एशियाई खेल प्रतियोगिता

     भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहा और इस गुलामी के कारण हम हर क्षेत्र में पिछड़ते चले गए। क्रीड़ा-क्षेत्र में भी हमारी यही स्थिति रही। लेकिन इन दिनों प्रत्येक क्षेत्र में हमारा विकास हो रहा है और खेलों में भी हम अब दुनिया से बहुत पीछे नहीं चल रहे हैं। बावजूद इस सब के, अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में हमारी उपलब्धि कम है। इसी भावना से आहत और प्रेरित होकर हमारे तत्कालीन लोकप्रिय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई खेल प्रतियोगता की नींव रखने में सक्रिय भूमिका निभाई। एशियाई खेल-प्रतियोगता को ही ’एशियाड’ कहा जाता है। हम भारतीयों के लिए तो यह और भी खुशी की बात हुई कि प्रथम एशियाड का आयोजन 4 मार्च 1952 ई. को भारत की धरती पर ही हुआ। ओलम्पिक व राष्ट्रमंडल खेलों के बाद यह विश्व का सबसे बड़ा क्रीड़ा-समारोह है। इस समारोह में एशिया महादेश के प्रायः सभी देशों के खिलाड़ी बिना जाति, लिंग, धर्म एवं रंग व भेद-भाव के हिस्सा लेते हैं। इसका आयोजन चार वर्षों के अन्तराल पर किया जाता है।

                4 मार्च 1952 ई. को प्रथम एशियाड के आयोजन के अवसर पर पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रसारित संदेश इस आयोजन के उ६ेश्य को स्पष्ट कर देता है। नेहरूजी के ये शब्द खेल और खिलाड़ियों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं-

                “खिलाड़ियों के इस अन्तर्राष्ट्रीय मिलन का एक और भी महत्वपूर्ण पहलू ह। इनमें अनेक देशों के युवा लोग शामिल होते हैं और इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को बढ़ावा मिलता है। प्रत्येक खिलाड़ी को अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए, चाहे वह हारे, चाहे जीते। उसे दोष मुक्त होकर खेल की भावना से ही खेल खेलना चाहिए।“

                सन् 1952 ई. के प्रथम एशियाड में मात्र 6 खेल ही खेले गए थे। प्रतियोगी देशों की संख्या भी मात्र ग्यारह ही थी। किन्तु वर्तमान में इस आयोजन में सम्मिलित खेलों की संख्या तीस से ऊपर हो चुकी है। इन खेलों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर के विजेताओं को क्रमशः स्वर्ण, रजत एवं कांस्य-पदक प्रदान किया जाता है। पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी एवं संबंधित देश कि लिए गौरव की बात है। इन दिनों एशियाई खेलों में चीन का वर्चस्व है। जापान दूसरे स्थान पर रहता है तथा भारत प्रायः पांचवें व सातवें स्थान पर रहता है।

                अब तक दो बार-प्रथम और नौवें एशियाड की मेजबानी करने का सुअवसर  भारत का मिल चुका है। नवें एशियाड को तो बड़ी धूमधाम से नई दिल्ली में आयोजित किया गया। 19 नवम्बर 1982 ई. को तत्कालीन राष्ट्रपति माननीय ज्ञानी जैल सिंह द्वारा इसका उद्घाटन हुआ और 4 दिसम्बर 1982 का उसी गरिमा के साथ इसका समापन भी किया गया। इस आयोजन का सफल बनाने के लिए दिल्ली में कुल सत्रह स्टेडियम तैयार किए गए। जिनमें जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इन्द्रप्रस्थ स्टेडियम और तालकटोरा स्टेडियम उल्लेखनीय हैं।

क्या संसदीय लोकतंत्र असफल हो गया है ?

        भारत द्वारा स्वतंत्रता के बाद संसदात्मक लोकतंत्र अपनाए जाने के बाद कई पश्चिमी विद्वानों का कहना था कि धार्मिक महानता, सामाजिक भेदभाव तथा मूलतः असंगठन में लिप्त भारत संसदीय लोकतंत्र के उपयुक्त नहीं है, परन्तु उनके ये आक्षेप चूर-चर हो गए, जब विभाजन के बाद राष्ट्रीय सरकार ने 552 रियासतों को भारत में मिला लिया। इसलिए मौरिस जोन्स का कहना था कि भारत में संसदीय राजनीति का प्रतिरूप उदय हो चुका है। उसने उस समय का सब भ्रान्तियों को दूर कर दिया हो भारत में संसदीय लोकतंत्र की सफलता के बारे में उत्पन्न की गई थी।

                वर्तमान में समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र असफल हो गया है और इसकी जगह राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू की जाए। राष्ट्रपति शासन वह शासन है जिसमें कार्यपालिका अपनी अवधि, शक्तियों और कार्यांे के सम्बन्ध में व्यवस्थापिका से स्वतंत्र रहती है। इस व्यवस्था में राष्ट्रपति राज्य एवं सरकार दोनों का प्रधान होता है। संसदीय लोकतंत्र सुचारू रूप से चल सके, क्या वह भारत में विद्यमान है। इन शर्तों में अनुशासन, चरित्र, संयम, नैतिकता की उच्च भावना, अल्पसंख्यक दृष्टिकोण को सुनने की तत्परता, राजनीतिक सहिष्णुता तथा सहनशाीलता की आवश्यकता होती है।

                जहां तक पहली शर्त अनुशासन की बात है, हमारे प्रतिनिधियों का  अमर्यादित आचरण जगजाहिर है। संसद भवन में ये लोग एक-दूसरे की आलोचना करते हैं, गाली-गलौज करते हैं; असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं। राज्यों की विधानसभाओं में तो स्थिति कई बाद भारी अराजकता की सी बन जाती है। चरित्रवान व्यक्ति का आज संसद में पहुंचना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि राजनीति का अपराधीकरण एवं अपराध का राजनीतिकरण हो गया है। चुनाव के दौरान बूथ कैप्चरिंग, धन के बला पर वोटों को खरीदना तो आम बात है।

                संसदीय लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेही होती है। इस जवाबदेही की उपेक्षा के चलते हमारे संसदीय लोकतंत्र का क्षरण हुआ है। संसद के लिफ्ट संख्या-2 के निकटवर्ती गुम्बज का भिŸिा लेख दो शाश्वत गुणों- सत्य और धर्म-पर जोर देते हैं, सिसका संसद को पालन करना चाहिए। अंकित सूक्ति कहती है-“सभा वा न प्रवेष्टव्या, वक्तवयं वा सामंजसम अबुवन विबुवन वापि, नरो भवति किल्विषी।“ जिसका हिन्दी अर्थ है-कोई व्यक्ति या तो सभा में प्रवेश ही न करे अथवा यदि व ऐसा करे तो वहां धर्मासुनार बोलना चाहिए क्योंकि न बोलने वाला असत्य बोलने वाला मनुष्य दोनों ही पाप के भागी होते हैं। इस सूक्ति की रोशनी में जब हम अपने सांसदों के आचरण का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हमारे जनप्रतिनिधि अपने मतदाताओं और अन्तर्वस्तु में संसदीय लोकतंत्र को समृद्ध करने के लिए क्या करते हैं। इनके आचरण व राजनीति से ही आम जन को घृणा पैदा होने लगी है, जिसके लिए इसका स्वयं का गैर जिम्मेदाराना जनविरोधी आचरण मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

                दल-बदल संसदीय लोकतंत्र का शोक कर्म है। दल-बदल विरोधी कानून बनाए जाने के बावजूद हमारी संसदीय व्यवस्था को घुन की तरह खा रहे इस गम्भीर रोग को रोकने के लिए हमारी संसद ने कठोर कदम नहीं उठाया क्या ऐसा कठारे कानून नहीं बनाना चाहिए जिससे दल-बदल करने वाले संासद एवं विधायक को तत्काल प्रभाव से अपनी सीट से त्यागपत्र देना पड़े इसके साथ ही गैर जिम्मेदारी एवं निजी लोभा से प्रेरित प्रतिनिधियों को जनता द्वारा वापस बुलाने (राइट टू रीकाॅल) का अधिकार दे देला चाहिए।

                अनेक लोग तर्क दे रहे हैं कि बहुदलीय प्रणाली संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए उŸारदायी है। लेकिन यदि ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र का उदाहरण लिया जाए तो वहां भी शुरू में बहुदलीय प्रणाली थी, लेकिन वहां की जागरूक जनता ने अन्य दलों का नकार दिया तथा यह परम्परा बना दी कि दो ही दल उचित है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बहुदलीय प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए जनता को शिक्षित किया जाए एवं उन्हें जागरूक बनाया जाए, जिससे भारत में संसदीय लोकतंत्र समृद्ध हो सके। आज लोकतन्त्रीय संस्थाओं में बढ़ती अनास्था का ही परिणाम है कि केन्द्रीयकरण की घातक प्रवृŸिा बढ़ रही है और राष्ट्रपति शासन प्रणाली है कि केन्द्रीयकरण की घातक प्रवृŸिा बढ़ रही है और राष्ट्रपति शासन प्रणाली की मांग एक तरफ से तो जायज दिखाई देती है। राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना जी जाए, जिसमें राष्ट्रपति के हाथों में सम्पूर्ण शासन होता है तो इससे लोकतंत्र का मूल उ६ेश्य ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि संसदीय लोकतन्त्र में प्रशासन का कार्यभार जनता द्वारा  चुले गए प्रतिनिधियों को रहता है। जबकि राष्ट्रपति प्रणाल में राष्ट्रपति प्रशासनिक पदों पर अपने मनुकूल व्यक्तियों की नियुक्ति करता है। इसलिए इस प्रणाली में जनता की अनदेखी हो सकती है और भारत जैसे विकासशील देश के लिए तो यह और खतरलाक हो सकता है। इसके अतिरिक्त हमारे यहां सैनिकों को प्रशासन से अलग रखा गया है। इसलिए यदि एकाएक राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना जी जाती है तो इन सैनिकों के माध्यम से राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है और भाता की लोकतांत्रिक एवं सांविधानिक भावनओं को ठेस पहुंच सकती है।

                आवश्यकता है भारतीय संसदीय लोकतंत्र की जो कमजोरियां हैं, उन्हें दूर किया जाए क्योंकि संसदीय लोकतांत्रिक परिवेश में ही समस्याओं का समाधान हो सकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि सम्पूर्ण समाज के जनवादीकरण के लिए चैतरफा प्रयास चलाया जाए। जनवाद की विरोधी सामंती शक्तियों को श्किस्त दी जाए। राज्य मशीनरी का जनवादीकरण किया जाए, जिससे आम जनता की भागीदारी बढ़ेगी। केवल संसदीय लोकतंत्र में ही जन शिक्षण हो सकता है, क्योंकि इस व्यवस्था में सरकार जनता की आवश्कताओं के प्रति अनुक्रियाशील रहती है। साथ जी यह कहा जा सकता है कि केवल इसी व्यवस्था में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का रक्षण हो सकता है।

                निष्कर्षतः, यह कहा जस सकता है कि राष्ट्रपति शासन की मांग विचार के स्तर पर तो ठीक है, लेकिन यह कहना कि अपने देश की समस्याएं इसी तरह ठीक हो सकती हैं-इस कहावत को चरितार्थ करता है कि ’नाच न जाने आंगन टेढ़ा’। इसीलिए हमारी संसद का लोकतंत्र को जमीना स्तर पर मजबूत करने के कार्य में लगना चाहिए, तभी संसदीय लोकतंत्र का वृक्ष फलदायी वृक्ष के रूप में विकसित हो सकता है अन्यथा समस्याएं बढ़ती जाएंगी।

काला धन: समस्या एवं समाधान

        जिस रूपये को हम काले धन के नाम से पुकारते हैं, उसकी आत्मा तथा मन दोनों ही काला है। सरकारी टैक्स से बचने के लिए इसे अत्यन्त गुप्त एवं गोपनीय रखा जाता है और साथ ही विधिवत या लिखित रूप में भी इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता है। देश की अर्थव्यवस्था के लिए काला धन टी.बी. समान रोग है। यदि ठीक से इसका निदान नहीं किया गया तो देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो सकती है। देश की प्रगति एवं अर्थव्यवस्था दिनोंदिन अवनति की ओर बढ़ती जाएगी।

                काले धन का हमारे आज के जीवन में और हमारे आर्थिक व्यवहार में कितना बड़ा हाथ है, इसके तरह-तरह के अनुमान लगाए जाते है। एक अर्थशास्त्री के अनुसार हमारा आधा आर्थिक व्यापार काले धन के बल पर ही चलता है। यह बात तो सच है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर इस काले धन ने बहुत ही अनिष्टकारी प्रभाव डाला है। इसका सबसे भयानक दुष्परिणाम यह है कि इसके कारण सरकार की तमाम नीतियां निष्फल जा रही हैं।

                अगर किसी ने सफेद धन कमा लिया तो उसका एक बड़ा भाग करों के द्वारा छीन लिया जाता है। सफेद धन को परिश्रम से कमाया जाता है। उसका अधिकांश भाग करों और आज के बढ़े हुए मूल्यों के कारण हाथ से निकल जाता है और बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता है। इसके विपरीत काला धन आसानी से कमाया जाता है और इसे आसानी से छिपा भी लिया जाता है और उस पर कर चुकाने को प्रश्न ही नहीं उठता। काले धन से अभिप्राय उस धन से है जो सरकारी टैक्स से बचने हेतु बिना लिखा-पढ़ी किए हुए छिपाकर तथा गोपनीय रखा  जाता है। चाहे चल संपत्ति हो अथवा अचल संपत्ति, सबके ऊपर कालेधन की काली छाया मंडरा नही है। काला धन व्यक्ति तक ही सीमित रहता है। इसका उपयोग भी सीमित हो जाता है। इससे देश की अत्यधिक क्षति हो रही है।

                काले धन से एक और अनिष्टकारी प्रभाव पड़ रहा है। समाज का अधिकांश आर्थिक कारोबार सरकार की आंखों से छिपाकर किया जाता है और सरकार को बचे-खुचे संकुचित क्षेत्र पर अपना नियंत्रण रखकर करना पड़ता है। हमारा सामाजिक जीवन भी इस काले धन से खोखला होता जा रहा है। जिन सामाजिक गुणो से हमें पे्ररणा लेनी चाहिए, वे गुण नष्ट होते जा रहे हैं और जिन असामाजिक तŸवों की रोकथाम होनी चाहिए, वे ’दिन दूना राज चैगुना’ करते जा रहे है। आज प्रायः हर व्यवसायी काला धन कमाने और उसे छुपाने में ही व्यस्त रहता है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 250 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा चोरी की जाती है, जिसकी काले धन के अन्तर्गत ही गणना करनी चाहिए। इस कालेधन के कारण धन का संचय सीमित लोगों के हाथों में सिमटा है। ’काले धन’ का संचय केवल धनिक वर्ग तक सीमित रहता है क्योंकि निर्धन का तो कठोर श्रम करने के पश्चात भी बड़ी कठिनाई से पेट भर पाता है। धनिक लोग ’काले धन’ के माध्यम से समाज में महंगाई का घातक विष प्रसारित करते रहते हैं।

ओलम्पिक खेल प्रतियोगिता

    ओलम्पिक अन्तर्राष्टीय स्तर पर प्रत्येक चार वर्षों में आयोजित होने वाला विश्व का सबसे विशालतम खेल-मेला है जिसमें, विश्व के लगभग सभी देशाों के खिलाड़ी जाति, धर्म, राजनिति, भाषा एवं सम्प्रदाय का भेद-भाव भुलाकर एक जगह एकत्रित हो अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। इन खेलों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर के विजेताओं को क्रमाशः स्वर्ण, रजत एवं कांस्य-पदक प्रदान किया जाता है। ओलम्पिक में पदक जीतना खिलाडी़ एवं राष्ट्र दोनों के लिए गौरव का विषय है।

                ओलम्पिक का इतिहास काफी पुराना है। सर्वप्रथम 776 ई. पूर्व यूनान के नगर एथेंस के ओलम्पिया पर्वत की तलहटी में खेलों की एक प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। बाद में ओलम्पिया पर्वत के नाम पर ही इस आयोजन का नाम ओलम्पिक पडा़। समय के साथ-साथ इसकी परम्परा एवं स्वरूप में धीरे-धीरे संशोधन एवं परिवर्धन होते गए। अब ओलम्पिक सारे विश्व को अपने में समाहित किए हुए है। आधुनिक ओलम्पियन खेलों के आयोजन का मुख्य श्रेय यूनान-निवासी ’पियरे द कुबर्तिन’ को जाता है, जिनके अथक प्रयास के फलस्वरूप ओलम्पिक का वर्तमान विशाल स्वरूप विश्व के सामने हैं।

                ओलम्पिक का एक झण्डा है जिसक रंग सफेद है और इसमें आपस में जुडे़ पांच गोले अंकित हैं।  ये गोले पंाच महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उद्घाटन के समय मशाल जलाकर हजारों कबूतरों को आकाशा में उड़ाया जाता है, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना एवं शांति का प्रतीक माना जाता है।

                आधुनिक ओलम्पिक का प्रथम आयोजन सन् 1896 में यूनान के एथेंस नगर में ही हुआ था। इसके बाद से प्रति चार वर्षो के अन्तराल पर विश्व के बडे़-बड़े नगरों में ओलम्पिक का आयोजन होता चला आ रहा है। अंतराल आया केवल दो बार, जब प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इन खेलों का आयोजन रद्द का देना पड़ा था।

खेल में हार और जीत का विशेष महत्व पहीं होता । महत्व होता है अनुशासन, भइचारे ओर इमानदारी का। 1996 ई. के आलम्पिक में इन्हीं कारणों से भारत को हाॅकी में ’फेयर प्ले एवार्ड’ मिला। जिस खेल-स्पर्धा में उŸाम खेल तकनीक के साथ-साथ जितना अधिक अनुशासन, ईमानदारी और बन्घत्व का भाव रहता है, उस खेल का उतना ही उत्कृष्ट माना जाता है। ओलम्पिक -आयोजन का उद्देश् खेलों के माध्यम से सारे जगत को एक सूत्र में जोडनस है। वस्तुतः ’वसुधैव कुटुम्बकम’ ही ओलम्विक का नारा है। 

इन्टरनेट का बढ़ता प्रभाव

      इंटरनेट दूनिया भर में फैले कम्प्यूटरों का एक विशाल संजाल है जिसमें ज्ञान एवं सूचनाएं भौगोलिक एवं राजनितिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए अनवरत प्रवाहित होती रहती है। उस संजाल में कुछ ऐसे कम्प्यूटर होते हैं जो सर्वदा सक्रिय  रहते हैं और कुछ ऐसे कम्प्यूटर होते हैं जो उपभोक्ताओं के द्वारा आवश्यकता पड़ने पर खोले  जाते हैं। जो कम्प्यूटर इस संजाल में सर्वदा खुले  होते हैं, वह संजाल उन्हीं कम्प्यूटरों के द्वारा चलता है। ऐसे कम्प्यूटर को सर्वर कहते है। इन्टरनेट के संजाल में ऐसे कई सर्वर होते हैं और ये सभी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। हम जब कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं तो इन्हीं में से किसी एक सर्वर से अपने कम्प्यूटर का संबंध स्थापित करते हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

                इंटरनेट का प्रारम्भ आज से लगभग साढे़ तीन दशक पूर्व अमेरिका के रक्षा विभाग के एक शोध प्रकल्प के रूप में हुआ था। उस समय इस शोध में लगे वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि दो अलग-अलग स्थानों पर स्थित कम्प्यूटरों के माध्यम से आंकडों एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान कैसे किया जाए। शीत युद्ध के दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया के तीन मेनफ्रेम कम्प्यूटर और यूटा के एक मेनफ्रेम कम्प्यूटर को आपस में जोड़ा गया और इसे अर्पानेट  कहा गया। इस शोध परियोजना के लिए अमेरिका की उन्नत अनुसंधान परियोजना ऐजेंसी  धन उपलब्ध करा रही थी, इसलिए नेटवर्क का यह नाम रखा गया। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सियोनार्ड क्लिनराॅक एवं उनके साथियों द्वारा किए गए एक प्रयोग से दिनांक 2 सितम्बर 1969 को इस कार्य को अंजाम मिला। डाॅ. क्निराॅक को इन्टरनेट का जन्मदाता माना जाता है। इन्टरनेट के स्थापना के पीछे उद्देश्य यह था कि परमाणु हमले की स्थिति में संचार के एक जीवंत नेटवर्क को बनाए रखा जाए। लेकिन जल्द ही रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला से हटकर इसका प्रयोग व्यावसायिक आधार पर होने लगा । फिर इन्टरनेट के व्यापक स्तर पर उपयोग की संभवनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ और बड़ी-बडी़ कम्पनियों ने इस नेटवर्क को व्यापक स्तर पर स्थापित करने के लिए अपना धन लगाना प्रारम्भ कर दिया। 1992 ई. के बाद इन्टरनेट पर ध्वनि एवं वीडियो का आदान-प्रदान संभव हो गया। अपनी कुछ दशकों की यात्रा में ही इन्टरनेट ने आज विकास की कल्पनातीत दूरी तय कर ली है। आज के इन्टरनेट के संजाल में छोटे-छोटे व्यक्तिगत कम्म्यूटरों से लेकर मेनफ्रेम और सुपर कम्प्यूटर तक परस्पर सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं। आज जिसके पास भी अपना व्यक्तिगत कम्प्यूटर  है वह इंटरनेट से जुड़ने की आकांक्षा रखता है।

                इन्टरनेट आधुनिक विश्व के सूचना विस्फोट की क्रांति का आधार है। इन्टरनेट के ताने-बाने में आज पूरी दुनिया है। विश्व के जिस शहर में इन्टरनेट की सुविधा उपलब्ध है, वह शहर सूचना के सुपर हाइवे का हिस्सा है। दुनिया में जो कुछ भी घटित होता है और नया होता है वह सुपर हाइवे के उस शहर में तत्काल पहुंच जाता है। इन्टरनेट आधुनिक सदी का ऐसा ताना बाना है, जो अपनी स्वच्छन्द गति से पूरी दुनिया को अपने आगोश में लेता जा रहा है। कोई सीमा इसे रोक नहीं सकती। यह एक ऐसा तंत्र है, जिस पर किसी एक संस्था या व्यक्ति या देश का अधिकार नहीं है बल्कि सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ताओं की सामूहिक संपत्ति है। इन्टरनेट सभी संचार माध्यमों का समन्वित एक नया रूप है। पत्र-पत्रिका, रेडियों और टेलीविजन ने सुचनाओं के आदान-प्रदान के रूप् में लिस सूचना क्रांति का प्रवर्तन किया था, आज इन्टरनेट के विकास के कारण वह विस्फोट की स्थिति में है। इन्टरनेट में माध्यम से सूचनाओं के आदान-प्रदान एवं संवाद आज दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पलक झपकते संभव हो चुका है।

उत्पाद पेटेंट व्यवस्था

विश्व व्यापार संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पेटेंट अधिनियम में संशोधन हेतु एक अध्यादेश 25 दिसम्बर 2004 को जारी किया। इससे बहुविवादित रही उत्पाद पेटेंट  व्यस्था 1 जनवरी 2004 से प्रभावी हो गई। इसके पूर्व 1999 एवं 2002 के पेटेंट (संशोधन) अधिनियमों के जरिये प्रक्रिया पेटेंट को लागू कर दिया गया था, जबकि दवाओं, रसायनों एवं अनाज के मामलों में उत्पाद पेटेंट अभी तक लम्बित था। अन्य क्षेत्रों में उत्पाद पेटेंट का प्रावधान पहले के संशोधन के जरिये किया जा चुका था। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत भारत को दवाओं, खाद्य पदार्थो व रसायनों के मामले में उत्पाद पेटेंट व्यवस्था को 1 जनवरी 2005 तक लागू करना था। इस प्रतिबद्धता को सन्दर्भित अध्यादेश के जरिये पूरा किया गया है।

विश्लेषकों का मत है कि उत्पाद पेटेंट व्यवस्था लागू होने से शरू के कुछ वर्ष तक भले ही इसका अधिक प्रभाव आम व्यक्तियों पर न पडे़, किन्तु उन्नत दवाओं, रसायनों, कृषि बीजों के मूल्यों में भारी वृद्धि इसके परिणामस्वरूप अन्ततः होगी। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत नई खोजों पर आधारित उत्पादों के 20 वर्ष तक विपणन का विशेषाधिकार केवल शोधकर्ता व्यक्ति अथवा कम्पनी को प्रप्त होगा तथा उसे उसके मूल्य निर्धारण की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। इन आलोचनाओं का खण्डन करते हुए सरकार ने दावा किया है कि नए अध्यादेश के कारण न तो दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होंगी और न ही भारतीय उद्योगों पर इसका बुरा असर पडे़गा। नयी पेटेण्ट व्यवस्था में भारतीय फार्मा इण्डस्ट्री को उन्नति के पहले से अधिक अवसर प्राप्त होंगे तथा बाजार में प्रतिस्पद्र्धा बढ़ने से दवाएं सस्ती भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में तीन तथ्यों का हवाला सरकार ने दिया है। एक तो यह कि बाजार में उपलब्ध 97 प्रतिशत दवाएं पेटेंट के दायरे में आती ही नहीं, इसलिए उनके महंगा होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। दूसरे पेटेंट के दायरे में आने वाली बाकी तीन प्रतिशत दवाओं में से भी अनेक ऐसी हैं जिनके बाजार में विकल्प उपलब्ध हैं और तीसरे भारत सरकार ने संशोधित कानून में जनहित की दृष्टि से 7 ऐसे विशेष प्रावधान रखे हैं जिनके जरिये सरकार किसी भी पेटेंट का रद्द करने, पेटेंटशुदा प्रोडक्ट का आयात करने अथवा किसी भी आविष्कार को अपने लिए इस्तेमाल करने का अधिकार रख सकेगी।

विदित है कि एक दशक पूर्व भारत में पेटेंट कानून की बात डराती थी, क्योंकि ऐसे कानून से सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा होता नजर आता था, किन्तु अब हालात बदल गए हैं। अब स्वयं भारतीय दवा कम्पनियों को विश्व बाजार में झण्डे गाड़ने के लिए पेटेंट संरक्षण की आवश्यकता है। 10 वर्ष पूर्व भारत का फार्म निर्यात 4 हजार करोड़ रूपये था जो आज बढ़कर 14 हजार करोड़ रूपये हो गया है। भारतीय फार्मा निर्यात अब प्रति वर्ष 30 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है और कम्पनियां अब अपने टर्न-ओवर का 6 से 8 प्रतिशत भाग अनुसन्धान (त्-क्) मे लगा रही हैं। इन परिस्थितियों में कडे़ पेटेंट कानून से भारतीय दवा बाजार को नुकसान नहीं, फायदा होने जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि ट्रिप्स समझौते के अनुपालन हेतु 1970 के पेटेंट अधिनियम (जो 20 अप्रैल 1972 से प्रभावी हुआ) में यह तीसरा संशोधन 26 दिसम्बर 2004 के आध्यादेश के जरिये किया गया तथा 23 मार्च 2005 को इसे संसद के दानो सदनों द्वारा पारित कर दिया गया। पहला संशोधन मार्च 1999 में अधिसूचित किया गया, जो 1 जनवरी 1995 से प्रभावी हुआ था। जून 2002 में अधिसूचित दूसरा संशोधन 1 जनवरी 2000 से प्रभावी हुआ था जबकि तीसरा संशोधन 1 जनवरी 2005 से प्रभावी हुआ था।

गंगा नदी – हमारी सांस्कृतिक गरिमा

गंगा पतित पावनी कहलाती है। पुण्य सलिला गंगा, गीता और गौ-इन तीनों को हमारी संस्कृति का आधार तत्व माना गया है। इसमें गंगा का स्थान प्रमुख है। इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि गंगा विष्णु के चरण-नख से निःसृत होकर ब्रह्या के कमण्डलु और तत्पश्चात शिव की जटाओं में विश्राम पाती हुई भगीरथ के अथक प्रयास के फलस्वरूप पृथ्वी पर अवतरित हो पाई है। पृथ्वी पर आते ही इसने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को शाप से मुक्त कर दिया। तब से अब तक न जाने कितने पतितों का उद्धार इसने किया। इसकी पावन पुलिन पर याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, अंगिरा, विश्वामित्र आदि ऋषि-मुनियों के आश्रम थे, जहां से ज्ञान की किरणें प्रस्फुटित होती थीं गंगा पुत्र भीष्म के पराक्रम को कौन नहीं जानता? इसकी पविता तो सर्वविदित है ही। ऐसी मान्यता है कि मरते समय व्यक्ति के मुख में अगर गंगा जल पड़ जाए तो व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, गंगा को हमारी संस्कृति में मां का स्थान दिया गया है। जैसे जन्मदात्री मां पुत्रों का दुख हरकर सुख देती है, वैसे ही गंगा भक्तों के लिए दुखहरणी और समस्त आनन्द-मंगलों की जननी है। गोस्वामी जी गंगा महात्म्य के बारे में लिखते हैंः-     ग्ंगा का अतीत जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान भी उतना ही प्रभावशाली है। हिमालय भारत का रजत-मुकुट है और गंगा इसके वक्षस्थल का हीरक-हार। हिमालय से निःसृत होने के कारण इसके जल में जड़ी-बूटियां मिली होती हैं। इसलिए गंगाजल का स्नान और पान दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हितकर हैं। इसके तट पर बड़े-बडे़ महानगरों का आर्विभाव हुआ है, यथा ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, कोलकाता इत्यादि। ये नगर धार्मिक एवं व्यावसायिक-दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण हैं। गंगोत्री से निकलकर बंगाल की खाड़ी से मिलने तक गंगा लंबी दूरी तय करती है। इस बीच गंगाजल से सिंचित भूमि (गंगा का मैदान) सोना उगलने लगाती है। इसके तटों पर हरे-भरे जंगल हैं, जो पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं। इस प्रकार गंगा आध्यात्मिक एवं भौमिक दोनों दृष्टिकोणों से भारत के लिए वरदान है। गीमा में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-’स्त्रोतसामस्ति जाहृवी’ (10/31) अर्थात मैं नदियों में गंगा हूं।

                आज इनती पवित्र और उपयोगी गंगा हमारे कुकृत्यों से दूषित हो चली है। बडे़-बडे़ नगरों का प्रदूषित जल एवं कल-कारखानों से निकले विषैले स्त्राव को सीधे गंगा में प्रवाहित किया जा रहा। यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसकी शु़िद्ध के लिए केन्द्र सरकार ने ’गंगा सफाई योजना’ शुरू की है। परन्तु अभी तक इसके सार्थक परिणाम नहीं प्राप्त हो सके हैं। हमें तो गंगा की वह पूर्ण स्थिति प्राप्त करनी है, जब कहा जाता था-’गंगा तेरा पानी अमृत’। अतः हम भारतीयों का यह पुनीत कर्Ÿाव्य है कि गंगा को प्रदुषित होने से बचाएं।

                सच पूछा जाए तो भातर की मर्यादा गंगा में निहित है औार गंगा की मर्यादा भारत में। गंगा की कहानी भारतीय संस्कृति का इतिहास है। वैदिक युग से इस वैज्ञानिक युग तक सामाजिक तथा राजनीतिक उत्थान- पतन की सारी गाथाएं गंगा की लहरों तथा तटवर्ती शिलाओं पर अंकित है।

गंगा-प्रदुषण की समस्या

पुण्य-सलिला गंगा के जल को सर्वपापहारी, सर्वरोगहारी अमृत-तुल्य माना गया है। यही कारण है कि हिन्दुओं के अनेक तीर्थ हरिद्वार, काशी, प्रयाग आदि गंगा के तट पर स्थित हैं। आर्थिक दृष्टि से गंगा के उपकारों का भारत सदैव ऋणी रहेगा। अनगिनत कल-कारखाने गंगा-तट पर स्थापित किए गए हैं तथा उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल का विशाल क्षेत्र गंगा-जल से सिंचित उर्वर कृषि-क्षेत्र. बना हुआ है। तथापि राष्ट्र का दुर्भाग्य है कि ज्यों-ज्यों जनसंख्या बढ़ती जा रही है त्यों-त्यों गंगा का जल विभिन्न रूपों मंे अधिकाधिक प्रदुषित होता जा रहा है।

                हिमालय के अंक में अवस्थित गंगोत्री से जन्मी हिमालय पर होने वाली वर्षा की विभिन्न जल-धाराओं से गंगा ने नदी का स्वरूप धारण किया। उस क्षेत्र में गंगा निश्चय ही पुण्य सलिला है और उसकी गति में प्रखरता है। किन्तु मैदानी क्षेत्र में उतरते ही उसके प्रदुषण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण गंगा-तट पर घनी आबादी के शहर और गांव विकसित हो गए हैं। उन बस्तियों का सारा कूड़ा-करकट तथा उनसे निकलता हुआ गंदे नाले-नालियों का जल गंगा में दिन-रात समाता रहता है। गंगा तट पर बसे हुए छोटे-बड़े शहरों की संख्या लगभग 920 है। कहा जाता है कि परम पावनी काशी नगरी से ही प्रतिवर्ष लगभग 10 करोड़ लीटर दूषित जल गंगा मंे प्रवाहित होता है। बनारस से ही लगभग 9000 शव प्रतिवर्ष गंगा के किनारे जलाए या बहाए जाते हैं। अधजले मुर्दे बहा देना तो आम बात है। इसी तरह अन्य क्षेत्रों से भी गंदा जल तथा कूड़ा-कचरा गंगा में बहता रहता है।

                कानपुर के निकट से जब गंगा गुजरती है तब कल-कारखानों से भी गंगा-जल प्रदुषित होता है। कानपुर महानगर के चर्म शोधन संयंत्रों से बहुत घातक रासायनिक अवशेष गंगा में बहाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त कपड़ा-मिलों और सैकड़ों प्रकार के अन्य उद्योगों के द्वारा गंगा प्रदूषित होती रहती है। जूट, रसायन, धातु, नगरीय मल, चिकित्सकीय यंत्र, चमड़ा उद्योग, कपड़ा मिल आदि विभिन्न स्त्रोतों से गंगा का अमृत निरन्तर जहर बन रहा है। गंगा-तट पर स्थित उत्तर प्रदेश की औद्योगिक इकाइयों में से अधिकांश कानपुर में स्थित हैं। बिहार से होकर बंगाल की दिशा मंे बढ़ती हुई गंगा को इसी तरह प्रदूषण की भेंट स्वीकार करनी पड़ती है। बंगाल में यह हुगली कहलाती है। हुगली के दोनो तटों पर कोलकाता और उसके निकटवर्ती क्षेत्र मंे उद्योगों की बहुत सी इकाइयां कार्यरत हैं और उन सबसे रासायनिक प्रदूषण दिन-रात हुगली में खपता रहता है। महानगर से करोड़ों लीटर दूषित जन प्रति वर्ष हुगली में बहतर और घुलता रहता है। अनुमान है कि शहरी क्षेत्र से प्रतिवर्ष 4 लाख किलोग्राम वज्र्य पदार्थ नदी में बहाया जाता है। हालत यह है कि प्रदूषित गंगा अमृत के स्थान पर विष बांट रही है। हालांकि हिमालय की गोद में पवित्र गंगा की धारा की प्रत्येक बूंद आज भी, अभी भी अमृत-तुल्य है लेकिन मैदानी क्षेत्र का गंगा-जल प्रदूषण के कारण अपना संजीवनी गुण खो चुका है।

                सच पूछा जाए तो औद्योगिक विस्तारवाद की दानवी गिरफ्त से हमारे जल स्त्रोत बच नहीं पा हैं। यह गिरफ्त प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत, विकलांगता, अस्वस्थता और रूग्णता का कारण बन रही है। प्रदूषित गंगा जल न केवल प्रत्यक्ष उपयोग के कारण, बल्कि खाद्य-शल्य के माध्यम से, मछलियों तथा अन्य जलीय प्राणियों के द्वारा, गगांजल का प्रयोग करने वाले दुधारू पशुओं के द्वारा भी हमें विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार बनना पड़ता है। जल में घुलनशील पदार्थों में अतिरिक्त अघुलनशील पदार्थ भी प्रवेश करते हैं, जिनके कारण नदी की गहराई कम होती जा रही है, अतः छिछली नदी नौकायन के योग्य भी नहीं रह गई है। इससे हमारे व्यापार-वाणिज्य को भी क्षति पहुंचती है। यह भी देखा जा रहा है कि नदी के विषाक्त जल के कारण जलीय प्राणियों की संख्या कम होती जा रही है। कानपुर के निकट शहर का किनारा छोड़कर गंगा की धारा कई फर्लांग दूर हटकर बह रही है। जिसका दुष्परिणाम शहरवासी भोग रहे हैं। धारा को पूर्ववत शहर के निकट लाने के सारे प्रयास विफल हुए हैं। इसका एकमात्र कारण अघुलनशील द्रव्यों के जमा होने पर नदी के तलपट का अत्यधिक उथला हो जाना है।

                औद्योगिकरण की अनियोजित व्यवस्था गंगा-जल के प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है। औद्योगिक विकास के लिए सरकारी प्रयत्नों तथा नीतियों का अधकचरापन, उनके अधूरे निष्कर्ष तथा नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदूषण की जटिल समस्या है जिस पर काबू पाना भारत जैसे विकासशील देश के लिए असंभव नही ंतो कठिन जरूर है। यह भी द्रष्टत्व है कि पर्यावरणविदों द्वारा दिए गए सुझावों को सरकारी अधिकारी अपेक्षित महत्व नहीं देते हैं। पतित पावनी गंगा का 600 कि.मी. का जल-क्षेत्र विशेष रूप से विषाक्त हो चुका है। ’गंगा एक्शन प्जान’ का भी वही हाल हुआ जो प्रायः ऐसी सरकारी परियोजनाओं का होता है। गंगा के निकटवर्ती 29 शहरों को इसके लिए चुन भी लिया गया। यह योजना बनाई गई कि इन शहरों से बहकर गंगा में गिरते हुए गन्दे जल के नालों को गंगा मंे न मिलने दिया जाए, बल्कि नदी की धारा के समानान्तर नए नाले खोल कर सारा गन्दा जल उनसे होकर बड़े-बड़े कुओं में इकटठा किया जाए, जहां से पाइपों के जरिये उस जल को जल साफ करने वाले संयंत्रों को भेजा जाए। इस उद्देश्य से सभी योजनाएं पक्की तरह बनकर तैयार हो चुकी थीं। लेकिन योजनाएं अब भी कागज पर तो हैं, व्यवहार में शिथिलता आ गई है।

                गंगा प्रदूषण का सबसे कारण अगर कोई है तो वह हमारे कल-कारखाने और सरकार की गंगा के प्रति उपेक्षा की भावना। भारतीय लोकतंत्र में राजनीति से सम्बद्ध लोग 99 फीसदी तुष्टीकरण की नीति पर भरोसा करते हैं, इसीलिए यह कहा जाना काफी कठिन है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त कर पाने में सरकार कहां तक सफल हो सकेगी।

गांधी चिंतन

        गांधी दर्शन जितना पवित्र और आदर्शात्मक था उतना ही तत्कालीन भारत के लिए उपयोगी भी था। लेकिन 21वीं सदी में यह दर्शन हमारी जीवन शैली से दूर होता जा रहा है और ऐसा मालूम होने लगा है कि गांधी जी के सपनों का भारत कहीं खो गया है। सत्य के नाम पर झूठ एवं धोखाधड़ी, अहिंसा के नाम पर हिंसा और सादगी और सत्याग्रह के नाम पर स्वार्थ, दिखावा और पूर्वाग्रह से ग्रसित परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। घोटालों का देश हो जाए यह भारत, इससे बड़ा जुल्म और हो ही क्या सकता है  गांधी जी के पदचिन्हों पर चलकर जहां हम गरीबी हटाकर ग्राम विकास का दम्भ भरते थे वहीं आज गरीबी कर चिंता छोड़कर शहरी विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। गरीबी के स्थान पर गरीबों को ही हटाया जा रहा है। आधी जनसंख्या का गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करना, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी और नौकरशाही हमारे अंग-भंग में शामिल है। धर्म के परदे के पीछे साम्प्रदायिकता का जहर फैलने लगा है, धार्मिक उन्माद से हिंसा का ताण्डव हो रहा है। हमारी स्वतंत्रता एवं स्वाालम्बन को विदेशियों के हाथों बेचा जा रहा है। बढ़ता आंतकवाद, हमारी शांति, एकता और अखण्डता को निगल रहा है।

                अब गांधी जी का अस्तित्व तस्वीरों, प्रतिमाआंे व भजन तक सिमट कर रह गया है। प्रति वर्ष गांधी जयन्ती पर फूल-माला चढ़ाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेना ही हमारी और हमारे राजनेताओं की प्रवृति बन गई है। हमें यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि वास्तव मंे वर्तमान परिस्थितियों में गांधी जी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं।

                गांधी जी का सपना कुछ और था। वे पाश्चात्य सभ्यता की चकाचैंध से दूर रहकर भारतीय संस्कृति का उत्थान चाहते थे। उनके सपनों का भारत मानव कल्याण से आपूरित भारत था। उनका मानना था कि जब भी तुम्हें सन्देह हो या तुम्हारा अहंकार तुम्हें परेशान करने लगे, तब तुम स्वंय को निम्नलिखित कसौटी पर परखो-उस गरीब से गरीब और कमजोर से कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो, फिर खुदा से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो क्या उससे उस व्यक्ति का भला होगा? गांधी जी का तो आदर्श था-

                                ’’सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः।

                                सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्विद दुखभाग भवेत।।’’

गांधी जी स्वावलम्बन, समाजवाद, समानता, सादगी और स्वदेशी के माध्यम से ग्राम राज्य और राम राज्य लाना चाहते थे। दुर्भाग्यवश बापू का सपना साकार नहीं हो सका। गांधी के सारे सिद्धान्त हमारे व्यवहार से हटकर सिर्फ ढोल पीटने भर के लिए रह गए हैं। सम्प्रति विज्ञान और टेक्नोलाॅजी प्रधान युग में गांध जी के आदर्शों, सिद्धांतों तथा चिन्तन के साथ-साथ उनकी प्रतिपादित समूची जीवन पद्धति ही प्रासंगिकता के प्रश्नों के घेरे में फंस गई है। उनका विचार इस 21वीं सदी मंे दकियानूसी माना जा रहा है। अहिंसा रूपी ढाल टूट चुकी है, निहत्थी निरीह जनता गोलियों का शिकार हो रही है और गांधी का जीवन दर्शन सत्य की वह ढाल बन चुका है जिसे लेका सर्वत्र असत्य की लड़ाई लड़ी जा रही है। गांधी जी हरिजन उद्धार की बात करते थे, आज उन्हीं के देश में हरिजन इस  समाज में सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं। उन्हें आरक्षण के छलावे से फुसलाया जा रहा है।

                सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में ’गांधी नहीं रहे पर गांधीवाद घसीटा जा रहा हे। सैकड़ों संस्थाएं उनके  नाम पर चल रही हैं। सत्ता की नई पौध उनके नाम पर पनपती है। दार्शनिक उनके सिद्धांतों एवं आदर्शों की चकाचैंध फैलाते हैं। संसार को चकित करते हैं।’ गांधीजी का मूलमंत्र था साधन को पाने के लिए साधन की पवित्रता की अनिवार्यता। भारतीय समाज में गांधीजी की सबसे बड़ी देन यही थी कि उन्होंने करोड़ों बेबस लोगों को आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति संकल्प, स्वावलम्बन की प्रेरणा दी। सुस्पष्ट है कि गांधी की राजनीति नैतिक मूल्यों पर आधारित थी। बायड आर. के. का तो यहां तक कहना है कि ’’मेरे विचार स ेअब वह समय आया पहुंचा है जब गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को विश्वव्यापी स्तर पर व्यवहार में लाना चाहिए। इसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जनता वह अनुभव करती है कि इसके सिवा विनाश से परित्राण की कोई आशा नहीं है।’’

                ’’आजादी के बाद गांधी जैसे सन्त राजनीतिक नेता की सार्थकता ही नहीं रही।’’ यह कथन माक्र्सवादी विचाराधारा के पुरोधा ई. एम.एस. नंबूदरीपाद का है। उनका यह कथन कड़वा तो लगता है लेकिन यह सत्य है। गांधी ने अपने विषय मंे स्वयं भी कहा है-’आज हिन्दुस्तान में कौन-सी ऐसी चीज हो रही है जिसमें मुझे खुशी हो सके। कांग्रेस बहुत बड़ी संस्था हो चुकी है। इसके सामने मैं उपवास नहीं कर सकता। लेकिन आज मैं भटठी में पड़ा हूं और मेरे दिल में अंगार जल रहे हैं।’

                गांधी जी ने अपनी नयी जिन्दगी को सार्वजनिक आयाम देकर, अपने दर्शन को जमीन पर उतारकर, आखिरी आदमी की लड़ाई लड़ने की कोशिश की। धनी से लेकर सर्वहारा, कृषक से लेकर जमींदार, बाबू से लेकर अधिकारी, सभी के नेतृत्व का भार उठाया और राजनीतिक जगत में उनका मुकाबला करने वाला अब तक कोई पैदा नहीं हुआ। गांधी जी अपनी मृत्यु के कई दशक बाद भी लोगों के दिमाग मंे लिखित हैं क्योंकि वे भारत के लिए उसी प्रकार थे जिस प्रकार-’गंगा और हिमालय।’

                निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियो में गांधी दर्शन को अपनाकर चलना जहां मुश्किल है, वहीं उसे पूर्ण रूप से नकारना भी हमारे हित में नहीं है। नए विचारों के बारे में गांधी जी ने कहा था-’’मैं नए विचारों को कदापि नहीं रोकना चाहता, पर मैं उनका गुलाम भी नहीं बनना चाहता।’’ यदि हम कहें वह पुराने युग में थे-उनके सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका दर्शन पराधीन भारत के लिए ही मान्य था तो क्या हमारा यह कर्तव्य नही होगा कि हम विचार करें कि आज कौन से सिद्धांत हमारे देश के लिए मान्य होंगे। शांति, सुरक्षा, स्वावलम्बन, सादगी, स्वाभिमान, अहिंसा की आवश्यकता जितनी आज है उतनी तब नहीं थी। बढ़ते हुए कटटरवाद, अलगावाद, आंतकवाद एवं असहिष्णुता के वर्तमान युग में गांधी चिंतन आज पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक है।

                राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती बेरोजगारी, जाति एवं नस्ल की वैमनस्यता, आर्थिक विषमताओं से उभरती, आर्थिक नूतन प्रवृतियों एवं अस्थिरता मे गांधी की राजनीति, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विचारधारा आज अत्यन्त प्रासंगिक है क्योंकि यह इन समस्याओं को सुलझाने में सक्षम है। हमें गांधी दर्शन के समानुकूल दर्शन करने का सदुपयोग करने का संकल्प लेना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही गांधी दर्शन का उपयोग किया जाना चाहिए। आज हमें अंधानुकरण के संकीर्ण मार्ग से थोड़ा हटकर इस दिशा मंे गहन विचार करने की आवश्यकता है ताकि हम उस महान पुरूष के सपने को साकार कर सकें।               । हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल कहने की बात रह गई है। पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता का गहरा रंग चढ़ता जा रहा है, मद्यपान हमारी सभ्यता और सम्मान का परिचायक बन चुका है। जो लोग भ्रष्ट आचरण और चरित्रहीनता के लिए बदनाम हैं, वे ही हर क्षेत्र में हमारे पथ प्रदर्शक एवं भाग्य विधाता बन बैठे हैं-

चुनाव या निर्वाचन

‘जम्हूरियत वह तर्ज-ए-हुकूमत है कि जिसमें,

बन्दों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।‘

– मो. इकबाल

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। प्रजातांत्रिक शासत-प्रणाली में शासन जनता के हाथों में होता है। लेकिन यह संभव नहीं है कि जनता स्वयं शासर करे। इसमें जनता द्वारा चयनित या निर्वाचित प्रतिनिधि शासन चलाते हैं। इन प्रतिनिधियों का चयन जिस प्रक्रिया द्वारा होता है उसे ही ‘चुनाव या निर्वाचन‘ कहते हैं। चुनाव में विजयी उम्मीदवार देश का शासन चलाता है। अतः यह आवश्यक है कि प्रतिनिधियों का चयन सही हो अन्यथा देश में कुव्यवस्था फैल सकती है। इसलिए चुनाव प्रजातांत्रिक शासन-प्रणाली की आधारशिला है।

स्वतंत्र भारत में पांच वर्षों के अन्तराल पर आम चुनाव का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा मध्यावधि चुनाव और उन-चुनाव की भी व्यवस्था है। भारत में भली-भांति चुनाव सम्पन्न कराने के लिए चुनाव-आयोग की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग के सर्वोच्च पदाधिकारी को मुख्य चुनाव आयुक्त कहा जाता है। केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के अधीन राज्यों में भी राज्य निर्वाचन आयोग कार्य करता है। चुनाव में 18 वर्ष या ऊपर के सभी वयस्क स्त्री-पुरूष मतदाताओं को मन देने का समान अधिकार है, बशर्ते वह पागल, दिवालिया या आपराधिक चरित्र का न हो। चुनाव दो तरह से सम्पन्न कराए जाते हैं-1. प्रत्यक्ष, 2. अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता सीधे अपना मत देकर प्रतिनिधियों का चयन करती है, जैसे- विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों का चुनाव। अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही चुनाव में भाग लेते हैं। यथा- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा तथा विधान परिषद के चुनाव।

च्ुनाव के लिए सर्वप्रथम चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है। चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवार खड़ा करते हैं। इसके लिए चुनाव क्षेत्र निर्धारित रहते हैं। सम्पूर्ण चुनाव क्षेत्रों को छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया जाता है। उन इकाइयों के सभी मतदाता एक स्थान पर एकत्र होकर, पंक्तिबद्ध होकर मतदान करते हैं। उस स्थान को मतदान केन्द्र कहा जाता है। मतदान केन्द्र का सही संचालन करने के लिए उसका सबसे बड़ा अधिकारी पीठासीन अधिकारी कहलाता है। निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान के लिए पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है। प्रत्येक मतदान केन्द्र (बूथ) पर मतदाताओं की संख्या लगभग 500 से 1000 के बीच होती है। निर्धारित तिथि के एक दित पूर्व ही चुनाव कर्मचारी बूथ पर पर पहुंच जाते हैं। वे अपने साथ मतपत्र, मतपेटियां या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन (इ.वी.एम.) तथा अन्य चुनाव-सम्बन्धी सामान ले जाते हैं। शांति-व्यवस्था के लिए बूथों में से संवेदनशील अथवा अतिसंवेदनशील बूथों का चयन पहले ही कर लिया जाता है। पीठासीन अधिकारी की देख-रेख में चुनाव सम्पन्न होता है। मतदान कार्य प्रातः 8 बजे से 5 बजे शाम तक चलता रहता है। मतदान के बाद मतपेटियों या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन को सील कर दिया जाता है। मतगणना की तिथि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित की जाती है। निर्धारित समय पर मतगणना की जाती है। मतगणना स्थल के चारों ओर सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की जाती है। मतगणना के बाद जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे विजयी घोषित किया जाता है और सम्बन्धित जिले के जिलाधिकारी की उपस्थिति में उस उम्मीदवार को विजयी होने का प्रमाणपत्र दिया जाता है। उस क्षेत्र के सिविल एस.डी.ओ. या बी.डी.ओ., जो भी रिटर्निंग ऑफिसर होते हैं, उनके द्वारा विजयी होने का प्रमाण पत्र दिया जाता है।

भारत में चुनाव एक समस्या है, क्योंकि भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है। अशिक्षित जनता चुनाव का महŸव नहीं समझ पाती है। जातीयता, साम्प्रदायिकता एवं आर्थिक प्रलोभन के चक्कर में फंसकर वह अपने मताधिकार का दुरूपयोग कर बैठती है। चुनाव के समय हत्या, बूथ-कैप्चरिंग या बूथ पर भय का वातावरण बनाना आम बात है। शक्तिशाली लोग बहुमत प्राप्त करने के लिए बूथों को ही अपने पक्ष में लुटवा लेते हैं। पैसों के बल पर गरीब जनता का मत खरीद लिया जाता है। अब तो सŸाालोलुप पदाधिकारी भी बूथ लुटवाने में असामाजिक तŸवों का सहयोग करते हैं। इतना ही नहीं, वे पदाधिकारी मतगणना में भी हेराफरी से नहीं चूकते।

इस प्रकार चुनाव का अर्थ ही समाप्त हो जाता है। इस चुनाव का एक खास दोष यह भी है कि इसमें मूर्ख और विद्वान में कोई अन्तर नहीं रह जाता। यही कारण है कि आज विधायिकाओं में बुद्धिमान के बदले पहलवान लोग ही ज्यादा सुशोभित हो रहे हैं।

सारांशतः लोकतन्त्र की सफलता के लिए चुनाव का निष्पक्ष होना जरूरी है। इसके लिए चुनाव को एक पर्व की तरह मनाया जाना चाहिए। जैसे पर्व में पवित्रता का काफी महŸव है-हिंसा, बूथ-लूट, जातीयता, साम्प्रदायिकता, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि चुनाव की अपविभताएं हैं- इन्हें दूर भगाकर ही चुनाव को पवित्र बनाया जा सकता है। इसीलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए-’’चुनाव युद्ध नहीं, तीर्थ है, पर्व है।’’

दल-बदल की राजनीति

    दल-बदल का सामान्य अर्थ अपने दायित्व को त्यागना या उससे मुकरना है। लेकिन राजनीति में विशेष स्थितियों में इसके विभिन्न स्वरूप होते हैं। जैसे-दल का बदलना, जिस दल के अधीन चुनाव लड़े उस दल का त्याग, कोई दल छोड़ना या फिर उसमें शामिल होना आदि। अभी तक दल-बदल की कोई सार्वभौमिक एवं सर्व स्वीकृत परिभाषा नहीं बन पाई है। इस दिशा में डाॅ. सुभाष कश्यप की परिभाषा बहुत हद तक दल-बदल की अवधारणा को स्पष्ट करती है। उनके अनुसार दल-बदल का मतलब राजनीतिक प्रतीक का बदलना है, जिसमें निम्नलिखित मामले शामिल हो सकते हैं-

एक दल के टिकट पर विधायक चुना जाना और फिर उस विशेष दल को छोड़कर अन्य दल में चला जाना।दल से त्यागपत्र देकर अपने को निर्दलीय घोषित कर देना।

निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतकर किसी विशेष दल में शामिल हो जाना।

                यदि कोई विधायक या सांसद किसी मामले में दल से त्यागपत्र दिए बिना अपने दल के विपरीत मत देता है तो उसे किसी भी रूप में दल-बदल से कम नहीं माना जाना चाहिए। वस्तुतः दल-बदल की प्रक्रिया उसी समय शुरू हो जाती है जब व्यक्ति चाहे किसी भी उद्देश्य से अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलता है। मूलतः राजनीतिक दल-बदल की क्रिया का प्रेरक किसी लाभ की संभावना होती है। सामान्यतः दल-बदलू वे लोग है जो राजनीतिक लाभ के लिए अपनी अवस्था बदल लेते हैं। यद्यपि कुछ राजनेताओं ने सैद्धांतिक आधार एवं नीतिगत मतभेदों के आधार पर कोई दल छोड़ा है तथापि अधिकतर मामलों में राजनीतिक दल-बदल का कारण घोर अवसरवादिता तथा पद-लाभ की आकांक्षा रही है। यदि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लोकतांत्रिक स्वरूप के शासन मंे दल-बदल विभिन्न स्वरूपों एवं मात्राओं में पाया जाता है। विश्व का कोई लोकतांत्रिक देश इसका अपवाद नहीं है। ब्रिटेन में ग्लेडस्टन, चर्चिल जैसे महान नेताओं ने सदन में अपना पाला बदला। यदि हम स्वतंत्रता पूर्व इतिहास को देखें तो श्यामलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, हाफिज मुहम्मद इब्राहिम जैसे कई नाम हैं, जिन्होंने कई पद लाभों के लिए अपनी दलीय प्रतिबद्धताएं बदलीं। 1967 के पूर्व आचार्य नरेंद्रदेव, जे.बी. कृपालानी, अशोक मेहता इत्यादि नेताओं ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदलीं, किन्तु इन घटनाओं ने दलीय राजनीति को अधिक दूषित नहीं किया।

                जो भी हो, भारत में चतुर्थ आम चुनाव (1967) के बाद राजनीतिक दल-बदल की समस्या ने गंभीर रूप धारण कर लिया। इस दल-बदल की प्रवृति में और वृद्धि होती गई तथा जून 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद भारत की राजनीति में तो जैसे दल-बदल की बाढ़-सी आ गई। इतना तो तय है कि भारत में राजनीतिक दल-बदल की प्रक्रिया का उद्भव कांग्रेस के पतन से ही त्रीव हुआ।

  1. राजनीतिक दल-बदल के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-
  2. अधिकतर दल-बदल राजनीतिक लाभ के लिए होता है।
  3. दलों मे अन्तर्कलह और उनमें गुटबन्दी के कारण हो सकता ळें
  4. राजनीतिक दलों में सैद्धांतिक ध्रुवीकरण का अभाव हो सकता है।
  5. साधारण विधायक और दल के नेता के बीच व्यक्तित्व का टकराव हो सकता है।
  6. पद, धन, स्तर आदि का लालच या उसका अभाव हो सकता है।
  7. राजनीतिक दलों में शक्तिशाली दबाव समूहों की भूमिका हो सकती है।
  8. सभी दलों में वृद्ध लोगों का नेतृत्व हो सकता है।
  9. दलों की सदस्यता, उनके लक्ष्यव गतिविधियों में जन भागीदारी का अभाव तथा चुने हुए प्रतिनिधियों की दल-बदल सम्बन्धी गतिविधियों के प्रति जन उपेक्षा हो सकती है।
  10. राज्य विधानसभाओं में अल्पमत वाली सरकारें तथा निर्दलीय सदस्यों की भूमिका हो सकती है।

                उपरोक्त कारणों से  स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दल-बदल मंे व्यक्तिगत लाभ की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

                दल-बदल रोकने के लिए समय-समय पर सरकार ने प्रयास किए। 8 दिसम्बर 1967 को लोकसभा ने एक उच्च स्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव पारित किया, जिसमे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एवं संवैधानिक विशेषज्ञ रखें गए। इसके बाद पुनः 16 मई 1973 को लोकसभा मे राजनीतिक दल-बदल विरोधी विधेयक पेश किया। पुनः इसके बाद जनता सरकार ने अप्रैल 1978 में एक विधेयक रखा जिसमे संविधान के अनुच्छेद 102 और 109 को परिवर्तित कर संसद एवं राज्य व्यवस्थापिकाओं के सदस्यों की योग्यताओं को पुननिर्धारित किया गया और अनेक प्रावधान किए गए। लेकिन पूर्व के सभी प्रयास असफल ही सिद्ध हुए। दल-बदल के विरोध में पहला ठोस कदम राजीव गांधी के द्वारा उठाया गया। राजीव गांधी सरकार ने 8वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में विपक्षी दलों के सहयोग से दल-बदल पर अकुंश लगाने पर सहारनीय कार्य किया। जनवरी 1985 में दोनों सदनों से पारित होकर यह चर्चित विधेयक 52वें संविधान विधेयक के रूप में सामने आया। इसने भारतीय संविधान मंे दसवीं अनुसची को बढ़ाया जिसमें निम्नलिखित प्रावधान हैं, जिससे दल-बदल को रोकने का प्रयास किया गया-

                निम्न परिस्थितियों में संसद या राज्य विधानमण्डल के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी-

                यदि वह स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे दे।

                यदि वह अपने दल या उसके अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान के समय अनुपस्थित रहे। परन्तु यदि 15 दिन के अन्दर उसका दल उसे उल्लंघन के लिए क्षमा कर दे तो उसकी सदस्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य एक निश्चित समयावधि में किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाए, तो उसे दल-बदल का दोषी नहीं माना जाएगा।

                किसी राजनीतिक दल के विघटन पर विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होगी यदि मूल दल के एक तिहाई सांसद, विधायक वह दल छोड़ दें।

                इसी प्रकार विलय की स्थिति मंे दल-बदल नहीं माना जाएगा। यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में मिल जाएं।

                दल-बदल के किसी प्रश्न पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होगा और किसी न्यायालय को उसकी वैधता जांचने का अधिकार नहीं होगा।

                इस विधेयक को कार्यान्वित करने के लिए सदन के अध्यक्ष को नियम व निर्देश बनाने का अधिकार होगा।

                यह सही है कि दल-बदल विरोधी अधिनियम हमारे राजनीतिक जीवन को स्वच्छ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वह ज्यादा अच्छा होता कि दल-बदल के प्रमुख कारणों जैस भौतिक लाभ की सम्भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगाया जाता तथा दल-बदलू को स्वीकारने वाले दल को कुछ समय के लिए अमान्य घोषित कर दिया जाता। इसके अतिरिक्त एक व्यावहारिक सुझाव यह भी हो सकता है कि राजनीतिक लाभ रोकने के लिए किन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था के साथ-साथ स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं का विकास होता। मंत्रिपरिषद के आकार पर प्रतिबन्ध, मंत्री की अवधि का निर्धारण तथा राजनीतिक दल बदलुओं की सदन की सदस्यता समाप्ति आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे दल-बदल को कुछ हद तक रोका जा सकता है तथा जनता को भी इस दिशा में जागृत करना चाहिए जिससे ऐसे अपराधियों को स्वस्थ जनमत सजा दे तथा ऐसी संभवनाओं को निरूत्साहित करे। अतः जनता को स्वंय अपने सांसदों एवं विधायकों पर कड़ी निगाह रखनी होगी क्यांेकि विधायी एवं नैतिक विकल्पांे का संयोजन ही इसका एकमात्र प्रभावी उपचार हो सकता है।

नास्टैल्जिया

           आजकल हर जगह नास्टैल्जिया का व्यापार किया जा रहा है। एक संगीत कम्पनी ने फ्लैशबैक नामक एक एलबम के लिए 21 हिट गानों का चयन किया। यह कम्पनी तीसरे-चैथे दशक से संगीत का व्यापार कर रही है। उसके संग्रह में ऐसी धुनें हैं जिनसे लगभग प्रत्येक पीढ़ी की भावनाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। वस्तुतः इस कंपनी ने युगों पहले नास्टैल्जिया को कमाऊ जरिया बना लिया था। हम सब जानते हैं कि खुशबू के बाद संगीत ही आपको तत्काल अतीत में ले जा सकता है। प्रत्येक पीढ़ी के लोगों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ अपनी घड़ी को पीछे ले जाने और अतीत के सुखद समय में लौट जाने की चाह बढ़ती जाती है। व्यापारियों ने इसे समझ लिया है और इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं। हाल के समय में बाॅलीवुड में रीमेक और रीमिक्सेज की बहार आ गई है। दुनिया भर में ’मुगले आजम’ की सफलता से यह साफ है कि जितनी तेजी से हम सहस्त्राब्दी में आगे बढ़ रहे हैं उतनी ही तीव्र एक पीढी़ को वापस पीछे देखने की इच्छा है।

                नास्टैल्जिया तनाव से मुक्ति देता है। यह अनेकानेक लोगों को बढ़ती उम्र मृत्यु और सतत परिवर्तन की चिंता से लड़ने की शक्ति देता है। उच्च गति वाले माॅडेम तथा 200 के करीब चैबीसों घंटे चलने वाले चैनलों के प्रहार से भारतवासी घिर गए हैं। भारत की लगभग आधी आबादी जो अभी युवा है, इस नई सुबह का स्वागत कर रही है और डिजिटल युग से लाभ उठा रही है। जबकी अनेक ऐसे लोग हैं जो इस संस्कृति के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं क्योंकि यह उनकी अपनी जमीन से उदित नहीं हुई है। इन पुराने लोगों को अपने अतीत से कुछ ऐसी कोमल चीजें चाहिए जो उन्हें सुकून दे सकें।

                विश्व की सबसे बड़ी मार्केटिंग कम्पनियों के लिए काम करने वाले एक विशेषज्ञ ने पिछले दिनों कहा,’’इन दिनों हम अपनी अधुनिक सुविधाओं की पैकेजिंग पुरानी शैली में कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इससे उम्रदराज लोगों की अतीत की स्मृतियां जागेंगी, उनकी जेब में पैसे है, वे हमारे उत्पाद खरीदेंगे।‘‘ इससे मैकडोनाल्ड के उस विज्ञापन का निहितार्थ समझने में आसानी होगी जिसमें बर्गर के विज्ञापन के लिए वह राजकुमार, संजीव कुमार और राजेश खन्ना के हमशक्लों का इस्तेमाल करता है। ऐसा करके वह उम्रदराज लोगों को अपने फास्ट-फूड की ओर आकर्षित करता है।

                आजकल एफ. एम. रेडियों पुराने हिट गानों का कार्यक्रम प्रसारित करता है जबकि ऐसे टीवी चैनल भी हैं जो केवल पुरानी फिल्में ही दिखाते हैं। मुगले आजम का नया संस्करण न केवल भारत बल्कि पाकिस्तान मे भी हाथों-हाथ बिका है और फिल्म निर्माताओं की नई पीढ़ी अपने अगले विषय के लिए बाॅलीवुड का पुराना कचरा खंगाल रही है। आधुनिक अभिनेताओं को पुराने विषयों में प्रस्तुत कर वे अपना बाजार बढ़ा रहे है। पुरानी फिल्मों के री-मेक का दौर चल पड़ा है।

                स्वर्णिम स्मृतियों का व्यपार दुनिया भर में फायदे का धंधा बन रहा है। अमेरिका में समय-समय पर एक के बाद एक पुराने गानों की सीडी, पुरानी तस्वीरों की पुस्तकें अथवा बचपन की याद दिलाने वाले लेखों की पुनः पैकेजिंग कर उन्हें जारी किया जा रहा है। जापान के लगभग तीन करोड़ लोग जो कुल आबादी का लगभग एक चैथाई है 38 से 56 वर्ष की आयु के हैं। दुनिया भर में इस आयु वर्ग के लोग केवल किशोरों पर केन्द्रित पाॅप संस्कृति को खारिज कर रहे है। इस प्रवृति के अनुकूल तथा उपभोक्ताओं की नास्टैल्जिया से भरी भावनाओं के अनुरूप व्यापारी एक के बाद एक ऐसे उत्पादों की लहर पैदा कर रहें है जो इस समूह की युवावस्था के दौरान लोकप्रिय थे।

                भारत अब इस प्रवृति की तरफ आंखे खोल रहा है। मजबूत अर्थव्यवस्था तथा पिछले कुछ वर्षो में अचानक आई समृद्धि के बावजूद सच्चाई यह है कि भारतीय लोगों को इन्हें आत्मसात करने में अभी थोड़ा समय लगेगा। हमारे जीवन में आए नाटकीय परिवर्तनों के कारण हमारी इच्छा मित्रों और परिवार वालों के साथा सहज बातचीत की और हमारे जीवन पर छा गए ब्रांडों और गति से मुक्त ठेठ देहाती जीवन जीने की होती है। भारतीय लोग अपनी परम्परा के प्रति काफी संवेदनशील हैं और अतीत की स्मृमियां उन्हें धराशायी कर देती हैं। उदीयमान नास्टैल्जिया के व्यापार से उन्हें उपनी इस कमजोरी से मुक्ति मिलती है। युवा भारत आज जहां दीप्त भविष्य के सपने देख रहा है वहीं उम्रदराज लोग अपने धूमिल कल की स्मृतियों के सहारे जी रहे हैं।

                यह नास्टैल्जिया कब तक बना रहेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन यह कहना उचित होगा कि युवा सपनों के आक्रमण से बढ़ती उम्र के अमीर भारतीय लोगों को अतीत से सम्बन्ध स्थापित कर अपने जीवन पर नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा बलवती होती जा रही है।

निःशस्त्रीकरण

         निःशस्त्रीकरण का अभिप्राय है घातक शस्त्रास्त्र पर नियंत्रण रखना और शस्त्रों की बढ़ती संख्या को रोकना। विश्व-शांति का मूल उपाय निःशस्त्रीकरण में ही निहित है। आज विश्व शस्त्रों के अम्बार के नीचे दमघोंटू परिस्थिति में पड़ा हुआ है। विज्ञान ने इतने शक्तिशाली बमों का निर्माण कर लिया है कि विश्व की शांति के लिए खतरा पैदा हो गया है। प्रधानमंत्री नेहरू ने आधुनिक अस्त्रो की भीषणता का वर्णन करते हुए कहा-’’आज के भीषण हाइड्रोजन बमों के सम्मुख एक-एक बम जो हिरोशिमा और नागासाकी में गिराए गए थे, खिलौने के तुल्य हैं।’’ इन अणुबमों के विनाशक प्रभाव को हिरोशिमा और नागासाकी मे देखकर लोग कांप उठे थे। उसकी स्मृति से मानवता का कलेजा कांप उठता है, किन्तु जब वे शस्त्र आधुनिक शस्त्रों के सम्मुख खिलौने के तुल्य हैं, तो बड़े शस्त्र कितने भंयकर होंगे, हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

                जब इतने भंयकर शस्त्रों का निर्माण हो चुका और दिन-प्रतिदिन उनकी भंयकरता मंे वृद्धि होती जा रही है, तब मानव का चिंतित हो उठना नितान्त स्वाभाविक है। आज विश्व की समस्या युद्ध और शांति है। युद्ध शस्त्रों से ही लड़े जाएंगे और इन भयानक शस्त्रों का प्रयोग प्राणिजगत को रसातल में पहुंचा देगा। अतः विचारकों और शांतिप्रिय विश्व नेताओं का मत है कि मानवता की रक्षा के लिए अस्त्रों का विनाश आवश्यक है। निरस्त्रीकरण ही इस अशांति का एकमात्र उपाय है।      द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका देखकर प्रत्येक राष्ट्र चिंतित हो उठा और शांति-स्थापना के लिए सभी ने सामूहिक प्रयास आरम्भ किए। 1945 में निरस्त्रीकरण का प्रश्न बड़े-बड़े राष्ट्रों द्वारा उठाया गया। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने युद्धों की विभीषिका को रोकने के लिए ’संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की। सन् 1946 में आणविक शस्त्रों पर नियंत्रण रखने के लिए अणुशक्ति आयोग का गठन किया गया और 1947 में सशस्त्र सेनाओं और हथियारों को घटाने के लिए परम्परागत शस्त्रास्त्र आयोग बनाया गया। 11 जनवरी 1952 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निरस्त्रीकरण आयोग की स्थापना की। इसके कर्तव्य निम्नलिखित थे-

                सभी सशस्त्र सेनाओं और इस प्रकार के हथियारों के नियमन, उसकी सीमा और उसे संतुलित करना।

                जनसंहार के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले सभी बड़े अस्त्रों को नष्ट करना।

                अणुशक्ति का प्रभावकारी, अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण करने के लिए ऐसे प्रस्ताव तैयार करना।

                निरस्त्रीकरण को लागू करने, राज्यों के सैनिक बजटों के स्थिरीकरण करने, परमाणविक अस्त्रों के प्रयोग की समाप्ति की घोषणा करने, युद्ध प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने, समाजवादी और पूंजीवादी देशों के बीच अनाक्रमण संधि सम्पन्न करने, दूसरे देशों के प्रदेशों से फौजों को हटाने, परमाणविक अस्त्रों के और भी अधिक प्रसार करने के विरूद्ध कदम उठाने, आकस्मिक आक्रमण को समाप्त करने के लिए कार्यवाहियां करने सम्बन्धी उपायों को क्रियान्वित करने की नितांत आवश्यकता है। जब तक ईमानदारी एवं सद्भावना से बड़े राष्ट्र निःशस्त्रीकरण का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इसमंे सफलता की आशा नहीं की जा सकती। पश्चिमी शक्तियों ने दोरंगी चाल अपनाई है। एक ओर वे विश्व-शांति-सम्मेलन में भाग लेकर ऊंचे आदर्श और विचार रख रहे हैं, दूसरी ओर अपने परमाणु शक्ति परीक्षण में सतत प्रयत्नशील हैं।

                बहुत प्रसन्नता का विषय है कि आज संसार के अनेक देश निःशस्त्रीकरण की समस्या और उसके महत्व पर गम्भीरता से विचार करने लगे हैं। निःशस्त्रीकरण के लिए आज के बुद्धिवादी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है-सहानुभूति, करूणा, प्रेम, दया, भाईचारा तथा विश्व बन्धुत्व की जिसमें संसार मंे शांति का वातावरण उत्पन्न हो सके। राष्ट्रपति डाॅ. राधाकृष्णन के ये शब्द, जो परमाणु हथियार विरोधी सम्मेलन में भाषण देते हुए कहे थे, कितने तर्कयुक्त, सामयिक एवं गम्भीरतापूर्ण हैं-

                अतः निःशस्त्रीकरण आज की मांग है और आवश्यकता इस बात की सबसे अधिक है कि उचित निदान द्वारा विश्वजनित मतभेदों को भुलाकर अशान्ति का माहौल खत्म किया जाए। अतः निःशस्त्रीकरण वरणीय, ग्रहणीय, सराहनीय एवं श्लाघनीय है। 

पोषाहार

शरीर का स्वस्थ रहना जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। रोगाी व्यक्ति का जीवन स्वस्थ आचार-विचार के अभाव में बोझ बनकर नष्ट हो जाता है। जिस देश के नागरिक स्वस्थ नहीं होते वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता । यही कारण है कि प्रत्येक राष्ट्र अपने नागारिकों के पोषाहार के स्तर को अच्छे से अच्छा बनाए रखने की चेष्टा करता है। पोषाहार का सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि पोषाहार पर किसी भी राष्ट्र की सपन्नता, सुरक्षा और प्रगाति निर्भर करती है। कुपोषण का बुरा प्रभाव न केवल शारिरिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है, बल्कि वह मानसिक और बौद्धिक क्षमता को भी नष्ट करता है।, जिससे राष्ट्र की उत्पादन शक्ति घट जाती है, राष्ट्र पतन की और बढ़ने लगता है! पोषाहार व्यक्ति के शरीर को सुडौल, सुन्दर तथा प्रभावशाली बनाता है। सुन्दर व्यक्तित्व रखने वालों को सदैव सफलता मिलती है। अपरिचित लोग भी ऐसे व्यक्ति के सहायक तथा हितैषी बन जाते हैं।

गरीबी और अज्ञानवश लोग कुपोषण के चंगुल में फंस जाते हैंै। इसलिए गरीबी दूर के साथ-साथ उन्हें पोषाहार की उचित शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गरीबी ही कुपोषण का कारण है। साधारण आय वाला व्यक्ति भी खान-पान के सम्बन्ध में सूझ-बूझ से काम लेकर उचित पोषाहार प्राप्त कर सकता है। भारत सरकार की और से ऐसे कई केन्द्र और कई इकाइयां स्थापित की गई हैं जो गांवों में साधारण तौर से पाई जाने वाली खाद्य-वस्तुओं के सही उपयोग की शिक्षा दे रही हैं। सरकारी प्रशिक्षण केन्द्र गांव वालों को यह शिक्षा देते हैं कि जो मौसमी फल,सब्जियां गांव में मिलती हैं उनका संरक्षण किस प्रकार किया जाए ताकि दूसरे मौसमों में भी उन्हें वे फल और सब्जियां मिलती रहें। शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्येक्रम बड़े व्यापक रूप से व्याख्यान, परिचर्चा, फिल्म, प्रदर्शनी आदि की सहायता से चलाया जाता है। इतना ही नहीं, भोजन में क्या लेना चाहिए, कितना देना चाहिए तथा भोजन पकाने में कोैन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए आदि बातों से भी लोगों को परिचित कराया जा रहा है। वे यह भी सीखते हैं कि भोजन का संरक्षण किस प्रकार किया जाए और दूषित भोजन से कैसे बचा जाए। ऐसे प्रशिक्षित लोग इस तथ्य को अच्छी तरह समझ लेते हैं कि गरिष्ठ, सुस्वादु और महंगा भोजन स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार हानिकारक होता है।

स्रकार के खाद्य-विभाग ने गरीब परिवारों के लोगों के लिए सस्ते खाद्य-पदार्थ बनाने की योजनाएं बनाई हैं और उन्हें शुरू कर दिया हैं। ऐसा एक पदार्थ है-‘मिल्टन‘। यह दूध जैसा एक पेय पदार्थ है। आज हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख लीटर ‘मिल्टन‘ तैयार किया जाता है। इसी तरह दूध में विटामिन ‘ए‘ और नमक में लौह तथा आयोडीन तत्व मिलाकर उन्हें अधिक पोषक बनाया जा सकता है। राजस्थान और तमिलनाडु में ऐसी योजनाएं अपनाई जा रही हैं, जिनके द्वारा नमक में लौह तत्व मिलाकर उसे विशेष गुणकारी बनाया जा रहा है। कृषि-वैज्ञानिक निरन्तर नये-नये किस्म के अनाज, फल और सब्जियों उगाने के उपायों की खोज में लगे हुए हैं, ताकि भारत जैसे गरीबों की विशाल जनसंख्या वाला देश सस्ते पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन अधिक से अधिक मात्रा में कर सके।

भारत मुख्यतः गांवों का देश है जहां तीन-चैथाई आबादी गांवों में ही रहती है। गांवों की जनता का दो-तिहाई भाग गरीब है और बीस प्रतिशत भाग तो गरीबी रेखा के बीच है। अतः कुपोषण इस देश की महŸवपूर्ण समस्या है। भारत सरकार का खाद्य विभाग कुपोषण से देश की रक्षा के लिए अनेक कार्यक्रमों को क्रमशः लागू कर रहा है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में चार प्रयोगशालाएं फलों और सब्जियों के क्षेत्र में उनके विभिन्न गुणों तथा घरेलू उपभोग के सम्बन्ध में निरन्तर अनुसंधान कार्य कर रही हैं। इसी तरह प्रत्येक खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों और उनकी मात्रा की खोज की जा रही है। अत्यधिक पिछड़े क्षेत्रों में और आदिवासी इलाकों में विशेष तथा पूरक पोषाहार और  दिन में भोजन देने के कार्यक्रम भी धीरे-धीरे लागू किए जा रहे हैं। इसमें सरकार के साथ-साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी भाग ले रही हैं। अतः भारत में लोग पोषाहार के महŸव को समझने लगे हैं तथा उनमें जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है।

समय का महत्व

मानव जीवन में बीता हुआ सब कुछ लौट सकता है पर समय एक ऐसा आजाद पंछी है जो एक बार जिस राह से गुजर जाए, वहाँ दोबारा नहीं लौटता। समय अमूल्य धन है। यही जीवन है। इसका सदुपयोग जीवन का सदुपयोग माना गया है। साथ ही इसका विनाश यानी जीवन का विनाश।
समय एक ऐसा है जिसको हमें उसके ही आकार में स्वीकारना पड़ेगा, न तो हम उसको बढ़ा सकते हैं और न ही हम उसको रोक सकते हैं।समय का जीवन में बहुत महत्व है। संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं उन्हें प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है, अगर हमारा धन नष्ट हो जाए, तो हम दोबारा मेहनत कर उसे पा सकते हैं। यदि स्वास्थ्य बिगड़ जाए तो आराम व इलाज कर उसे देबारा स्वस्थ कर सकते हैं। पर हाँ यदी मानव का बस कहीं नहीं चल पाया है तो वह है समय।
समय के सदुपयोग से ही मूर्ख, विद्वान बन सकता है। निर्बल बलवान बन सकता है और तो और निर्धन भी धनवान बन सकता है। । समय की हानि को सबसे बड़ी हानि बतलाया गया है। समय का दुरुपयोग या बर्बादी से मानव की उन्नति में बाधा पड़ सकती है और अंत में पश्चाताप के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं रह पाता। वे कभी अपने जीवन में सफल नहीं हो सकते हैं। जो समय का दुरुपयोग करते हैं।
समय का सदुपयोग करने से जीवन में बहुत ही लाभ हैं। इससे मानव सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इसी के बल पर सुखी और समृद्ध जीवन जिया जा सकता है। समय का सदुपयोग करने से ही मानव स्वस्थ रह सकता है। समय का सदुपयोग करने वाले के द्वार पर उन्नति सदैव फूल लिए उसका स्वागत करने खड़ी रहती है।
विद्यार्थी जीवन में तो समय का महत्व ही कुछ और है। विद्यार्थी जीवन को तो आगे आने वाले जीवन की तैयारी का समय बताया गया है, इस समय जो विद्यार्थी समय का सदुपयोग कर लेते हैं वह तो अपना जीवन सफल कर लेते हैं और जो विद्यार्थी समय का दुरुपयोग कर लेते हैं उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
किसी महापुरुष ने तो यहां तक कहा है कि विद्यार्थियों को तो समय का एकएक पल सोच-समझकर काम में लाना चाहिए क्यों कि यहाँ समय-समय नहीं बल्कि उसका भविष्य है जिसे जैसे वह अब रखेगा, भविष्य में वह वही पाएगा।
समय के महत्व पर किसी महाकविने सच ही लिखा है- समय ईश्वर का दिया हुआ एक अनुपम धन है।
समय के लिए कहा गया है कि एक विद्यार्थी को उसका समय केवल नवीनतम जानकारीव अध्ययन में लगाना चाहिए, एक भक्त को अपना समय केवल प्रभु भक्ति में लगाना चाहिए, एक कलाकार को अपना समय अपनी कलाकृति पर ही लगाना चाहिए तभी हम कह सकते हैं कि उन्होंने अपने समय का सदुपयोग किया है।

होली – रंगों का त्यौहार

मानव जीवन में त्यौहारों का अपना महत्व है। त्यौहार जीवन की एकरसता को खत्म करने और उत्सव के द्वारा अपने में नयी स्फूर्ति हासिल करने के लिए मनाए जाते हैं। देश में मनाए जाने वाले हर त्यौहार के पीछे उसका अपना इतिहास व मान्यताएँ हैं। हमारे भारतवर्ष का एक और नाम भी है इसे हम त्यौहारों का देश भी कहते हैं। शायद ही भारत की कोई तिथि ऐसी हो, जो किसी न किसी त्यौहार से संबंधित न हो।दशहरा, रक्षाबंधन, बैसाखी, बसंत पंचमी आदि अनेक धार्मिक पर्व हैं। रंगों का यह त्यौहार अपने आप में सिर्फ एक त्यौहार ही नहीं बल्कि मनोरंजन का भी एक पर्व है। जो उल्लास, अमंग तथा उत्साह के साथ मनाया जाता है।

हंसी-मजाक के पर्व के नाम से भी होली मनाई जाती है। इसलिए तो कहते हैंभाई साहब बुरा न मानें, होली हैं।
इस त्यौहार में लोग अपने बैर-भाव को त्याग कर एक दूसरे को गुलाल लगा कर होली की बधाई देते हैं। होलिका दहन के दिन तो हर गल्ली-मुहल्ले में लकड़ी के ढेर लगा होलिका बनाई जाती है। जिसे शाम को सभी महिलाओं द्वारा पूजा जाता है।
होली सिर्फ हिन्दू का त्यौहार नहीं है, इसे समाज के सभी धर्मों, वर्गों द्वारा सहर्ष मनाया जाता है।
होली के त्यौहार की अपनी एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने अपनी प्रजा को भगवान का नाम न लेने का आदेश दे रखा था। किन्तु उसके स्वयं का पुत्र प्रह्लाद अपने पिता की आज्ञा न मानकर विष्णु भजन में लीन रहता था। उसके पिता उसे बार बार समझाते थे पर वह नहीं मानता था। प्रह्लाद, प्रजा के बीच में भी काफी प्रसिद्ध हो चुका था। दैत्यराज को डर था कि कहीं उसकी प्रजा विद्रोह न कर दे इसलिए उसने अपनी बहन होलिका (जिसे वरदान प्राप्त था कि आग उसे कुछ नुकसान नहीं पहुँचा सकती है।) के साथ मिलकर एक गुप्त योजना बनाई।
योजनानुसार होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ गई और उसके एक इशारे पर चारों तरफ आग लगा दी गई। उसे अहं था कि आग तो उसका कुछ नहीं कर सकती पर प्रह्लाद तो आग की चपेट में आने से मर जाएगा और प्रजा इसे एक दुर्घटना समझ भूल जाएगी।
पर प्रभु को तो कुछ और ही मंजूर था। आगने अपने में होलिका को तो समा ही लिया पर प्रहाद को छू भी न सकी क्यों कि प्रहाद तो आग की लपटों में भी प्रभु दर्शन कर रहा था और अपने प्रभु भजन में मस्त था। तभी से होलिका दहन मनाया जाता है।
इस होली के त्यौहार को ऋतुओं से भी संबंधित माना जाता है। इस सुअवसर पर किसानों द्वारा अपने खेतों में उगाई फसलें जो पककर तैयार हो चुकी होती हैं, उसे देखकर वह झूम उठता है। खेतों में खड़ी-पकी फसल को भूनकर वह अपने सगे संबंधियों व मित्रों में बाँटते हैं।
होलिका दहन के दूसरे दिन रंगों के साथ होली त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन सुबह से दोपहर तक लोग आपस में रंगों का अदान-प्रदान करते हैं एक दूसरे को मेह के साथ रंग लगाते हैं और शाम को आपस में मिलकर खूब मौज-मस्ती व ठंडाई का आनंद लेते हैं।
होली का दिन अपने आप में एक बुराई के अंत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कुछ लोग मदिरापान कर आपस में ही लड़ लेते हैं। जो त्यौहार के रंग में भंग डालता है।
होली के दिन कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा हास्य कवि सम्मेलनों वसंगोष्ठियों का भी आयोजन किया जाता है।
विभिन्न समाज के लोग अपने अपने तरीकों से होली-मिलन भी करते हैं।
भारत देश विभिन्नता में भी एकता के लिए प्रसिद्ध है, जो कि इसे पर्व व त्यौहारों में हमें देखने को मिलता है।

Banning Hugs & High Fives in School

Say good bye to hugs, high fives and touching in school. (Reminder: a wave or text will suffice as a parting exchange unless you want detention).

Schools, like the Portland middle school noted in this ABC News video, are banning hugs and other physical contact because it is interfering with students’ educational experience.

दीपावली – पटाखों का त्यौहार

त्यौहार खुशियाँ लाते हैं, साल में एक बार आते हैं और अपनी खट्टी मिठ्ठी यादें छोड़ जाते हैं। हिन्दू धर्म में तो त्यौहारों की अपनी मान्यताएँ भी हैं। हर त्यौहार के पीछे एक कथा है। चाहे अमीर हो या गरीब हर कोई सच्चे मन से त्यौहारों का स्वागत करते हैं। मानव जाति की तो मान्यता ही है कि एक त्यौहार हजारों दुश्मनों के सीने से होकर आता है। व्यापारी वर्ग में तो दीपावली का अपना ही महत्व है।
दीपावली हिन्दुओं का एक ऐसा पर्व है जो अपने साथ और भी कई पर्वो को लाता है। जैसे नरकाचोदस, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, पडवा आदि
दीपावली अर्थात् दीपों की वाली जिसका अर्थ है अपने चारों ओर फैले अंधियारे को दीए की रोशनी से दूर कर देना।
दीपावली के पहले दिन नरकाचोदस के रूप में घर, दुकान, ऑफिस आदि की तगड़ी सफाई होती है। रगड़ कर साफ किया जाता है, धोया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन घर से दरीदी भी साफ हो जाती है।
दूसरे दिन धनतेरस पर्व आता है। इस दिन हर कोई चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब परंपरानुसार नए बर्तन खरीदता है, फर्क बस इतना है कि अमीर सोने चाँदी के खरीदेगा तो गरीब तांबे, लोहे का। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि उस खरीदी हुई वस्तु के साथ ही घर में लक्ष्मी जी का प्रवेश भी होता है।
तीसरे दिन छोटी दीपावली का त्यौहार बनाया जाता है। फिर बड़ी दीपावली, अगले दिन गोवर्धन पूजा, अंत में भैय्याज।
दीपावली के पीछे कई पौराणिक कथाएँ हैं, अधिक मान्यतानुसार पहली पौराणिक कथा है कि इस दिन विष्णु भगवान ने नृसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप को मारकर भक्त प्रहाद की रक्षा की थी। और कुछ लोगों कि मान्यता थी कि इस दिन भगवान पुरुषोत्तम राम ने लंका के राजा रावण को मारकर अपने अयोद्धया वापस लौटे थे।
कथा या मान्यता कुछ भी हो सच तो यह है कि यह त्यौहार बड़ी ही खुशी एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में दीए जलाकर प्रकाश करते हैं। आजकल कुछ लोग मोमबत्तियाँ, झिमझिम लाइटों का भी प्रयोग करने लगे हैं। इस त्यौहार की हर किसी को प्रतीक्षा होती है। खासकर बच्चों व व्यापारियों को। पर्व के शुरूआत में तो लोग अपने निवास, आवास की सफाई में जुट जाते हैं। पताई एवं रंग-रोपन भी कराते हैं। बाजारों में तो हफ्तों पहले से ही चहल पहल शुरु हो जाती है। मिठाई की सुगंध से घर घर आनंदित होने लगता है। बच्चे आतिशबाजी करने को बेताब होते हैं।
दीपावली रात्रि को व्यापारी वर्ग अपने व्यापार में उन्नति हेतु कई धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं। घर घर लक्ष्मी गणेश का पूजन मिठाई और खील बताशों द्वारा किया जाता है। कई बाजार तो रात भर खुले रहते हैं इसके पीछे मान्यता है कि रात्रि को गणेश-लक्ष्मी ठहलने को निकलते हैं। जहाँ जाते हैं वहीं के हो जाते हैं।
दीपावली के दूसरे दिन पण्डवा मनाया जाता है व्यापारी लोग इस दिन मुहर्त देखकर अपने दुकान की बोनी (पहली बिक्री) करते हैं। फिर फौरन दुकान बंद करके परिवार सहित घूमने, फिरने, मौज मस्ती करने निकलते हैं।
इस पंच-दिवसीय त्यौहार की महीमा ही निराली है। जिसे न सिर्फ हिन्दू बल्कि हर धर्म के लोग धूमधाम से मनाते हैं। सभी आपस में मिलकर मिठाई खाते हैं।
कुछ समाज ने निम्नवर्गीय, मंदबुद्धि वाले लोग इस दिन शराब पीकर जुआ खेलते हैं हारने पर खुद का माहौल तो दूषित करते हैं साथ ही दूसरों के लिए भी परेशानी बनते हैं।
आजकल बाजार में उपलब्ध प्रदूषण युक्त पटाखों द्वारा आतिशबाजी करने के कारण हमारा वातावरण भी दूषित हो रहा है। हमें इसके निवारण हेतु पारंपरिक पटाखों का ही प्रयोग करना चाहिए ताकि हमारी परंपरा भी कायम रहे और पर्यावरण भी दूषित न हो।

ईद – भाईचारे का त्यौहार

रमजान का महीना मुस्लिम भाइयों के लिए विशेष महत्व रखता है। माना जाता है कि यह महीना रहमतों व पाक से भरा हुआ होता है। ईद का अर्थ ही है खुशी जाहीर करना।
सबसे ज्यादा खुशी तो उनको होती है जो कठिन परीक्षा देते हुए अपने एक महीने का रोजा रखते हैं। ऐसा माना जाता है कि महीने भर रोजा रखने वालों के सभी गुनाह अल्लाह माफ कर देता है। रमजान के पूरे माह के रोजे रखना हर मुसलमान का फर्ज है। बदले में खुदा भी अपने बंदों के लिए जन्नत के सारे दरवाजे खोल देता
ऐसा माना जाता है कि इस त्यौहार की शुरुआत अरब से हुई थी। पर सबसे ज्यादा उमंग व उत्साह तो भारतीय मुसलमानों में देखा जाता है। जहाँ दिन भर रोजा रखते हुए मुसलमान लोग अपना सारा वक्त खुदा की इबादत में बिताते हैं और शाम के समय नमाज अदा करके अपना रोजा खोलते हैं।
ईद का चाँद दिखते ही महीने भर के रोजे समाप्त हो जाते हैं। दूसरे दिन लोग खुदा की मेहरबानी के प्रति शुक्रिया अदा करते हैं कि खुदा ने उन्हें महीने भर के रोजे रखने की शक्ति दी। यह धन्यवाद सामूहिक रूप से नमाज अदा करके दी जाती है। साथ ही इस दिन अपनी सालाना आमदनी और जायदाद का एक हिस्सा मोहताजों और गरीबों में बाँटा जाता है। ईद की नमाज के पहले जकात और फितरा अदा करने का नियम है।
ईद के दिन सभी लोग सुबह के स्नान के बाद कुर्ता-पायजामा पहनकर ईद की नमाज में सम्मिलित होने के लिए जाने से पहले गरीबों में सदका देते हैं। ताकि वह गरीब लोग भी उनके ईद में शमिल हो सकें। ईद की नमाज के दिन ईदगाह, मस्जिद अथवा दरगाह आदि पर नमाज करने के लिए लोग एकत्र होते हैं।
इस पाक दिन पंक्ति बनाकर एक इमाम के नेतृत्व में ईद की नमाज अदा की जाती है। नमाज के बाद लोग एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं, यह सिलसिला लगभग पूरे दिन चलता रहता है।
अगर हम ईद की बात करें और हलीम (रोजा खोलने के समय खाने वाले एक पकवान का नाम) का जिक्र न करें तो यह नाइंसाफी होगी।
हलीम जिसे खाने के लिए साल भर लोग इंतजार करते हैं आजकल तो विदेशों में भी भेजा जा रहा है। इस पाक महीने में गली गली दुकानें लगती हैं और शाम को नमाज के समय के बाद से मेले के रूप में बदल जाता है। इस पाक त्यौहार में एकता व अपने पन को बनाए रखने के लिए कई लोग सामूहिक रूप से दावत भी देते हैं। जिसमें अपने भाइयों, इष्ट मित्रों को नमाज के बाद बुलाकर फल और हलीम की दावत देते हैं।
इस पाक त्यौहार के बाद निश्चित समय पर ईद-उल-जुहा या बकरीद त्यौहार मनाया जाता है इस पाक दिन बकरे को काट कर उसके माँस को अपने ईष्ट मित्रों में । बाँटा जाता है।
बकरीद का अपना महत्व है। इस दिन को कुर्बानी का दिन भी कहते हैं।
इस ईद के महीने में चाहे वह गरीब हो या अमीर सभी वर्ग के लोग नए नए कपड़े सिलवाते हैं जिसे पहनकर वे खुशी-खुशी मेलों में जाते हैं और मौज मस्ती करते हैं।
ईद के महीने में सभी मिठाइयों व खिलौनों की दुकानों में अच्छी खासी भीड़ देखी जाती है।
ईद के महीने में तो शुरुआत से ही कपड़ों के व्यापारी रात भर अपनी दुकाने खोल कर अपने कपड़े बेचते हैं।
ईद मन को पवित्र और आत्मा की शुद्धता का संदेश अपने साथ लाता है। सिवइयाँ (मीठी खीर फल-मेवे सहित) तो इस पर्व की पहचान है।।

Megamind Writing Activities

K-2: My Super Powers
If you could be a superhero, what would you want your super power to be? What would you use it to do?

3-5: Your Super Identity
If you were a superhero, what would you want your name to be? Explain why that name would be a perfect fit for you and your super powers. What would you wear? Choose your superhero name and draw a picture of you in your superhero outfit.

क्रिसमस – एकता का त्यौहार

भारतवर्ष एक बड़ा विशाल देश है। इस देश में अनेक जातियों एवं धर्मों के लोग निवास करते हैं। धर्मों के अनुसार यहाँ पर्व एवं त्यौहार मनाए जाते हैं। क्रिसमस ईसाइयों का त्यौहार है। क्रिसमस को बड़ा दिन भी कहते हैं। ईसाई धर्म का मार्गदर्शन महात्मा ईसा मसीह ने किया था।
महात्मा ईसा का जन्म 25 दिसंबर को येरुशलम के पास बेतलहम गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम मरियम एवं पिता का नाम यूसुफ था। जन्म के समय से ही लोगों ने ईसा मसीह की पूजा आरंभ कर दी थी। जिस कारण वहाँ के राजा हैरोदस बहुत क्रोधित हुए। उसने बालक ईसा को मारने का आदेश दे दिया। ईसा के मातापिता को किसी तरह इस बात का पता चल गया। जिस कारण वे अपने पुत्र को चुपचाप लेकर मिस्त्र चले गए। वहीं पर उनका लालन-पालन हुआ। वहीं पर उन्होंने अपने पिता से बढ़ाई का काम भी सीखा। कहा जाता है कि उन्हें 31 वें वर्ष में ईश्वरीय प्रेरणा प्राप्त हुई। फिर क्या था वे संत मार्ग को स्वीकार कर प्रभु की तपस्या में लीन हो गए। 40 दिनों की अखण्ड तपस्या में वे उपवास रह कर करे थे। फिर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
ईसा मसीह ने अपने संदेश में कहा था- मनुष्य को नम्रता, पवित्रता, शांति, प्यार, भलाई, गुप्त दान एवं क्षमा का धर्म अपनाना चाहिए। उनके अधिकाधिक शिष्य भी बन गए।
उनकी बढ़ती हुई प्रसिद्धि के कारण यहूदी धर्म-गुरु उनके शत्रु बन गए। पर ईसा मसीह बेपरवाह हो अपने कार्य में लगे रहे। वे अपने वचनुसार सदैव दूसरों की भलाई करते रहे। जैसा अक्सर हर महापुरुष के साथ होता है उन्हें भी उनके एक शिष्य ने धोखा दे, उनके साथ विश्वासघात कर उन्हें बंदी बना लिया।
यहूदियों संग मिलकर उन्हें क्रूस पर लटकाकर सजा दी गई। क्रूस पर उन्हें अत्यंत वेदना दी गई थी पर ईसा मसीह ने प्रभु से माँगा कि – हे प्रभु! इन्हें क्षमा करना। ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं। फिर वहीं पर कूस में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
ऐसा माना जाता है कि क्रिसमस मनाने का मुख्य कारण ईसा मसीह द्वारा जो ईसाई धर्म का प्रचार किया गया, चलाया गया। इसलिए ही उन्हें याद कर उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को यह पर्व मनाया जाने लगा।
हर त्यौहार कि भांति क्रिसमस की तैयारियाँ एक माह पूर्व से की जाती है। ईसाई लोग नए वस्त्र बनाते हैं। क्रिसमस के कार्ड खरीदते हैं। बच्चों एवं मित्रों के लिए उपहार लाते हैं।
इस शुभ अवसर पर ईसाई लोग अपने ईसा को याद करते हैं। ठीक रात को बारह बजे के बाद बच्चों एवं युवकों की विभिन्न टोलियाँ रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाकर क्रिसमस की बधाई देती हैं।
इस दिन के विभिन्न आकर्षणों में से एक है एक्स-मास ट्री, जिसे लोग विभिन्न प्रकार से सजाते हैं। घर घर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
हम क्रिसमस की बात करें और सेंताक्रुज को भूल जाए ऐसा कैसे संभव हो सकता है। इस पवित्र दिन सेंताक्रुज सभी बड़ों-बच्चों के लिए विभिन्न उपहार और हर किसी के लिए खुशियों की सौगात लाता है साथ ही ईसा के जन्मअध्ययन का संदेश जन जन तक पहुँचाता है। हर धर्म के लोग इसे बड़े उत्साह के साथ मानते भी हैं। लोग आपस में मिलते भी हैं और अपनी अपनी शुभकामनाएँ भी देते हैं।
दिन के शुरुआत में लोग गिरजाघरों में जाकर प्रभु ईशु की प्रार्थना करते हैं। धर्मगुरु इस दिन ईसा के उपदेशों की व्याख्याएँ लोगों को सुनाते हैं, साथ ही मिलजुल कर साथ-साथ रहने की शिक्षा देते हैं।
गरीबों में अन्न, धन एवं वस्त्र आदि का दान अपनी स्वेच्छानुसार करते हैं।
क्रिसमस के दिन हर ईसाई घर से हमें यह गीत (प्रार्थना) जरूर सुनने को | मिलते है 

गंगा की आत्मकथा

मेरा नाम गंगा है। मैं ही हूँ पतित पावन गंगा। मेरी शोभा बढ़ाने मेरे किनारों पर कई तीर्थ स्थान बने हैं। मैं ही जन जन को पावन करती हूँ।
वेदों के अनुसार मैं देवताओं की नदी हूँ। मैं पहले स्वर्ग में बहा करती थी, मेरा नाम अमृत था। एक दिन मेरे भक्त ने मेरी कड़ी तपस्या कर मुझे भू लोक पर आने को विवश कर दिया।राजा सगर के वंश की तप-परंपरा के कारण ही मुझे विवश हो, धरती पर आना पड़ा।
मैं आज आप सभी को मेरी धरती पर आने की महान् कथा सुनाती हूँ, मेरी यह कहानी सिर्फ रोचक ही नहीं बल्कि रोमांचक भी है।
बात बहुत पुरानी है। सगर नाम के प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा थे। उन्हें 100 अश्वमेघ यज्ञ परे करने का गौरव प्राप्त था। अंतिम यज्ञ के लिए जब उन्होंने श्यामवर्ण का अश्व छोड़ा तो इंद्र का सिंहासन तक हिलने लगा था। सिंहासन छिन जाने के भय से इंद्र ने उस अश्व को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया। राजा सगर ने अपने 60,000 पुत्रों को अश्व की खोज के लिए भेजा। काफी खोज के
बाद वे जब कपिल मुनि के आश्रम पहुँचकर अपने अश्व को बंधा पाया, तो यह देख राजकुमारों ने कपिल महर्षि का अपमान कर दिया। क्रोधित कपिल मुनि ने सभी के सभी 60,000 राजकुमारों को भस्म कर डाला।
राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने जब कपिल मुनि को प्रसन्न किया और अपने चाचाओं की मुक्ति का उपाय पूछा, जब मुनि ने बताया कि स्वर्ग से गंगा भू-लोक पर उतरेगी और तुम्हारे चाचाओं के भस्म को स्पर्श करेगी, तभी उनकी मुक्ति संभव है। फिर क्या था लग गया अंशुमान घोर तप करने। पर वह सफल न हो सका।
फिर उसके पुत्र दिलीप का अथक् श्रम भी सार्थकन हुआ। फिर दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से मैं प्रसन्न होकर पृथ्वी पर आना स्वीकार किया। साथ ही भगीरथ की तपस्या से मैं प्रसन्न होकर मैंने उसे वरदान दिया कि इस धरती पर मुझे तुम्हारे नाम से यानि भागीरथी के नाम से भी जाना जाएगा।
फिर मैं अपने वादेनुसार धरती पर प्रकट होकर भगीरथ की तपस्या को सफल बनाया और उनके परदादाओं के भस्मों के स्पर्श कर उन्हें मुक्ति भी दिलवाई।
हिमालय की गोद में एक एकांत स्थान पर एक छोटी सी घाटी बनी है, जो लगभग 1.5 कि.मी. चौड़ी है। इसे चारों ओर बर्फ से ढके हुए ऊंचे ऊंचे पर्वत शिखर हैं। जिस कारण वहाँ बड़ी ठंड भी होती है। यहीं एक गुफा भी है जिसे गोमुख कहते हैं। यहीं से मेरा उद्भव होता है।
यह गुफा ऊंची और चौड़ी है। कभी-कभी इसके किनारों से बर्फ के बड़े बड़े टुकड़े टूटकर गिरते हैं और मैं अपने तेज बहाव में उन्हें बालू मिश्रित घाटी की ओर पहुंचा देती हैं।
मैं गाती, नाचती, कूदती हुई मेरी धारागंगोत्री के पास से गुजरती है, वहीं एक छोटा सा तीर्थ स्थान भी बन गया है। इसी तरह देवप्रयाग में मेरा मिलन अलकनंदा से होता है। जिससे मेरी गति और अधिक बढ़ जाती है।
यहीं मैं अपने पिता हिमराज की गोद से उतरती हूँ जिसे हरिद्वार का पुण्य तीर्थ कहा जाता है। इसी से कुछ ऊपर मैं ऋषिकेश में मैं लक्ष्मण झूला के साथ, खेलती हूं और नीचे से गुजर जाती हैं। यहीं पर कुछ प्राचीन मंदिर भी हैं।
हरिद्वार से अपनी हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हुई मैं प्रयाग, काशी के तटों को पवित्र करती हुई बंगाल जा पहुँचती हैं। फिर हुगली नदी के मुहाने के पास दक्षिण पहुँच दामोदर नदी से मिलती हूँ। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य देखने लायक होता
इसी तरह मेरी कहानी बड़ी लंबी है। मेरे कई नाम भी हैं जिसमें से मुख्यतः मैं मंदाकिनी, सुरसरु, भागीरथी, विष्णुपदी, देवापगा, हरिनदी हैं। मेरे हर एक नाम के पिछे अपना एक इतिहास व कथा है।
मुझे भारतीय संस्कृति के प्रतिक के रूप में गौरव प्राप्त है।

Harry Potter Lesson Ideas

Last week, my excitement hit a fever pitch for the long-awaited release of Harry Potter and the Deathly Hallows Part II lined up at midnight with all the Pottermaniacs (those enlightened enough to recognize the genius behind J.K. Rowling’s creation) and it didn’t disappoint.

To tide myself and the rest of you fans over until the final film is released, here are some Harry Potter themed lesson ideas.

Get Harry Potter Lessons

रोटी की आत्मकथा

मैं रोटी हूँ। देखने व सुनने में ही मैं कितनी सुन्दर लगती हूँ। प्रायः मुझे पाने के लिए हर कोई उत्सुक होता है। चाहे कोई कितना भी धनवान, बलवान, शौर्य वीर ही क्यों न हो, पर मेरे सेवन बिना कोई नहीं रह सकता। मानव या फिर कोई भी जीव ही क्यों न हो, पेट भरने के लिए मेरा प्रयोग ही करता है।मुझे गर्व है कि लोग मुझे पाने के लिए किसी भी हद तक गुजर जाते हैं, आज के रावण के वंशज यानि भ्रष्टाचार, काला बजारी आदि लोग मुझे पाने के लिए ही तो करते हैं। हाँ, आज मैं आप सबको मेरी जीवन यात्रा के बारे में बताती हैं कि मैं इस रूप में कैसे आई। शायद यह सुन आप मेरे बलिदान से कुछ सीख सकें।

जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि मेरा जन्म खेतों में हुआ। धरती मेरी माँ है। अपनी धरती माँ की गोद में मेरा पालन-पोषण होता है। हवा जो कि मेरे मामा हैं, मुझे पालने में झुलाते हैं। पक्षियाँ जो मेरी मौसी हैं, मुझे लोरियाँ सुनाती हैं। मैं पौधों की बालियों में इन सब को देख मस्ती से झूमती रहती हूँ। मेरे साथ आगे इस संसार में होने वाले छल-कपट से बेखबर हो बढ़ती जाती हैं। वर्षा का पानी पीती हूं, चाँदनी का आनंद लेती हूँ।
यौवन की दहलीज पर पहुँची तो मेरे साथ छल होना शुरु हो गया। मेरी खुशी किसी से देखी नहीं गई और मुझे काटने के लिए वह तैयार हो गए।
मुझे किसान ने अपने कूर हाथों से काट कर मुझे अपने परिवार से अलग कर दिया। यह देख मेरा दिल ही बैठ गया। मैं सदमें से अभी उभर ही रही थी कि अत्याचारों का मुझ पर पहाड़ ही टूट पड़ा। मुझे और मेरे (मुझ जैसे कुछ) साथियों को बैलों से कुचलवाया गया। मैं अपने साथियों के साथ उनके पैरो के नीचे दब गई। मैंने खूब विलाप किया, पर किसी ने मेरी परवाह नहीं की।
फिर मानव ने अपनी फितरतनुसार मुझसे सहानुभूति दिखाई जो कि उसके षड्यंत्र का एक हिस्सा मात्र था, मुझे साफ-सुथरा कर एक जगह रखा गया। मैं बेचारी उनकी चाल में फंस अपने दानों को ऐसे चमकाने लगी जैसे कोई सोने के कण हों। जिसे देख मानव की आंखें चौंधिया गई और फिर मुझे बोरों में कैद कर दिया गया। दोपहर की तेज धूप जिसके साथ मैं खेली थी अब उसके लिए मेरे नयन तरसने लगे।
फिर मुझे नीलाम कर दिया गया। बोली लगाने वाले मुझे कैसी कैसी निगाहों से परखने लगे, मुझे बड़ा कष्ट हुआ। मेरी बोली लगाई गई। मैं उस एक दिन की मानो बेताज रानी थी। फिर मुझे मेरे नए घर भेज दिया गया। जहाँ फिर कुछ समय के बाद मेरा प्रदर्शन होने लगा। वही तो वह जगह है जहाँ से तुम मुझे खरीद लाए हो। फिर मेरा घर दोबारा बदला। आगे तो तुम जानते ही हो कि मुझे वहाँ से लाने के बाद मुझे अच्छे से नहलाया गया। मुझे साफ-सुथरा कर चक्की में पिसने के लिए भेज दिया गया जहाँ मेरे रूप को बदल दिया गया। पिसने के लिए मुझे दो पाटों के बीच में डालकर मेरे ऊपर हथौड़े, छुरी-कांटे चलाए गए। मैं इन सब से डरकर अपने रूप में बदलाव लाते हुए अपने आप को आटे के रूप में बदल डाला।
उस आटे को फिर तुम अपने साथ लाकर डब्बों में भरकर अपने किचन की शान बढ़ाने लगे। रोज चुरक-चुरक कर थोड़ा-थोड़ा कर मुझे पानी के साथ मिलाकर मुझे बेलकर तुम मेरा वास्तविक रूप देने लगे। अपने इस रूप में आने के लिए तुमने सुन तो लिया कि मुझे कैसी-कैसी यातना झेलनी पड़ी। फिर तुम भी तो अपने साथ लाकर मेरे सारे शरीर को जला देते हो, मुझे तेज आँच में सेकते हो। पर तुम्हारी भूख शांत करके मैं अपने आप को धन्य समझती हूँ और अपनी खुशी दिखाते हुए गर्म-गर्म तवे पर भी खुशी से फूल जाती हूँ। यही है मेरी कहानी।

Charlie Brown Thanksgiving – Writing Prompts

Here grade-specific samples of this week’s video writing prompts based on a clip from Charlie Brown Thanksgiving.

3-5: Food Frenzy
Food is a big part of Thanksgiving. While traditional Thanksgiving feasts include turkey, stuffing and pumpkin pie, the holiday could use some new and exciting additions to the menu. Snoopy tries some creative options for his Thanksgiving dinner. Now it’s your turn.

Create a new dish that you think would commemorate the holiday. Describe what it is made of and why you think Thanksgiving would be better with your dish on the table.

सड़क की आत्मकथा

मैं सड़क हूँ, मेरे कई रूप आप सब को देखने को मिल सकते हैं। कहीं मैं अपने विशाल रूप में हूं तो कहीं अपने छोटे रूप में। चाहे कोई भी हो, सभी मेरा प्रयोग करते हैं। मैं कभी अपने आप को प्रयोग करने वाले से यह नहीं पूछती कि क्या वह हिन्दू है, या फिर मुसलमान, सिख है या फिर ईसाई। मैं अपने कर्म को ही अपना धर्म समझती हूँ। सभी मुझ पर से गुजरकर ही अपने अपने लक्ष्य को पाते हैं।
मैं ही हूँ जो कस्बे से गाँव को, गाँव से शहर को और शहर को महानगर से जोड़ती हूँ। मानव के साथ हर जीव जैसे पशु, पक्षी, कीड़े-मकौड़े आदि भी मेरा भरपूर प्रयोग करते हैं।समय परिवर्तन के साथ-साथ मुझ में भी काफी परिवर्तन आने लगे। जहाँ पहले मैं अपने कच्चे रूप में थी वहाँ पर भी मुझे आज पक्का रूप दे दिया गया है। अब मुझे साफ सुथरा, आकर्षक रूप मिल चुका है। अब मेरे शरीर पर मिट्टी की एक भी झरीं नहीं दिखाई देने लगी। मैं अब बिल्कुल चिकनी, सुन्दर बन चुकी हूँ।
मुझ पर चलने से लोगों को अपना लक्ष्य और मुझे उनकी सेवा करने का सुख मिल जाता है। मेरी यही तपस्या से भगवान ने मुझमें एक अद्भुत शक्ति प्रदान कर डाली है। मैं कभी थकती नहीं और किसी से डरती नहीं। चाहे मुझे पर हाथी चले या चींटी रेंगे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं अपने आप में एक बल हूँ।
मुझ पर कारें, बसें आदि वाहन भी तेजी से गुजरते रहते हैं। जितना मजा वाहन वाले को मेरे ऊपर से गुजरने में मिलता है उतना ही मजा मुझे उसे राह देने से मिलता है।
मुझ में पहचान की अद्भुत क्षमता है, मैं जान लेती हूँ कि मेरा प्रयोग कौन कर रहा है, क्या वह पुरुष है या फिर स्त्री। जीव है या फिर जन्तु या फिर कोई मशीन। मैं मात्र गुजरने की आहट और पैरों की चाप से समझ जाती हूँ कि मेरा प्रयोगकर्ता कौन है।
मैं बच्चों के साथ बच्चा बन उनके साथ मस्ती भरी इठलाती चाल का आनंद लेती हूं, तो वहीं बूढ़ों का सहारा बन उन्हें संभालती हूँ।
यहां तक कि मैं योगी और भोगी दोनों का अंतर पहचान लेती हूँ।
मेरा जन्म अनादि काल से इस संसार में मानव के जन्म के साथ ही हुआ है। जबतक इस धरती पर मानव हैं मैं भी उनकी परछाई बन रहूंगी। मुझे विश्वास है समय के साथ-साथ मानव मुझ में बदलाव भी लाता रहेगा।
 मैं भले ही इस संसार में निर्जीव समझी जाती हैं, पर मुझमें चेतना की कोई कमी नहीं। मैं तो सारे देश, विश्व, संसार में भाईचारे का नारा देते हुए अपने आप को फैला लेती हैं। स्वयं दूसरों के पैरों के नीचे रहकर भी खुश हैं। काश मेरे इस करनी का मानव महत्व समझ मेरा ध्यान रखे।
पर आज का मानव इतना बेईमान हो चुका है कि वह मुझे बनाने तक में धांधली करने लगा है, यहाँ तक कि वह जानता है कि आने वाले समय में मेरा प्रयोग उसके बच्चों द्वारा ही किया जाएगा पर फिर भी वह नहीं संभलता।
लोग नशे में धूत, अहं में डूबे वाहन चलाते हैं एक दूसरे से ठकराते हैं और अपने प्राण त्याग देते हैं पर मनुष्य अपनी गलती छोड़ अपनी आदत के अनुसार अपनी करनी किसी और पर ढकेल देता है और मैं खूनी सड़क के नाम से बदनाम हो जाती हूं। जरा आप मेरे द्वारा सहे जा रहे कष्टों के बारे में सोचें, मैं तेज बारिश हो या फिर तेज धूप सबकुछ सहते हुए भी अपने कर्म में लगी रहती हूँ फिर भी मुझे ही कष्ट मिलता है, मैं आपके सामने यह प्रश्नछोड़ती हूँ, आप विचार कर मुझे अपनाएँ।

I Am Thankful For…

all the amazing teachers – for what they do in the classroom and for sharing their wisdom with us on TeachHUB.

We try to thank our members every week with our Teacher Spotlight feature. This week’s spotlight teacher is Scott Bolden. Check him out!

Mr. Scott Bolden

Eagleville School
Eagleville, Tennessee

How did you know you wanted to be a teacher?
It started when I was in the first grade. My parents tell me that I came home from school during just the second week of first grade and told them I wanted to be a first grade teacher just like Miss Peggy. I always wanted to help students learn to read and find a love for learning just like she had done for myself and so many other lives she touched. I actually got to fulfill that dream. I am know teaching first grade at Eagleville School where Miss Peggy taught me.

रुपये की आत्मकथा

मैं रुपया हैं। मुझे सभी लोग प्यार करते हैं। मुझे पाने के लिए लोग सदैव सब कुछ करने तैयार रहते हैं। मेरा आकर्षण ही कुछ ऐसा कि लोग कुछ भी कर गुजरें। मैं अगर चाहूँ तो राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता हैं। हर जगह सिर्फ मेरा ही बोल-बाला है। आइए, मैं आज आपको अपनी कथा सुनाता हूँ।
मेरा जन्म धरती माता के गर्भ से हुआ है। मैं वर्षों तक धरती माता की गोद में ही विश्राम करता रहा। पहले का मेरा रूप आज के इस रूप से बिल्कुल भिन्न था। मेरा बहुत बड़ा परिवार हुआ करता था। हम सब साथ मिल-जुलकर रहते थे।समय बीता, एकदिन कुछ मानव रूपी दानवने खान की खुदाई का कार्य शुरू कर दिया, जैसे ही उनकी खुदाई शुरु हुई मेरा तो दिल ही काँप उठा। उनसे बात न बनी तो बड़ी-बड़ी मशीनों से हमारी खुदाई शुरु कर दी गई। अंतः हमने हार मान कर ऊपर आना ही ठीक समझा।
फिर क्या मानव रूपी दानवों ने हमें बड़ी-बड़ी गाड़ियों में लाद कर एक बहुत बड़े भवन की ओर ले जाने लगे। वहीं कुछ रसायन से हमारी धुलाई की गई। हम सब कुछ सहन करते गए।
फिर हमें टकसाल भेज दिया गया, वहाँ हमें मिट्टी में डाल पिघलाया गया और उसके बाद साँचों में डाल नया रूप दिया गया। हमारा नया नामकरण किया गयारुपया। हमें अपने इस नए रूप पर गर्व होने लगा था।
फिर हमें थैलों में डाल एक मजबूत कमरे में जिसे मानव बैंक कहता है, वहाँ पहुँचाया गया, यहाँ के बाद हमारे जीवन में भी आजादी आने वाली थी।
एक दिन हमारा नया मालिक एक सेठ बैंक पहुँचा तो हमें उसे सौंप दिया गया। मैं खुश हो गया कि अब मैं खुली हवा में सांस ले सकता हूँ पर यह क्या… |
सेठ तो बड़ा कंजूस निकला, उसने हमारी कैद और बढ़ा दी, हमें अपनी मजबूत तिजोरी में ताले में बंद कर दिया।
फिर क्या मैं अपने जीवन से निराश हो गया और प्रभु स्मरण करने लगा कि अचानक मैंने देखा कि कुछ डाकू उस सेठ के घर डाका डालने आ पहुँचे हैं उन्होंने मुझे उस सेठ की कैद से आजाद करवाया और खुले हाथों मझे खर्च करने लगे। मैं भी उन्हें अपनी इस आजादी के बदले सुख-चैन के सारे साधन दिलाता चला गया।
पर अफसोस, मेरे कुछ भाई-बंधु अभी भी किसी न किसी सेठ की कैद में रह गए थे।
मैं आपको एक बात जरूर बताना चाहूँगा, आप लोग जितना मुझे रोलिंग (चलन) में लोगे मैं उतना ही बढ़ता जाऊंगा, एक जगह मुझे कैद कर देने से मैं घटता जाता हूँ, मेरा स्वभाव ही है मैं जितना चलँगा, उतना ही बदूंगा।
समय के साथ मैंने अपने में बदलाव आया आज मैं सिर्फ सिक्के के रूप में ही नहीं कागज के रूप में आने लगा हूँ।
पर शायद किसी की मुझे नजर लग गयी कि लोग आज कल मेरी जगह क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि नवीनतम् रूपों का इस्तेमाल करने लगे।
देखा, आपने मेरी करुण व साहसपूर्ण गाथा अब आप मेरे भाग्य पर हँसना नहीं, आप जितना मेरा ध्यान रखेंगे मैं वादा करता हूँ कि मैं भी आपका उससे दुगुना

Content v. Skills: The Great Curriculum Debate

As teachers, we are always in a race to cover required content, but is winning that race really teaching our students the skills they need?

Many educators might face the dilemma of skills vs. content when it comes to classroom curriculum. With strict state standards in place and limited class time, we are forced to choose between spending more time teaching a wide variety of content, or focusing on hands-on activities that teach skill.

फूल की आत्मकथा

मैं गुलाब हूँ। लोग मुझे पुष्पराज भी कहते हैं। क्यों कि मैं हर किस्म के फूलों से भिन्न और अधिक खुशबूदार हूँ। मैं यह गर्व से कह सकता हूँ कि मेरा जीवन भारतीय दर्शन और चिंतन के अनुरुप है। क्योंकि भारतीय दर्शन कहता है कि मनुष्य का जीवन कठिनाइयों के बीच से होता हुआ गुजरता है। मैं भी तो कांटों से बीच ही जन्म लेता हूँ और उनसे बचते हुए बड़ा होता हूँ और अपनी कोमलता बनाए रखता हूँ। मैं भी कई रंगों में कई संदेश देता हूँ जैसे कि मैं लाल रंग वाले रूप के माध्यम से क्रांति और प्रेम का संदेश देता हूँ, सफेद रंग के रूप में शांति और सादगी को संदेश देता हूँ, पीले रंग के रूप में सविचार और मन की निर्मलता का संदेश देता
मैं अपने प्रशंसकों में कोई भेदभाव नहीं करता, मैं सभी स्तर के लोगों को एक समान देखता हूँ। मजदूरों की जीवन-शैली तो मेरी ही जीवन शैली जैसी है। जिस तरह मजदूर कठिनाइयों से घिरे रहते हैं, मैं भी कांटों के बीच ही रहता हूँ। बड़े-बड़े धनी अपनी आपको निर्धन समझते हैं अगर मैं उनकी पुष्पवाटिका में न रहूँ। कई लोग तो मुझे गुलदस्ते के रूप में एक-दूसरे को उपहार स्वरूप देते हैं।आज कल के युग में मेरी जगह नकली कागज या प्लास्टिक के फूलों ने ले ली है। पर संतोष है उन्होंने मेरा वास्तविक रूप नहीं बदला।
हां, मैं अगर पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. जाकिर हुसैन का नाम ना लें तो यह ठीक नहीं होगा, उन्होंने सदैव जीवनभर मुझे अपनी छाती से लगाकर जो अतिशय प्यार एवं सम्मान मुझे दिया है मैं जीवन भर उनका कृतज्ञ रहूँ तो भी कम है।
हाँ, महिलाएं भी मुझे अपना सौंदर्य बढ़ाने का माध्यम मान मुझे सम्मान सहित अपने सिर पर बैठाकर घूमती हैं।
एक बात मैं आपको यहाँ बताना जरूरी समझता हूँ वह यह कि मैं सिर्फ आँख को सुन्दरता के माध्यम से और नाक को सुगंध के माध्यम से ही तृप्त नहीं करता बल्कि अगर आप मुझे सुखाकर रख लें तो मैं एक औषधि का काम भी करता हूँ, आप मेरा जल अपनी आंखों में तकलीफ होने पर डाल लें तो मैं आपको ठंडक महसूस कराता हूँ।
और हाँ, अगर आप रसगुल्ले पर मेरे एक-दो बूंद का छिड़काव कर उसकी चाश्नी में मेरी कुछ बूंद मिलाकर खाएं तो मैं आपको ऐसा स्वादहूँगा की आप जिंदगी भर भूल नहीं सकते।
कवियों और लेखकों ने तो मुझे जो सम्मान दिया है वह मैं कभी भूल ही नहीं सकता। उन्होंने तो मुझे अपनी रचनाओं में स्थान दे डाला। कुछ ने मुझे सराहा तो कुछ ने मुझे फटकारा भी।
पर मैं अपने जीवन के उस पल को कभी नहीं भूल सकता जब एक भक्त अपनी भक्ति प्रकट करते हुए मुझे भगवान, अल्ला, वाहे गुरु के चरणों में अर्पित करता है। और एक माता अपनी रोती हुई संतान के चेहरे पर खुशी लाने के लिए मुझे उसे भेंट करती है। और हाँ मैं उस प्रेमी को कैसे भूल सकता हूँ जो मेरे माध्यम से अपनी प्रेमिका को संदेश भेजता है।

How to Use Assessment to Motivate Students

As teachers, we often spend countless hours grading papers and writing comments in margins, only to have our students look at the grade and then toss the paper in the wastebasket.

While we must evaluate our students’ work, we also need to develop opportunities for our students to think about their work and use our corrective feedback to develop next steps for meeting the learning targets we have set. read more

भारतीय गाँव

हमारे भारत को गाँवों का देश भी कहा जाता है। भारत की 85 प्रतिशत जनता गावों में रहती है, अतः अगर हम कहें की भारत की आत्मा, भरत के गाँवों में ही रहती है तो कोई गलत नहीं होगा। गाँव भारतीय जीवन के दर्पण भी माने जाते हैं। गाँव ही भारत की संस्कृति व सभ्यता के प्रतीक हैं।
भारतीय गाँव प्रकृति की अनुपम भेटों में से एक है। प्राकृतिक सौंदर्य-सुषमा के घर हैं, भारत के निवासियों के लिए अन्न, फल-फूल, साग-सब्जी, दूध-घी आदि गाँव से ही आते हैं अर्थात् सेना को सैनिक, पुलिस को सिपाही और कल-कारखानों के मजदूर आदि भी अत्याधिक गाँवों से ही मिलते हैं।गाँवों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है अशिया। स्वतंत्रता के पश्चात् गाँवों में प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध किया गया था किन्तु हाई स्कूल और कॉलेज काफी दूर कस्बों या नगरों में होने के कारणआपस में जुड़नसके। इस कारण ग्रामीण की आधी आबादी अनपढ़ ही रह गयी। गाँवों में अगर हम देखें तो आज भी अज्ञानता का पूरा बोलबाला है।
वही अज्ञानता के कारण ही सेठ-साहूकार, नेता, अधिकारी ग्रामवासियों को लूटते हैं। देते तो वो सिर्फ पाँच हैं पर अंगूठा लगवाते हैं दस पर, बेचारा ग्रामीण उम्र भर ब्याज भरता ही रहता है ब्याज तो व्याज असल तक तो पहुँच भी न पाता है।
भारतीय गाँव सभ्यता और आधुनिक सुख-सुविधा से अभी भी काफी दूर है। कुछ पक्के मकानों को छोड़कर अभी भी गाँव में हमें कच्चे मकान और झोंपड़ियाँ वहीं शान से सीना ऊंचा कर खड़ी हैं। वहाँ पेयजल की कमी भी है, आज भी मल-मूत्र विसर्जन के लिए वहाँ कोई विधिवत् निकासी नहीं है।
गाँवों में गड्ढे बहुत होते हैं जहाँ कचरा उड़कर जमा होता है और साथ ही वह सड़ते हुए दुर्गध पैद्य करता रहता है। कई गाँवों में तो बिजली अभी भी नहीं है। कई गाँवों में तो बिजली के खंभे पहुंच चुके हैं पर पता नहीं बिजली कब तक पहुँचेगी। कई भारतीय गाँवों में तो अभी तक चिकित्सालय, प्रशिक्षित डॉक्टर पहुँच भी नहीं पाए हैं जिस कारण वहीं नीम हकीम का राज चल रहा है, जो फायदा तो करता ही है पर खतरा-ए-जान के होने से कोई इंकार भी नहीं कर सकता है। यहाँ तक तो ठीक है पर आज भी कई भारतीय गाँवों में तो जादू-टोना आज भी ग्रामवासियों में स्वस्थ रहने की औषध है।
गाँव में पंडित, मौलवी आदि की पूजा की जाती है। धर्मभीरु गाँव वासियों के लिए कर्मकाण्ड के नाम पर खूब शोषण करता है। बेचारे ग्रामवासी परंपराओं और रूढ़ियों में उसी प्रकार बंधे हुए हैं, जिस प्रकार नाचने वाला बंदर मदारी के हाथों कैद होता है।
भारतीय गांव जहाँ अब तक शारीरिक तथा मानसिक दुर्बलता के घर थे, अब वहाँ पर भी नई चेतना, नई ज्योति, नया जीवन भी आया है। सरकार ने वहाँ आर्थिक शोषण से मुक्ति हेतु सहकारी बैंक स्थापित किए हैं। सूदखोर जमींदारों की जमीन वापिस लेकर किसानों में बाँट दी गई है। शिक्षा के विकास हेतु समय-समय पर कई शैक्षिक आयोजन किए जाते हैं। कई समाज सेवी संस्थाएँ गाँव-गाँव जाकर मुफ्त शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था भी करती है।
आजकल तो स्वस्थ्य व सफल फसल हेतु किसानों को भी प्रशिक्षण दिए जाने लगे हैं, सीधे माल बेचने की व्यवस्था भी की गई है जिससे जमींदारों को अनैतिक रूप से मिलने वाले मोटे मुनाफे से रोका जा सके। सरकार ने पहल करते हुए गाँव और शहर के बीच पक्की सड़क बनवा दी जिससे फसल समय पर बाजार पहुँच उचित मूल्य पा सके। अब तो किसानों को ऋण देकर टैक्टर, फसल हेतु बीज, खाद आदि भी उपलब्ध हो रहा है।
कृषि उन्नति हेतु कृषि विश्वविद्यालय भी स्थापित हो गए हैं, जहाँ किसान कभी भी अपनी समस्या के निवारण हेतु पहुँच सकता है।
स्वंतत्रता के पश्चात् ग्राम-पंचायतों का पुनर्गठन भी हुआ। पंचायती राज्य के तीन आधार बने- ग्राम पंचायत, क्षेत्र समिति तथा जिलापरिषद्- ये तीन संस्थाएँ ग्राम विकास की उत्तरदायी बनीं, गांवों की सामाजिक और आर्थिक उन्नति का माध्ययम भी यही हैं। जिस कारण अशिक्षा भी वहाँ से कोसो दूर होती जा रही है। जागरूकता के कारण आज का भारतीय गाँव, शहर से किसी भी मुकाबले पीछे नहीं रह गया है। पर हाँ अगर किसी को भारतीय संस्कृति को देखना है तो उसे किसी भी भारतीय गाँव में जाना ही पड़ेगा। भले ही गाँव शहर में बदल चुके हैं पर उनकी सादगी, सीधापन नहीं बदला है।

भारतीय संस्कृति

विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की अगर हम बात करें तो भारत का पहला स्थान आता है। भारत संसार का एक प्राचीनतम विशाल देश है। इस भाँति इसको संस्कृति भी उदार, प्राचीन और गौरवशालिनी है। संस्कृति का संबंध मानवों की आत्मा और मन से होता है किन्तु सभ्यता का संबंध उसकी बाहरी वेश-भूषा, खानपान और उठने-बैठने से होता है।
भारत संसार का महान् देश है। यहाँ की सिर्फ संस्कृति ही विश्व पर अपनी छाप नहीं छोड़ती बल्कि यहाँ के ऋषि-मुनि जो वनों, नदी-तटों और रमणीय पर्वतों की कन्दराओं में बैठे ज्ञान की खोज करते रहते हैं उन्हीं की इस खोज ने भारतीय संस्कृति का मार्ग प्रकाशित किया है। आज भी भारतीय संस्कृति का मूल आदर्श आत्मा का ज्ञान ही है। इसमें संसार के भौतिक तत्त्वों के प्रति कोई मोह नहीं है।पहले संत-महापुरुषों के सत्संग केवल भारत में ही हुआ करते थे पर भारतीय संस्कृति का चस्का विदेशियों को ऐसा लगा कि वह विशेष तौर से हमारे संतोंमहात्माओं को अपने देश में बुलवा कर सत्संग करवाने लगे हैं।
समय-समय पर देश में होने वाले धार्मिक आंदोलनों ने ही संस्कृति को और उदार बनाया है। बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त तथा वैष्णव मत-प्रचारकों ने ही भारतीय संस्कृति में अनेक तत्त्व जोड़े हैं जिनमें मुख्यतः सहनशीलता, अहिंसा, परोपकार आदि गुणों का नाम भी उल्लेखनीय है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता जो हमें कहीं और किसी देश में देखने को नहीं मिलती है कि यहाँ भारत देश में सब धर्मों एवं सम्प्रदायों की शिक्षा को एक साथ लेकर चलना और सामूहिक रूप से देश को एक मानना। तभी तो भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में रामायण, पुराण आदि ग्रंथ पूजे जाते हैं।
संस्कृति के तत्त्व के संबंध में अगर कहा जाए तो हम पाएंगे कि भारतीय संस्कृति चार तत्त्व में विद्यमान है, वह है- चरित्र, विज्ञान, साहित्य और धर्म।
भारतीय संस्कृति में प्रेय और श्रेय के दोनों रूप स्वीकृत हैं। प्रेय से तात्पर्य है लोक में कर्म करते हुए अभ्युदय को प्राप्त करना और श्रेय से तात्पर्य है आत्मिक उन्नति को प्राप्त करना।
भारतीय संस्कृति, साहित्य के माध्यम से विदेशों में भी प्रचारित हो चुकी है। यही कारण है कि आज विदेशी विश्वविद्यालयों में भी भारतीय दर्शन पर पठन-पाठन हो रहा है।
भारतीय संस्कृति की कई विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता तो यही है कि यहाँ सभी समान भाव से आचरण करते हैं साथ ही सभी की विचारधाराओं का सम्मान किया जाता है। दूसरी विशेषता उदारता से संबंधित है। भारतीय जीवन की शक्ति ही उदारता है। सबके प्रति खुले मन से व्यवहार करना यहाँ के जनजीवन का मूलभूत गुण है। साहिष्णुता के गुण से भारतीय संस्कृति का महत्त्व लोक-प्रसिद्धि पा चुका है। तीसरी विशेषता है यहाँ कि शान्ति की जो आज विश्व में कहीं पर भी नहीं है, यही कारण है कि उसी शान्ति की खोज में कई विदेशी लोग भारत आते हैं।
आज विश्व के सभी देश दूसरे देशों में सांस्कृतिक संगठनों की स्थापना करने में लगे हैं। हमारी भारत सरकार ने भी कदम बढ़ाते हुए विदेशों में अपने सांस्कृतिक प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं, जो समय-समय पर विदेशों में भारतीय संस्कृति पर व्याख्या करते हैं। इस पद्धति से अन्य देशों के साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध मधुर होते जा रहे हैं।
एक बात तो हम दावे से कह सकते हैं कि संसार का कोई भी देश संस्कृति के | बिना जीवित रह ही नहीं सकता, अगर हम संस्कृति को देश की आत्मा कहें तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा।

Bell Ringer Activity: Exit Slips

One teaching objective frequently used by administrators and educational evaluators is the old adage “Teach bell-to-bell.” Sometimes, however, this wise advice is easier given than done.

Teachers find themselves with five or even ten vacant minutes at the end of class, and they ask themselves, “What now?” While some may opt to allow students additional “study time” or “early homework time,” such a plan usually goes awry, and students begin chattering, antagonizing one another, and generally become disruptive in the absence of an actual purpose.

A better answer to the “dead time” issue comes in the form of Exit Slips:

जीवन में ऋतु का महत्व

वैसे तो हर किसी के जीवन में की प्रकार के ऋतु आते हैं। ऋतु चाहे कोई भी । हो अगर वह साथ में खुशी लाए तो ही अच्छा लगता है।
भारतवर्ष की अगर हम बात करें तो यहाँ छह प्रकार की अतुओं का वर्णन मिलता है। पर ऋतुराज के रूप में बसंत ऋतु को जो सम्मान मिलता है वह शायद ही किसी और को मिला हो।ऋतुराज वसंत आनंद एवं जवानी का प्रतीक माना जाता है। वसंत ऋतु का आगमन होते ही शिशिर से ठिठुरते तन-मन में नवीन स्फूर्ति, आनंद एवं उल्लास का संचार हो जाता है। इसके मादक स्पर्श से कोई अछूता नहीं रहता। इसकी महिमा का गुणगान तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने भी अपनी गीता में किया है।
ऐसा माना जाता है कि वसंत ऋतु का आगमन होते ही प्रकृति के कण-कण में । छिपा श्री कृष्ण का रूप, वैभव, ऐश्वर्य विराट रूप में प्रकट होने लगता है। चारों दिशाओं से आती कोयल की कहू-कहू की आवाज स्वयं श्री कृष्ण के बाँसुरी वादन को परिणाम माना जाता है।
वैसे तो चैत और बैसाख वसंत ऋतु के मुख्य माह माने जाते हैं लेकिन माघ की शुक्ल पंचमी या वसंत पंचमी के दिन से ही वसंत ऋतु अपने शुभागमन की सूचना दे देता है। इस दिन भारत के कई राज्यों में वसंतोत्सव भी मनाया जाता है।
वसंत ऋतु में प्रकृति समशीतोष्ण रहती है अर्थात् न तो इसमें ज्यादा ठंड होती है और न ही ज्यादा गर्मी, इसलिए अमीर हो या गरीब सभी इस का समान रूप से आनंद लेते हैं। जब वसंत ऋतु की वसंती हवा हमें स्पर्श करती है तो हमारा रोम-रोम पुलकित हो उठता है।
पतझड़ की मार से वीरान दिखने वाले पेड़-पौधे भी बसंत का स्पर्श पाते ही नए-नए पल्लवों तथा पुष्पों से लद जाते हैं। विभिन्न प्रकार की पुष्पलताओं पर कई रंग बिरंगे फूल खिल उठते हैं जो किसी अन्य ऋतु में नहीं दिख पाते। ऐसे फूलों से सजी प्रकृति रानी को देख ऐसा लगता है मानो, उसने नया परिधान धारण कर लिया है। और रंग-बिरंगे पुष्पों को अपने आँचल में समेटे इतरा रही हो।
ऋतुराज वसंत का वर्णन हमें सिर्फ भारतीय साहित्य में ही नहीं बल्कि विदेशी साहित्य में भी देखने को मिलता है। जयदेव ने वसंत के लिए अपनी कलम से निम्न पंक्तियों को जन्म दिया है
ललित लवंग-लता परिशीलन कोमल मलय समीरे,
मधुकर-निकर करम्बित कोकिल कुंजित कुंज कुटीरे।
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने वसंत के लिए कहा है कि
वसंत आता नहीं, ले आया जाता है।
वसंत ऋतु का आगमन मानव को एक संदेश देता है और प्रकृति के एक शाश्वत सत्य को उद्घाटित भी करता है और साथ ही कहता है कि- हे मानव, मैं तुम्हारे जीवन में आनंद और खुशियाँ अवश्य लेकर आऊंगा, क्योंकि तुम मेरा स्वागत बड़ी निडरता के साथ शिशिर की कड़कड़ाती ठंड को झेलते हुए करते हो। ठीक उसी तरह जैसे हर रात की सुबह जरूर होती है और हर दुख के बाद सुख अवश्य आता है।

Fighting Failure Rates One Assessment at a Time

Congratulations teachers, we made it! First marking period grades are in and we are closing in on the first semester. However, as it always happens, there were a few teachers who have more than half of their students failing.

To keep teachers reflecting on how well each lesson is delivered, we’re trying to implement a new policy of authentically assessing students for any lesson objective we write.

ताजमहल – विश्व का आश्चर्य

भारत एक ऐसा गौरवशाली देश है जिसने अपने में कई उपलब्धियों को समेट रखा है। सारे विश्व में जो किसी को नहीं मिल सकता वह केवल भारत में ही मिल सकता है। भारत के पास कई ऐसे रत्न हैं जिसका मोल शायद ही कोई लगा सके।
विश्व के महान आश्चर्यों में से एक है ताजमहल। यह विश्व में अपनी अभूतपूर्व कलाकृति के लिए जाना जाता है।
ताजमहल का निर्माण आगरा में यमुना नदी के तट पर अपनी पत्नी की याद में तत्कालीन मुगल सम्राट शाहजहाँ ने सन् 1654 ई. में बनवाया था। इतिहास में लिखा है कि इसे बनाने में लगभग 22 वर्ष का समय लगा जिसे 20,000 कारीगरों ने बनाया था और उस समय लगभग 3 करोड़ का खर्च आया था।
कहा यह भी जाता है कि जैसे ही ताजमहल का निर्माण कार्य सफल हुआ, शाहजहाँ ने उसे बनाने वाले कारीगरों को कतार में खड़ा कर सबके हाथ काट डाले ताकि इस तरह की अद्वितीय कला का नमूना कहीं और न बन सके।
इसका निर्माण सफेद संगमरमर के पत्थरों से कराया गया। ये पत्थर नागौर के मकराने से विशेष रूप से मंगवाए गए। इसमें जो लाल रंग के पत्थर लगे हैं, वे धौलपुर और फतेहपुर सीकरी से मंगवाए गए थे। पीले और काले पत्थर नरबाद और चारकोह से आए थे। साथ ही इसमें जो कीमती पत्थर व सोने-चाँदी का जो इस्तेमाल हुआ है, वह पूरे देशों के सम्राटों से प्राप्त किया हुआ है।
अगर हमें ताजमहल का वास्तविक रूप देखना है तो हमें चाँदनी रात का इंतजार करना होगा, क्योंकि उसे रात वह अन्य रातों के मुकाबले अत्याधिक सुन्दर लगता है। ताजमहल के मुख्य भवन के बाहर बहुत ऊंचा और सुंदर दरवाजा है, जिसे बुलंद दरवाजा कहते हैं। इसे बनाने के लिए लाल रंग के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। इसके भीतर प्रवेश करने के लिए उन दरवाजों से प्रवेश करना पड़ता है जिस पर कुरान-शरीफ की आयतें लिखी गयी हैं। आगे पहुँचने पर भव्य उद्यान के बीचों-बीच ताजमहल का मुख्य द्वार है। बीचोंबीच एक सुंदर झील भी है। जो इसकी शोभा में चार चाँद लगाती है।
कहा जाता है कि शरद् पूर्णिमा की रात ताजमहल के पत्थरों का रंग अपनेआप बदल जाता है। सभी लाल और हरे रंग के पत्थर इस रात को हीरे की तरह चमकने लगते हैं।
अब तक ताजमहल अपने 358 वर्ष पूरे कर चुका है। जब ताजमहल सन् 2004 में अपने 350 वर्ष पूरे कर चुका था तो उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे वर्ष विभिन्न तरह के आयोजनों द्वारा अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए उस वर्ष को ताज महोत्सव का नाम दिया।
दर्शकों का सम्मान करते हुए सर्वोच्चन्यायालय द्वारा ताजमहल के रात्रिकालीन दर्शन पर जो प्रतिबंध लगा था उसे हटा लिया गया है।
ताजमहल अपने सौंदर्य, प्रेम और आश्चर्य के कारण आज विश्वभर में जाना जाता है, इसकी एक झलक पाने लोग हजारों-लाखों मील दूर से आते हैं।

10 Tips to Stay Focused Before Holiday Break

With only a few short weeks before break, it’s tempting to let school run on autopilot until party time. This valuable learning time doesn’t have to go to waste or feel like a punishment.

To make these days count instead of countdown, here are a few tips and tricks to keep the energy and learning alive while having some pre-holiday fun.


मन के हारे, हार है

प्राय: देखा जाता है कि कुछ व्यक्ति समुचित सहायता, प्रेरणा और अनुकूल वातावरण मिलने पर भी आगे नहीं बढ़ पाते। ऐसे व्यक्ति हष्ट-पुष्ट तो होते हैं, अच्छा खाते, पहनते भी हैं परंतु जीवन में कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते। जिसके लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं। वे संघर्षों से दूर भागते हैं और किसी भी भयानक परिस्थिति का सामना नहीं कर पाते।
इसके विपरीत कुछ व्यक्ति व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो होते तो दुबलेपतले हैं पर कठिन से कठिन परिस्थितियों का भी सामना डटकर करते हैं। वे दिन-बदिन सफलता की राह पर आगे बढ़ते जाते हैं।इन दोनों तरह के व्यक्ति के मध्य कोई फर्क नहीं रहता, रहता है तो बस इतना कि एक के साथ एक अद्भुत शक्ति होती है और एक के पास वह शक्ति होते हुए भी नहीं होती।
आखिर यह शक्ति है क्या, इसका जवाब है वह शक्ति कुछ और नहीं बल्कि उसका खुद का मन अर्थात् उसका मानसिक बल है।
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार मनुष्य में प्रायः तीन प्रकार की शक्तियां विद्यमान रहती हैं। यहाँ हम शारीरिक तथा मानसिक शक्ति पर ही विचार करेंगे। शारीरिक शक्तिकी दृष्टि से देखें तो विश्व के सभी मनुष्यों के बीच थोड़ा-बहुत फर्क पाया जाता है। पर मानसिक शक्ति सबकी एक समान सेती है। बस फर्क होता है तो यह कि कोई उसे विकसित कर लेता है तो कोई उसे संकीर्ण बने रहने देता है। शरीर तो एक यंत्र के समान है जिसमें कोई न कोई खराबी आती ही रहती है पर हाँ अगर हम अपनी मानसिक शक्ति को इतना प्रबल कर लें तो यह खराबी भी ज्यादा समय तक नहीं रह सकती है।
उदाहरण के तौर पर हम देखते हैं कि कुछ मनुष्य थोड़ा सा कार्य करके ही थक जाते हैं और कुछ घंटों कार्य करते हुए भी नहीं थकते। इसका कारण है उनकी अपनी ही मानसिक शक्ति। एक व्यक्ति में यह संकीर्ण रूप से रहती है तो वह जल्द ही हार मान लेता है जबकि किसी दूसरे में यह विकसित रूप से रहती है तो वह उसे समय-समय पर बल देते हुए कार्य के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। जिससे वह थकान महसूस नहीं करता।
अगर हम किसी भी महापुरुष का जीवन-चरित्र पढ़े तो उनके द्वारा किए गए कल्पनातीत कार्यों को जानकर हमें बहुत आश्चर्य होता है। हम यह सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि वह कौन सी शक्ति थी, जिससे उन्होंने ऐसे अद्भुत कार्य कर डाले। विचार-विमर्श करने पर हमें पता चलता है कि उन लोगों की मानसिक शक्ति इतनी प्रबल थी कि वह उसके बलबूते पर असंभव से असंभव कार्य को सरलता से पूर्ण कर लेते थे। इसीलिए तो किसी महापुरुष ने सच ही कहा है –
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
कार्य सफल सब पाइए, मन ही के परतीत।।
इस दोहे पर अगर हम गौर करें तो हमे पता चलेगा कि मन के हारने से ही व्यक्ति की भी हार हो जाती है और मन के जीतने से ही व्यक्ति की भी जीत हो जाती है। कठिन से कठिन कार्य भी सफल हो सकते हैं अगर हम अपने मन को विकसित कर लें, तो।
मानव ने अपने मन के परताप से परमात्मा को भी दिव्य रूप में प्रकट होने के लिए विवश कर दिया था। किसी महापुरुष ने तो यहाँ तक कह दिया है कि जिस व्यक्ति का मन हार चुका होता है वह व्यक्ति मर चुका होता है। मनुष्य को अपने संघर्षों से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
अगर हम कहें कि मनुष्य की मानसिक शक्ति वास्तव में उसकी इच्छा शक्ति है तो यह गलत नहीं होगा। मानव की इच्छा शक्ति जितनी प्रबल होगी, उसका मन भी उतना ही सुदृढ़ होगा।
मनुष्य चाहे तो वह अपनी इच्छा शक्ति के माध्यम से मृत्यु को भी पछाड़ सकता है। भीष्म पितामह इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। इसलिए हमें अपने मन को कभी हारने नहीं देना चाहिए।

Snowy Day & Winter Lesson Ideas

We had our first Chicago snow storm this weekend which meant digging out my car, an unpleasant drive to work and basically feeling soggy all morning. But I am determined to maintain a romanticized winter wonderland mentality this year. To stay optimistic, I’m focusing on the upside of snow.

1. It’s pretty (esp. through the window while you’re warm and cozy next to a fire drinking cocoa).
2. Snowball fights and snowman building
3. Shoveling is great cardio.
4. Snow days!!!!
5. And, finally, seasonally sensational learning opportunities.

Stretching Ourselves as Educators

With so many lightning-fast connections at our doorstep, we find ourselves within reach of some of the most powerful learning resources that have ever existed on Earth. The quantity of choices intimidates many. However, the beauty of having so many choices, the beauty of digital media itself is its inherent flexibility and potential to serve all learners.

Why should we not make it a priority to improve our own flexibility as educators and learners at every available opportunity?

Online Collaboration Tools for 21st Century Learning

Educational technology is changing the way we teach and the objectives of classroom assignments. Online resources continue to emerge that offer new and exciting ways to teach and bring about new teaching standards. Online sharing is one way to meet collaboration standards and objectives for 21st Century learning.

It is important for all students to see the power of online collaboration and to learn the rules about collaborating with others.

Top 10 Holiday Learning Activities

As December rolls by, the holiday hype has most likely invaded your classroom. The energy of your students is on the rise as they shift focus from their science homework to their holiday break plans.

Why not capitalize on your students’ holiday spirit with these Christmas and winter holiday activities!

Exciting Nonfiction Science Books: Not an Oxymoron

As educators, we spend countless hours in professional development studying methods for improving teen literacy and planning ways to integrate literacy into our daily lessons.

Choosing the right books to read with or to your students can be tricky. I’ve found several nonfiction books that provide meaningful science lessons and engage adolescent minds equally well.

Video Writing Prompts: Ribbon Cutting Light Show

K-2: Transform Your House
They made the store look like a present, a castle and even a sweater. If you could transform your house, what would you make it look like? Draw a picture of your house “dressed up” and write what it is beneath the picture.

6-8: Modernize Traditions for the 21st Century
This is a technologically-advanced approach to a ribbon cutting ceremony for a new store. Think of other traditional ceremonies, like receiving a diploma at graduation, 4th of July fireworks celebrations, passing the Olympic torch, awarding statues at the Oscars or even a wedding. In at least two paragraphs, describe an updated version of the ceremony using technology to add some pizazz.

How to Handle Religious Holidays in Public Schools

Since 1776 the United States has grown from a nation of relatively few religious differences to one of countless religious groups. This expanding pluralism challenges the public schools to deal creatively and sensitively with students professing many religions and none.

The following questions and answers concern religious holidays and public education, a subject often marked by confusion and conflict. Teachers and school officials, as well as parents and students, should approach this discussion as an opportunity to work cooperatively for the sake of good education rather than at cross purposes.

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

निबंध का शीषर्क महाकवि अलामा इकबाल की कविता से लिया गया है, वे ऊर्दू के एक प्रसिद्ध शायर भी थे।
यह पंक्ति एक राष्ट्रीय आंदोलन के समय पढ़ी गई थी। यह सिर्फ राष्ट्रीय आंदोलन तक ही सीमित न रहकर आज कई मायनों में सभी के लिए उपयोगी है। इस कविता, शायरी के एक एक शब्द समस्त देशवासियों के रग-रग में देशभक्ति का संचार करते हैं साथ ही एक अनोखी ऊर्जा प्रदान करते हैं जिसकी मदद से देशवासी साम्प्रदायिकता की भावना से ऊपर उठकर स्वतंत्रता-संग्राम में कूद पड़ते हैं।मजहब एक पवित्र अवधारणा है। यह अत्यंत सूक्ष्म, भावनात्मक सूझ, विश्वास और श्रद्धा है। मूलतः अध्यात्म के क्षेत्र में ईश्वर, पैगम्बर आदि के प्रति मन की श्रद्धा या विश्वास पर आधारित धारणात्मक प्रक्रिया ही मजहब है। यह बाह्य-आडंबरों, बैरभाव, अंधविश्वास आदि से ऊपर है। इसी बात को ही इकबाल जी के अलावा तकरीबन सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने कहा है।
इस सूक्ति के माध्यम से हमें संदेश मिलता है कि धर्म परस्पर बैर रखने को प्रोत्साहित नहीं करता, अपितु परस्पर मेल-मिलाप और भाई-चारे का संदेश देता है। कोई भी मजहब हो, हमें वह यही सिखाता है कि लड़ाई-झगड़े से दूर रहकर आत्म-संस्कार के द्वारा प्राणियों का हिस-साधना करना। साथ ही मजहब यह भी स्पष्ट करता है कि भले ही कोई भी मज़हब वाले ऊपर वाले को किसी भी नाम से पुकारे, पर पुकार सब की वह एक ही सुनता है।
मजहब के नाम पर लड़ाना-भिड़ाना तो केवल कुछ स्वार्थी लोगों की चाल थी।
इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो हम देखेंगे कि लोग यह जानते थे कि हम सभी एक-दूसरे के साथ भाई-चारे के साथ रहेंगे तो ही अखण्ड रहेंगे, वे जानते थे कि एकता में ही बल होता है फिर भी मजहब के नाम पर कत्लेआम हुआ और भारत माँ को टुकड़ों में विभाजित कर दिया गया।
इतिहास से नजर हटाकर अगर हम वर्तमान में मनन करें तो क्या आज भी मजहब के नाम पर दंगे फसाद नहीं होते? सदियों पुराना अयोद्धा मामला आज तक नहीं सुलझ पाया है, इसका कारण क्या हमें पता नहीं।
देश को मजहब आदि का तमंचा दिखा कर कुछ स्वार्थी लोग अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु देश को खण्ड-खण्ड में बाँट देना चाहते हैं। ताकि वह समय आने पर अपनी स्वार्थ की सीमा को बढ़ा सकें।
हाल ही में मजहब के नाम पर देश-विभाजन की माँग किसी से छिपी नहीं है। इतिहास स्वयं साक्षी है कि किस प्रकार कुछ पथभ्रष्टों व स्वार्थी लोगों ने मजहब के नाम पर अंधविश्वास फैलाते हुए स्वयं ईसा को, सलीब को, कीले ठोककर सूली पर लटका डाला। फिर भी उन देवदूतों को सलाम करना चाहिए जो जाते जाते भी प्रभू से उन सूली पर चढ़ाने वालों के लिए ही सुख, समृद्धि और शांति की कामना करते रहे।
महात्मा गांधी, गुरु तेगबहादूर आदि महापुरुषों को भी मजहब का नाम लेकर ही मारागया था।
मजहब धीरे-धीरे एक ऐसा ज्वलंत विषय बनता जा रहा है कि उस पर कोई चर्चा करने से भी हिचकिचा रहा है। सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन जैसे लेखक इस बात का प्रमाण ।
अगर हम किसी भी मजहब की कोई भी धार्मिक पुस्तक को उठा कर देखें तो उसमें अपने-अपने तरीकों से भले ही अपने-अपने पूजनीयों की वंदना की गई है पर अंततः सन मानते तो एक ही को हैं, चाहे उसके कितने भी नाम हो, वास्तविकता तो एक ही है। धर्म सदैव से सबको जोड़ने का काम करता आया है, न कि तोड़ने का। पूरी पंक्ति इस प्रकार है

करत-करत अभ्यास के जड़पति होता सुजान

अभ्यास का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। अभ्यास से जीवन में आशा के अनुरूप परिवर्तन आते रहते हैं। अभ्यास से यदि मूर्ख व्यक्ति भी चाहे तो समझदार बन सकता है।
जन्म से ही हर कार्य में कुशल व प्रवीण कम ही व्यक्ति होते हैं। हजारों में एकाध का नंबर आता है जो बिना किसी अभ्यास के ही कर कार्य में सफल हो जाते हैं। इसका भी शास्त्रीय अध्ययन करें तो यह उसके पिछले जन्म के पुण्य या परिश्रम या अभ्यास का ही प्रताप माना जा सकता है। खैर,… ।
मानव जीवन में प्रायः यह देखा गया है कि निरंतर अभ्यास से ही कार्य में कुशलता आती है। इसीलिए जीवन का निष्कर्ष किसी महापुरुष ने कुछ इस तरह से दिया है –
करत-करत अभ्यास के जड़पति होता सुजान।
रस्सी आवत-जात है, छोड़ देत सिला पर निसान।।
अब इस दोहे की अगर हम व्याख्या करने बैठेंगे तो निबंध की यह पुस्तक ही छोटी पड़ जाएगी। संक्षिप्त में हम इस का अर्थ समझ लेते हैं कि जिस तरह से बावड़ी की शिला पर बार-बार रस्सी बाल्टी से बंधी नीचे-ऊपर होती रहती है तो एक समय ऐसा आता है कि वह शिला भी रस्सी से हार मान अपने पर उसका निशान ले लेती है, यह एक सत्य कहावत है। उसी तरह अगर व्यक्ति भी बार-बार अभ्यास करे तो एक समय ऐसा आता है जब मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी समझदार बन जाता है।
यहाँ हम महाकवि वाल्मीकि का उदाहरण देखेंगे, महाकवि बनने से पहले वे एक मूर्ख व्यक्ति और डाकू थे। पर उनकी किस्मत जो वे राम-राम के स्थान पर उसका उल्टा मरा-मरा का उच्चारण अक्सर किया करते थे। एक दिन उनकी मुलाकात एक प्रतापी विद्वान से हुई जिसने उन्हें अकी गलती का अहसास करवाया और अभ्यास से राम-राम का उच्चारण करवाने लगा।
इसका फल यह निकला कि जो व्यक्ति राम-राम तक नहीं बोल पाता था उसने समय आने पर रामायण जैसा विशाल ग्रंथ ही लिख डाला।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमें देखने को मिलेंगे, अगर हम आज के इस युग की बात करें तो हम स्वर कोकिला लता मंगेशकर की बात करेंगें। एक समारोह में उन्होंने बताया था कि उनकी रूचि संगीत में नहीं थी पर अपने परिवार के लिए उन्होंने संगीत का अभ्यास जो शुरु किया तो अभ्यास करते करते वे आज संगीत की मल्लिका ही बन बैठी।
आप किसी भी सफल व्यक्ति की जीवनी पढ़ें, हर सफल उद्यमी के पीछे भी अभ्यास का ही सहारा होता है।
हम इतना जरूर कह सकते हैं कि जिन-जिन ने निरंतर अभ्यास किया है, उनउन के सभी कार्य सफल हुए हैं।
आपका अपना जीवन भी एक उदाहरण है, कभी-न-कभी अपने भी अपने जीवन में अभ्यास का महत्व परखा होगा, फिर चाहे वह परीक्षा के दौरान पढ़ने से हो या बचपन में साइकिल चलाना सिखने से हो।।
इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि अभ्यास से ही सफलता का मार्ग सशक्त किया जा सकता है। अभ्यास ही सफलता प्राप्त करने की सीढ़ी है। यही जीवन का मूल मंत्र है इसीलिए तो अंग्रेजी में एक कहावत

यदि मैं प्रधानमंत्री होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं प्रधानमंत्री होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
किसी भी राष्ट्र का शासनाध्यक्ष होना मतलब कांटों का ताज पहनना। विपत्तियों का पहाड़ उठाना, जलते अंगारों पर चलना, आग के दरिया में कूदना, खाई के बीचोंबीच चलना आदि के बराबर होता हैबेनजीर भुट्टो, हिटलर, गद्दाफी आदि इसके साक्षात् प्रमाण हैं। अगर हम अपने भारत देश को ही ले लें तो श्री लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि की असामयिक मृत्यु इसके प्रमाण हैं।
भारत के संविधान में प्रधानमंत्री का पद सर्वोच्च बताया गया है। प्रत्येक नागरिक का हक इस पद पर हो सकता है, सभी इस पद के जोख़िम को जानते हुए भी इस पर बैठने लालायित रहते हैं। अतः अगर मुझे भी मौका मिले तो मैं भी पीछे नहीं हदूंगा। भला मैं अपने प्यारे भारतीयों का दिल तो नहीं तोड़ सकता हूँ।
सत्तासीन होकर मैं एक राष्ट्रभक्त की तरह हर पल राष्ट्र की उन्नति व विकास के बारे में ही सोचूंगा। भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, सरदार पटेल आदि मेरे आदर्श रहेंगे।
जैसा कि हम सब जानते हैं, भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, समानता प्रजातंत्र का ही मूलमंत्र है। आज भारत के समक्ष कई चुनौतियाँ हैं, जो समस्या बन मुँह उठाए खड़ी हैं। बेरोजगारी, निर्धनता, भूखमरी आदि इसके साक्षात् प्रमाण हैं।
अतः प्रधानमंत्री बनते ही सर्वप्रथम मैं इन चुनौतियों से निपटूगा, यही मेरा प्रथम कर्तव्य होगा। इनके अलावा अशिक्षा, जातीयता, संप्रदायिकता एवं आतंकवाद आदि को भी जड़ से उखाड़ फेंकने को प्राथमिकता दूंगा। मैं देश-विदेश का भ्रमण कर हर संपन्न देश से कुछ न कुछ रहस्य सीख अपने भारत में लौटुंगा और देश को सभी अन्य देशों से समृद्ध बनाने का लक्ष्य रचूँगा। मेरी समझ से अगर देश से अशिक्षा को मिटा दिया जाए तो अपने आप ही हर समस्या का निदान संभव हो जाएगा।
मैं शिक्षा के क्षेत्र में नए-नए शोध करवाकर नई पद्धति से भारत में अशिक्षा को मिटाने का प्रयास करूंगा।
हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को मैं और भी समृद्ध बनाने के हर संभव प्रयास करूंगा। जैसा कि हम जानते हैं की हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है, मैं नए-नए शोध द्वारा इसे विज्ञान की सहायता से और सफल बनाने का भरपूर प्रयास करूंगा। साथ ही हरित क्रांति लाऊंगा।
बेरोजगारी मिटाने हेतु घर-घर कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दूंगा। हर किसी को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहने की शिक्षा दूंगा, गौ-पालन पर सबका ध्यान आकर्षित कर श्वेत क्रांति लाने का प्रयास करूंगा।
संक्षेप में अगर कहूँ तो मैं इस देश से बेरोजगारी मिटाने का प्रयास करूंगा।
मैंने अपने जीवन में जो अनुभव किया वह यह कि जातियता, भाई-चारे की सबसे बड़ी समस्या है, इस हेतु भी मैं अपने देश में विभिन्न जागरूकता अभियान चलाते हुए, अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रोत्साहित करूगा साथ ही अन्य को इस हेतु प्रेरणा भी दूंगा।
समय-समय पर अन्य देश के राजनेताओं को अपने देश बुलवाकर उन्हें सम्मानित करूंगा साथ ही भारत देश में इंवेस्टमैंट हेतु आग्रह करूंगा। इससे हमारे कई फायदे होंगे, एक तो वो हम से दबे रहेंगे और साथ ही हमारे देश के कई नौजवानों को रोजगार का अवसर भी मिल जाएगा।
अगर अन्य नेताओं का सहयोग मिले तो मैं इस देश का नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी सफल प्रयास करूंगा, हर नेता की तनख्वाह इतनी बड़ा दूंगा कि वो भ्रष्टाचार के बारे में विचार भी नहीं करेंगे। क्योंकि मैंने देखा है कि अगर पेट भरा हो तो आदमी रसमल्लाई भी त्याग देता है।
आंतकवाद को तो जड़ से मिटाना मैं अपने कार्यकालका लक्ष्य रखेंगा। आगे आपलोगों की मर्जी अगर आप मुझे बहुमत देने तैयार हैं तो अगामी चुनाव मैं लड़ ही लेता हूँ।

यदि मैं शिक्षक होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं शिक्षक होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही था कि मैं शिक्षक बनूं। क्यों कि देशभक्ति तो मेरे अंदर कूट-कूट कर भरी हुई है। मैं जड़ से ही अपने देश को मजबूत बनाना चाहता हूँ। अपने राष्ट्र के भावी कर्णधारों तथा मनु की संतानों को शिक्षा के माध्यम से मानवता का पाठ पढ़ाना और अपने विद्यार्थियों को वास्तविक मनुष्य बनाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य होता।मैं गुरु-शिष्य के संबंधों का निर्वाह भली-भाँति करूगा। मैं महात्मा बुद्ध को अपना आदर्श बनाते हुए उनकी ये बातें सदैव याद रखूगा कि गुरु को आकाशम होना चाहिए, शिलाधर्मी नहीं।।
मैं आचार्य चाणक्य को अपना आदर्श मानकर अपने शिष्यों को ठीक चंद्रगुप्त की तरह रंक से राजा बनाने का सफल प्रयास करूंगा।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि जो गुण एक आदर्श शिक्षक में होने चाहिए, वह सब मुझमें हैं। मैं शिक्षण को एक नौकरी समझकर नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझ कर करूंगा।
मैं न तो अपने शिक्षण के समय अत्याधिक सख्ती करूंगा न ही अत्याधिक नरमी, जैसे कि आप सभी जानते हैं मैंने अभी हाल ही में अपनी पढ़ाई की है मैं एक विद्यार्थी मन से ताजा-ताजा परिचित हूँ। मुझे उनके मन में चल रहे शिक्षक के खिलाफ़ गलतफहमी सब पता है, मैं सर्वप्रथम उसे मिटाकर आपस में दोस्तों की तरह रहते हुए, जहाँ नरमी की आवश्यकता है, वहाँ नरमी का प्रयोग करूंगा और जहाँ सख्ती की आवश्यकता है, वहाँ सख्ती का प्रयोग करूंगा।
मैं केवल सिलेबस को खत्म करने के लिए नहीं पढ़ाते हुए अपने छात्रों को समाज के प्रति उदार, दयावान, सबकी मदद करने जैसे नैतिक पाठों को प्रमुखता के साथ पढ़ाऊंगा। मैं केवल थ्योरी ही में नहीं बल्कि प्रैक्टिकल में विश्वास रखते हुए उन्हें सभी
जैसा कि मैं पहले कह चूका हूँ कि मैं अपने छात्रों के साथ केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में व्यवहार करूंगा, साथ ही उनके जीवन के हर क्षेत्र में उनकी मदद करने सदैव तैयार रहँगा, जितना मुझसे संभव होगा मैं उनके लिए जीवन के हर क्षेत्र के दरवाजे खुले कर दूगां, जितना मुझे पता होगा मैं उतना उनमें बाहूँगा, मैं सदैव नई-नई जानकारियाँ हासिल करता रहूँगा, ताकि मेरे छात्रों को मैं सभी जानकारियों से आवगत करा सकें।
मैं किसी भी छात्र के बीच भेद-भाव की भावना को नहीं आने दूंगा। क्योंकि सभी छात्र मेरे लिए एक समान थे, एक समान हैं और एक समान रहेंगे। मैं धन, जाति, संप्रदाय आदि को बीच में नहीं आने दूंगा, साथ ही उन को भी आपस में एकता का पाठ पढ़ाते हुए मिल-जुलकर रहने की सलाह दूंगा।
मैं सदैव उनसे मीठा बोलूंगा और साथ ही उन्हें भी मीठा बोलने के लिए प्रोत्साहित करूंगा।
मैं समय-समय पर अपने विद्यार्थियों को अन्य विद्यालय ले जाकर सेमिनार आदिका आयोजन करवाता रहूँगा ताकि आपस में उनके विचारों का आदने-प्रदान हो और वह बाहरी जीवन से भी आवगत हो सकें।
अंतमें मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि यदि जीवन में मुझे कभी भी शिक्षक बनने का मौका मिला तो मैं समाज में अपने लिए एक आदर्श शिक्षक के रूप में पहचान अवश्य बनाऊंगा। साथ ही देश को एक अच्छे नागरिक और भावी कर्णधार श्रद्धा स्वरूप भेंट करूंगा।
क्या आप जानते हैं? हिन्दी की 47 बोलियों के नाम –
1981 की जनगणना में भारत में विभिन्न बोलियों का हिन्दी भाषा के । ! साथ परिगणन – अवधी, बधेली, छत्तीसगढ़ी, बागड़ी-राजस्थानी, बनजारी, भद्रभाषा, भरमौरी / गदी, भोजपुरी, बज्रभाषा, बुंदेली/बुंदेलखंडी, चूराठी, चंबियाली, ढूंढाड़ी, गढ़वाली, गोजरी, हाडौती, हरियाणवी, जौनसारी, कांगडी, खडी बोली, खोट्टा, कुल्ची, कुमाउनी, कुरमलीथार, लबानी, लमानी/लंबादी,  लडिया, लोधी, मागधी । मगही, मैथिली, मालवी, मंडिआली, मारवाड़ी,  मेवाती,नागपुरिया, निमाड़ी, पडारी, पहाडी, पंचपरगनि, पंगवाली, पवारी / पोवारी, राजस्थानी, सदन/ सदरी, मोड़वारी, सुगली, सुरगुजिया, सूरजपुरी।

यदि में करोडपति होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं करोड़पति होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही है कि मैं करोड़पति बनूं। क्यों कि आज के भौतिक युग में धनाढ्य होना गौरव तथा सम्मान दोनों की ही बात है। परंतु यह तो सच है कि व्यक्ति केवल अपने सौभाग्य से ही नहीं बल्कि अपने कर्म से भी करोड़पति बन सकता है। प्राचीन काल में तो अगर किसी व्यक्ति के पास एक वक्त की रोटी भी अगर खाने के लिए है तो वह किसी करोड़पति से कम नहीं होता था। पर आज के इस युग की बात करें तो धन के बिना जीवन निरर्थक सा लगता है। अधिक धन प्राप्त करने की लालसा में हर कोई लगा है चाहे वह नैतिकता के आधार पर हो या फिर अनैतिकता के आधार पर ऐसे माहौल में अगर हम चाहते हैं कि आगे रहें तो हमें भी करोड़पति बनना चाहिए नहीं तो हमें कोई पूछेगा तक नहीं।अक्सर मैं सोचा करता हूँ कि अगर मैं करोड़पति होता तो कितना अच्छा होता, हाँ मैं एक बात पहले ही आपको बता दें कि मैं सिर्फ नैतिकता के मार्ग पर चलकर ही करोड़पति बनना चाहँगा, भले कुछ समय अधिक लग जाए पर संतोष तो रहेगा। आज के इस प्रतिस्पर्धा वाले युग में करोड़पति बनना कोई मुश्किल काम नहीं है, बस आपको समय के साथ बदलना होगा।
जैसे ही मैं करोड़पति बन जाऊंगा, सर्वप्रथम मैं एक ऐसी संस्था की स्थापना करूंगा जो हर किसी जरूरतमंद के कोई-न-कोई काम आए। जैसे योग्य छात्रछात्राओं के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था करना, विवाह योग्य युवक-युवतियाँ जिनका धनाभाव के कारण विवाह में विलंभ हो रहा, उन्हें आर्थिक मदद देकर, सैल करूंगा। साथ ही कई ऐसी धर्मशालाओं, गौशालाओं आदि का निर्माण करवाऊंगा जिससे सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि हर किसी की अध्यात्मिक तृप्ति हो सके।
घर से बेघर किए जाने वाले वृद्धों के लिए मैं वृद्धाश्रम बनवाऊंगा। अनाथ बच्चों के लिए अनाथालयों का निर्माण करवाऊंगा साथ ही वहाँ उन्हें उनके भावी जीवन में आने वाले संकटों से लड़ने के लिए सक्षम बनाऊंगा, ताकि वह अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें। साथ ही धन के अभाव से अपना उचित समय पर इलाज न करवा सकने वाले व्यक्तियों के लिए मुफ्त में उपयोगी औषधियाँ उपलब्धकरवाऊंगा।
पौष्टिक आहार न मिल पाने से जो गरीबों के बच्चों में रोग पैदा हो रहे हैं, उसे दूर करने हेतु निर्धनों में पौष्टिक आहार बटवाऊंगा।
मैं अपने ही देश में विभिन्न शोध-संस्थाओं का निर्माण करवाऊंगा जिसके माध्यम से हमारे देश का पैसा हमारे देश में ही रह सके, जैसे कि कुछ तरह के रोगों का इलाज हमारे देशवासियों को बाहर देश जाकर करवाना पड़ता है जिससे समय व धन दोनों का व्यय अधिक होता है। अगर वही सब कुछ यहाँ हमारे ही देश में होने लग जाए तो समय व धन दोनों की ही बचत हो सकेगी।
वैसे एक बात मैं यहाँ साफ कर दें। मैं यह सब कार्य कोई घमंड से नहीं करूंगा बल्कि सेवाभाव से बिना किसी नाम कमाने के स्वार्थ के लिए करूंगा।
मैं अपने देश के लिए ऐसा कुछ करना चाहूँगा, जिससे वह समृद्ध बन सके। साथ ही सारे नागरिक खुशहाल व स्वस्थ रह सकें।
मैं अपने ही देश में कुछ ऐसे प्रॉजेक्ट्रेस शुरू करवाऊंगा जिससे अधिकतम से अधिकतम लोगों को रोजगार मिल सके और वह अपने ही देश में रहकर तरक्की करें। खुद भी समृद्ध हों और अपने देश को भी समृद्ध बनाएं।
मैं किसी की मदद करते समय कभी भी उसकी जाति, धर्म, वर्ग आदि का भेदभाव नहीं करूंगा क्योंकि मैंने बचपन से ही अपने माँ-बाप से सीखा है कि हम सभी भारतीय एक ही धर्म के हैं और हमारा धर्म है भारतीयता।
अंत में मैं इतना जरूर कहूंगा कि जितना हो सकेगा मैं अपने धन का प्रयोग अच्छे कामों में ही खर्च करना चाहूँगा। जिससे मैं अपना तो जीवन आनंदमयी बना सर्केगा साथ ही अपने आसपास का वातावरण भी सुखद बना लूंगा।

पर्यावरण

पर्यावरण से तात्पर्य है- हमारे चारों ओर का वातावरण, जहाँ हम रहते हैं, घूमते-फिरते हैं तथा जीवन व्यतीत करते हैं। इसी वातावरण में हम श्वास लेते हैं। यदि पर्यावरण प्रदूषित हो तो जीवन बीमारियों और कठिनाइयों से भर जाता है। पर्यावरण की रक्षा के लिए हम महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यदि हर नागरिक सजग हो तो पर्यावरण प्रदूषित होगा ही नहीं। प्रदूषित वातावरण इंसानों के लिए ही नहीं जानवरों और पक्षियों के लिए भी खतरनाक है। वृक्ष पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करते हैं। वृक्षों द्वारा छोड़ी गई वायु जैसे ऑक्सीजन मनुष्य तथा पर्यावरण के लिए फेफड़ों का कार्य करती है। हमें चाहिए कि हम खूब पौधे व वृक्ष लगाएँ। जितने अधिक वृक्ष होंगे, उतनी ही पर्यावरण की रक्षा होगी। यदि कोई वृक्ष काटता है तो हमें उसकी शिकायत करनी चाहिए क्योंकि वृक्ष काटना अपराध है।
ओ पापी मानव! क्यों पाप किए जाता है?
अपनी ही माँ को तू निर्वस्त्र किए जाता है।
पेड़ काट कर तू धरती की लाज मिटाता जाता है।
जिस आँचल ने तुझको पाला, उसे फाड़ता जाता है।
हमारे पर्यावरण की रक्षा के लिए हम सभी को मिलकर संकल्प लेना चाहिए। सब के संयुक्त प्रयास से पर्यावरण को दूषित होने से आसानी से बचाया जा सकता है। गाड़ियों द्वारा होने वाले प्रदूषित वातावरण से बचने के लिए गाड़ियों की नियमित रूप से जाँच की जानी आवश्यक है। इसकी जानकारी सभी नागरिकों को समान रूप से दी जानी चाहिए। वाहनों का प्रदूषण चेक होने पर उसे नियंत्रित किया जा सकता है।
हमें चाहिए कि हम अधिक से अधिक वक्ष लगाएँ और दूसरों को भी वक्षारोपण करने के लिए प्रेरित करें। वृक्षों का कटान रोकने की दिशा में सुदृढ़ प्रयास करें। किंतु केवल वृक्षारोपण करके ही अपने कर्तव्य की इति नहीं माननी चाहिए बल्कि वृक्षों की देखभाल का पूरा दायित्व भी वहन करना चाहिए। जब तक हमारे द्वारा रोपे गए वृक्ष | बड़े न हो जाएँ तब तक उनकी वृधि के लिए हमें प्रयत्नशील रहना चाहिए। इसके अलावा नदियों में कूड़ा-करकट, फूल, पूजा सामग्री, जली हुई लकड़ी, मूर्तियाँ आदि न तो स्वयं डालें, न ही और किसी को डालने दें। हमें लोगों में जागरुकता लानी होगी कि इन कार्यों से पर्यावरण प्रदूषित होता है। नदी, तालाबों पर कपड़े धोने व जानवरों के नहलाने से लोगों को रोकना चाहिए ताकि पर्यावरण प्रदूषित न हो। बड़ी फैक्टरियों की बची हुई गंदगी, बचा तेल, कूड़ा-करकट आदि को नदियों में बहाए जाने पर रोक लगानी चाहिए। यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो हमें उसे रोकने का प्रयास करना चाहिए। यदि फिर भी कोई हमारी बात न सुने तो हमें अधिकारियों से या पुलिस से इसकी शिकायत करनी चाहिए।

वृक्षारोपण का महत्त्व

वृक्षारोपण का अर्थ है- नए-नए वृक्षों को लगाना। वृक्षारोपण एक सामाजिक दायित्व है। पेड़-पौधों के साथ मानव का पुराना संबंध है। यदि ध्यान से देखा जाए तो वृक्षों के अभाव में जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पेड़-पौधे मनुष्य की अनेक प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तथा उनका पालन-पोषण भी करते हैं। वृक्षारोपण केवल सौंदर्य एवं सुरक्षा का साधन ही नहीं अपितु हमारे जीवन के लिए अति आवश्यक है।वृक्षहीन धरती के स्वरूप की हम कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि यदि धरती से वृक्ष समाप्त हो जाएँगे तो मनुष्य सहित दूसरे जीव-जंतु भी समाप्त हो जाएँगे क्योंकि हम अपनी प्रत्येक छोटी-बड़ी आवश्यकताओं, यहाँ तक की साँस लेने के लिए अति आवश्यक प्राण वायु के लिए भी वृक्षों पर आश्रित हैं। वन प्राकृतिक सुषमा के घर हैं। लकड़ी व जड़ी-बूटियों की खान हैं, जिनसे जीवन-रक्षक औषधियाँ बनती हैं। बाँस व फर की लकड़ी से कागज बनता है। वन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। पर्यटन व्यवसाय राष्ट्रीय आय का स्रोत भी माना जाता है। वन विविध वनस्पतियों के स्थायी घर हैं। वृक्ष जलवायु की विषमता को दूर करते हैं। ऋतु-परिवर्तन में इनका अहम् योगदान है। वृक्ष प्रदूषण के नाशक हैं। फल-फूल के साथ छाया प्रदान करने वाले हैं। पक्षियों की विश्राम-स्थली हैं। बाढ़ को नियंत्रित करते हैं। अनगिनत गुणों की खान होने के कारण आज वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण की आवश्यकता बढ़ती जा रही है।