जिस रूपये को हम काले धन के नाम से पुकारते हैं, उसकी आत्मा तथा मन दोनों ही काला है। सरकारी टैक्स से बचने के लिए इसे अत्यन्त गुप्त एवं गोपनीय रखा जाता है और साथ ही विधिवत या लिखित रूप में भी इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता है। देश की अर्थव्यवस्था के लिए काला धन टी.बी. समान रोग है। यदि ठीक से इसका निदान नहीं किया गया तो देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो सकती है। देश की प्रगति एवं अर्थव्यवस्था दिनोंदिन अवनति की ओर बढ़ती जाएगी।
काले धन का हमारे आज के जीवन में और हमारे आर्थिक व्यवहार में कितना बड़ा हाथ है, इसके तरह-तरह के अनुमान लगाए जाते है। एक अर्थशास्त्री के अनुसार हमारा आधा आर्थिक व्यापार काले धन के बल पर ही चलता है। यह बात तो सच है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर इस काले धन ने बहुत ही अनिष्टकारी प्रभाव डाला है। इसका सबसे भयानक दुष्परिणाम यह है कि इसके कारण सरकार की तमाम नीतियां निष्फल जा रही हैं।
अगर किसी ने सफेद धन कमा लिया तो उसका एक बड़ा भाग करों के द्वारा छीन लिया जाता है। सफेद धन को परिश्रम से कमाया जाता है। उसका अधिकांश भाग करों और आज के बढ़े हुए मूल्यों के कारण हाथ से निकल जाता है और बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता है। इसके विपरीत काला धन आसानी से कमाया जाता है और इसे आसानी से छिपा भी लिया जाता है और उस पर कर चुकाने को प्रश्न ही नहीं उठता। काले धन से अभिप्राय उस धन से है जो सरकारी टैक्स से बचने हेतु बिना लिखा-पढ़ी किए हुए छिपाकर तथा गोपनीय रखा जाता है। चाहे चल संपत्ति हो अथवा अचल संपत्ति, सबके ऊपर कालेधन की काली छाया मंडरा नही है। काला धन व्यक्ति तक ही सीमित रहता है। इसका उपयोग भी सीमित हो जाता है। इससे देश की अत्यधिक क्षति हो रही है।
काले धन से एक और अनिष्टकारी प्रभाव पड़ रहा है। समाज का अधिकांश आर्थिक कारोबार सरकार की आंखों से छिपाकर किया जाता है और सरकार को बचे-खुचे संकुचित क्षेत्र पर अपना नियंत्रण रखकर करना पड़ता है। हमारा सामाजिक जीवन भी इस काले धन से खोखला होता जा रहा है। जिन सामाजिक गुणो से हमें पे्ररणा लेनी चाहिए, वे गुण नष्ट होते जा रहे हैं और जिन असामाजिक तŸवों की रोकथाम होनी चाहिए, वे ’दिन दूना राज चैगुना’ करते जा रहे है। आज प्रायः हर व्यवसायी काला धन कमाने और उसे छुपाने में ही व्यस्त रहता है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 250 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा चोरी की जाती है, जिसकी काले धन के अन्तर्गत ही गणना करनी चाहिए। इस कालेधन के कारण धन का संचय सीमित लोगों के हाथों में सिमटा है। ’काले धन’ का संचय केवल धनिक वर्ग तक सीमित रहता है क्योंकि निर्धन का तो कठोर श्रम करने के पश्चात भी बड़ी कठिनाई से पेट भर पाता है। धनिक लोग ’काले धन’ के माध्यम से समाज में महंगाई का घातक विष प्रसारित करते रहते हैं।





















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