मां द्वारा गमले में भात खाते हुए
    चित्रित करना था | परंतु पैसे खत्म होने के कारण यह दृश्य चित्रित ना हो सका 6 महीने
    के बाद लेखक पुनः उस स्थान पर गया तब तक कुत्ते की मौत हो चुकी थी | काफी प्रयास
    के बाद उसे मिलता जुलता कुत्ता मिला और उसे भात खाते हुए उस दृश्य को पूरा किया गया |
    यह दृश्य इतना स्वभाविक था कि कोई भी दर्शक उसे पहचान नहीं पाया कि कुत्ता बदला हुआ
    है |
    दूसरा दृश्य  इस दृश्य में श्रीनिवास नामक व्यक्ति मिठाई वाले की भूमिका निभा रहा था |
    बीच में शूटिंग रोकनी पड़ी दोबारा उस स्थान पर जाने से पता चला कि उस व्यक्ति का देहांत
    हो चुका है  | लेखक ने मिलते-जुलते व्यक्ति को लेकर बाकी दृश्य फिल्म आया | पहला
    श्रीनिवास आसमान से बाहर आता है और दूसरा श्रीनिवास कमरे की ओर पीठ करके मुखर्जी
    के घर के गेट के अंदर जाता है |  इस प्रकार इस दृश्य में भी दर्शक अलग-अलग कलाकार
    को पहचान नहीं पाए |

    फिल्मकार ने बताया कि पथेर पांचाली फिल्म का निर्माण करते समय अनेक समस्याओं का
    सामना करना पड़ा | उदाहरणस्वरूप तीसरा दृश्य फिल्म की शूटिंग में रेलगाड़ी पर अनेक 
    दृश्य दर्शाए गए किंतु जहां शूटिंग हो रही थी | गांव में रेलगाड़ी इतनी देर तक नहीं रूकती थी
    सभी दृश्य नहीं फिल्माए जाते | नई तरकीब अपनाई गई वहां से निकलने वाली अलग-अलग
    तीन रेलगाड़ियों पर दृश्य फिल्माए गए और फिर उन्हें आपस में जोड़ दिया गया | इस प्रकार
    तीन रेलगाड़ियों का दृश्य फिल्म आने पर भी दर्शक रेलगाड़ी को नहीं पहचान पाए |


    प्रश्न – भूलो की जगह दूसरा कुत्ता क्यों लाया गया उसने फिल्म के किस दृश्य को पूरा
    किया ?
    उत्तर –
    भूलो कुत्ते की मृत्यु हो जाने के कारण दूसरा कुत्ता लाया गया | फिल्म में दृश्य इस प्रकार था
    कि अप्पू की मां सर्व जया पप्पू को भात खिला रही थी और वह अपने तीर कमान से खेलने के
    लिए उतावला है | पप्पू   भात खाते-खाते कमान से तीर छोड़ता है और उसे लाने के लिए भाग
    जाता है | उसकी मां सर्व जया उसे भात खिलाने के लिए उसके पीछे दौड़ती है | भूलो कुत्ता
    वहीं खड़ा सब कुछ देख रहा है | उसका सारा ध्यान भात की थाली की ओर है और यह सारा
    दृश्य भूलो कुत्ते पर ही दर्शाया गया है |  इसके बाद दृश्य में अप्पू की मां बचा हुआ भात गमले
    में डाल देती है और यह बात भूलो कुत्ता का जाता है | यह दृश्य दूसरे कुत्ते से पूरा किया गया
    क्योंकि भूलो कुत्ता मर चुका था |

    प्रश्न – बारिश का दृश्य चित्रित करने में क्या मुश्किल है और उसका समाधान किस
    प्रकार हुआ ?
    उत्तर –
    फिल्मकार के पास पैसे का भाव था | अतः बारिश के दिनों में शूटिंग नहीं कर सके | जब
    उनके पास पैसा आया तो अक्टूबर का महीना शुरु हो चुका था | बरसात के दिन समाप्त
    हो चुके थे | शरद ऋतु में बारिश होना भाग्य पर निर्भर था | लेखक हर रोज अपनी टीम
    लेकर गांव में जाकर बैठ जाते थे | बादलों की ओर टकटकी लगाकर देखते रहते थे कि
    आज बारिश आएगी लेकिन बारिश नहीं आती | परंतु अचानक बदल छा  जाते थे और
    धुआंधार बारिश होने लगती थी इस तरह जो बारिश का दृश्य फिल्माया गया | इतना
    अवश्य हुआ कि बेमौसमी बरसात में भीगने के कारण अप्पू और दुर्गा दोनों बच्चों को
    ठंड लग गई |

    प्रश्न – किसी फिल्म की शूटिंग करते समय फिल्मकार को जिन समस्याओं का सामना
    करना पड़ता है उन्हें सूचीबद्ध कीजिए ?
    उत्तर –
    1. फिल्म बनाने के लिए बहुत सारे धन की आवश्यकता पड़ती है कई बार फिल्म पर
    अनुमान से भी अधिक खर्च हो जाता है |
    2. कलाकारों के कलाकारों का चयन करते समय बहुत सी बातो का ध्यान रखना
    पड़ता है |
    3. कई बार फिल्मकार को फिल्म की कहानी के अनुसार पात्र ही नहीं मिल पाते |
    4. फिल्म में काम करने वाले कलाकारों में से किसी एक की अचानक मृत्यु भी
    फिल्म की शूटिंग के लिए समस्या बन जाती है |
    5. स्थानीय लोगों का हस्तक्षेप व सहयोग भी कई बार फिल्मकार को अपनी फिल्म
    की शूटिंग किसी पिछड़े गांव में जाकर करनी होती है | जहां उन्हें गांव वालों का सहयोग
    प्राप्त नहीं हो पाता कई समस्याएं खड़ी हो
    जाती है |
    6. प्राकृतिक दृश्यों के लिए भी मौसम पर निर्भर होना पड़ता है |

    आरोह अध्याय 4 गद्य भाग

    प्रश्न – लार्ड कर्जन को इस्तीफा क्यों देना पड़ गया?
    उत्तर –
    लॉर्ड कर्जन भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के वायसराय बन कर आया | उसमें भारत में अंग्रेजी
    साम्राज्य की जड़े मजबूत करने और उनका वर्चस्व स्थापित करने का हर संभव प्रयास किया |
    भारत के लोगों पर भी उसने अनेक दमनकारी नीतियां बनाकर अधिकार जमा लिया था | लार्ड
    कर्जन के इस्तीफे के दो कारण थे |
    1. बंग भंग की योजना को मनमाने ढंग से लागू करने के कारण सारे भारतवासी उसके विरुद्ध
    उठ खड़े हुए | इस से कर्जन की जड़े हिल गई | वह इंग्लैंड वापस जाने के बहाने ढूंढने लगा |
    2. कर्जन ने फौजी अफसर को अपनी इच्छा से  नियुक्त करना चाहा | दबाव बनाने के लिए
    उसने इस्तीफा देने की बात कही  उसने सोचा नहीं था कि उनके रुतबे को देखते हुए अंग्रेजी
    सरकार उनकी बात मान लेगी | लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसके विपरीत अंग्रेजी सरकार ने उनका
    इस्तीफा ही मंजूर कर दिया और इंग्लैंड वापिस जाना पड़ा |
    प्रश्न – शिव शंभू की दो गायों के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
    उत्तर –
    शिव शंभू की दो गायों  के माध्यम से लेखक यह कहना चाहता है कि भारत के पशु हो या
    मनुष्य अपने संगी-साथियों के साथ गहरा लगाव रखते हैं | चाहे वह आपस में लड़ते झगड़ते
    भी हो तो भी उनका परस्पर प्रेम अटूट होता है | एक दूसरे से विदा होते समय वह दुख का
    अनुभव करते हैं | लेखक यह बताना चाहता कि भारत देश में भावनाएं प्रदान है | इसी प्रकार
    लॉर्ड कर्जन ने भारत में रहते हुए भारत वासियों को बहुत दुख पहुंचाया है | भारत वासियों को
    पतन की ओर धकेला है | फिर भी भारतवासियों को उसकी विदाई पर गहरा दुख अनुभव हो रहा है |

    प्रश्न – नादिरशाह से भी बढ़कर जिद्दी है लॉर्ड कर्जन के संदर्भ में क्या आपको यह बात सही
    लगती है पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए ?
    उत्तर –  
    जी हां, कर्जन के संदर्भ में ही हमें यह बात सही लगती है | क्योंकि नादिरशाह एक बड़ा ही क्रूर
    राजा था | उसने दिल्ली में कत्लेआम करवाया था | परंतु आसिफजहा ने तलवार गले में डाल
    कर उसके आगे समर्पण कर के कत्लेआम रोकने की प्रार्थना की तो तुरंत नादिरशाह ने कत्लेआम
    रोक दिया गया | परंतु जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया 8 करोड़ भारत वासियों
    की ओर से विनती बार-बार हो रही थी | परंतु उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी इस संदर्भ में कर्जन
    की जिद्द नादिरशाह से भी बड़ी है लॉर्ड कर्जन नादिरशाह से भीअधिक क्रूर था | उसने जनहित
    की अपेक्षा की है |

    प्रश्न – 8 करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद ना करने की प्रार्थना पर आपने जरा भी ध्यान
    नहीं दिया यह किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?
    उत्तर –
    लेखक बाबू बालमुकुंद जी यहां बंगाल के विभाजन की ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत करते
    हैं | लार्ड कर्जन दो बार भारत का वायसराय बनकर आया |उसने भारत पर अंग्रेजी का प्रभुत्व
    स्थाई करने के लिए अनेक काम किए | भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं को कुचलने के लिए
    उन्होंने बंगाल का विभाजन की योजना बनाई | देश की जनता कर्जन की ओर इस चाल को
    समझ गई | उन्होंने इस योजना का विरोध भी किया | परंतु भारतीय लोग पूरी तरह असहाय
    और लाचार थे | भारत के लोग बंगाल का विभाजन नहीं चाहते थे | किंतु उसने अपनी मनमानी
    करते हुए बंगाल को दो टुकड़ों में बांट दिया | पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल लेकिन भारत
    से जाते-जाते उन्होंने बंगाल का विभाजन कर दिया | यद्यपि उनका भारत में वायसराय बनने का
    कार्यकाल भी समाप्त हो चुका था |

    प्रश्न –  क्या  शान आप की देश में थी अब क्या हो गई कितने ऊंचे   होकर आप कितने
    नीचे गिरे पाठ के आधार पर आशय स्पष्ट कीजिए  ?
    उत्तर –
    लॉर्ड कर्जन को संबोधित करते हुए लेखक कहते हैं कि कुछ समय पहले तक भारत और
    ब्रिटिश साम्राज्य में आपकी जड़े बहुत मजबूत थी | लेकिन अब आप ने अपना मान सम्मान
    खो दिया | भारत में आपका बड़ा रुतबा था | दिल्ली दरबार में उनका वैभव चरम सीमा पर था |
    पति-पत्नी की कुर्सी सोने की थी | उनका हाथी सबसे ऊंचा और सबसे आगे रहता था | सम्राट
    के भाई का स्थान भी उनसे कम था | उनके  इशारे पर प्रशासक ,राजा, धनीआदमी नाचते थे |
    उनके संकेत पर बड़े-बड़े राजाओं को मिट्टी में मिला दिया गया और बहुत से निकम्मों को बड़े
    पदों पर रखा गया | परंतु बाद में यह स्थिति थी कि एक फौजी अफसर को भी आपके कहने
    के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने नहीं रखा | इससे भारत और ब्रिटिश साम्राज्य दोनों जगह पर
    आप का अपमान हुआ | आप बहुत ऊंचे उठकर भी बहुत नीचे गिर गए |