Top 10 Holiday Learning Activities

As December rolls by, the holiday hype has most likely invaded your classroom. The energy of your students is on the rise as they shift focus from their science homework to their holiday break plans.

Why not capitalize on your students’ holiday spirit with these Christmas and winter holiday activities!

Exciting Nonfiction Science Books: Not an Oxymoron

As educators, we spend countless hours in professional development studying methods for improving teen literacy and planning ways to integrate literacy into our daily lessons.

Choosing the right books to read with or to your students can be tricky. I’ve found several nonfiction books that provide meaningful science lessons and engage adolescent minds equally well.

How to Handle Religious Holidays in Public Schools

Since 1776 the United States has grown from a nation of relatively few religious differences to one of countless religious groups. This expanding pluralism challenges the public schools to deal creatively and sensitively with students professing many religions and none.

The following questions and answers concern religious holidays and public education, a subject often marked by confusion and conflict. Teachers and school officials, as well as parents and students, should approach this discussion as an opportunity to work cooperatively for the sake of good education rather than at cross purposes.

Video Writing Prompts: Ribbon Cutting Light Show

K-2: Transform Your House
They made the store look like a present, a castle and even a sweater. If you could transform your house, what would you make it look like? Draw a picture of your house “dressed up” and write what it is beneath the picture.

6-8: Modernize Traditions for the 21st Century
This is a technologically-advanced approach to a ribbon cutting ceremony for a new store. Think of other traditional ceremonies, like receiving a diploma at graduation, 4th of July fireworks celebrations, passing the Olympic torch, awarding statues at the Oscars or even a wedding. In at least two paragraphs, describe an updated version of the ceremony using technology to add some pizazz.

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

निबंध का शीषर्क महाकवि अलामा इकबाल की कविता से लिया गया है, वे ऊर्दू के एक प्रसिद्ध शायर भी थे।
यह पंक्ति एक राष्ट्रीय आंदोलन के समय पढ़ी गई थी। यह सिर्फ राष्ट्रीय आंदोलन तक ही सीमित न रहकर आज कई मायनों में सभी के लिए उपयोगी है। इस कविता, शायरी के एक एक शब्द समस्त देशवासियों के रग-रग में देशभक्ति का संचार करते हैं साथ ही एक अनोखी ऊर्जा प्रदान करते हैं जिसकी मदद से देशवासी साम्प्रदायिकता की भावना से ऊपर उठकर स्वतंत्रता-संग्राम में कूद पड़ते हैं।मजहब एक पवित्र अवधारणा है। यह अत्यंत सूक्ष्म, भावनात्मक सूझ, विश्वास और श्रद्धा है। मूलतः अध्यात्म के क्षेत्र में ईश्वर, पैगम्बर आदि के प्रति मन की श्रद्धा या विश्वास पर आधारित धारणात्मक प्रक्रिया ही मजहब है। यह बाह्य-आडंबरों, बैरभाव, अंधविश्वास आदि से ऊपर है। इसी बात को ही इकबाल जी के अलावा तकरीबन सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने कहा है।
इस सूक्ति के माध्यम से हमें संदेश मिलता है कि धर्म परस्पर बैर रखने को प्रोत्साहित नहीं करता, अपितु परस्पर मेल-मिलाप और भाई-चारे का संदेश देता है। कोई भी मजहब हो, हमें वह यही सिखाता है कि लड़ाई-झगड़े से दूर रहकर आत्म-संस्कार के द्वारा प्राणियों का हिस-साधना करना। साथ ही मजहब यह भी स्पष्ट करता है कि भले ही कोई भी मज़हब वाले ऊपर वाले को किसी भी नाम से पुकारे, पर पुकार सब की वह एक ही सुनता है।
मजहब के नाम पर लड़ाना-भिड़ाना तो केवल कुछ स्वार्थी लोगों की चाल थी।
इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो हम देखेंगे कि लोग यह जानते थे कि हम सभी एक-दूसरे के साथ भाई-चारे के साथ रहेंगे तो ही अखण्ड रहेंगे, वे जानते थे कि एकता में ही बल होता है फिर भी मजहब के नाम पर कत्लेआम हुआ और भारत माँ को टुकड़ों में विभाजित कर दिया गया।
इतिहास से नजर हटाकर अगर हम वर्तमान में मनन करें तो क्या आज भी मजहब के नाम पर दंगे फसाद नहीं होते? सदियों पुराना अयोद्धा मामला आज तक नहीं सुलझ पाया है, इसका कारण क्या हमें पता नहीं।
देश को मजहब आदि का तमंचा दिखा कर कुछ स्वार्थी लोग अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु देश को खण्ड-खण्ड में बाँट देना चाहते हैं। ताकि वह समय आने पर अपनी स्वार्थ की सीमा को बढ़ा सकें।
हाल ही में मजहब के नाम पर देश-विभाजन की माँग किसी से छिपी नहीं है। इतिहास स्वयं साक्षी है कि किस प्रकार कुछ पथभ्रष्टों व स्वार्थी लोगों ने मजहब के नाम पर अंधविश्वास फैलाते हुए स्वयं ईसा को, सलीब को, कीले ठोककर सूली पर लटका डाला। फिर भी उन देवदूतों को सलाम करना चाहिए जो जाते जाते भी प्रभू से उन सूली पर चढ़ाने वालों के लिए ही सुख, समृद्धि और शांति की कामना करते रहे।
महात्मा गांधी, गुरु तेगबहादूर आदि महापुरुषों को भी मजहब का नाम लेकर ही मारागया था।
मजहब धीरे-धीरे एक ऐसा ज्वलंत विषय बनता जा रहा है कि उस पर कोई चर्चा करने से भी हिचकिचा रहा है। सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन जैसे लेखक इस बात का प्रमाण ।
अगर हम किसी भी मजहब की कोई भी धार्मिक पुस्तक को उठा कर देखें तो उसमें अपने-अपने तरीकों से भले ही अपने-अपने पूजनीयों की वंदना की गई है पर अंततः सन मानते तो एक ही को हैं, चाहे उसके कितने भी नाम हो, वास्तविकता तो एक ही है। धर्म सदैव से सबको जोड़ने का काम करता आया है, न कि तोड़ने का। पूरी पंक्ति इस प्रकार है

करत-करत अभ्यास के जड़पति होता सुजान

अभ्यास का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। अभ्यास से जीवन में आशा के अनुरूप परिवर्तन आते रहते हैं। अभ्यास से यदि मूर्ख व्यक्ति भी चाहे तो समझदार बन सकता है।
जन्म से ही हर कार्य में कुशल व प्रवीण कम ही व्यक्ति होते हैं। हजारों में एकाध का नंबर आता है जो बिना किसी अभ्यास के ही कर कार्य में सफल हो जाते हैं। इसका भी शास्त्रीय अध्ययन करें तो यह उसके पिछले जन्म के पुण्य या परिश्रम या अभ्यास का ही प्रताप माना जा सकता है। खैर,… ।
मानव जीवन में प्रायः यह देखा गया है कि निरंतर अभ्यास से ही कार्य में कुशलता आती है। इसीलिए जीवन का निष्कर्ष किसी महापुरुष ने कुछ इस तरह से दिया है –
करत-करत अभ्यास के जड़पति होता सुजान।
रस्सी आवत-जात है, छोड़ देत सिला पर निसान।।
अब इस दोहे की अगर हम व्याख्या करने बैठेंगे तो निबंध की यह पुस्तक ही छोटी पड़ जाएगी। संक्षिप्त में हम इस का अर्थ समझ लेते हैं कि जिस तरह से बावड़ी की शिला पर बार-बार रस्सी बाल्टी से बंधी नीचे-ऊपर होती रहती है तो एक समय ऐसा आता है कि वह शिला भी रस्सी से हार मान अपने पर उसका निशान ले लेती है, यह एक सत्य कहावत है। उसी तरह अगर व्यक्ति भी बार-बार अभ्यास करे तो एक समय ऐसा आता है जब मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी समझदार बन जाता है।
यहाँ हम महाकवि वाल्मीकि का उदाहरण देखेंगे, महाकवि बनने से पहले वे एक मूर्ख व्यक्ति और डाकू थे। पर उनकी किस्मत जो वे राम-राम के स्थान पर उसका उल्टा मरा-मरा का उच्चारण अक्सर किया करते थे। एक दिन उनकी मुलाकात एक प्रतापी विद्वान से हुई जिसने उन्हें अकी गलती का अहसास करवाया और अभ्यास से राम-राम का उच्चारण करवाने लगा।
इसका फल यह निकला कि जो व्यक्ति राम-राम तक नहीं बोल पाता था उसने समय आने पर रामायण जैसा विशाल ग्रंथ ही लिख डाला।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमें देखने को मिलेंगे, अगर हम आज के इस युग की बात करें तो हम स्वर कोकिला लता मंगेशकर की बात करेंगें। एक समारोह में उन्होंने बताया था कि उनकी रूचि संगीत में नहीं थी पर अपने परिवार के लिए उन्होंने संगीत का अभ्यास जो शुरु किया तो अभ्यास करते करते वे आज संगीत की मल्लिका ही बन बैठी।
आप किसी भी सफल व्यक्ति की जीवनी पढ़ें, हर सफल उद्यमी के पीछे भी अभ्यास का ही सहारा होता है।
हम इतना जरूर कह सकते हैं कि जिन-जिन ने निरंतर अभ्यास किया है, उनउन के सभी कार्य सफल हुए हैं।
आपका अपना जीवन भी एक उदाहरण है, कभी-न-कभी अपने भी अपने जीवन में अभ्यास का महत्व परखा होगा, फिर चाहे वह परीक्षा के दौरान पढ़ने से हो या बचपन में साइकिल चलाना सिखने से हो।।
इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि अभ्यास से ही सफलता का मार्ग सशक्त किया जा सकता है। अभ्यास ही सफलता प्राप्त करने की सीढ़ी है। यही जीवन का मूल मंत्र है इसीलिए तो अंग्रेजी में एक कहावत

यदि मैं प्रधानमंत्री होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं प्रधानमंत्री होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
किसी भी राष्ट्र का शासनाध्यक्ष होना मतलब कांटों का ताज पहनना। विपत्तियों का पहाड़ उठाना, जलते अंगारों पर चलना, आग के दरिया में कूदना, खाई के बीचोंबीच चलना आदि के बराबर होता हैबेनजीर भुट्टो, हिटलर, गद्दाफी आदि इसके साक्षात् प्रमाण हैं। अगर हम अपने भारत देश को ही ले लें तो श्री लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि की असामयिक मृत्यु इसके प्रमाण हैं।
भारत के संविधान में प्रधानमंत्री का पद सर्वोच्च बताया गया है। प्रत्येक नागरिक का हक इस पद पर हो सकता है, सभी इस पद के जोख़िम को जानते हुए भी इस पर बैठने लालायित रहते हैं। अतः अगर मुझे भी मौका मिले तो मैं भी पीछे नहीं हदूंगा। भला मैं अपने प्यारे भारतीयों का दिल तो नहीं तोड़ सकता हूँ।
सत्तासीन होकर मैं एक राष्ट्रभक्त की तरह हर पल राष्ट्र की उन्नति व विकास के बारे में ही सोचूंगा। भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, सरदार पटेल आदि मेरे आदर्श रहेंगे।
जैसा कि हम सब जानते हैं, भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, समानता प्रजातंत्र का ही मूलमंत्र है। आज भारत के समक्ष कई चुनौतियाँ हैं, जो समस्या बन मुँह उठाए खड़ी हैं। बेरोजगारी, निर्धनता, भूखमरी आदि इसके साक्षात् प्रमाण हैं।
अतः प्रधानमंत्री बनते ही सर्वप्रथम मैं इन चुनौतियों से निपटूगा, यही मेरा प्रथम कर्तव्य होगा। इनके अलावा अशिक्षा, जातीयता, संप्रदायिकता एवं आतंकवाद आदि को भी जड़ से उखाड़ फेंकने को प्राथमिकता दूंगा। मैं देश-विदेश का भ्रमण कर हर संपन्न देश से कुछ न कुछ रहस्य सीख अपने भारत में लौटुंगा और देश को सभी अन्य देशों से समृद्ध बनाने का लक्ष्य रचूँगा। मेरी समझ से अगर देश से अशिक्षा को मिटा दिया जाए तो अपने आप ही हर समस्या का निदान संभव हो जाएगा।
मैं शिक्षा के क्षेत्र में नए-नए शोध करवाकर नई पद्धति से भारत में अशिक्षा को मिटाने का प्रयास करूंगा।
हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को मैं और भी समृद्ध बनाने के हर संभव प्रयास करूंगा। जैसा कि हम जानते हैं की हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है, मैं नए-नए शोध द्वारा इसे विज्ञान की सहायता से और सफल बनाने का भरपूर प्रयास करूंगा। साथ ही हरित क्रांति लाऊंगा।
बेरोजगारी मिटाने हेतु घर-घर कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दूंगा। हर किसी को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहने की शिक्षा दूंगा, गौ-पालन पर सबका ध्यान आकर्षित कर श्वेत क्रांति लाने का प्रयास करूंगा।
संक्षेप में अगर कहूँ तो मैं इस देश से बेरोजगारी मिटाने का प्रयास करूंगा।
मैंने अपने जीवन में जो अनुभव किया वह यह कि जातियता, भाई-चारे की सबसे बड़ी समस्या है, इस हेतु भी मैं अपने देश में विभिन्न जागरूकता अभियान चलाते हुए, अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रोत्साहित करूगा साथ ही अन्य को इस हेतु प्रेरणा भी दूंगा।
समय-समय पर अन्य देश के राजनेताओं को अपने देश बुलवाकर उन्हें सम्मानित करूंगा साथ ही भारत देश में इंवेस्टमैंट हेतु आग्रह करूंगा। इससे हमारे कई फायदे होंगे, एक तो वो हम से दबे रहेंगे और साथ ही हमारे देश के कई नौजवानों को रोजगार का अवसर भी मिल जाएगा।
अगर अन्य नेताओं का सहयोग मिले तो मैं इस देश का नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी सफल प्रयास करूंगा, हर नेता की तनख्वाह इतनी बड़ा दूंगा कि वो भ्रष्टाचार के बारे में विचार भी नहीं करेंगे। क्योंकि मैंने देखा है कि अगर पेट भरा हो तो आदमी रसमल्लाई भी त्याग देता है।
आंतकवाद को तो जड़ से मिटाना मैं अपने कार्यकालका लक्ष्य रखेंगा। आगे आपलोगों की मर्जी अगर आप मुझे बहुमत देने तैयार हैं तो अगामी चुनाव मैं लड़ ही लेता हूँ।

यदि मैं शिक्षक होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं शिक्षक होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही था कि मैं शिक्षक बनूं। क्यों कि देशभक्ति तो मेरे अंदर कूट-कूट कर भरी हुई है। मैं जड़ से ही अपने देश को मजबूत बनाना चाहता हूँ। अपने राष्ट्र के भावी कर्णधारों तथा मनु की संतानों को शिक्षा के माध्यम से मानवता का पाठ पढ़ाना और अपने विद्यार्थियों को वास्तविक मनुष्य बनाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य होता।मैं गुरु-शिष्य के संबंधों का निर्वाह भली-भाँति करूगा। मैं महात्मा बुद्ध को अपना आदर्श बनाते हुए उनकी ये बातें सदैव याद रखूगा कि गुरु को आकाशम होना चाहिए, शिलाधर्मी नहीं।।
मैं आचार्य चाणक्य को अपना आदर्श मानकर अपने शिष्यों को ठीक चंद्रगुप्त की तरह रंक से राजा बनाने का सफल प्रयास करूंगा।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि जो गुण एक आदर्श शिक्षक में होने चाहिए, वह सब मुझमें हैं। मैं शिक्षण को एक नौकरी समझकर नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझ कर करूंगा।
मैं न तो अपने शिक्षण के समय अत्याधिक सख्ती करूंगा न ही अत्याधिक नरमी, जैसे कि आप सभी जानते हैं मैंने अभी हाल ही में अपनी पढ़ाई की है मैं एक विद्यार्थी मन से ताजा-ताजा परिचित हूँ। मुझे उनके मन में चल रहे शिक्षक के खिलाफ़ गलतफहमी सब पता है, मैं सर्वप्रथम उसे मिटाकर आपस में दोस्तों की तरह रहते हुए, जहाँ नरमी की आवश्यकता है, वहाँ नरमी का प्रयोग करूंगा और जहाँ सख्ती की आवश्यकता है, वहाँ सख्ती का प्रयोग करूंगा।
मैं केवल सिलेबस को खत्म करने के लिए नहीं पढ़ाते हुए अपने छात्रों को समाज के प्रति उदार, दयावान, सबकी मदद करने जैसे नैतिक पाठों को प्रमुखता के साथ पढ़ाऊंगा। मैं केवल थ्योरी ही में नहीं बल्कि प्रैक्टिकल में विश्वास रखते हुए उन्हें सभी
जैसा कि मैं पहले कह चूका हूँ कि मैं अपने छात्रों के साथ केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में व्यवहार करूंगा, साथ ही उनके जीवन के हर क्षेत्र में उनकी मदद करने सदैव तैयार रहँगा, जितना मुझसे संभव होगा मैं उनके लिए जीवन के हर क्षेत्र के दरवाजे खुले कर दूगां, जितना मुझे पता होगा मैं उतना उनमें बाहूँगा, मैं सदैव नई-नई जानकारियाँ हासिल करता रहूँगा, ताकि मेरे छात्रों को मैं सभी जानकारियों से आवगत करा सकें।
मैं किसी भी छात्र के बीच भेद-भाव की भावना को नहीं आने दूंगा। क्योंकि सभी छात्र मेरे लिए एक समान थे, एक समान हैं और एक समान रहेंगे। मैं धन, जाति, संप्रदाय आदि को बीच में नहीं आने दूंगा, साथ ही उन को भी आपस में एकता का पाठ पढ़ाते हुए मिल-जुलकर रहने की सलाह दूंगा।
मैं सदैव उनसे मीठा बोलूंगा और साथ ही उन्हें भी मीठा बोलने के लिए प्रोत्साहित करूंगा।
मैं समय-समय पर अपने विद्यार्थियों को अन्य विद्यालय ले जाकर सेमिनार आदिका आयोजन करवाता रहूँगा ताकि आपस में उनके विचारों का आदने-प्रदान हो और वह बाहरी जीवन से भी आवगत हो सकें।
अंतमें मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि यदि जीवन में मुझे कभी भी शिक्षक बनने का मौका मिला तो मैं समाज में अपने लिए एक आदर्श शिक्षक के रूप में पहचान अवश्य बनाऊंगा। साथ ही देश को एक अच्छे नागरिक और भावी कर्णधार श्रद्धा स्वरूप भेंट करूंगा।
क्या आप जानते हैं? हिन्दी की 47 बोलियों के नाम –
1981 की जनगणना में भारत में विभिन्न बोलियों का हिन्दी भाषा के । ! साथ परिगणन – अवधी, बधेली, छत्तीसगढ़ी, बागड़ी-राजस्थानी, बनजारी, भद्रभाषा, भरमौरी / गदी, भोजपुरी, बज्रभाषा, बुंदेली/बुंदेलखंडी, चूराठी, चंबियाली, ढूंढाड़ी, गढ़वाली, गोजरी, हाडौती, हरियाणवी, जौनसारी, कांगडी, खडी बोली, खोट्टा, कुल्ची, कुमाउनी, कुरमलीथार, लबानी, लमानी/लंबादी,  लडिया, लोधी, मागधी । मगही, मैथिली, मालवी, मंडिआली, मारवाड़ी,  मेवाती,नागपुरिया, निमाड़ी, पडारी, पहाडी, पंचपरगनि, पंगवाली, पवारी / पोवारी, राजस्थानी, सदन/ सदरी, मोड़वारी, सुगली, सुरगुजिया, सूरजपुरी।

यदि में करोडपति होता

हाँ, आपने सच ही सुना है यदि मैं करोड़पति होता, तो आपको पता है मैं क्या करता …
मेरा तो सपना ही है कि मैं करोड़पति बनूं। क्यों कि आज के भौतिक युग में धनाढ्य होना गौरव तथा सम्मान दोनों की ही बात है। परंतु यह तो सच है कि व्यक्ति केवल अपने सौभाग्य से ही नहीं बल्कि अपने कर्म से भी करोड़पति बन सकता है। प्राचीन काल में तो अगर किसी व्यक्ति के पास एक वक्त की रोटी भी अगर खाने के लिए है तो वह किसी करोड़पति से कम नहीं होता था। पर आज के इस युग की बात करें तो धन के बिना जीवन निरर्थक सा लगता है। अधिक धन प्राप्त करने की लालसा में हर कोई लगा है चाहे वह नैतिकता के आधार पर हो या फिर अनैतिकता के आधार पर ऐसे माहौल में अगर हम चाहते हैं कि आगे रहें तो हमें भी करोड़पति बनना चाहिए नहीं तो हमें कोई पूछेगा तक नहीं।अक्सर मैं सोचा करता हूँ कि अगर मैं करोड़पति होता तो कितना अच्छा होता, हाँ मैं एक बात पहले ही आपको बता दें कि मैं सिर्फ नैतिकता के मार्ग पर चलकर ही करोड़पति बनना चाहँगा, भले कुछ समय अधिक लग जाए पर संतोष तो रहेगा। आज के इस प्रतिस्पर्धा वाले युग में करोड़पति बनना कोई मुश्किल काम नहीं है, बस आपको समय के साथ बदलना होगा।
जैसे ही मैं करोड़पति बन जाऊंगा, सर्वप्रथम मैं एक ऐसी संस्था की स्थापना करूंगा जो हर किसी जरूरतमंद के कोई-न-कोई काम आए। जैसे योग्य छात्रछात्राओं के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था करना, विवाह योग्य युवक-युवतियाँ जिनका धनाभाव के कारण विवाह में विलंभ हो रहा, उन्हें आर्थिक मदद देकर, सैल करूंगा। साथ ही कई ऐसी धर्मशालाओं, गौशालाओं आदि का निर्माण करवाऊंगा जिससे सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि हर किसी की अध्यात्मिक तृप्ति हो सके।
घर से बेघर किए जाने वाले वृद्धों के लिए मैं वृद्धाश्रम बनवाऊंगा। अनाथ बच्चों के लिए अनाथालयों का निर्माण करवाऊंगा साथ ही वहाँ उन्हें उनके भावी जीवन में आने वाले संकटों से लड़ने के लिए सक्षम बनाऊंगा, ताकि वह अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें। साथ ही धन के अभाव से अपना उचित समय पर इलाज न करवा सकने वाले व्यक्तियों के लिए मुफ्त में उपयोगी औषधियाँ उपलब्धकरवाऊंगा।
पौष्टिक आहार न मिल पाने से जो गरीबों के बच्चों में रोग पैदा हो रहे हैं, उसे दूर करने हेतु निर्धनों में पौष्टिक आहार बटवाऊंगा।
मैं अपने ही देश में विभिन्न शोध-संस्थाओं का निर्माण करवाऊंगा जिसके माध्यम से हमारे देश का पैसा हमारे देश में ही रह सके, जैसे कि कुछ तरह के रोगों का इलाज हमारे देशवासियों को बाहर देश जाकर करवाना पड़ता है जिससे समय व धन दोनों का व्यय अधिक होता है। अगर वही सब कुछ यहाँ हमारे ही देश में होने लग जाए तो समय व धन दोनों की ही बचत हो सकेगी।
वैसे एक बात मैं यहाँ साफ कर दें। मैं यह सब कार्य कोई घमंड से नहीं करूंगा बल्कि सेवाभाव से बिना किसी नाम कमाने के स्वार्थ के लिए करूंगा।
मैं अपने देश के लिए ऐसा कुछ करना चाहूँगा, जिससे वह समृद्ध बन सके। साथ ही सारे नागरिक खुशहाल व स्वस्थ रह सकें।
मैं अपने ही देश में कुछ ऐसे प्रॉजेक्ट्रेस शुरू करवाऊंगा जिससे अधिकतम से अधिकतम लोगों को रोजगार मिल सके और वह अपने ही देश में रहकर तरक्की करें। खुद भी समृद्ध हों और अपने देश को भी समृद्ध बनाएं।
मैं किसी की मदद करते समय कभी भी उसकी जाति, धर्म, वर्ग आदि का भेदभाव नहीं करूंगा क्योंकि मैंने बचपन से ही अपने माँ-बाप से सीखा है कि हम सभी भारतीय एक ही धर्म के हैं और हमारा धर्म है भारतीयता।
अंत में मैं इतना जरूर कहूंगा कि जितना हो सकेगा मैं अपने धन का प्रयोग अच्छे कामों में ही खर्च करना चाहूँगा। जिससे मैं अपना तो जीवन आनंदमयी बना सर्केगा साथ ही अपने आसपास का वातावरण भी सुखद बना लूंगा।

पर्यावरण

पर्यावरण से तात्पर्य है- हमारे चारों ओर का वातावरण, जहाँ हम रहते हैं, घूमते-फिरते हैं तथा जीवन व्यतीत करते हैं। इसी वातावरण में हम श्वास लेते हैं। यदि पर्यावरण प्रदूषित हो तो जीवन बीमारियों और कठिनाइयों से भर जाता है। पर्यावरण की रक्षा के लिए हम महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। यदि हर नागरिक सजग हो तो पर्यावरण प्रदूषित होगा ही नहीं। प्रदूषित वातावरण इंसानों के लिए ही नहीं जानवरों और पक्षियों के लिए भी खतरनाक है। वृक्ष पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करते हैं। वृक्षों द्वारा छोड़ी गई वायु जैसे ऑक्सीजन मनुष्य तथा पर्यावरण के लिए फेफड़ों का कार्य करती है। हमें चाहिए कि हम खूब पौधे व वृक्ष लगाएँ। जितने अधिक वृक्ष होंगे, उतनी ही पर्यावरण की रक्षा होगी। यदि कोई वृक्ष काटता है तो हमें उसकी शिकायत करनी चाहिए क्योंकि वृक्ष काटना अपराध है।
ओ पापी मानव! क्यों पाप किए जाता है?
अपनी ही माँ को तू निर्वस्त्र किए जाता है।
पेड़ काट कर तू धरती की लाज मिटाता जाता है।
जिस आँचल ने तुझको पाला, उसे फाड़ता जाता है।
हमारे पर्यावरण की रक्षा के लिए हम सभी को मिलकर संकल्प लेना चाहिए। सब के संयुक्त प्रयास से पर्यावरण को दूषित होने से आसानी से बचाया जा सकता है। गाड़ियों द्वारा होने वाले प्रदूषित वातावरण से बचने के लिए गाड़ियों की नियमित रूप से जाँच की जानी आवश्यक है। इसकी जानकारी सभी नागरिकों को समान रूप से दी जानी चाहिए। वाहनों का प्रदूषण चेक होने पर उसे नियंत्रित किया जा सकता है।
हमें चाहिए कि हम अधिक से अधिक वक्ष लगाएँ और दूसरों को भी वक्षारोपण करने के लिए प्रेरित करें। वृक्षों का कटान रोकने की दिशा में सुदृढ़ प्रयास करें। किंतु केवल वृक्षारोपण करके ही अपने कर्तव्य की इति नहीं माननी चाहिए बल्कि वृक्षों की देखभाल का पूरा दायित्व भी वहन करना चाहिए। जब तक हमारे द्वारा रोपे गए वृक्ष | बड़े न हो जाएँ तब तक उनकी वृधि के लिए हमें प्रयत्नशील रहना चाहिए। इसके अलावा नदियों में कूड़ा-करकट, फूल, पूजा सामग्री, जली हुई लकड़ी, मूर्तियाँ आदि न तो स्वयं डालें, न ही और किसी को डालने दें। हमें लोगों में जागरुकता लानी होगी कि इन कार्यों से पर्यावरण प्रदूषित होता है। नदी, तालाबों पर कपड़े धोने व जानवरों के नहलाने से लोगों को रोकना चाहिए ताकि पर्यावरण प्रदूषित न हो। बड़ी फैक्टरियों की बची हुई गंदगी, बचा तेल, कूड़ा-करकट आदि को नदियों में बहाए जाने पर रोक लगानी चाहिए। यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो हमें उसे रोकने का प्रयास करना चाहिए। यदि फिर भी कोई हमारी बात न सुने तो हमें अधिकारियों से या पुलिस से इसकी शिकायत करनी चाहिए।

वृक्षारोपण का महत्त्व

वृक्षारोपण का अर्थ है- नए-नए वृक्षों को लगाना। वृक्षारोपण एक सामाजिक दायित्व है। पेड़-पौधों के साथ मानव का पुराना संबंध है। यदि ध्यान से देखा जाए तो वृक्षों के अभाव में जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। पेड़-पौधे मनुष्य की अनेक प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं तथा उनका पालन-पोषण भी करते हैं। वृक्षारोपण केवल सौंदर्य एवं सुरक्षा का साधन ही नहीं अपितु हमारे जीवन के लिए अति आवश्यक है।वृक्षहीन धरती के स्वरूप की हम कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि यदि धरती से वृक्ष समाप्त हो जाएँगे तो मनुष्य सहित दूसरे जीव-जंतु भी समाप्त हो जाएँगे क्योंकि हम अपनी प्रत्येक छोटी-बड़ी आवश्यकताओं, यहाँ तक की साँस लेने के लिए अति आवश्यक प्राण वायु के लिए भी वृक्षों पर आश्रित हैं। वन प्राकृतिक सुषमा के घर हैं। लकड़ी व जड़ी-बूटियों की खान हैं, जिनसे जीवन-रक्षक औषधियाँ बनती हैं। बाँस व फर की लकड़ी से कागज बनता है। वन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। पर्यटन व्यवसाय राष्ट्रीय आय का स्रोत भी माना जाता है। वन विविध वनस्पतियों के स्थायी घर हैं। वृक्ष जलवायु की विषमता को दूर करते हैं। ऋतु-परिवर्तन में इनका अहम् योगदान है। वृक्ष प्रदूषण के नाशक हैं। फल-फूल के साथ छाया प्रदान करने वाले हैं। पक्षियों की विश्राम-स्थली हैं। बाढ़ को नियंत्रित करते हैं। अनगिनत गुणों की खान होने के कारण आज वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण की आवश्यकता बढ़ती जा रही है।

सच्चा मित्र

सच्चा मित्र वही है जो मित्र के दु:ख में काम आता है। वह मित्र के कण जैसे दु:ख को भी मेरु के समान भारी मानकर उसकी सहायता करता है। एक सच्चा मित्र प्राणों से भी अधिक मूल्यवान होता है। मित्रता के अभाव में जीवन सूना हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- “सच्ची मित्रता में उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है। अच्छी-से-अच्छी माता का सा धैर्य और कोमलता होती है।” गोस्वामी तुलसीदास ने सच्चे मित्र के विषय में कहा है-
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी,
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।
निज दुःख गिरि सम रजे करि जाना,
मित्रक दु:ख रज मेरु समाना।।
सच्चा मित्र हमारे लिए प्रेरक, सहायक और मार्गदर्शक का काम करता है। जब भी हम निराश होते हैं, मित्र हमारी हिम्मत बढ़ाता है। जब हम परास्त होते हैं, वह उत्साह देता है। सच्चा मित्र हमारे लिए शक्तिवर्धक औषधि बनकर सामने आता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से भी बचाता है और सन्मार्ग की ओर अग्रसर करता है। सच्चा मित्र | सरलता से नहीं मिलता। इसलिए मित्र का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए। केवल बाहरी चमक-दमक, वाक्प टुता अथवा आर्थिक स्थिति को देखकर ही मित्र का चयन कर लेना उचित नहीं है, इसके लिए उसके व्यवहार, आचरण तथा अन्य बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है। सच्चा मित्र सच्चरित्र, विनम्र, सदाचारी तथा विश्वास पात्र होना चाहिए, क्योंकि सच्ची मित्रता मनुष्य के लिए वरदान है। किसी ने ठीक ही कहा है- ‘सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ।’
निबंध नंबर : 02
मेरा सच्चा मित्र
Mera Sacha Mitra 
मित्रता का यह सिद्धान्त है कि मित्र कम भले ही हों, लेकिन जो भी हों विश्वासपात्र हों। ऐसे मित्र सर्वत्र नहीं मिल पाते, ढूंढ़ने पर ही मिलते हैं। अगर आपके पास मित्रों पर उड़ाने के लिए पर्याप्त पैसा हो, तो सैकड़ों मित्र बन जाएंगे। और अगर आप गरीबी में जीवन बिता रहे हों तो बहुत कम लोगों को आपकी चिन्ता होगी।
दुनिया में ऐसे बहुत से व्यक्ति होंगे जो आपके प्रति सद्भावना रखते होंगे, लेकिन उन्हें मित्रता के योग्य नहीं माना जा सकता। उनमें से बहुत-से स्वार्थी भी हो सकते हैं, जो मौका पड़ने पर बड़ी आसानी से मुंह फेर सकते हैं।
सच्चे मित्र की पहचान किसी विपत्ति या दुःख के समय ही हो सकती है। सुख व समृद्धि के समय तो सैकड़ों लोग मित्र होने का दावा करते रहते हैं, लेकिन परेशानी या दुःख के समय बहुत गिने-चुने लोग ही पास दिखाई देंगे। वही ऐसे लोग हैं जिन्हें सच्चे अर्थों में दोस्त कहा जा सकता है। बहुत-से लोग बेहद स्वार्थी होते हैं और वे अपना मतलब सिद्ध करना अच्छी तरह जानते हैं। उनके मन में सहानुभूति या सद्भावना का नाम लेश-मात्र भी नहीं होता। वे तो बस औरों का शोषण करना जानते हैं, इसलिए अच्छे मित्र के लिए हमें काफी भटकना पड़ता है।
मेरे कुल चार मित्र ऐसे हैं जो मुसीबत के समय कसौटी पर खरे उतरे हैं। उनमें भी श्री गोविन्द लाल सबसे अधिक विश्वासपात्र सिद्ध हुए। एक बार की बात है, मैं बस में सफर कर रहा था, कि अचानक मेरी जेब कट गई। वह मेरे साथ थे। उन्होंने बडी बहादुरी के साथ आगे बढ़कर जेबकतरे को पकड़ लिया और उससे मेरा मनीबैग छीनकर मुझे दे दिया। उसके बाद उस जेबकतरे को पुलिस चौकी ले जाकर उन्होंने पुलिस के हवाले कर दिया। इस तरह उन्होंने मेरा धन और जीवन दोनों की रक्षा की। उस दिन के बाद से हम दोनों अभिन्न मित्र हो गए। वे एक धनी पिता की सन्तान हैं। उनके पिता एक बहुत बड़ी फैक्ट्री के मालिक हैं, लेकिन वे बड़े वीर, स्पष्टवक्ता और ईमानदार भी हैं।
मैं न तो झूठ बोलता हूँ और न झूठ बोलने वालों को पसन्द करता हूँ। श्री गोविन्द लाल एक सच्चे इन्सान हैं और सच्चाई में ही उनका विश्वास है। संयोग से वह मेरे सहपाठी भी हैं।
पढ़ने में वह मुझसे काफी कमजोर हैं, इसलिए हर रोज शाम को मैं उनकी सहायता खुले दिल से करने को तत्पर रहता हूँ। हम लोग घूमने-फिरने भी साथ-साथ जाते हैं। गोविन्द लाल को कहानी सुनाने का बहुत शौक है। मुझे भी वे अजीबो-गरीब कहानियां सुनाते रहते हैं। वह मेरे घर भी आते हैं और मेरी मां उन्हें सगे बेटे के तरह स्नेह करती हैं।
श्री गोविन्द लाल अपनी पढ़ाई के प्रति बेहद मुस्तैद हैं, लेकिन पढ़ाई में मेरी मदद की उन्हें बड़ी आवश्यकता पड़ती है। चूंकि मेरी दृष्टि में वह छल-कपट से दूर एक निश्छल इन्सान हैं, इसलिए मैं भी हरदम उनकी मदद के लिए तैयार रहता हूँ। मैं भी प्रायः उनके घर जाता रहता हूँ और हम दोनों घण्टों साथ-साथ रहते हैं।

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों

  • शिक्षा का महत्त्व • साक्षरता अभियान • अभियान में कठिनाइयाँ • संचार माध्यमों का सहयोग
शिक्षा कामधेनु के समान है जो मनुष्य की सभी इच्छाओं को प्रतिफलित करती है। शिक्षा के महत्त्व एवं आवश्यकता को देखते हुए प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह समय से पढ़-लिखकर परिवार एवं देश की उन्नति में सहयोग दे। किंतु भारत की पराधीनता ने शिक्षा के क्षेत्र के विकास में अनेक रुकावटें खड़ी कर दी, जिससे भारत की अधिकतर प्रौढ़ जनसंख्या अशिक्षित एवं निरक्षर रह गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी शिक्षण संस्थाओं की कमी एवं धनाभाव के कारण सबके लिए शिक्षा जुटा पाने में सरकार के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं, फिर प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए अभियान आरंभ करना आसान नहीं था और प्रौढ वर्ग के अशिक्षित होने के कारण देश की प्रगति की गति भी | अत्यंत धीमी थी। अतः सरकार ने 2 अक्तूबर सन् 1978 को प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षित करने के लिए एक अभियान
आरंभ किया, जिसमें 15 वर्ष से 35 वर्ष तक के स्त्री-पुरुषों को साक्षर एवं शिक्षित बनाने का निर्णय लिया गया। इस आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष किसी न किसी आजीविका अर्जन कार्य से संबंधित होते हैं। अतः इसको ध्यान में रखकर सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं ने सायंकालीन कक्षाएँ एवं विद्यालय खोले हैं। स्त्रियों की सुविधा के लिए दोपहर को भी कक्षाएँ लगाई जाती हैं।ऐसी शिक्षा चाहिए हमें करे भारत का नव-निर्माण
जिस शिक्षा से मिट जाए, जन मानस में फैला अंधकार
साक्षरता अभियान के अंतर्गत जनसंचार माध्यमों- दूरदर्शन एवं आकाशवाणी भी प्रौढों को प्रोत्साहित करने | के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा ‘पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों’ तथा ‘पढ़-लिख, लिख-पढ बन होशियार’, जैसे गीतों द्वारा प्रौढ़ों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। ये अत्यंत सराहनीय कार्य हैं। स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व हमारे देश में शिक्षा-व्यवस्था अत्यंत खराब थी, शिक्षण संस्थाएँ नगण्य थीं, बहुत कम थीं. अतः सब उनका लाभ नहीं उठा पाते थे। इसीलिए भारत की अधिकतर जनसंख्या अशिक्षित थी जिससे देश की प्रगति भी अत्यंत धीमी थी। आजकल ‘एक से एक को शिक्षा’ जैसे कार्यक्रम चलाकर प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है, सफल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरों में यह अभियान अत्यंत सफल रहा है। प्रौढ शिक्षा को सफल बनाने के लिए इसे राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना आवश्यक है।

विद्यार्थी और अनुशासन

  • अनुशासन का अर्थ • विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का महत्त्व • दोनों एक-दूसरे के पूरक
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता होती है, क्योंकि अनुशासन के बिना शासन संभव नहीं। ‘अनुशासन’ का शाब्दिक अर्थ है-नियंत्रक द्वारा बनाए गए नियमों का अनुगमन करना अर्थात् पीछे-पीछे चलना, यदि और स्पष्ट रूप से कहें तो अनुशासन का अर्थ “व्यक्ति के विभिन्न क्रिया-कलापों को एक सीमा में बाँधना है, जो समाज, राष्ट्र, राज्य, संस्था एवं स्वयं उसके लिए कल्याणकारी हों।” विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का विशेष महत्त्व है। आज के नागरिक कल के नेता हैं, उन्हें ही देश की पतवार सँभालनी है। अतः विद्यार्थियों का समुचित विकास आवश्यक है। वास्तव में विद्यार्थी-जीवन का आदर्श ही अनुशासन है, क्योंकि यही जीवन का निर्माण-काल है।यही तुम्हारा समय ज्ञान संचय करने का,
संयमशील, सुशील सदाचारी बनने का।
यह सब संभव हो सकता यदि अनुशासन हो,
मन में प्रेम, बड़ों का आदर, श्रद्धा का आसन हो ।।
हर समय कुछ-न-कुछ सीखने के लिए विद्यार्थी-जीवन ही सर्वोत्तम अवस्था है। जो विद्यार्थी प्रारंभिक अवस्था से अनुशासन का पालन करते हैं, उन्हें कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। किसी ने ठीक ही कहा हैअनुशासन सफलता की कुंजी है। अनुशासनहीनता मनुष्य को स्वार्थी एवं आलसी बना देती है। हमारा सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक विकास रुक जाता है। अनुशासनहीनता के कारण ही समाज में अपराधीकरण बढ़ता है। विद्यार्थियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। वे माता-पिता एवं गुरुजनों की अवज्ञा करने लगते हैं। आज उन्हें देश-समाज आदि की चिंता नहीं है, उन्हें किसी से सहानुभूति भी नहीं है और उनका आचरण दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा है।

विद्यार्थियों पर टीवी का प्रभाव

  • प्रस्तावना • मनोरंजन के साधन के रूप में • शिक्षा के माध्यम के रूप में • निष्कर्ष
टेलीविज़न की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह हमारे मनोरंजन का आधुनिकतम एव सरा साधन है। इसने हमारे दैनिक जीवन, रहन-सहन पर भी प्रभाव डाला है। इस पर अनेक प्रकार के रोचक कार्यक्रमटेलीफ़िल्में, धारावाहिक, चित्रहार, चित्रगीत, संगीत, नाटक, कवि-सम्मेलन एवं खेल-जगत आदि कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, जिनसे हमारा पर्याप्त मनोरंजन होता है। दूरदर्शन शिक्षा का सशक्त माध्यम है। इस पर औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों प्रकार की शिक्षाएँ दी जा रही हैं। स्कूली विद्यार्थियों के लिए नियमित पाठों का प्रसारण किया जाता है। प्रयोगात्मक ढंग से पाठों को सुरुचिपूर्ण तरीके से समझाया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के माध्यम से विद्यार्थियों को प्रतिदिन किसी-न-किसी विषय के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने विषय की नवीन-से-नवीन जानकारी प्राप्त होती है। दूरदर्शन पर राष्ट्रीय चैनलों के अतिरिक्त अन्य प्राइवेट चैनलों की भरमार है जिन पर अनेक रुचिकर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। कुछ कार्यक्रम सीधे विद्यार्थी वर्ग से न जुड़े होकर भी उनके ज्ञान का विस्तार करते हैं; जैसे-कौन बनेगा करोड़पति, फैमिली फ़ॉर्म्युन आदि । बोर्नविटा क्विज आदि कार्यक्रम तो विशेष रूप से विद्यार्थियों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने के लिए ही बनाए गए हैं।

चमत्कार विज्ञान जगत् का, और मनोरंजन जन साधन
चारों ओर हो रहा जग में, आज दूरदर्शन का अभिनंदन
दूर्भाग्य से दूरदर्शन ने विद्यार्थियों की पढ़ने की आदतों पर बुरा प्रभाव डाला है, जिससे उनकी चिंतन-मनन की क्षमता को ठेस पहुँची है और वे अच्छाई-बुराई में अंतर करना भूल गए हैं। वे केवल क्षणिक-चित्रों और शब्द-६ वनियों के जाद में बँधकर रह गए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि छात्र आवश्यकता से अधिक दूरदर्शन के कार्यक्रमों का अवलोकन न करें। प्रतिदिन अधिक-से-अधिक एक घंटा ही कार्यक्रमों को देखें और अपनी चिंतन-मनन की शक्ति को ठेस न पहुँचाएँ । नियमित अभ्यास ही उन्हें लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर करेगा।

समय का सदुपयोग

  • समय की परख ० समय के सम्मान से ही सफलता • समय की पालक प्रकृति
एक बार महात्मा गांधी से किसी ने पूछा कि “जीवन की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं–शिक्षा, शक्ति । अथवा धन को।” उत्तर मिला-“ये वस्तुएँ जीवन को सफल बनाने में सहायक अवश्य हैं, परंतु सबसे महत्त्वपूर्ण । है-समय की परख। जिसने समय की परख करना सीख लिया उसने जीने की कला सीख ली।” जो लोग उचित समय पर उचित कार्य करने की योजना बनाते हैं, वे ही समय के महत्त्व को जानते हैं। जो व्यक्ति समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है। समय कभी रुकता नहीं है, वह सम्मान माँगता है। जो जाति समय का सम्मान करना जानती । है, वह अपनी शक्ति कई गुना बढ़ा लेती है और विश्व की प्रमुख सत्ता बन बैठती है। फ्रैंकलिन के अनुसार-समय का सदुपयोग करने से जीवन में निश्चितता आती है, सब कार्य सुचारु रूप से होते चले जाते हैं। प्रत्येक कार्य के लिए समय मिल जाता है, चित्त शांत एवं प्रसन्न रहता है। धरती, सूर्य, चाँद-तारे, यहाँ तक कि संपूर्ण प्रकृति समय का पालन करती है तो मनुष्य को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। जीवन का एक-एक पल मूल्यवान है। समय मनुष्य का सबसे बड़ा धन है। युद्ध में एक मिनट खो देना सब कुछ खो देना है। अंग्रेजी की एक कहावत है कि “समय तथा समुद्र की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं।” इस संसार में सबसे अमूल्य है समय। जो इसे नष्ट करता है वह स्वयं नष्ट हो जाता है।
है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें, सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल, पर्वत झुक जाया करते हैं। ।
इस संसार में सभी वस्तुओं को घटाया और बढ़ाया जा सकता है, पर समय को नहीं। समय किसी के अधीन नहीं।  न वह रुकता है और न वह किसी की प्रतीक्षा करता है । कबीर के अनुसार जो लोग दिन खा-पीकर और रात सो कर गुजार देते हैं वे हीरे जैसे अनमोल जीवन को कौड़ियों के मूल्य बेच देते हैं। ऐसे लोग, अंत में पछताते रह जाते हैं। समय एक ऐसा देवता है यदि वह प्रसन्न हो जाए तो इंसान को उन्नति के शिखर तक पहुँचा देता है, यदि नाराज़ हो जाए तो इंसान को पतन के गर्त में गिरा देता है। अतः इस मूल्यवान समय का हमें हमेशा सदुपयोग करना चाहिए ।

माता-पिता की शिक्षा में भूमिका

माता-पिता संतान के जन्मदाता ही नहीं, सब कुछ होते हैं। भारतीय परंपरा तो माँ के चरणों में स्वर्ग मानती है ।भारतीय परम्परा मई अभिभावकों की अहम् भूमिका रही है-बच्चे के व्यक्तित्व-निर्माण में। आज भारतीय जीवन  में पाश्चात्य सभ्यता के  प्रभाव से भौतिकवादी बुधिप्रधान दृष्टिकोण व्याप्त हो रहा है। सामाजिक परिवेश में परिवर्तन आ रहा है। आज माता-पिता की संतान से आकांक्षाएँ भारतीय मूल से परिवर्तित रूप में प्रकट हो रहा है। संतान भी पाश्चात्य प्रभाव से प्रभावित होकर अधिकारों का रोना रो रही हैं, कर्तव्य नाम की चीज तो आज की संतान के शब्दकोश में है ही नहीं। माता-पिता को संतान की शिक्षा-प्राप्ति में अहम भूमिका निभानी होती है। माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा से संबंधित सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ-साथ उनको स्वतंत्र-चिंतन, कार्य-पद्धति तथा व्यवहार की छूट देनी होगी।
अपरिपक्व बुधि को परिपक्व होने में अपना संयम-पूर्ण योगदान देना होगा। आज की व्यस्त जिंदगी में अभिभावकों को समय निकालकर भौतिक सुखों के साथ अपनी मौजूदगी का अहसास बच्चों में भरना होगा। अपनी आवश्यकता थोपने के स्थान पर अहसास की भावना भरनी होगी। विचारों में समन्वय करना होगा। प्रसाद जी ने मानो माता-पिता को यही संदेश देते हुए कहा है-आँसु के भीगे अंचल पर, मन का सब कुछ रखना होगा।
तुमको अपनी स्मित रेखा से, यह संधि पत्र लिखना होगा।।
वास्तव में पाश्चात्य सभ्यता ‘मैं’ की उपासिका है। वह व्यक्ति के मूल्य को अंकित करती है परिवार के नहीं। जबकि भारतीय संस्कृति पूरे विश्व को परिवार समझने की पक्षधर है। दोनों सभ्यताओं में अंतर ही आज की समस्याओं की जड है। माता-पिता ने जीवन की दौड़ में दौड़कर ‘अनुभव’ के जो रत्न प्राप्त किए हैं, आज की संतान उन रत्नों से लाभ नहीं उठाना चाहती। वह स्वयं गलत या सही अनुभव करना चाहती है। इसलिए माता-पिता को अपने अनुभव बताने चाहिए, लादने नहीं।

नैतिक शिक्षा का महत्व

‘नैतिकता’ से अभिप्राय है-आचरण की शुद्धता तथा आदर्श मानवीय मूल्यों को अपनाना। सत्य, अहिंसा, प्रेम, सौहार्द, बड़ों का सम्मान, अनुशासन-पालन, दुर्बल एवं दीन-हीनों पर दया तथा परोपकार आदि गुणों को अपनाना ही नैतिकता का वरण करना है। सभी प्राणियों में ईश्वर का नूर देखना, न्याय-पथ पर चलना, शिष्टाचार का पालन करना- कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनका वर्णन प्रत्येक धर्मग्रंथ में मिलता है। धर्म-प्रवर्तकों एवं महान पुरुषों के जीवन से भी हमें नैतिकता को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, गांधीजी, मदर टेरेसा, विवेकानंद, महावीर स्वामी सभी ने प्राणिमात्र से प्रेम करने की शिक्षा दी है। बेवजह किसी को कष्ट न देना, अहिंसा का पालन करना, रोगियों, असहायों एवं अपाहिजों की सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। ‘जीवों पर दया करो’, ‘पर्यावरण की रक्षा करो’, ‘अहिंसा परम धर्म है’, ‘अपने पड़ोसी से प्रेम करो’, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, ‘जियो और जीने दो’, आदि विभिन्न धर्मों के ऐसे सूक्ति-वाक्य हैं जो हमें नैतिक मार्ग पर अग्रसर होने की निरंतर प्रेरणा देते हैं। बोर्डमैन के अनुसार-कर्म को बोओ और आदत की फसल काटे,

आदत को बोओ और चरित्र की फसल काटो,
चरित्र को बोओ और भाग्य की फसल काटो।
नैतिकता को अपनाने से अभिप्राय उपर्युक्त मानवीय मूल्यों को सम्मानपूर्वक अपनाने से है। वर्तमान समय में भौतिकवाद का बोलबाला है। भौतिक उन्नति की ओर अग्रसर मानव ने नैतिक मूल्यों को ताक़ पर रख दिया है। परिणामस्वरूप समाज में आतंक, भ्रष्यचार, हिंसा एवं अपराध बढ़ रहे हैं। भौतिक सुखों के लिए अनैतिकता और अराजकता को बढ़ावा देकर रावण की लंका का ही निर्माण किया जा सकता है, परंतु स्वर्ग के समान सुख, शांति एवं समृधि तो नैतिकता के बल पर ही स्थापित की जा सकती है। अत: आज के परिवेश में नैतिक शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा को शिक्षण संस्थाओं में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में नैतिक शिक्षा को स्थान नहीं दिया गया है। प्राथमिक स्तर से ही नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करके विद्यार्थियों के राष्ट्रीय चरित्र एवं नैतिक चरित्र के निर्माण में सहयोग देना चाहिए तथा इसके व्यावहारिक पक्ष पर भी। बल देना चाहिए क्योंकि कोई शिक्षा तब तक कारगर सिद्ध नहीं होती जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाए। शिक्षक वर्ग को भी नैतिक गुणों को अपनाना चाहिए क्योंकि उनके आचरण एवं चरित्र का सीधा प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ता है।
निबंध नंबर :- 02
नैतिक-शिक्षा का महत्त्व
Naitik Shiksha ka Mahatva 
आधानिक युग में नैतिकता और उसके रक्षक-संर्वद्धक तत्त्वों का पूर्णतया हास बलिक सीहो चका है। नैतिकता किस चिड़िया का नाम होता या हो सकता है, आम खास किसी को इस का अहसास या ज्ञान तक नहीं रह गया है। लगता है, नैतिकता नामक पटिया को मार और भून कर लोग खा तो चुके ही हैं, हज्म तक कर चुके हैं और वह भी बिना किसी डकार लिए। इस का मुख्य कारण स्वतंत्रता प्राप्त करने वाली पीढ़ी के समाप्त हो जाने के बाद मचने वाली लूट-पाट, आपाधापी और आदर्शहीनता ही है। इस से भी बड़ा कारण है उस तरह का राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा का सर्वथा अभाव और नैतिकता और उसके मूल्यों को जगाए रखने की अवगत प्रेरणा बनी रहा करती है। पर नहीं, हमारे नेतृवर्ग ने स्वतंत्र भारत में इस सब की व्यवस्था करने के दायित्व निर्वाह की ओर कतई कोई ध्यान नहीं दिया। नैतिकता और नैतिक शिक्षा का महत्त्व इस तथ्य से भली भांति परिचित रहते हुए भी सर्वथा भुला दिया गया कि राष्ट्र-निर्माण और सुरक्षा के लिए एक प्रकार के राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता रहा करती है। वह नैतिक जागृति रहने पर ही संभव हुआ करता है।
उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में ही सहज ही देखा, परखा और समझा जा सकता है कि किसी भी युग में नैतिक शिक्षा का क्या महत्त्व हुआ करता है। उसकी कितनी अधिक आवश्यकता हुआ करती है। आज हमारा देश जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, जिस तरह की अपसंस्कृति और मूल्यहीनता का शिकार होकर अनवरत हीन बल्कि निकृष्टतम अमानवीय मनोवृत्तियों का अखाड़ा बन कर रह गया है, इसमें नैतिक शिक्षा का महत्त्व एवं आवश्यकता और भी बढ़ गई है। आज जिस प्रकार की शिक्षा स्कूलों-कॉलेजों में दी जा रही है, वह साक्षर तो जरूर बना देती है, सुशिक्षित क्या मात्र शिक्षित भी नहीं बना पाती। ऐसे में उसके द्वारा नैतिक मानों-मल्यों की रक्षा तो क्या करना, वह व्यक्ति का साधारण मनुष्य तक बने रहने की प्रेरणा भी दे पाने में असमर्थ है। इसी कारण आज यह बात बड़ी तीव्रता से अनुभव की जा रही है कि बाकी शिक्षा के साथ-साथ, बाल्क उस से भी पहले नैतिक शिक्षा की व्यवस्था करना बड़ा ही आवश्यक है।
आज भारत में जिधर भी दृष्टिपात कर के देखिए, चारों ओर कई प्रकार के भ्रष्टाचारी का एकाधिकार छा रहा है। नैतिकता और साँस्कतिक आयोजनों की आड़ में अनैतिकता और अनाचार का पोषण कर उसे हर प्रकार से बढ़ावा दिया जा रहा है। हर तरफ भ्रष्ट मूल्यों वालों का बोल बाला हो रहा है पश्चिम की भौंडी नकल के फलस्वरूप अपसंस्कृति अपमूल्यों, नग्नता का प्रचार इतना बढ़ गया है कि उसका कहीं कोई किनारा तल दिखाई नहीं देता। चारों ओर कामुकता, हिंसा और वासना का नंगा नाच हो रहा है। सुनहरे सपने बेचने वाले सौदागरों ने माँस-मज्जागत लज्जा तक का अपहरण कर के मानवता की उदात भावनाओं को शरे-आम नंगा कर के खड़ी कर दिया है। सहज मानवीय सम्बन्ध तक दरारे जाकर भुरभुराने लगे और टूट का गिर पड़ने को उतावले नजर आ रहे हैं। अराजक और माफिया-गिरोहों को धार्मिक, सांप्रदायिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाने के कारण अच्छाई भरा आचरण तो क्या करना, उसका नाम तक ले पाना सुरक्षित नहीं समझा जाता। व्यापारिक दृष्टिकोण और आर्थिक तत्त्वों की प्रधानता ने मानवीयता का गला घोंट कर रख दिया है। फलतः चारों ओर एक प्रकार की कृत्रिमता. मात्र औपचारिकता का ही साम्राज्य छा रहा है। ऐसे वातावरण की सफलता पर प्रहार करने की क्षमता केवल आत्मिक स्तर तक नैतिक बन कर ही किया जा सकता है। नैतिक बनने – के लिए उस तरह की शिक्षा की स्पष्ट आवश्यकता तो है ही, सभी तरह के उपलब्ध उपकरणों – मानवीय मूल्यों को शुद्ध करना भी परमावश्यक है।
नैतिक शिक्षा व्यक्ति को उदार मानव तो बनाया ही करती है, एक तरह का राष्ट्रीय – चरित्र बनाने और विकसित करने में भी सहायक हो सकती है। उसके विकसित होने पर ही अपसंस्कृति, आरोपित और आयातित मूल्यों से छूटकारा पाकर अपनी संस्कृति. अपने राष्ट्रीय तत्त्वों, मल्यों एवं मानो को विकसित कर के समग्र राष्ट्रीयता का उदात तथा उच्च स्थितियों तक पहुँचाया जा सकता है। नैतिक मूल्यो-मानों को विकसित किए। बिना अन्य सभी प्रकार के विकास एक प्रकार से व्यर्थ ही हैं। उनका वास्तविक लाभ वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकता कि जिन के लिए सारे आयोजन किए जाते हैं। इतना ही नहीं नैतिक शिक्षा द्वारा नैतिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों का विकास किए बिना राष्ट्र की सुरक्षा तक को निश्चित कर पाना संभव नहीं कहा माना जा सकता।
कभी भारत का सारे संसार में जो गुरुवत् मान-सम्मान किया जाता था, वह उसके उदात मानवीय मूल्यों के कारण ही किया जाता था। लेकिन आज देश-विदेश सभी जगह प्रत्येक स्तर पर भारतीयता को हेय एवं त्याज्य माना जाने लगा है। उसकी आवाज का कहीं कोई मूल्य एवं महत्त्व नहीं रह गया। नेतृवर्ग ने विदेशों से ऋण-पर-ण लेकर यहाँ की अस्मिता का दीवालियापन तो घोषित कर ही दिया है, भिखारी जैसा भी बना दिया है। इस प्रकार की विषमताओं पर नैतिक बल और साहस अर्जित कर के ही पार पाया जा सकता है। इसके लिए सब से पहले तो राष्ट्र के नेतृत्व या नेतृ वर्ग को नैतिक रूप से शिक्षित बनाना परम आवश्यक है, बाद में समूचे राष्ट्र जन को जितनी जल्दी यह कार्य आरम्भ कर दिया जाएगा, उतना ही राष्ट्र और राष्ट्र जन का हित-साधन संभव हो पाएगा। कहावत भी है कि शुभस्य शीघ्रम, अर्थात् शुभ कार्य में देर नहीं करनी चाहिए।

भाग्य और पुरुषार्थ

हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”

भाग्य और पुरुषार्थ

हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”

डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

वे शुद्ध पायलट बनना चाहते थे। वैज्ञानिक बन गये। उनके पिता उन्हें कलक्टर बनाना चाहते थे। पर वे राष्ट्रपति बन गये। यानी कुछ भी न उनकी मर्जी का हुआ न उनके पिता की मर्जी की। फिर भी उन्होंने बेमर्जी के जो कुछ किया उससे देश का गौरव बढ़ा और वे भारतरत्न’ बन गये। इसके बीच बहत कुछ बदलता गया, लेकिन नहीं बदली ती उनकी सादगी  डा. अबुल फाफिर जैनुल आबेदिन अब्दुल कलाम यानी डी. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु में रामेश्वरम जिले के धनुष कोडि गाँव में 15 अक्तूबर, सन् 1931 ई.को हुआ।प्राथमिक शाला की पढ़ाई पूरी करने के बाद डा. कलाम को हायर सेकेंड्री की पढ़ाई के लिए रामनाथपुरम जाना पड़ा। यहाँ के स्क्वार्टज मिशनरी हाई स्कूल से हायर सेकेंड्री की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। लेकिन हायर सेकेंड्री तक की पढ़ाई तो जैसे-तैसे हो गयी, मगर आगे की पढ़ाई के लिए उनके घरवालों के पास कोई आर्थिक जुगाड़ नहीं था। लेकिन कलाम के दादाजी जिन्हें कलाम अब्बू’ कहकर बुलाया करते थे, ने एक तरकीब

निकाली। उन्होंने घर में पड़े लकड़ी के कुछ तख्तों को निकाला और उनसे एक छोटी नाव बनवाई। इस नाव को उन्होंने किराये पर देना शुरू किया और इससे वसूल होने वाले किराये से अब्दल कलाम की पढ़ाई का खर्च पूरा होने लगा।
इस तरह हायर सेकेंड्री के बाद डांवाडोल हो रही पढ़ाई को आधार मिला और अदल कलाम आगे की पढ़ाई के लिए त्रिचुरापल्ली के सेंट जोसफ कॉलेज गये। छुट्टियों में कलाम दसरे छात्रों की ही तरह अपने घर चले जाया करते थे और इन छुट्टियों में वह अपने पिता के काम में हाथ बंटाते थे। एक दिन जब वह पिताजी के साथ अखबारों की छंटनी कर के थे कि उनकी नजर अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ में छपे एक लेख पर पड़ी, जिसका शीर्षक था-‘स्पिटफायर’ यानी ‘मंत्र बाण’    दरअसल यह प्राचीन भारतीय अस्त्र का नाम था। जिसका इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध में गठबंधन सेनाओं (मित्र राष्ट्र) ने किया था। वास्तव में यह आग्नेयास्त्र मिसाइल ही था, जिसको पढ़कर अब्दुल कलाम अन्दर तक उत्तेजित हो गये थे और सोचने लगे थे कि काश! हिन्दुस्तान के पास इस तरह के आग्नेयास्त्र होते। बाद में उनके जीवन की सफलता की सारी कहानी इसी सपने का विस्तार है।
बी.एससी. प्रथम श्रेणी से पास करने के बाद आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके पास उसी तरह का संकट था जैसे कि हायर सेकेंड्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद आया था। लेकिन इस बार पढ़ाई जारी रखने का जिम्मा उन्होंने खुद अपने ऊपर लिया। इसके लिए उन्होंने न केवल ट्यूशन को अपना जरिया बनाया। बल्कि बीच-बीच में मद्रास से छपने वाले अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ के लिए विज्ञान पर कुछ लेख और फीचर भी लिखे। बी.एससी. के बाद कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने प्रथम    श्रेणी में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया। शायद यह बात बहुत लोगों को पता न हो कि कलाम साहब ने पी-एच.डी नहीं की। उनके नाम के पहले जो डॉक्टर शब्द लगा है वह मानद उपाधि के चलते लगा है।
पढ़ाई खत्म करने के बाद जब अब्दुल कलाम ने कैरियर की शुरुआत की, तो भारी दुविधा में फंस गये, क्योंकि उन दिनों वैज्ञानिकी के छात्रों की यूरोप और अमरीका में अच्छी खासी मांग थी। हाँ पैसा भी इतना मिलता था जिसकी सामान्य हिन्दुस्तान के लोग तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे। अपनी आत्मकथा कृति ‘माई जर्नी’ में कलाम साहब ने लिखा है-जीवन के वे दिन काफी कसमसाहटभरे थे। एक तरफ विदेशों में शानदार कैरियर था, तो दूसरी तरफ देश-सेवा का आदर्श बचपन के सपनों को सच करने का मौका चुनाव करना कठिन था कि आदेशों की ओर चला जाये या मालामाल होने के अवसर को गले लगाया जाये। लेकिन अन्ततः मैंने तय किया कि पैसों के लिए विदेश नहीं जाऊँगा। कैरियर की परवाह के लिए देश-सेवा का अवसर नहीं आँवाऊँगा। इस तरह 1958 में मैं डी.आर.डी.ओ डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) से जुड़ गया।”
डा. कलाम की पहली तेनाती डी.आर.डी.ओ. के हैदराबाद केन्द्र में हुई। पाँच सालों तक वे यहाँ पर महत्त्वपूर्ण अनुसंधानों में सहायक रहे। उन्हीं दिनों चीन ने भारत पर हमला कर दिया: 1962 के इस युद्ध में भारत को करारी हार शिकस्त झेलनी पड़ी। युद्ध के तुरन्त बाद निर्णय लिया गया कि देश की सामरिक शक्ति को नये हथियारों से सुसज्जित किया जाय। अनेक योजनाएँ बनीं, जिनके जनक डा. कलाम थे। लेकिन 1963 में उनका हैदराबाद से त्रिवेन्द्रम तबादला कर दिया गया। उनका यह तबादला विक्रम साराभाई स्पेस रिसर्च सेंटर में हुआ, जो कि इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन) का सहयोगी संस्थान था। डा. कलाम ने 1990 तक इस केन्द्र में काम किया। अपने इस लम्बे सेवाकाल में उन्होंने देश को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचाया। उन्हीं के नेतृत्व में भारत  कृत्रिम उपग्रहों के क्षेत्र में पहली कतार के देशों में शामिल हुआ | डा. कलाम एस. एल. बी. -3 परियोजना के निदेशक थे। 1979 में जब एस.एल.वी-3 की एक प्रायोगिक अपने ऊपर ले ली। अपने 44 साल के कैरियर में उनका हमेशा एक ही ध्येय वाक्य रहा है ‘विजन मिशन एंड गोल;  अर्थात् दृष्टिकोण ध्येय और लक्ष्य  
हम देशवासियों की ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह आपको चिरायु प्रदान कर  आपको और अधिक देशसेवा के लिए सक्षम और योग्य बनाये।

Civic Engagement for Young People During Social Distancing

Many of us feel a bit helpless to help others out during these coronavirus social distancing and isolation times. This also true for kids and young people. There are actions they can take as part of their home schooling. They can participate in civic engagement and activism activities.

Civic engagement is defined as “working to make a difference in the civic life of one’s community and developing the combination of knowledge, skills, values and motivation to make that difference (https://youth.gov/youth-topics/civic-engagement-and-volunteering).”

Quite frequently, not only do state standards permit teachers and schools to support student activism, but they encourage student activism as a means by which to develop civic understanding. Although standards vary from state to state, many of them are modeled on the National Council for the Social Studies (NCSS) College, Career, and Civic Life (C3) Framework for Social Studies State Standards (NCSS, 2013), which specifically endorses student activism:  “Civics is not limited to the study of politics and society; it also encompasses participation in classrooms and schools, neighborhoods, groups, and organizations . . . In civics, students learn to contribute appropriately to public processes and discussions of real issues. Their contributions to public discussions may take many forms, ranging from personal testimony to abstract arguments. They will also learn civic practices such as voting, volunteering, jury service, and joining with others to improve society. Civics enables students not only to study how others participate, but also to practice participating and taking informed action themselves” (https://kappanonline.org/student-activism-civics-school-response-singer/).

Civic engagement and activism in normal times has benefits, but in these times of coronavirus and social distancing-isolation, the benefits are amplified as such engagement can move young people from feelings of helplessness to feelings of empowerment.

Even in social isolation, there are actions young people and kids can do. The following activity guide can provide ideas and give some structure to civics activity engagement.

The following PDF has links with more information about how to do that challenge:

Increasing Student Participation During Zoom Synchronous Teaching Meetings

Due to Coronavirus, many schools are moving online, and teaching through Zoom meetings. If it is only being used to present content to students, then why not just record videos and have students watch them on their own? The value of Zoom meetings is that the educator can create synchronous interactive conversations and activities. My goal is to have all my students actively engaged throughout the meeting. Below are some the activities I have used during my. teacher education Zoom meetings although they can be adapted for any age group and age level (3rd grade and up), and in training professionals. Along with the tools that come with Zoom, I also use online web tools and applications to increase interactivity and engagement. All tools I describe below are free and work on any device, any browser.

Whole Group Discussions

Whole group discussions should be just that – discussions. I believe that the teacher can use this forum for short lectures but, again, they should be short as the power of synchronous Zoom meetings is that it permits interactivity and active learning. Questions about class content can be posed with student responses elicited through verbal responses and/or through the Zoom group chat.

A favorite whole group activity I do is to have a group video viewing party. For this activity, I begin with a short overview of the video and a question of what they should look for during the video. Student responses are put in the chat during and/or after the video.

Whole group activities and discussions can also be used for Breakout Groups follow-up to share what they discussed and did. In this case, I inform the Breakout Groups to decide on a spokesperson or two to report to the whole group.

Breakout Groups

One of the best tools in Zoom is the ability to put students into smaller, self-contained breakout groups. Some ways to use the Breakout Rooms include:

  • To discuss a prompt or questions provided by the teacher or another student.
  • To do online research about a given topic.
  • To discuss a real life scenario or case study. This can be done in a jigsaw strategy whereby different groups are given different case studies. When they are brought back into the whole group, each Breakout Group shares their thoughts and conclusions.
  • To create projects using some of the web tools such as Google Slides, webbing tools, or comics that I discuss later. Time is then given to each group to share what they produced with the rest of the class in a whole group setting.

Quizzes

My students of all ages, kids and adults, absolutely love the competitive, real time quizzes – Kahoot and Quizziz. Both of these online tools – applications have huge archives of teacher created quizzes. They also let teachers create their own and remix the quizzes other teachers have created.

Kahoot

Kahoot! is a game-based learning platform, used as educational technology in schools and other educational institutions. Its learning games, “Kahoots”, are multiple-choice quizzes that allow user responses.

Mentioned Kahoot and any student who has played it just lights up. I like using it at the beginning of a session prime students about what they will be exploring during the session or in the middle to re-energize them.

Quizziz

Quizziz offers self-paced quizzes to students. During my Zoom sessions, I do live Quizziz quizzes where the students answer quiz questions on their own yet compete with one another. It is similar to Kahoot but Kahoot is teacher directed, it displays the questions and answers on the teacher’s device; whereas Quizizz is student directed, it displays all the information on the student’s device.

Polling

Polling web tools can get real time information about students’ opinions, thoughts, and ideas which can be shared with them immediately.

Google Form

Google Forms can be used for student surveys and polling. More information about how to do this can be found at How to Make a Survey With Google Docs Forms. What I really love about using Google Forms for surveys and polls is that immediate feedback can be presented to the students through the response tab.

I like using Google Forms to check in with students and to inquire about what topics they would like to discuss.

Poll Everywhere

Poll Everywhere is a live student-response tool that offers whole-class participation and assessment through teacher-designed surveys, polls, and discussion boards. Tutorial guides can be found at https://www.polleverywhere.com/guides and video tutorials at https://www.polleverywhere.com/videos.

An example I did recently was polling the student teachers with who I work about special education services at their respective schools (see screenshots below).

Web Tools

There are lots of free, relatively easy-to-use web tools that students can use in Breakout Groups to create products about a class topic. The benefits of doing so include:

  • Students get to be creative during the synchronous meeting.
  • Creating products with visual elements helps deepen the learning.
  • Students have fun during the synchronous meeting.
  • Community is built as students work together on such tasks.

Before I give them their task and send them into their Breakout Groups, I give a screen share tutorial on how to use the tool. There are also lots of online video tutorials that can be shared with students.

As mentioned above, the smaller Breakout Groups share what they did with the whole group. To insure that the others pay attention, I ask them to share in the chat the favorite thing or what they learned from the smaller group presentations.

Shared Google Slides and Docs

Having students help create a shared Google slide show is one of my favorite activities. Individual or small groups are asked to take a slide of a shared Google Slide presentation to report on a given topic. I give some broad guidelines including finding and adding both content and images. The following video explains this process.

Below is an example that focuses on classroom management. In Breakout Groups, they were give a topic. Breakout groups 1 and 2 were given the topic. , groups 3 and 4 Classroom Environment, and 5 and 6 Instructional Strategies. They were given several online articles as references and also encouraged to use their own experiences.

Padlet – A Collaborative Sticky Note Board

Padlet is a website and app that allows kids to curate information onto virtual bulletin boards using a simple drag-and-drop system. Students, alone or in groups, can start with a template or a blank page and add videos, text, links, documents, images — basically anything — to the wall and organize it, like a page full of Post-it notes (https://www.commonsense.org/education/website/padlet).

I typically use Padlet as a whole group activity. What I like about it is that the students can easily see the responses, images, links that their classmates have posted.

For example, I love starting my first Zoom meeting with the Padlet: Time to Take a Selfie Icebreaker developed by Catlin Tucker. Below is one I did with a group of teachers with whom I worked.

Made with Padlet

I have also created and used Padlets for partner interviews, where they posted the results of their partner interviews, SEL strategies, technology in the classroom, classroom management, and collaborating with the community.

Collaborative Webbing – Mind Mapping

“A mind map is a diagram for representing tasks, words, concepts, or items linked to and arranged around a central concept or subject using a non-linear graphical layout that allows the user to build an intuitive framework around a central concept (https://www.mindmapping.com/mind-map.php).

I like to use Coggle in Zoom Breakout Groups. Coggle is an online tool for creating and sharing mind maps and flow charts. It works online in your browser. It is easy to use and permits real time collaborative.

To collaborate, one of the group members starts a Coggle and then invites others by clicking on the + sign in the upper right hand corner and sends email invites.

Below is an example the student teachers did in a breakout about SEL strategies for the classroom.

Comic Creator

Students can be asked to create a comic strip in their Breakout Groups to depict a given topic. My favorite is comic creator is Storyboard That but it has a bit of a learning curve for those who are less technology savvy. Although Make Belief Comix lacks some of the tools and options that Storyboard That has, it is much easier for students to use, so I have moved to using Make Belief Comix in my Zoom meetings. For more technology savvy groups, though, I recommend Storyboard That.

Once back in the whole group. students do a screen share of their product and explain it’s content to the rest of the group. For example, a here is a comic about differentiating instruction using Storyboard That.

As mentioned earlier, Breakout Groups then do a show and tell of their mind maps, comics. The following video shows how to do a screen share. The teacher needs to make sure they have “All Participants” enabled under the sharing settings.

My Educational Learning Plan for the Coronavirus-Induced Hiatus

I, like many of you, have gone into a somewhat involuntary social distancing and isolation (mostly) due to my school and health club closures and recommendation to stay away from crowds. It’s just my cats and I (gives new meaning to home alone). Having a plan to engage my mind and body is of utmost importance. I am sharing my plan of activities, which are almost all free, as it may give other educators some ideas. If you have additional ideas, please share them in the comments.

Working Remotely with My Gifted Elementary Students

I work with gifted students one day a week. Our state and thus my district made an extremely quick decision to close the schools – heard last Thursday night and was told to send home with students Chromebooks along with lessons on Friday, a half day. Obviously most of the teachers didn’t have time to develop lesson plans and learning activities. I met with my learners quickly on Friday, as so much was going on, and asked them to check in with a shared Google doc and our Google Classroom. What follows are the general tasks they are being asked to do during our regularly scheduled gifted day.

  • Writing Children’s Book Narrative – Prior to the school closing, my learners spent quite a bit of time learning how to write a children’s book using a Dr. Seuss type of writing style (yes, I know he is controversial but I like his writing style). The goal is to have them write their stories, illustrate them with cut out shapes made with a Cricut or a laser cutter, and then create Makey Makey Talking Books out of them. They just reached the point of writing their own narratives when the school closed. I asked each of them to share their stories with me via a Google doc. They were instructed to add to their stories during our hiatus, that I would provide feedback and suggestions directly on their shared Google docs. Then when we return, we can jump into creating the illustrations.
  • Newsela – For those who don’t know, Newsela is best-in-class library of high-interest, cross-curricular current news and nonfiction texts.. They have offered all teachers access to Newsela ELA, Newsela Social Studies, Newsela Science and the SEL Collection for FREE for the rest of the school year. At home, my learners are being asked to do the same thing they do in class – pick an article of personal interest, read it, and take the quiz where they need to get at least 3 out of 4 correct. If they don’t, they need to choose another article to read and follow the same procedure.
  • Prodigy Math Game – For those who don’t know, Prodigy is no-cost math game where kids can earn prizes, go on quests and play with friends — all while learning math. With Prodigy math homework is disguised as a video-game. My learners love it. I typically don’t give them class time to play it as I prefer hands-on, learner-to-learner interactive math activities. Since they will be at home, I asked them to play it for an hour during our typical gifted days to keep up with and improve their math skills.
  • Code.org – My 4th graders have working through the Code.org Course F . They were asked to continue working on this through our hiatus while my 5th and 6th graders were asked to join and work on the Code.org CS in Algebra.
  • Maker Camphttps://makercamp.com/project-paths/ and the Maker Stations Home Pack (see download below) : Since we do a lot of making in my gifted classes, I am requesting that my learners pick a project or two to try at home. It has been posted as an assignment via Google Classroom and they have been asked to post pictures of it. I will later (at school or at home depending how long the school closing lasts) ask them to blog about their processes.

Here is their schedule that I posted in Google Classroom for them.

The online applications – Newsela, Prodigy, and Code.org – have teacher dashboards so I can track progress and give them feedback. For their writing, I can give feedback directly on their Google docs, and for their maker projects, they are to post pictures to Google classroom.


Professional Development – Virtual Style

I plan on doing some PD in my pajamas – in other words, virtual style.

Attending Some Virtual Conferences

  • 2020 Share My Lesson Virtual Conference – is a free virtual conference from March 24-26, with over over 30 webinars focusing on instructional strategies across the curriculum, social-emotional learning, activism, STEM, and trauma-informed practices. This is a fantastic conference. I attend every year. The sessions and presenters from professional organizations are top notch!
  • CUE Spring Conference – Computer-Using Educators (CUE) is a California-based non-profit that offers a premiere educational technology conference each spring. This year, because of coronavirus, they are going virtual offering sessions from March 19 through April 5. There is a $75 fee for the virtual conference.

Taking Some Online Classes

  • The Power of Mathematics Visualization – There is a nominal fee for this course but it looks good and might help me develop some interesting strategies for teaching mathematics to my gifted students.
  • Code Academy Pro – They are offering Pro free to students and teachers. It’ll give me an opportunity to learn some advanced code.

Doing Some Maker Projects

Because I use lots of maker education projects in my gifted education classes and our school has a new STEAM lab, this forced hiatus is giving me the opportunity to try out some new projects including:


My Physical Health

I work out in group fitness classes several days a week. It verges on addiction. When I don’t get to do so, I get stressed out. Plus, it provides me with needed social interactions. So when my health club decided to limit their services, I became distraught. Luckily, though, I live in Santa Fe, New Mexico, so I plan to go on lots of hikes and am fixing up my bicycle to ride – hoping that the weather permits it. I am going to do online fitness classes. Oh, and, of course, cleaning my house from top to bottom will add an other fitness element. I absolutely know my physical workouts and health will positively affect my mental health.

Stay healthy, happy, and wise!

Top-Down and Bottom-Up Approaches in Planning

1. Introduction

Planning approaches determine how decisions are made and implemented in the development process. In development planning, particularly in urban and rural planning, two major approaches are commonly discussed: the Top-Down approach and the Bottom-Up approach. These approaches differ mainly in terms of decision-making authority, participation of stakeholders, and implementation methods.

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The top-down approach focuses on centralized decision-making by higher authorities, whereas the bottom-up approach emphasizes participation and involvement of local communities in planning processes. Both approaches have advantages and limitations, and modern planning practices often try to combine elements of both to achieve effective and inclusive development.


2. Top-Down Approach

Definition

The Top-Down approach refers to a planning method where decisions are made by higher authorities such as national governments, central planning agencies, or senior administrators, and then implemented at lower levels such as states, districts, cities, or villages.

In this approach, policies, strategies, and development programs are designed at the top level and passed down to lower administrative levels for execution.


Characteristics of the Top-Down Approach

  • Decision-making is centralized.
  • Planning policies are developed by higher authorities or experts.
  • Local communities have limited participation in decision-making.
  • Implementation occurs through government institutions and administrative systems.
  • Emphasis is placed on large-scale national or regional development goals.

Examples

Examples of top-down planning include:

  • National development policies formulated by central governments.
  • Large infrastructure projects such as highways, dams, and industrial corridors planned at national or state levels.
  • Early Five-Year Plans in India where development priorities were determined by central planning authorities.

Advantages of the Top-Down Approach

  1. Efficient Decision-Making
    Centralized planning allows faster decision-making and implementation of large-scale projects.
  2. Availability of Expertise
    Experts and planners with specialized knowledge can design comprehensive policies.
  3. Coordination Across Regions
    It helps coordinate development across multiple regions and sectors.
  4. Strategic National Planning
    Important for national development strategies such as infrastructure expansion and economic policies.

Limitations of the Top-Down Approach

  • Limited involvement of local communities.
  • Plans may not reflect local needs and priorities.
  • Risk of bureaucratic delays.
  • Implementation challenges at local levels due to lack of community participation.

3. Bottom-Up Approach

Definition

The Bottom-Up approach is a planning method where local communities, grassroots organizations, and local governments actively participate in the planning process. In this approach, development ideas originate from the local level and are gradually integrated into higher-level planning frameworks.

The bottom-up approach emphasizes community participation and local knowledge.


Characteristics of the Bottom-Up Approach

  • Planning begins at the grassroots level.
  • Local communities identify their needs and priorities.
  • Decision-making is decentralized.
  • Strong participation of stakeholders.
  • Plans reflect local social, economic, and environmental conditions.

Examples

Examples of bottom-up planning include:

  • Village development plans prepared by local communities.
  • Participatory rural development programs.
  • Local area planning initiatives in urban neighborhoods.

In India, the Panchayati Raj system encourages bottom-up planning through village-level governance.


Advantages of the Bottom-Up Approach

  1. Community Participation
    Local residents participate in decision-making and planning processes.
  2. Better Understanding of Local Needs
    Local communities have better knowledge of their problems and priorities.
  3. Greater Accountability
    Community involvement increases transparency and accountability in development projects.
  4. Sustainable Development
    Local ownership of projects improves long-term sustainability.

Limitations of the Bottom-Up Approach

  • Lack of technical expertise at local levels.
  • Limited financial and administrative resources.
  • Coordination challenges between local and higher-level planning institutions.
  • Possible conflicts between different community interests.

4. Comparison Between Top-Down and Bottom-Up Approaches

AspectTop-Down ApproachBottom-Up Approach
Decision-makingCentralizedDecentralized
ParticipationLimited community involvementStrong community participation
Planning levelNational or regional levelLocal or grassroots level
ImplementationGovernment-drivenCommunity-driven
FlexibilityLess flexibleMore adaptable to local needs

5. Integrated Planning Approach

Modern planning practices increasingly recognize the importance of combining both approaches.

An integrated planning approach allows:

  • Strategic direction from higher authorities.
  • Active participation from local communities.
  • Coordination between different levels of governance.

This combination ensures that development policies are both technically sound and socially inclusive.


6. Conclusion

The top-down and bottom-up approaches represent two different methods of planning and development. The top-down approach relies on centralized decision-making and expert-driven policies, while the bottom-up approach emphasizes community participation and decentralized planning.

Both approaches have their advantages and limitations. While top-down planning is useful for large-scale national development projects, bottom-up planning ensures that local needs and priorities are considered. In modern planning systems, integrating both approaches helps achieve more effective, inclusive, and sustainable development outcomes.

Daily writing prompt
Are you superstitious?

Sometimes Kids Just Need to Play During School

Teachers get so much pressure to meet standards and prepare students for state mandated tests, that I believe they forget their students are just kids. Because of this pressure, too many teacher education and professional development strategies stress the concept of time on task. For example, see Identifying (and Engaging Students in), Time-on-Task Activities, Increasing Time on Task, and Time on Task. This has some importance in teaching and learning but it shouldn’t always be the professed key to good instruction. This leaves little time for play. Play is important for students of all ages and grades.

This week I was reminded of the importance of playing and having fun; and that play and fun are determined by the kids, themselves. I planned a math lesson based on visual patterning, The concluding activity was for them to make a Fractal Tetrahedron, a marshmallow-toothpick tower. I had planned to have them work on it during a series of math classes, but they asked to stay through lunch and recess to work on it.

I started working with this group of gifted middle school students in January. I always have a goal of engaging learners as I believe it is the foundation of all good learning. I have had difficulty engaging them even with the use of Breakout EDU escape boxes, art activities, and games. Some engaged. Some did not. This marshmallow-toothpick activity brought a new energy into this group. All of them participated. They worked together. They laughed. They excitedly kept building and building. They added pieces to it that weren’t part of the plan. They played and had fun. A new group and classroom dynamic emerged which I believe was due with just letting them play with this project.

I discussed the beauty of spontaneous play (lots of play is spontaneous) in An Education Filled with Wonder:

One day I was substituting for a 2nd grade class.  It had begun to snow as we arrived to school that morning.  By mid-morning, a few inches covered the ground.  It was time for recess but, as expected, a voice came over the intercom to state that recess would be inside within each teacher’s classroom.  I heard the kids moan as they came to school dressed for snow with boots and winter jackets.  I threw caution into the wind.  I asked the kids to bundle up so we could go outside.  The kids became . . . well, kids.  They ran through the fresh snow in the huge back-of-the-school play area with no other students out there. They examined the footprints they created in the snow.  When one found something of interest, they called the others over to see.  They caught snow flakes with their tongues and made snow angles.  There were no conflicts nor arguing as was common to this group of kids.  They just ran, played, and laughed together as a unified group reminding me of a flock of geese.  I watched them with a tear in my eye, one that reflected the beauty I was witnessing. 

I wonder (even though I intuitively know the answer) whether learners in their adulthoods will better remember the types of activities I described above or their very structured time-on-task classroom activities.

The Harvard Graduate School of Education discussed the importance of play in Playing to Learn: How a pedagogy of play can enliven the classroom, for students of all ages:

Play and school can seem diametrically opposed. School is structured, often focused on order; play, by definition, is not.

But within this paradox of play and school, educators can find meaningful learning opportunities, advancing students’ academic skills as well as the social skills that will allow them to thrive in adulthood and enjoy their childhood now, according to researchers from Project Zero (PZ), a research center at the Harvard Graduate School of Education.

“Play is a strategy for learning at any age,” says Project Zero’s researcher Mara Krechevsky. While older students and their teachers might have more curricular demands than younger students, playful learning still has an important role to play — it might just look different.

There is a universality to play: children are often more relaxed and engaged during play, and it’s enjoyable — all aspects that facilitate learning.

I think most educators innately know about the importance of play but according to many of them, they don’t have the time during the school day to permit kids to play outside of recess . . . but I ask, “What are the costs of not permitting them to play?”

Top 5 most overrated players in the Premier League 2019-20


A wonderful serenity has taken possession of my entire soul, like these sweet mornings of spring which I enjoy with my whole heart.

I am so happy, my dear friend, so absorbed in the exquisite sense of mere tranquil existence, that I neglect my talents.

I am alone, and feel the charm of existence in this spot, which was created for the bliss of souls like mine. I am so happy, my dear friend, so absorbed in the exquisite sense of mere tranquil existence, that I neglect my talents.

I should be incapable of drawing a single stroke at the present moment; and yet I feel that I never was a greater artist than now.

When, while the lovely valley teems with vapour around me, and the meridian sun strikes the upper surface of the impenetrable foliage of my trees, and but a few stray gleams steal into the inner sanctuary, I throw myself down among the tall grass by the trickling stream; and, as I lie close to the earth, a thousand unknown plants are noticed by me: when I hear the buzz of the little world among the stalks, and grow familiar with the countless indescribable forms of the insects and flies, then I feel the presence of the Almighty, who formed us in his own image, and the breath of that universal love which bears and sustains us, as it floats around us in an eternity of bliss; and then, my friend, when darkness overspreads my eyes, and heaven and earth seem to dwell in my soul and absorb its power, like the form of a beloved mistress, then I often think with longing, Oh, would I could describe these conceptions, could impress upon paper all that is living so full and warm within me, that it might be the mirror of my soul, as my soul is the mirror of the infinite God!

O my friend — but it is too much for my strength — I sink under the weight of the splendour of these visions! A wonderful serenity has taken possession of my entire soul, like these sweet mornings of spring which I enjoy with my whole heart. I am alone, and feel the charm of existence in this spot, which was created for the bliss of souls like mine.

I am so happy, my dear friend, so absorbed in the exquisite sense of mere tranquil existence, that I neglect my talents. I should be incapable of drawing a single stroke at the present moment; and yet I feel that I never was a greater artist than now. When, while the lovely valley teems with vapour around me, and the meridian sun strikes the upper surface of the impenetrable foliage of my trees, and but a few stray gleams steal into the inner sanctuary, I throw myself down among the tall grass by the trickling stream; and, as I lie close to the earth, a thousand unknown plants are noticed by me: when I hear the buzz of the little world among the stalks, and grow familiar with the countless indescribable forms of the insects and

भाई दूज पर हिन्दी में निबंध

प्रस्तावना- दीपावली हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्योहार है और पांच दिवसीय त्योहार के पांचवे दिन मनाया जाता है, का पर्व। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित पर्व है, जिसे बड़ी श्रद्धा और परस्पर प्रेम के साथ मनाया जाता है। रक्षाबंधन के बाद, भाईदूज ऐसा दूसरा त्योहार है, जो भाई बहन के अगाध प्रेम को समर्पित है।कैसे मनाते हैं- भाई दूज का पर्व दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस दिन वि‍वाहिता बहनें भाई बहन अपने भाई को भोजन के लिए अपने घर पर आमंत्रित करती है, और गोबर से भाई दूज परिवार का निर्माण कर, उसका पूजन अर्चन कर भाई को प्रेम पूर्वक भोजन कराती है। बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लंबी उम्र की कामना करती है। भाई दूर से जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं जिनके आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग तरह ये मनाया जाता है।
भाई दूज की कथा- सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया।
इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर मांगने को कहा। तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज ‘तथास्तु’ कहकर यमपुरी चले गए। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता।
मान्यता– भाई दूज को लेकर यह मान्यता प्रचलित है, कि इस दिन भाई को तिलक लगाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराने से परस्पर तो प्रेम बढ़ता ही है, भाई की उम्र भी लंबी होती है। चूंकि इस दिन यमुना जी ने अपने भाई यमराज से वचन लिया था, उसके अनुसार भाई दूज मनाने से यमराज के भय से मुक्ति मिलती है, और भाई की उम्र व बहन के सौभाग्य में वृद्धि होती है।

उपसंहार- भाई का प्रेम है सबसे अलग। बहन के प्रति बचपन से ही चिंतित रहने वाले भाई के प्रति प्रेम प्रकट करने का इससे अच्छा अवसर दूसरा नहीं। जितना महत्व रक्षा बंधन को दिया जाता है उतना ही महत्व भाई दूज को भी दिया जाना चाहिए। बहन को चाहिए कि भाई को अपने घर बुलाकर उसे भोजन कराएं तथा लंबी उम्र की कामना के साथ छोटा-सा ही सही, पर उपहार जरूर दें।

Analysis of Verdict 2019: Case of Karnataka

Ramachandra*

* Assistant Professor, Department of political Science, Government First grade College, Hosadurga, Chitradurga, Karnataka.

Abstract

The recent elections held in Karnataka were significant for a number of reasons, many of which were discussed threadbare in the popular press at different levels. The BJP victory was astounding. Veterans politicians like Mallikarjun Kharge, who never lost an election or those like Deva Gowda and Veerappa Moily, all of them lost by huge margins. A more exhaustive analysis tends to happens only as a post-factor event – something which is bound to happen even this time. The verdict has confounded many observers who were looking at the larger picture. Hence, there is often an attempt to simplify what is otherwise a complex and perplexing result. There is no doubt that factors like nationalism, terrorism and related aspects did play an important part in the outcome, it would be unfair to ascribe the results only to one or two factors. Using the prism of an analysis of the results in Karnataka we argue that the verdict is the result of more complex factors that are at work in the state.

Keywords: Astounding, Exhaustive Analysis, verdict, Political Land Scape, Discernible, NOTA, Criss-crossed, Coalition government.

Introduction

The recently concluded elections were significant for a number of reasons, many of which were discussed threadbare in the popular press at different levels. The scale of BJP victory in Karnataka is, to say the least, astounding. Veterans like Mallikarjun Kharge, who never lost an election or those like Deva Gowda and Veerappa Moily, who had bucked the 2014 Modi wave lost. And, all of them lost by large margins. A more exhaustive analysis tends to happens only as a post-factor event – something which is bound to happen even this time. The verdict has confounded many observers who were looking at the larger picture. Hence, there is often an attempt to simplify what is otherwise a complex and perplexing result. There is no doubt that factors like nationalism, terrorism and related aspects did play an important part in the outcome, it would be unfair to ascribe the results only to one or two factors. Using the prism of an analysis of the results in Karnataka we argue that the verdict is the result of more complex factors that are at work in the state.

Karnataka Verdict: Overview

Karnataka has 28 parliamentary seats of which four are reserved for Scheduled Castes while 24 are unreserved. The political landscape of Karnataka is diverse and difficult to predict. The diversity is largely because of its historical evolution where the state consists of parts of that were united into a linguistic state from the British India and various princely states. There are six regions in the state each with its own unique set of political, social and economic dynamics. These regions include Bengaluru (28 assembly seats), Old Mysore (61 assembly seats; part of the princely state of Mysore), Coastal Karnataka (19 assembly seats), Central Karnataka (26 assembly seats), Hyderabad Karnataka (40 seats; part of erstwhile princely state of Hyderabad), and Bombay Karnataka (50 seats; part of the Bombay Presidency). According to the 2011 Census1, Hindus comprise of about 84 per cent of the population, Muslims about 13 per cent and Christians 1.87 per cent. An interesting aspect of Karnataka is the historical importance of various sects within Hinduism — a factor which played an important role in 2018 Assembly elections. Dalits make up about 17 per cent of the population. Unofficial estimates indicate that the two politically “dominant communities”[1], Lingayats and Vokkaligas make up an estimated 16-17 and 11-13 per cent respectively. Historically, Lingayats and Vokkaligas dominate the political landscape and have always accounted for about fifty percent of the elected legislators and parliamentarians.

In Karnataka there are three major political parties – Indian National Congress (INC), Bharatiya Janata Party (BJP) and Janata Dal (Secular) – of which two occupy the most important part of the spectrum while the third is a relatively smaller party, whose importance was magnified in the 2018 Assembly elections. It is well known fact that smaller parties tend to play a crucial role when there is an indecisive verdict.

Table 1: Karnataka General Elections

Parties20142019
SeatsVote ShareSeatsVote share
BJP1743.372551.38
Congress941.15131.88
Janata Dal (S)911.0719.67
Others parties01.2401.31
Independents01.5715.04
NOTA00.8300.71

Note: Vote Share in Percentage

Source: Compiled From Election Commission of India website (https://eci.gov.in/statistical-reDOrt/statisticah reports/ and http://results.eci.gov.in/pc/en/trends/statewiseS101.htm?st=S 101

The verdict in Karnataka threw up new and interesting aspects and aspects. It is not clear whether these will continue to remain long lasting trends. The contest was primarily between the BJP and the Congress-JDS alliance on the other hand. The discernible trends in 2019 elections include: first, the voter turnout was a record of 68.6 per cent which was higher than the previous highest 67.58 per cent recorded in 1999 parliamentary elections and about 67.2 per cent recorded in the 2014 general elections[2]. Second, the verdict illustrated that it was overwhelming win for the BJP. The party won 25 out of 28 (or about 89 per cent) of the parliamentary seats in the state. A victory of this magnitude is rare in Karnataka. Second, the BJP won more than half of the popular vote share: it garnered 51.38 per cent of the votes cast.

Third, the magnitude of the vielory of the BJP in 2019 was larger than 2014 in terms of seat and vote sliare – trend that is in consonance with many other states in the country. Our observation about the magnitude of the victory is borne out by the results: in 20 of28 seats at stake, the BJP won by a margin of more than 1 lakh votes while in 24 of the total 28 seats the BJP won by a margin of more than 50,000 votes. In most constituencies, the swing in favour of the BJP varied from 6 to 12 percent of the votes cast. Fourth, except in one constituency (Mandya), won by an independent supported by the BJP, in all the other constituencies all candidates not belonging to the tluee major political parties lost their deposits. Fifth, in some constituencies “none of the above” (or NOTA) garnered the third highest number of votes polled, indicating of the complete dominance of the three political parties in the state. Sixth, the verdict saw the complete defeat of the Deva Gowda family, which has played an. important part in the state’s politics over the past three decades. Seventh, 2019 witnessed a marginal decline in the share of NOTA.

Assembly versus Parliament Voting Patterns

Karnataka has 224 assembly seats. Table 2 offers insights into the seat and vote shares of different parties in the two assembly elections (2013 and 2018). In 2013, BJP the then incumbent was defeated after it was bruised by a combination of anti-incumbency and a division of its votes due to the split in the party with a section led by B.S. Yedyurappa floating a separate party. Though the Congress won in the 2013 Assembly elections, it had to be content with just nine seats in the parliamentary elections while the BJP won 17 of the total 28 seats. This victory was largely facilitated by the Modi wave in 2014 and the fact that Yeddyurappa had returned to the parent party shortly before the 2014 general elections.

Table 2: Karnataka Assembly Elections

Parties20132018
SeatsVote ShareSeatsVote share
BJP4019.8910436.22
Congress12236.597838.04
Janata dal (S)4020.193720.61
Others1315.9522.34
Independents97.3813.93
NOTANANA00.86

Note: Vote Share in Percentage; * NOTA was introduced for the first time in the elections to Assemblies of Chhattisgarh, Rajasthan and MP in December 2013.

Compiled from Election Commission oflndia Website (https://eci ■ gov.i n/stati stical-report/stati sti cal-reports/)

In 2018 elections, the BJP emerged as the single largest party with 105 seats against the Congress’ tally of 78 seats. This is despite the fact that the Congress got a number of votes. Interestingly, the vote and seat share of the JDS remained largely constant. After high drama which saw a midnight Supreme Court hearing, the Congress and JDS formed a coalition government in which the representative of the third largest party ended up as the Chief Minister.

Understanding the Electoral Tsunami

An important aspect of the elections is that the ruling coalition which was cobbled up after the elections in May 2018 or about one year before the general elections was decimated. The results indicate that Karnataka has now emerged as the stronghold which the BJP can use as the springboard for its larger foray into other South Indian states much like Uttar Pradesh and Madhya Pradesh are to North and Central India. If one were extrapolate the parliamentary elections to the legislative assembly, the BJP would have won about 170 seats while the ruling alliance would have won in about 50 seats. There are a number of reasons for this. A combination of Karnataka specific factors and national level factors played an important role. First, Karnataka has a history of voting different for parliament and assembly elections. Second, the ruling alliance has only itself to blame. They were essentially stuck with fighting among themselves rather than putting up a resolute fight against a common foe – something that had enabled them to come to power in the first place. In short, the government has survived on a tenterhook from the very first day. They have been afflicted by constant dissidence and infighting either among the partners or have had to keep unhappy members in good humour. The net results are that governance went for a toss – a factor that had a significant impact on an electorate that votes differently in assembly and parliament elections. Third, BJP’s mammoth victory was made possible only because it was able to make dramatic gains into the Congress Vote bank in Old Mysuru Region – another first to the BJP’s credit. That is indicative of not just dissatisfaction but the fact that the BJP got the caste arithmetic right. In contrast, the alliance’s tendency to focus on giving tickets to members of entrenched families was contrasted with those of the BJP which went out of the way to show that it was against dynastic politics – an optics that meant the denial of ticket to the wife of the Union Minister, Late Ananth Kumar. Contrast this with the JDS where in two constituencies their third-generation family members contested – something that left an acute distaste among the electorate. In a number of seats it may be noted that poor strategy and execution led to self in (lie ted wounds among the alliance partners. Foremost is the fact thai the alliance partners never really worked in earnest for each other. The ease of Tumkur where the .IDS was allotted the ticket in the face of vociferous opposition from the sitting MP was illustrative of this. Moreover, fight for tickets often took a nasty turn where the partners did not work the success of each other. In many cases, the distribution of tickets was such that it was not just the victory but the margin of victory was assured. This poor strategy went to extreme lengths. In two constituencies that were allotted to JDS, that party did not have candidates and instead had to borrow candidates from the Congress. Thus, it is clear that better strategy would have invariably led to better electoral results for the alliance partners.

The role and contribution of Prime Minister Narendra Modi, his ability to micro-manage the party affairs and marshal the cumulative resources of the party without any let up played an important role. Unlike the alliance partners, whose electoral fight did not gain traction till the last minute, the Prime Minister and Amit Shah, the BJP president not just criss-crossed the state but saw to it that all the groups in the party worked to a united goal – that of victory. Similarly, the reach of the BJP and its affiliates in the ‘Sangh Parivar’ meant that while the BJP’s campaign was visible, the door-to-door low profile but highly effective campaign of hundreds of thousands of ideologically motivated cadres created a ground for the electoral tsunami. This explains the loss of entrenched leaders even in their strong holds. This cohesion and single minded devotion to achieving the goal was contrasted with that of the alliance partners where fights over ticket distribution meant that a large segment of the focal leadership was unhappy or a last minute stitching up a comprise meant a classic case of ‘too little, too late’.

The creation of the BJP juggernaut is largely due a major change in the electoral strategy of the BJP under Modi-Shah. Unlike in the past, the BJP has no qualms about assimilating strong candidates with a mass base into itself. In the past, this tactical move was considered the forte of the Congress Party and the BJP subtly frowned presumably because the ideological difference that may have been thought to exist. Post 2014, it is clear that the BJP under the leadership of Modi-Shah have no such qualms. They have been liberal in seeking to win over any discontented elements in any party across the ideological spectrum. In fact, the BJP’s success in Gulbarga and Bidar is because it was played a proactive role in drawing such elements in these seats – both of which the BJP won.

It is in this context of well oiled paily machinery backed by huge human resources and razor sharp focussed strategy that the post-Pulwama nationalist rhetoric should be approached. A nationalist rhetoric was something that was always a part of the BJP arsenal but the fact that it could be harnessed was lai’gely due to the fact that the party organisation was able to exploit it to the fullest extent which made the difference. Of course, to all the above one may add the usual factors like money power, advertising power and more importantly social media. The spread of smart phones and mobile internet means that the role of media transmission and their impact has changed. Millions of mobile internet connections aided by massive numbers of social media organisation and groups pushing Modi’s re-election bid, it is but not surprising that his message reached the last mile. In Karnataka elections social media reach and social media campaign, especially in the aftermath of Pulwama and surgical strikes played an important part in mobilising public opinion in favour of Narendra Modi. The use of social media to fill the gap in the last mile media outreach is a new feature of 2019 elections and one that will continue to remain for the foreseeable future.

An aspect of 2019 elections is that it is clear that Prime Minister Narendra Modi has brought about a major shift in the manner in which future elections will be fought. It was different for the simple reason that it was for the first time that an election was fought with all the new dynamics and one in which a national party was able to truly change the narrative from one that is usually highly localised to one that was pan-India in scope.

Conclusion

There is no doubt that the biggest win in Karnataka’s parliamentary election voting patterns will have massive ramifications – one that is already playing. The writing on the wall is clear that the opportunistic alliance’s days are likely to be numbered. This is for the reason that the alliance was afflicted by contradictions from day one and they had no unifying factor other than keeping the BJP out of power. A more worrying factor for the non-BJP parties should be the fact that it is clear that the BJP has spread its wings to areas that were in the past considered to be the traditional strong holds of the opposition. Hence, it is likely that the politics ot the state is likely to be in a state of flux for the next few years.

References

Kothari. Raj ini and Manor. James (eds). Caste in Indian Politics. Orient Blackswan. Hyderabad

2010

hup: www.censusindia.yov.in 2011 census Religion PCA. tiinil

https://eci.gov.in statistical-report statistical-reports


 

[1]             Used in the same sense as Rajini Kothari and James Manor (eds), Caste in Indian Politics, Orient Blackswan, Hyderabad, 2010

[2] htti^:”eci.gov.in/statistica1-reDort/statistical-reports/ (website last visited 15 July 2019)

नरक चतुर्दशी पर निबंध

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार की कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को और के नाम से भी जानते हैं। दीपावली के एक दिन पहले आने वाली इस चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहते हैं
इस दिन के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अत्याचारी राक्षस का वध किया था। नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता है। प्रागज्योतिषपुर के राजा भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुंदर कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा था। भगवान श्रीकृष्‍ण ने उन सभी को मुक्त कराया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई गई थी।
दूसरी कथा के अनुसार पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा रंति देव को जब यमदूत नरक ले जाने लगे तो उन्होंने कहा मैंने तो कोई पाप नहीं किया फिर क्यों नरक ले जा रहे हो? यमदूतों ने कहा कि एक बार आपके द्वार से एक विप्र भूखा ही लौट गया था, यह उसी पाप कर्म का फल है। तब रंति देव ने कहा कि मुझे इसके प्रायश्चित का एक वर्ष दीजिए। यमदूतों ने एक वर्ष दिया तो राजा ऋषियों के पास पहुंचे और उन्होंने इस पाप से छूटने का उपाय पूछा। तब ऋषियों ने बताया कि कार्तिक मास की चतुर्दशी को व्रत रखने के बाद ब्राह्मण भोज कराएंगे तो आप इस पाप से मुक्त हो जाएंगे। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।
नरक चतुर्दशी के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौंदर्य की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता हैं कि जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय होने से बाद नहाता हैं उसे वर्ष भर में किए गए अच्छे कार्यों का फल नहीं मिलता है।
इस दिन को यम के नाम से भी जानते हैं। इसीलिए इस दिन शाम होने के बाद घर में और उसके चारों ओर दीये जलाए जाते हैं और यमराज से अकाल मृत्यु से मुक्ति और स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं।कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दीया जला कर पूरे घर में घूमाता है और फिर उसे लेकर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दीये को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घूमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।
इस दिन को काली चौदस भी कहते हैं। काली चौदस की रात माता काली की पूजा होती है। दरअसल पूरे भारतवर्ष में रूप चतुर्दशी का पर्व यमराज के प्रति दीप प्रज्ज्वलित कर, यम के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए मनाया जाता है, लेकिन बंगाल में मां काली के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है, जिसके कारण इस दिन को काली चौदस कहा जाता है। इस दिन मां काली की आराधना का विशेष महत्व होता है। काली मां के आशीर्वाद से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सफलता मिलती है।

इंदिरा गांधी पर हिन्दी निबंध

भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। एक ऐसी महिला जो न केवल भारतीय राजनीति पर छाई रहीं बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी वह विलक्षण प्रभाव छोड़ गईं। यही वजह है कि उन्हें लौह महिला के नाम से संबोधित किया जाता है।श्रीमती इंदिरा गांधी का जन्म नेहरू खानदान में हुआ था। वह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की इकलौती पुत्री थीं। आज इंदिरा गांधी को सिर्फ इस कारण नहीं जाना जाता कि वह पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी थीं बल्कि इंदिरा गांधी अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए ‘विश्व राजनीति’ के इतिहास में हमेशा जानी जाती रहेंगी।

इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम था- ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी’। उन्हें एक घरेलू नाम भी मिला था जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप ‘इंदु’ था। उनके पिता का नाम जवाहरलाल नेहरू और दादा का नाम मोतीलाल नेहरू था। पिता एवं दादा दोनों वकालत के पेशे से संबंधित थे और देश की स्वाधीनता में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। माता का नाम कमला नेहरू था।

इंदिराजी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो आर्थिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टि से काफी संपन्न था। उनका इंदिरा नाम उनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरू ने रखा था। जिसका मतलब होता है कांति, लक्ष्मी एवं शोभा। इस नाम के पीछे की वजह यह थी कि उनके दादाजी को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें मां लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है।

इंदिरा के अत्यंत प्रिय दिखने के कारण पंडित नेहरू उन्हें ‘प्रियदर्शिनी’ के नाम से संबोधित किया करते थे। चूंकि जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, इस कारण सुंदरता उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुई थी। इंदिरा को उनका ‘गांधी’ उपनाम फिरोज गांधी से विवाह के बाद मिला था।
इंदिरा गांधी को बचपन में भी एक स्थिर पारिवारिक जीवन का अनुभव नहीं मिल पाया था। इसकी वजह यह थी कि 1936 में 18 वर्ष की उम्र में ही उनकी मां कमला नेहरू का तपेदिक के कारण एक लंबे संघर्ष के बाद निधन हो गया था और पिता हमेशा स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त रहे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू शिक्षा का महत्व काफी अच्छी तरह समझते थे। यही कारण है कि उन्होंने पुत्री इंदिरा की प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध घर पर ही कर दिया था। बाद में एक स्कूल में उनका दाखिला करवाया गया। 1934-35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद इंदिरा ने शांतिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर के बनाए गए ‘विश्व-भारती विश्वविद्यालय’ में प्रवेश लिया।
इसके बाद 1937 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। बचपन से ही इंदिरा गांधी को पत्र पत्रिकाएं तथा पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक था जो स्कूल के दिनों में भी जारी रहा। इसका एक फायदा उन्हें यह मिला कि उनके सामान्य ज्ञान की जानकारी सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उन्हें देश दुनिया का भी काफी ज्ञान हो गया और वह अभिव्यक्ति की कला में निपुण हो गईं। विद्यालय द्वारा आयोजित होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिता में उनका कोई सानी नहीं था।

बावजूद इसके वह हमेशा ही एक औसत दर्जे की विद्यार्थी रहीं। अंग्रेजी के अतिरिक्त अन्य विषयों में वह कोई विशेष दक्षता नहीं प्राप्त कर सकीं। लेकिन अंग्रेजी भाषा पर उन्हें बहुत अच्छी पकड़ थी। इसकी वजह थी पिता पंडित नेहरू द्वारा उन्हें अंग्रेजी में लिखे गए लंबे-लंबे पत्र, चूंकि पंडित नेहरू अंग्रेजी भाषा के इतने अच्छे ज्ञाता थे कि लॉर्ड माउंटबेटन की अंग्रेजी भी उनके सामने फीकी लगती थी।


स्वयं उन्होंने भी अपने पिता पंडित मोतीलाल नेहरू का आदेश माना था। उन्होंने कई प्रकार से इंदिरा को समझाने का भी प्रयास किया लेकिन इंदिरा की जिद कायम रही। तब कोई भी रास्ता निकलता न देखकर नेहरू जी ने अपनी हामी भर दी। शादी के बाद 1944 में उन्होंने राजीव गांधी और इसके दो साल के बाद संजय गांधी को जन्म दिया। शुरुआत में तो उनका वैवाहिक जीवन ठीक रहा लेकिन बाद में उसमें खटास आ गई और कई सालों तक उनका रिश्ता हिचकौले खाता रहा। इसी दौरान 8 सितंबर 1960 को जब इंदिरा अपने पिता के साथ एक विदेश दौरे पर गई हुईं थीं तब फिरोज गांधी की मृत्यु हो गई।

इंदिरा गांधी को परिवार के माहौल में राजनीतिक विचारधारा विरासत में प्राप्त हुई थी। 1941 में ऑक्सफोर्ड से भारत वापस आने के बाद वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं। सन् 1947 के भारत विभाजन के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों को संगठित करने तथा पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए चिकित्सा संबंधी देखभाल प्रदान करने में मदद की। उनके लिए प्रमुख सार्वजनिक सेवा का यह पहला मौका था। धीरे-धीरे पार्टी में उनका कद काफी बढ़ गया।

42 वर्ष की उम्र में 1959 में वह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी बन गईं। इस पर कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था। फिर 27 मई 1964 को नेहरू के निधन के बाद इंदिरा चुनाव जीतकर सूचना और प्रसारण मंत्री बन गईं।

11 जनवरी 1966 को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के बाद 24 जनवरी 1966 को श्रीमती इंदिरा गांधी भारत की तीसरी और प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद तो वह लगातार तीन बार 1967-1977 और फिर चौथी बार 1980-84 देश की प्रधानमंत्री बनीं।


16 वर्ष तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी के शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव आए। लेकिन 1975 में आपातकाल 1984 में सिख दंगा जैसे कई मुद्दों पर इंदिरा गांधी को भारी विरोध-प्रदर्शन और तीखी आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी थी।

बावजूद इसके रूसी क्रांति के साल में पैदा हुईं इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को परास्त किया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया। लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को उन्हें अपने अंगक्षक की ही गोली का शिकार होना पड़ा और वह देश की एकता और अखंडता के लिए कुर्बान हो गईं।

गाय पर हिन्दी निबंध

भूमिका : का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है।

अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। बच्चों को विशेष तौर पर गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है क्योंकि भैंस का दूध जहां सुस्ती लाता है, वहीं गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है। माना जाता है कि भैंस का बच्चा (पाड़ा) दूध पीने के बाद सो जाता है, जबकि गाय का बछड़ा अपनी मां का दूध पीने के बाद उछल-कूद करता है।

गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्‍डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है।
गाय की शारीरिक संरचना : गाय का एक मुंह, दो आंखें, दो कान, चार थन, दो सींग, दो नथुने तथा चार पांव होते हैं। पांवों के खुर गाय के लिए जूतों का काम करते हैं। गाय की पूंछ लंबी होती है तथा उसके किनारे पर एक गुच्छा भी होता है, जिसे वह मक्खियां आदि उड़ाने के काम में लेती है। गाय की एकाध प्रजाति में सींग नहीं होते।
गायों की प्रमुख नस्लें : गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्‍यत: सहिवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गीर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्ल में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी अधिक देती है। भारतीय गाय छोटी होती है, जबकि विदेशी गाय का शरीर थोड़ा भारी होता है।
गाय के रंग : गाय कई रंगों जैसे सफेद, काला, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है।

गाय का धार्मिक महत्व : भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।

प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है। कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। इसी कारण उनका एक नाम गोपाल भी है।

निष्कर्ष : दुर्भाग्य से शहरों में जिस तरह पॉलिथिन का उपयोग किया जाता है और उसे फेंक दिया जाता है, उसे खाकर गायों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में सभी को गंभीरता से विचार करना होगा ताकि हमारी ‘आस्था’ और ‘अर्थव्यवस्था’ के प्रतीक गोवंश को बचाया जा सके। गाय आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कुल मिलाकर गाय का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है।
परिचय : भारत के पहले प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 इलाहाबाद में हुआ था। उनकाजन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
उनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू था, जो एक धनाढ्य परिवार के थे और माता का नाम स्वरूपरानी था। पिता पेशे से वकील थे। जवाहरलाल नेहरू उनके इकलौते पुत्र थे और 3 पुत्रियां थीं। नेहरू जी को बच्चों से बड़ा स्नेह और लगाव था और वे बच्चों को देश का भावी निर्माता मानते थे।शि‍क्षा : जवाहरलाल नेहरू को दुनिया के बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लंदन से पूरी की थी। उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। हैरो और कैम्ब्रिज में पढ़ाई कर 1912 में नेहरूजी ने बार-एट-लॉ की उपाधि ग्रहण की और वे बार में बुलाए गए।

पंडित नेहरू शुरू से ही गांधीजी से प्रभावित रहे और 1912 में कांग्रेस से जुड़े। 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में नेहरू घायल हुए और 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए। उन्होंने 6 माह जेल काटी। 1935 में अलमोड़ा जेल में ‘आत्मकथा’ लिखी। उन्होंने कुल 9 बार जेल यात्राएं कीं। उन्होंने विश्वभ्रमण किया और अंतरराष्ट्रीय नायक के रूप में पहचाने गए।योगदान : उन्होंने 6 बार कांग्रेस अध्यक्ष के पद (लाहौर 1929, लखनऊ 1936, फैजपुर 1937, दिल्ली 1951, हैदराबाद 1953 और कल्याणी 1954) को सुशोभित किया। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में नेहरूजी 9 अगस्त 1942 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, जहां से 15 जून 1945 को रिहा किए गए। नेहरू ने पंचशील का सिद्धांत प्रतिपादित किया और 1954 में ‘भारतरत्न’ से अलंकृत हुए नेहरूजी ने तटस्थ राष्ट्रों को संगठित किया और उनका नेतृत्व किया।

सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जब भावी प्रधानमंत्री के लिए कांग्रेस में मतदान हुआ तो सरदार वल्लभभाई पटेल और आचार्य कृपलानी को सर्वाधिक मत मिले थे। किंतु महात्मा गांधी के कहने पर दोनों ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू 1947 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आजादी के पहले गठित अंतरिम सरकार में और आजादी के बाद 1947 में भारत के प्रधानमंत्री बने और 27 मई 1964 को उनके निधन तक इस पद पर बने रहे।

‘स्वाधीनता और स्वाधीनता की लड़ाई को चलाने के लिए की जाने वाली कार्रवाई का खास प्रस्ताव तो करीब-करीब एकमत से पास हो गया। …खास प्रस्ताव इत्तफाक से 31 दिसंबर की आधी रात के घंटे की चोट के साथ, जबकि पिछला साल गुजरकर उसकी जगह नया साल आ रहा था, मंजूर हुआ।’ -लाहौर अधिवेशन में स्वतंत्रता प्रस्ताव पारित होने के बारे में नेहरू की ‘मेरी कहानी’ से।

उपसंहार : पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान करना और योजनाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू करना उनके मुख्य उद्देश्य रहे।

बाल दिवस पर हिन्दी निबंध

हर साल को मनाया जाता है। इसी दिन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ था, उन्हें बच्चों से बेहद लगाव और प्रेम था। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रति वर्ष उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहबाद में हुआ था। नेहरू जी का बच्चों से बड़ा स्नेह था और वे बच्चों को देश का भावी निर्माता मानते थे। बच्चों के प्रति उनके इस स्नेह भाव के कारण बच्चे भी उनसे बेहद लगाव और प्रेम रखते थे और उन्हें चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे। यही कारण है कि नेहरू जी के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।


14 नवंबर की तारीख को नेहरू जयंती या फिर बाल दिवस के नाम से जाना जाता है। यह दिन पूरी तरह से बच्चों को समर्पित है। इस दिन विशेष रूप से बच्चों के लिए स्कूल व अन्य संस्थानों में कार्यक्रम एवं खेल-कूद से जूड़े आयोजन होते हैं। बच्चे देश का भविष्य हैं, वे ऐसे बीज के समान हैं जिन्हें दिया गया पोषण उनका विकास और गुणवत्ता निर्धारित करेगा। यही कारण है कि इस दिन बच्चों से जुड़े विभिन्न मुद्दों जैसे शिक्षा, संस्कार, उनकी सेहत, मानसिक और शारीरिक विकास हेतु जरूरी विषयों पर विचार विमर्श किया जाता है।

कई स्कूलों व संस्थानों में बाल मेला एवं प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, ताकि बच्चों की क्षमता और प्रतिभा को और बढ़ावा मिले। इस दिन विशेष रूप से गरीब बच्चों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने एवं बाल श्रृम एवं बाल शोषण जैसे गंभीर मुद्दों पर भी विचार विमर्श किया जाता है।

बच्चे नाजुक मन के होते हैं और हर छोटी चीज या बात उनके दिमाग पर असर डालती है। उनका आज, देश के आने वाले कल के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उनके क्रियाकलापों, उन्हें दिए जाने वाले ज्ञान और संस्कारों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी है। बच्चों को सही शिक्षा, पोषण, संस्कार मिले य‍ह देशहित के लिए बेहद अहम है, क्योंकि आज के बच्चे ही कल का भविष्य है।

प्रदूषण एक समस्या निबंध हिन्दी में

स्तावना : विज्ञान के इस युग में मानव को जहां कुछ वरदान मिले है, वहां कुछ अभिशाप भी मिले हैं। प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप हैं जो विज्ञान की कोख में से जन्मा हैं और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबूर हैं।

प्रदूषण का अर्थ : प्रदूषण का अर्थ है -प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना। न शुद्ध वायु मिलना, न शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना, न शांत वातावरण मिलना।

प्रदूषण कई प्रकार का होता है! प्रमुख प्रदूषण हैं – वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण ।वायु-प्रदूषण : महानगरों में यह प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चौबीसों घंटे कल-कारखानों का धुआं, मोटर-वाहनों का काला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है। मुंबई की महिलाएं धोए हुए वस्त्र छत से उतारने जाती है तो उन पर काले-काले कण जमे हुए पाती है। ये कण सांस के साथ मनुष्य के फेफड़ों में चले जाते हैं और असाध्य रोगों को जन्म देते हैं! यह समस्या वहां अधिक होती हैं जहां सघन आबादी होती है, वृक्षों का अभाव होता है और वातावरण तंग होता है।जल-प्रदूषण : कल-कारखानों का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है। बाढ़ के समय तो कारखानों का दुर्गंधित जल सब नाली-नालों में घुल मिल जाता है। इससे अनेक बीमारियां पैदा होती है।ध्वनि-प्रदूषण : मनुष्य को रहने के लिए शांत वातावरण चाहिए। परन्तु आजकल कल-कारखानों का शोर, यातायात का शोर, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों, लाउड स्पीकरों की कर्णभेदक ध्वनि ने बहरेपन और तनाव को जन्म दिया है।

प्रदूषणों के दुष्परिणाम: उपर्युक्त प्रदूषणों के कारण मानव के स्वस्थ जीवन को खतरा पैदा हो गया है। खुली हवा में लम्बी सांस लेने तक को तरस गया है आदमी। गंदे जल के कारण कई बीमारियां फसलों में चली जाती हैं जो मनुष्य के शरीर में पहुंचकर घातक बीमारियां पैदा करती हैं। भोपाल गैस कारखाने से रिसी गैस के कारण हजारों लोग मर गए, कितने ही अपंग हो गए। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण न समय पर वर्षा आती है, न सर्दी-गर्मी का चक्र ठीक चलता है। सुखा, बाढ़, ओला आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है।

प्रदूषण के कारण : प्रदूषण को बढ़ाने में कल-कारखाने, वैज्ञानिक साधनों का अधिक उपयोग, फ्रिज, कूलर, वातानुकूलन, ऊर्जा संयंत्र आदि दोषी हैं। प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना भी मुख्य कारण है। वृक्षों को अंधा-धुंध काटने से मौसम का चक्र बिगड़ा है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली न होने से भी प्रदूषण बढ़ा है।

सुधार के उपाय : विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से बचने के लिए चाहिए कि अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं, हरियाली की मात्रा अधिक हो। सड़कों के किनारे घने वृक्ष हों। आबादी वाले क्षेत्र खुले हों, हवादार हों, हरियाली से ओतप्रोत हों। कल-कारखानों को आबादी से दूर रखना चाहिए और उनसे निकले प्रदूषित मल को नष्ट करने के उपाय सोचना चाहिए।

नए साल पर हिन्दी निबंध

वैसे तो पूरी दुनिया में नया साल अलग-अलग दिन मनाया जाता है और भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में भी नए साल की शुरुआत अलग-अलग समय होती है। लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत मानी जाती है, क्योंकि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 31 दिसंबर को एक वर्ष का अंत होने के बाद 1 जनवरी से नए कैलेंडर वर्ष की शुरुआत होती है।इसलिए इस दिन को पूरी दुनिया में नया साल शुरू होने के उपलक्ष्य में पर्व की तरह मनाया जाता है।नया साल नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य और की उम्मीद देता है, इसलिए सभी लोग खुशी से इसका स्वागत करते है। ऐसा माना जाता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो पूरा साल इसी उत्साह और खुशियों के साथ बीतेगा।


हालांकि हिन्दू पंचांग के अनुसार नया साल 1 जनवरी से शुरू नहीं होता। हिन्दू नववर्ष का आगाज गुड़ी पड़वा से होता है। लेकिन 1 जनवरी को नया साल मनाना सभी धर्मों में एकता कायम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है, क्योंकि इसे सभी मिलकर मनाते हैं। 31 दिसंबर की रात से ही कई स्थानों पर अलग-अलग समूहों में इकट्ठा होकर लोग नए साल का जश्न मनाना शुरू कर देते हैं और रात 12 बजते ही सभी एक दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते हैं।

नया साल एक नई शुरुआत को दर्शाता है और हमेशा आगे बढ़ने की सीख देता है। पुराने साल में हमने जो भी किया, सीखा, सफल या असफल हुए उससे सीख लेकर, एक नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

जिस प्रकार हम पुराने साल के समाप्त होने पर दुखी नहीं होते बल्‍कि नए साल का स्वागत बड़े उत्साह और खुशी के साथ करते हैं, उसी तरह जीवन में भी बीते हुए समय को लेकर हमें दुखी नहीं होना चाहिए। जो बीत गया उसके बारे में सोचने की अपेक्षा आने वाले अवसरों का स्वागत करें और उनके जरिए जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करें।

नए साल की खुशी में कई स्थानों पर पार्टी आयोजित की जाती है जिसमें नाच-गाना और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ-साथ मजेदार खेलों के जरिए मनोरंजन किया जाता है। कुछ लोग धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कर ईश्वर को याद कर नए साल की शुरुआत करते हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल

वल्लभभाई झावेरभाई पटेल, सरदार पटेल के नाम से लोकप्रिय थे। का को हुआ था। सरदार पटेल एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आजार भारत के पहले गृहमंत्री थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान था, जिसके कारण उन्हें भारत का भी कहा जाता है।31 अक्टूबर 1875 गुजरात के नाडियाद में सरदार पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबा देवी था। सरदार पटेल अपने तीन भाई बहनों में सबसे छोटे और चौथे नंबर पर थे।शिक्षा : सरदार वल्लभ भाई पटेल की शिक्षा का प्रमुख स्त्रोत स्वाध्याय था। उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की और उसके बाद पुन: भारत आकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की।


में भागीदारी : सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। सरदार पटेल द्वारा इस लड़ाई में अपना पहला योगदान खेड़ा संघर्ष में दिया गया, जब खेड़ा क्षेत्र सूखे की चपेट में था और वहां के किसानों ने अंग्रेज सरकार से कर में छूट देने की मांग की। जब अंग्रेज सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया, तो सरदार पटेल, महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्ररित किया। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और किसानों को कर में राहत दे दी गई।

यूं पड़ा नाम सरदार पटेल : सरदार पटेल को सरदार नाम, बारडोली सत्याग्रह के बाद मिला, जब बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें पह ले बारडोली का सरदार कहा गया। बाद में सरदार उनके नाम के साथ ही जुड़ गया।

योगदान : आजादी के बाद ज्यादातर प्रांतीय समितियां सरदार पटेल के पक्ष में थीं। गांधी जी की इच्छा थी, इसलिए सरदार पटेल ने खुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से दूर रखा और जवाहर लाल नेहरू को समर्थन दिया। बाद में उन्हें उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री का पद सौंपा गया, जिसके बाद उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों तो भारत में शामिल करना था। इस कार्य को उन्होंने बगैर किसी बड़े लड़ाई झगड़े के बखूबी किया। परंतु हैदराबाद के ऑपरेशन पोलो के लिए सेना भेजनी पड़ी।चूंकि भारत के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा गया। 15 दिसंबर 1950 को भारत का उनकी मृत्यु हो गई और यह लौह पुरुष दुनिया को अलविदा कह गया।

Geographers and Uses of GIS

By Shashikant Nishant Sharma

Geographers often find it beneficial to understand GIS (Geographic Information System) algorithms, but it’s not always a strict requirement for all geographers. GIS is a powerful tool that allows geographers to analyze and interpret spatial data, and a basic understanding of GIS algorithms can enhance their ability to use GIS effectively. Here are a few reasons why geographers might benefit from understanding GIS algorithms:

  1. Better Use of GIS Software: Understanding the algorithms behind GIS software can help geographers make more informed decisions when choosing and utilizing specific tools. It enables them to select appropriate methods for data analysis and visualization.
  2. Customization and Problem Solving: A deeper understanding of GIS algorithms allows geographers to customize workflows and address specific spatial analysis problems more effectively. This knowledge empowers them to develop solutions tailored to their research or professional needs.
  3. Interpretation of Results: Knowing the algorithms applied in GIS helps geographers interpret the results of spatial analyses more accurately. This understanding allows them to critically evaluate the outcomes and make informed decisions based on a deeper comprehension of the underlying processes.
  4. Integration with Other Technologies: Geographers working at the intersection of GIS and other technologies, such as remote sensing or machine learning, may benefit from understanding the algorithms that drive these technologies. It facilitates integration and synergy between different tools and methods.
  5. Algorithm Development: Some geographers may engage in algorithm development for specific spatial analysis tasks. In such cases, a solid understanding of GIS algorithms is essential for creating effective and efficient solutions.

However, it’s important to note that not all geographers need to delve deeply into GIS algorithms. Many geographers use GIS as a tool for spatial analysis without needing to understand the underlying algorithms at a detailed level. The level of understanding required depends on the specific tasks and goals of the geographer. Some may focus more on the conceptual and applied aspects of GIS, while others, especially those involved in GIS development or research, may need a more in-depth understanding of algorithms.

References

Abler, R. F. (1993). Everything in its place: GPS, GIS, and geography in the 1990s. The Professional Geographer45(2), 131-139.

Goodchild, M. F. (2004). GIScience, geography, form, and process. Annals of the Association of American Geographers94(4), 709-714.

Healy, G., & Walshe, N. (2019). Real-world geographers and GIS. Teaching Geography44(2), 52-55.

Johnston, R. J. (1999). Geography and GIS. Geographical information systems: Principles, techniques, management and applications1, 39-47.

Sharma, S. N. (2019). Review of most used urban growth models. International Journal of Advanced Research in Engineering and Technology (IJARET)10(3), 397-405.

क्रिसमस डे पर हिन्दी में निबंध

भारत त्योहारों का देश है, जहां सभी समुदायों के लोग मिल-जुलकर विभिन्न प्रकार के त्योहार मनाते हैं। दिवाली, होली, राखी की ही तरह भी एक खास पर्व है। यह वैसे तो क्रिश्चियन समुदाय के लोगों का पर्व है लेकिन अन्य धर्मों के लोग भी इसे मनाते हैं। इस दिन स्कूलों में छुट्टी होती है, वहीं घर के अलावा मोहल्ले और शहरों के मॉल में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है और बच्चों के लिए विभिन्न आयोजन किए जाते हैं।क्रिश्चियन समुदाय के लोग हर साल के दिन मनाते हैं। यह ईसाइयों का सबसे बड़ा त्योहार है। इसी दिन प्रभु ईसा मसीह या जीसस क्राइस्ट का जन्म हुआ था इसलिए इसे ‘बड़ा दिन’ भी कहते हैं।

क्रिसमस के 15 दिन पहले से ही मसीह समाज के लोग इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं। लगभग 1 सप्ताह तक छुट्‍टी रहती है और इस दौरान बाजारों की रौनक बढ़ जाती है। घर और बाजार रंगीन रोशनियों से जगमगा उठते हैं।
क्रिसमस के कुछ दिन पहले से ही चर्च में विभिन्न कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं, जो न्यू ईयर तक चलते रहते हैं। मसीह गीतों की अंताक्षरी खेली जाती है, विभिन्न प्रकार के गेम्स खेले जाते हैं, प्रार्थनाएं की जाती हैं आदि। ईसाई समुदाय के लोग इस दिन के लिए अपने घरों की सफाई करते हैं, नए कपड़े खरीदते हैं और विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाते हैंइस दिन के लिए विशेष रूप से चर्चों को सजाया जाता है और प्रभु यीशु मसीह की जन्म गाथा को नाटक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। कई जगह क्रिसमस की पूर्व रात्रि गि‍‍‍‍रिजाघरों में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा की जाती है, जो रात के 12 बजे तक चलती है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाइयां देते हैं और खुशियां मनाते हैं।

क्रिसमस की सुबह गि‍‍‍‍रिजाघरों में विशेष प्रार्थना सभा होती है। कई जगह क्रिसमस के दिन मसीह समाज द्वारा जुलूस निकाला जाता है जिसमें प्रभु यीशु मसीह की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। सिर्फ ईसाई समुदाय ही नहीं, अन्य धर्मों के लोग भी इस दिन चर्च में मोमबत्तियां जलाकर प्रार्थना करते हैं।
क्रिसमस पर बच्चों के लिए सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र होता है सांताक्लॉज, जो लाल और सफेद कपड़ों में बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार और चॉकलेट्स लेकर आता है। यह एक काल्पनिक किरदार होता है जिसके प्रति बच्चों का विशेष लगाव होता है। ऐसा कहा जाता है कि स्वर्ग से आता है और लोगों को मनचाही चीजें उपहार के तौर पर देकर जाता है। यही कारण है कि कुछ लोग सांताक्लॉज की वेशभूषा पहनकर बच्चों को भी खुश कर देते हैं।
इस दिन आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है और इसकी विशेष साज-सज्जा की जाती है और इसी के माध्यम से सभी एक-दूसरे को उपहार भी देते हैं। इस त्योहार में केक का विशेष महत्व है। केक क्रिसमस का विशेष व्यंजन है। इसके बिना क्रिसमस अधूरा होता है। मीठे व मनमोहक केक काटकर खिलाने का रिवाज बहुत पुराना है।

इस दिन चर्च और अपने घरों में क्रिसमस ट्री को सजाने और केक बनाने का बेहद महत्व है। घर पर आने वाले मेहमानों एवं मिलने-जुलने वाले लोगों को केक खिलाकर मुंह मीठा किया जाता है और क्रिसमस की बधाई दी जाती

बड़ा दिन (क्रिसमस) पर पढ़ें हिन्दी में निबंध

bada din essay: हर साल के दिन क्रिश्चियन समुदाय के लोग का त्योहार मनाते हैं। क्रिसमस का त्योहार ईसा मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। क्रिसमस क्रिश्चियन समुदाय का सबसे बड़ा और खुशी का त्योहार है, इस कारण इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है।
* क्रिसमस के 15 दिन पहले से ही मसीह समाज के लोग इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं।

* घरों की सफाई की जाती है, नए कपड़े खरीदे जाते हैं, विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।* क्रिसमस के कुछ दिन पहले से ही चर्च में विभिन्न कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं जो न्यू ईयर तक चलते रहते हैं।

* इन कार्यक्रमों में प्रभु यीशु मसीह की जन्म गाथा को नाटक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। मसीह गीतों की अंताक्षरी खेली जाती है, विभिन्न प्रकार के गेम्स खेले जाते है, प्रार्थनाएं की जाती हैं आदि।
* कई जगह क्रिसमस के दिन मसीह समाज द्वारा जुलूस निकाला जाता है। जिसमें प्रभु यीशु मसीह की झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं।

* कई जगह क्रिसमस की पूर्व रात्रि, गि‍‍‍‍रिजाघरों में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा की जाती है जो रात के 12 बजे तक चलती है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाइयां देते हैं और खुशियां मनाते हैं।* इस दिन अन्य धर्मों के लोग भी चर्च में मोमबत्तियां जलाकर प्रार्थना करते हैं।

* क्रिसमस की सुबह गि‍‍‍‍रिजाघरों में विशेष प्रार्थना सभा होती है।

* क्रिसमस का विशेष व्यंजन केक है, केक बिना क्रिसमस अधूरा होता है।

* इस दिन लोग चर्च और अपने घरों में क्रिसमस ट्री सजाते हैं।

बच्चों को चॉकलेट्स और गिफ्ट्स देते हैं।
ईसाईयों में बहुत ज्यादा त्योहार होते भी नहीं है, उनके लिए यही सबसे बड़ा दिन होता है, इसलिए भी क्रिसमस को बड़ा दिन कहा जाने लगा।

अटल बिहारी वाजपेयी पर हिन्दी निबंध

प्रस्तावना : पूर्व प्रधानमंत्री और ‘भारतरत्न’ अटल बिहारी वाजपेयी देश के एकमात्र ऐसे राजनेता थे, जो 4 राज्यों के 6 लोकसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके थे। उत्तरप्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधीनगर, मध्यप्रदेश के ग्वालियर और विदिशा और दिल्ली की नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी इकलौते नेता हैं।जन्म व शिक्षा : अटल बिहारी वाजपेयी का जन्‍म 25 दिसंबर 1924 को हुआ, इस दिन को भारत में ‘बड़ा दिन’ कहा जाता है। उनके पिता पंडित कृष्णबिहारी वाजपेयी अध्यापन का कार्य करते थे और माता कृष्णादेवी घरेलू महिला थीं।अटलजी अपने माता-पिता की 7वीं संतान थे। उनसे बड़े 3 भाई और 3 बहनें थीं। अटलजी के बड़े भाइयों को अवधबिहारी वाजपेयी, सदाबिहारी वाजपेयी तथा प्रेमबिहारी वाजपेयी के नाम से जाना जाता है।

अटलजी बचपन से ही अंतर्मुखी और प्रतिभा संपन्न थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिक्षा मंदिर, गोरखी, बाड़ा, विद्यालय में हुई। यहां से उन्होंने 8वीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। जब वे 5वीं कक्षा में थे, तब उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था। उन्हें विक्टोरिया कॉलेज में दाखिल कराया गया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की।

कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था। आरंभ में वे छात्र संगठन से जुड़े। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख कार्यकर्ता नारायण राव तरटे ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में कार्य किया।राजनीतिक जीवन : वाजपेयी 1942 में राजनीति में उस समय आए, जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके भाई 23 दिनों के लिए जेल गए। 1951 में आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ पार्टी का गठन हुआ तो श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं के साथ अटलबिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका रही।

वर्ष 1952 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, पर सफलता नहीं मिली। वे उत्तरप्रदेश की एक लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उतरे थे, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार सफलता 1957 में मिली थी। 1957 में जनसंघ ने उन्हें 3 लोकसभा सीटों- लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। लखनऊ में वे चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई, लेकिन बलरामपुर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर वे लोकसभा में पहुंचे।

वाजपेयी के असाधारण व्‍यक्तित्‍व को देखकर उस समय के वर्तमान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा। वाजपेयी तीसरे लोकसभा चुनाव 1962 में लखनऊ सीट से उतरे, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी। इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य चुने गए। बाद में 1967 में फिर लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। इसके बाद 1967 में ही उपचुनाव हुआ, जहां से वे जीतकर सांसद बने।

इसके बाद 1968 में वाजपेयी जनसंघ के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष बने। उस समय पार्टी के साथ नानाजी देशमुख, बलराज मधोक तथा लालकृष्‍ण आडवाणी जैसे नेता थे। 1971 में 5वें लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी मध्यप्रदेश के ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव में उतरे और जीतकर संसद पहुंचे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में 1977 और फिर 1980 के मध्यावधि चुनाव में उन्होंने नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

1984 में अटलजी ने मध्यप्रदेश के ग्वालियर से लोकसभा चुनाव का पर्चा दाखिल कर दिया और उनके खिलाफ अचानक कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को खड़ा कर दिया जबकि माधवराव गुना संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते थे। सिंधिया से वाजपेयी पौने 2 लाख वोटों से हार गए।

वाजपेयीजी ने एक बार जिक्र भी किया था कि उन्होंने स्वयं संसद के गलियारे में माधवराव से पूछा था कि वे ग्वालियर से तो चुनाव नहीं लड़ेंगे? माधवराव ने उस समय मना कर दिया था, लेकिन कांग्रेस की रणनीति के तहत अचानक उनका पर्चा दाखिल करा दिया गया। इस तरह वाजपेयी के पास मौका ही नहीं बचा कि वे दूसरी जगह से नामांकन दाखिल कर पाते। ऐसे में उन्हें सिंधिया से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वाजपेयी 1991 के आम चुनाव में लखनऊ और मध्यप्रदेश की विदिशा सीट से चुनाव लड़े और दोनों ही जगहों से जीते। बाद में उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी।1996 में हवाला कांड में अपना नाम आने के कारण लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर से चुनाव नहीं लड़े। इस स्थिति में अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ सीट के साथ-साथ गांधीनगर से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगहों से जीत हासिल की। इसके बाद वाजपेयी ने लखनऊ अपनी कर्मभूमि बना ली। वे 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव लखनऊ सीट से जीतकर सांसद बने।

आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी और वे मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार में विदेश मामलों के मंत्री बने। विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले ऐसे नेता थे जिन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासंघ को हिन्‍दी भाषा में संबोधित किया। इसके बाद जनता पार्टी अंतरकलह के कारण बिखर गई और 1980 में वाजपेयी के साथ पुराने दोस्‍त भी जनता पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए।

वाजपेयी भाजपा के पहले राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बने और वे कांग्रेस सरकार के सबसे बड़े आलोचकों में शुमार किए जाने लगे। 1994 में कर्नाटक तथा 1995 में गुजरात और महाराष्‍ट्र में पार्टी जब चुनाव जीत गई, तो उसके बाद पार्टी के तत्कालीन अध्‍यक्ष लालकृष्‍ण आडवाणी ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया था।

वाजपेयीजी 1996 से लेकर 2004 तक 3 बार प्रधानमंत्री बने। 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने, हालांकि उनकी सरकार 13 दिनों में संसद में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं करने के चलते गिर गई।

1998 के दोबारा लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्‍यादा सीटें मिलीं और कुछ अन्‍य पार्टियों के सहयोग से वाजपेयीजी ने एनडीए का गठन किया और वे फिर प्रधानमंत्री बने। यह सरकार 13 महीनों तक चली, लेकिन बीच में ही जयललिता की पार्टी ने सरकार का साथ छोड़ दिया जिसके चलते सरकार गिर गई। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से सत्‍ता में आई और वे इस पद पर 2004 तक बने रहे। इस बार वाजपेयीजी ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लंबे समय से बीमार रहने के कारण अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में भर्ती रहे, जहां उनका लंबा इलाज चला और 16 अगस्त 2018 को 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

हिन्दी निबंध: युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद

वर्तमान में भारत के युवा जि‍स महापुरुष के विचारों को आदर्श मानकर उससे प्रेरित होते हैं, युवाओं के वे मार्गदर्शक और भारतीय गौरव हैं स्वामी विवेकानंद।भारत की गरिमा को वैश्विक स्तर पर सम्मान के साथ बरकरार रखने के लिए के कई उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। 
 
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।
 
सन्‌ 1884 में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।
 
रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।
 
स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।
 
गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।
 
25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।
 
सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।
 
फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।
 
‘अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा’ यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।
 
4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

मकर संक्रांति पर हिन्दी में निबंध, पढ़ें रोचक जानकारी

प्रस्तावना : मकर संक्रांति हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। यह त्योहार, सूर्य के उत्तरायन होने पर मनाया जाता है। इस पर्व की विशेष बात यह है कि यह अन्य त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं, बल्कि हर साल 14 जनवरी को ही मनाया जाता है, जब सूर्य उत्तरायन होकर मकर रेखा से गुजरता है।कब मनाया जाता है यह त्योहार : मकर संक्रांति का संबंध सीधा पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से है। जब भी सूर्य मकर रेखा पर आता है, वह दिन 14 जनवरी ही होता है, अत: इस दिन मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है।



कभी-कभी यह एक दिन पहले या बाद में यानी 13 या 15 जनवरी को भी मनाया जाता है लेकिन ऐसा कम ही होता है।

कैसे मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्योहार : इस दिन सुबह जल्दी उठकर तिल का उबटन कर स्नान किया जाता है। इसके अलावा तिल और गुड़ के लड्डू एवं अन्य व्यंजन भी बनाए जाते हैं। इस समय सुहागन महिलाएं सुहाग की सामग्री का आदान प्रदान भी करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे उनके पति की आयु लंबी होती है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है और तमिलनाडु में इसे पर्व के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व मनाया जाता है, वहीं असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है।

मकर संक्रांति की खासियत : हर प्रांत में इसका नाम और मनाने का तरीका अलग-अलग होता है। अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के पकवान भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन दाल और चावल की खिचड़ी इस पर्व की प्रमुख पहचान बन चुकी है। विशेष रूप से गुड़ और घी के साथ खिचड़ी खाने का महत्व है। इसके अलावा तिल और गुड़ का भी मकर संक्राति पर बेहद महत्व है।धर्म-ज्योतिष की नजर से मकर संक्रांति : ज्योतिष की दृष्ट‍ि से देखें तो इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य के उत्तरायण की गति प्रारंभ होती है। सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत-पर्व के रूप में मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। वर्षभर में बारह राशियों मेष, वृषभ, मकर, कुंभ, धनु इत्यादि में सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं और जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति होती है।

दान का महत्व : सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। मकर संक्रांति को स्नान और दान का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन तीर्थों एवं पवित्र नदियों में स्नान का बेहद महत्व है साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल एवं राशि अनुसार दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं।

महाभारत के अनुसार : महाभारत में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही माघ शुक्ल अष्टमी के दिन स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।

उपसंहार : इन सभी मान्यताओं के अलावा मकर संक्रांति पर्व एक उत्साह और भी जुड़ा है। इस दिन पतंग उड़ाने का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन कई स्थानों पर पतंगबाजी के बड़े-बड़े आयोजन भी किए जाते हैं। लोग बेहद आनंद और उल्लास के साथ पतंगबाजी करते हैं।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस पर हिन्दी में निबंध

विश्व इतिहास में 23 जनवरी 1897 का दिन स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक का जन्म हुआ था। सुभाषचंद्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावती देवी के यहां हुआ था।उनके पिता ने अंगरेजों के दमन चक्र के विरोध में ‘रायबहादुर’ की उपाधि लौटा दी। इससे सुभाष के मन में अंगरेजों के प्रति कटुता ने घर कर लिया। अब सुभाष अंगरेजों को भारत से खदेड़ने व भारत को स्वतंत्र कराने का आत्मसंकल्प ले, चल पड़े राष्ट्रकर्म की राह पर।


आईसीएस की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद सुभाष ने आईसीएस से इस्तीफा दिया। इस बात पर उनके पिता ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- ‘जब तुमने देशसेवा का व्रत ले ही लिया है, तो कभी इस पथ से विचलित मत होना।’दिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने कहा था – मेरी यह कामना है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में ही हमें स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना है। हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद से है। धीरे-धीरे कांग्रेस से सुभाष का मोह भंग होने लगा।16 मार्च 1939 को सुभाष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुभाष ने आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में ‘भारतीय स्वाधीनता सम्मेलन’ के साथ हुई।

5 जुलाई 1943 को ‘आजाद हिन्द फौज’ का विधिवत गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में शहीद यतीन्द्र दास के स्मृति दिवस पर नेताजी ने अत्यंत मार्मिक भाषण देते हुए कहा- ‘अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी बलिदान मांगती है। आप मुझे खून दो, मैं आपको आजादी दूंगा।’ यही देश के नौजवानों में प्राण फूंकने वाला वाक्य था, जो भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाला, भारत मां का दुलारा सदा के लिए, राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमर हो गया।

26 जनवरी हिन्दी निबंध : ‘गणतंत्र दिवस’ भारत का राष्ट्रीय पर्व

प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाने वाला गणतंत्र दिवस, भारत का राष्ट्रीय पर्व है, जिसे प्रत्येक भारतवासी पूरे उत्साह, जोश और सम्मान के साथ मनाता है। राष्ट्रीय पर्व होने के नाते इसे हर धर्म, संप्रदाय और जाति के लोग मनाते हैं।26 जनवरी सन 1950 को हमारे देश को पूर्ण स्वायत्त गणराज्य घोषित किया गया था और इसी दिन हमारा संविधान लागू हुआ था। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को भारत का गणतंत्र दिवस मनाया जाता है और चूंकि यह दिन किसी विशेष धर्म, जाति या संप्रदाय से न जुड़कर राष्ट्रीयता से जुड़ा है, इसलिए देश का हर बाशिंदा इसे राष्ट्रीय पर्व के तौर पर मनाता है।


खास तौर से सरकारी संस्थानों एवं शिक्षण संस्थानों में इस दिन ध्वजारोहण, झंडा वंदन करने के पश्चात राष्ट्रगान जन-गन-मन का गायन होता है और देशभक्ति से जुड़े विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।

देशाक्ति गीत, भाषण, चित्रकला एवं अन्य प्रतियोगिताओं के साथ ही देश के वीर सपूतों को याद भी किया जाता है और वंदे मातरम, जय हिन्दी, भारत माता की जय के उद्घोष के साथ पूरा वातावरण देशभक्ति से ओतप्रोत हो जाता है।

भारत की राजधानी दिल्ली में गणंतंत्र दिवस पर विशेष आयोजन होते हैं। देश के प्रधानमंत्री द्वारा इंडिया गेट पर शहीद ज्योति का अभिनंदन करने के साथ ही उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं।इस दिन विशेष रूप से दिल्ली के विजय चौक से लाल किले तक होने वाली परेड आकर्षण का प्रमुख केंद्र होती है, जिसमें देश और विदेश के गणमान्य जनों को आमंत्रित किया जाता है। इस परेड में तीनों सेना के प्रमुख राष्ट्रीपति को सलामी दी जाती है एवं सेना द्वारा प्रयोग किए जाने वाले हथियार, प्रक्षेपास्त्र एवं शक्तिशाली टैंकों का प्रदर्शन किया जाता है एवं परेड के माध्यम से सैनिकों की शक्ति और पराक्रम को बताया जाता है।

गांव से लेकर शहरों तक, राष्ट्रभक्ति के गीतों की गूंज सुनाई देती है और प्रत्येक भारतवासी एक बार फिर अथाह देशभक्ति से भर उठता है। बच्चों में इस दिन को लेकर बेहद उत्साह होता है। इस दिन आयोजित कार्यक्रमों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थ‍ियों का सम्मान एवं पुरस्कार वितरण भी किया जाता है और मिठाई वितरण भी विशेष रूप से होता है।

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

प्रस्तावना : प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है, जो उस देश के स्वतंत्र देश होने का संकेत है। का तिरंगा है, जो तीन रंगों – केसरिया, सफेद और हरे रंग से बना है और इसके केंद्र में नीले रंग से बना अशोक चक्र है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था।यह 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘तिरंगे’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है।भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।


तिरंगे का विकास : यह जानना अत्यंत रोचक है कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्वतंत्रता के राष्ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्यता दी गई। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों से गुजरा। हमारे राष्ट्रीय ध्वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं :-

प्रथम राष्ट्रीय ध्वज 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

तृतीय ध्वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड़ लिया। डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है।
गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्वि करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था।

22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्त भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना।

राष्ट्रीय ध्वज के रंग : भारत के राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।

अशोक चक्र : इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है।

उपसंहार : भारतीय राष्ट्रीय ध्वज भारत के नागरिकों की आशाएं और आकांक्षाएं दर्शाता है। यह हमारे राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। पिछले पांच दशकों से अधिक समय से सशस्त्र सेना बलों के सदस्यों सहित अनेक नागरिकों ने तिरंगे की शान को बनाए रखने के लिए निरंतर अपने जीवन न्यौछावर किए हैं।

महात्मा गांधी पर हिन्दी में निबंध

महात्मा गांधी का को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। मोहनदास की माता का नाम पुतलीबाई था जो करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थीं। मोहनदास अपने पिता की चौथी पत्नी की अंतिम संतान थे। महात्मा गांधी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेता और ‘राष्ट्रपिता’ माना जाता है।

गांधी जी का परिवार- गांधी की मां पुतलीबाई अत्यधिक धार्मिक थीं। उनकी दिनचर्या घर और मंदिर में बंटी हुई थी। वह नियमित रूप से उपवास रखती थीं और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा सुश्रुषा में दिन-रात एक कर देती थीं। मोहनदास का लालन-पालन वैष्णव मत में रमे परिवार में हुआ और उन पर कठिन नीतियों वाले जैन धर्म का गहरा प्रभाव पड़ा। जिसके मुख्य सिद्धांत, अहिंसा एवं विश्व की सभी वस्तुओं को शाश्वत मानना है। इस प्रकार, उन्होंने स्वाभाविक रूप से अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए उपवास और विभिन्न पंथों को मानने वालों के बीच परस्पर सहिष्णुता को अपनाया।
विद्यार्थी के रूप में गांधी जी – मोहनदास एक औसत विद्यार्थी थे, हालांकि उन्होंने यदा-कदा पुरस्कार और छात्रवृत्तियां भी जीतीं। वह पढ़ाई व खेल, दोनों में ही तेज नहीं थे। बीमार पिता की सेवा करना, घरेलू कामों में मां का हाथ बंटाना और समय मिलने पर दूर तक अकेले सैर पर निकलना, उन्हें पसंद था। उन्हीं के शब्दों में – ‘बड़ों की आज्ञा का पालन करना सीखा, उनमें मीनमेख निकालना नहीं।’

उनकी किशोरावस्था उनकी आयु-वर्ग के अधिकांश बच्चों से अधिक हलचल भरी नहीं थी। हर ऐसी नादानी के बाद वह स्वयं वादा करते ‘फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा’ और अपने वादे पर अटल रहते। उन्होंने सच्चाई और बलिदान के प्रतीक प्रह्लाद और हरिश्चंद्र जैसे पौराणिक हिन्दू नायकों को सजीव आदर्श के रूप में अपनाया। गांधी जी जब केवल तेरह वर्ष के थे और स्कूल में पढ़ते थे उसी वक्त पोरबंदर के एक व्यापारी की पुत्री कस्तूरबा से उनका विवाह कर दिया गया।युवा गांधी जी – 1887 में मोहनदास ने जैसे-तैसे ‘मुंबई यूनिवर्सिटी’ की मैट्रिक की परीक्षा पास की और भावनगर स्थित ‘सामलदास कॉलेज’ में दाखिल लिया। अचानक गुजराती से अंग्रेजी भाषा में जाने से उन्हें व्याख्यानों को समझने में कुछ दिक्कत होने लगी। इस बीच उनके परिवार में उनके भविष्य को लेकर चर्चा चल रही थी। अगर निर्णय उन पर छोड़ा जाता, तो वह डॉक्टर बनना चाहते थे। लेकिन वैष्णव परिवार में चीर-फाड़ की इजाजत नहीं थी। साथ ही यह भी स्पष्ट था कि यदि उन्हें गुजरात के किसी राजघराने में उच्च पद प्राप्त करने की पारिवारिक परंपरा निभानी है तो उन्हें बैरिस्टर बनना पड़ेगा और ऐसे में गांधीजी को इंग्लैंड जाना पड़ा।

यूं भी गांधी जी का मन उनके ‘सामलदास कॉलेज’ में कुछ खास नहीं लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को सहज ही स्वीकार कर लिया। उनके युवा मन में इंग्लैंड की छवि ‘दार्शनिकों और कवियों की भूमि, संपूर्ण सभ्यता के केन्द्र’ के रूप में थी। सितंबर 1888 में वह लंदन पहुंच गए। वहां पहुंचने के 10 दिन बाद वह लंदन के चार कानून महाविद्यालय में से एक ‘इनर टेंपल’ में दाखिल हो गए।

1906 में टांसवाल सरकार ने दक्षिण अफीका की भारतीय जनता के पंजीकरण के लिए विशेष रूप से अपमानजनक अध्यादेश जारी किया। भारतीयों ने सितंबर 1906 में जोहेन्सबर्ग में गांधी के नेतृत्व में एक विरोध जनसभा का आयोजन किया और इस अध्यादेश के उल्लंघन तथा इसके परिणामस्वरूप दंड भुगतने की शपथ ली। इस प्रकार सत्याग्रह का जन्म हुआ, जो वेदना पहुंचाने के बजाए उन्हें झेलने, विद्वेषहीन प्रतिरोध करने और बिना हिंसा किए उससे लड़ने की नई तकनीक थी।

इसके बाद दक्षिण अफीका में सात वर्ष से अधिक समय तक संघर्ष चला। इसमें उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन गांधी के नेतृत्व में भारतीय अल्पसंख्यकों के छोटे से समुदाय ने अपने शक्तिशाली प्रतिपक्षियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। सैकड़ों भारतीयों ने अपने स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाले इस कानून के सामने झुकने के बजाय अपनी आजीविका तथा स्वतंत्रता की बलि चढ़ाना ज्यादा पसंद किया।

गांधी जब भारत लौट आए- सन् 1914 में गांधी जी भारत लौट आए। देशवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें महात्मा पुकारना शुरू कर दिया। उन्होंने अगले चार वर्ष भारतीय स्थिति का अध्ययन करने तथा उन लोगों को तैयार करने में बिताए जो सत्याग्रह के द्वारा भारत में प्रचलित सामाजिक व राजनीतिक बुराइयों को हटाने में उनका साथ दे सकें।फरवरी 1919 में अंग्रेजों के बनाए रॉलेट एक्ट कानून पर, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए जेल भेजने का प्रावधान था, उन्होंने अंग्रेजों का विरोध किया। फिर गांधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा कर दी। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा राजनीतिक भूचाल आया, जिसने 1919 के बसंत में समूचे उपमहाद्वीप को झकझोर दिया।

इस सफलता से प्रेरणा लेकर महात्‍मा गांधी ने भारतीय स्‍वतंत्रता के लिए किए जाने वाले अन्‍य अभियानों में सत्‍याग्रह और अहिंसा के विरोध जारी रखे, जैसे कि ‘असहयोग आंदोलन’, ‘नागरिक अवज्ञा आंदोलन’, ‘दांडी यात्रा’ तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’। गांधी जी के इन सारे प्रयासों से भारत को 15 अगस्‍त 1947 को स्‍वतंत्रता मिल गई।

उपसंहार – मोहनदास करमचंद गांधी भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनीतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। राजनीतिक और सामाजिक प्रगति की प्राप्ति हेतु अपने अहिंसक विरोध के सिद्धांत के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।

महात्मा गांधी के पूर्व भी शांति और अहिंसा की के बारे में लोग जानते थे, परंतु उन्होंने जिस प्रकार सत्याग्रह, शांति व अहिंसा के रास्तों पर चलते हुए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। तभी तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2007 से गांधी जयंती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की है।

गांधी जी के बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि- ‘हजार साल बाद आने वाली नस्लें इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी धरती पर कभी आया था।

वेलेंटाइन डे यानी प्रेम दिवस पर हिन्दी में निबंध

प्रत्येक वर्ष 14 फरवरी के दिन वेलेंटाइन डे मनाया जाता है। वेलेंटाइन डे को प्रेम दिवस के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन प्रेमी युगलों के लिए एक उत्सव की तरह होता है, जब खास तौर से अपने प्रिय को प्रेम अभिव्यक्त किया जाता है।वेलेंटइन डे इतिहास : वेलेंटइन डे की शुरुआत अमेरिका में की याद में हुई थी। सर्वप्रथन यह दिन अमेरिेका में ही मनाया गया, फिर इंग्लैंड में इसे मनाने की शुरुआत हुई। इसके बाद यह पूरे विश्व में धीरे-धीरे मनाया जाने लगा।कुछ देशों में इसे अलग-अलग नामों के साथ भी मनाया जाता है। चीन में इसे ‘नाइट्स ऑफ सेवेन्स’ वहीं जापान व कोरिया में ‘वाइट डे’ के नाम से जाना जाता है और पूरा फरवरी माह प्रेम का महीना माना जाता है। भारत में वेलेंटाइन डे मनाने की शुरुआत सन 1992 के लगभग हुई थी, जिसके बाद इसका चलन यहां भी शुरू हो गया।


सेंट वेलेंटाइन कौन थे : वेलेंटाइन-डे मूल रूप से सेंट वेलेंटाइन की याद में मनाया जाता है। हालांकि सेंट वेलेंटाइन के बारे में ऐतिहासिक तौर पर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं। 1969 में कैथोलिक चर्च ने कुल ग्यारह सेंट वेलेंटाइन के होने की पुष्टि की और 14 फरवरी को उनके सम्मान में पर्व मनाने की घोषणा की। इनमें सबसे महत्वपूर्ण वेलेंटाइन रोम के सेंट वेलेंटाइन माने जाते हैं।

वहीं 1260 में संकलित की गई ‘ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन’ नामक पुस्तक में भी सेंट वेलेंटाइन का जिक्र किया गया है जिसके इसके अनुसार रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था। उसके अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती। इसी के चलते उसने आदेश जारी किया कि उसका कोई भी सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। लेकिन संत वेलेंटाइन ने इस आदेश का न केवल वि‍रोध किया बल्कि शादी भी की।

यह विरोध एक आंधी की तरह फैला और सम्राट क्लॉडियस के अन्य सैनिकों और अधिकारियों ने भी विवाह किए। इस बात से गुस्साए क्लॉडियस ने 14 फरवरी सन् 269 को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया।

रंग-रंगीले त्योहार ‘होली’ पर हिन्दी में निबंध

भारत का रंग-रंगीला होली, प्यारभरे रंगों से सजा यह पर्व हर धर्म, संप्रदाय व जाति के बंधन खोलकर भाईचारे का संदेश देता है। इस दिन सारे लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भूलकर गले लगते हैं और एक-दूजे को गुलाल लगाते हैं।होली एक ऐसा रंग-बिरंगा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग पूरे उत्साह और मस्ती के साथ मनाते हैं। बच्चे और युवा रंगों से खेलते हैं। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है। होली के साथ अनेक कथाएं जुड़ी हैं। होली मनाने के एक रात पहले होली को जलाया जाता है।


इसके पीछे एक लोकप्रिय पौराणिक कथा है। भक्त प्रह्लाद के पिता हरिण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे। वे विष्णु के विरोधी थे जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त थे। उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति करने से रोका। जब वे नहीं माने तो उन्होंने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। प्रह्लाद के पिता ने अपनी बहन होलिका से मदद मांगी।
होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठी परंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई।

यह कथा इस बात का संकेत करती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते हैं और अगले दिन सब लोग एक-दूसरे पर गुलाल, अबीर और तरह-तरह के रंग डालते हैं। यह त्योहार रंगों का त्योहार है।इस दिन लोग प्रात:काल उठकर रंगों को लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाते हैं और उनके साथ जमकर होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता है। वे एक दिन पहले से ही बाजार से अपने लिए तरह-तरह की पिचकारियां व गुब्बारे लाते हैं। बच्चे गुब्बारों व पिचकारी से अपने मित्रों के साथ होली का आनंद उठाते हैं।

होली के दिन सभी लोग बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे से परस्पर गले मिलते हैं। घरों में औरतें एक दिन पहले से ही मिठाई, गुझिया आदि बनाती हैं व अपने पास-पड़ोस में आपस में बांटती हैं। कई लोग होली की टोली बनाकर निकलते हैं और उन्हें हुर्रियारे कहा जाता है। ब्रज की होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाने की होली, काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है।
आजकल अच्छी क्वालिटी के रंगों का प्रयोग नहीं होता और त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले रंग खेले जाते हैं। यह सरासर गलत है। इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहना चाहिए। बच्चों को भी सावधानी रखनी चाहिए। बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही होली खेलना चाहिए। दूर से गुब्बारे फेंकने से आंखों में घाव भी हो सकता है। रंगों को भी आंखों और अन्य अंदरुनी अंगों में जाने से रोकना चाहिए।

यह मस्तीभरा पर्व मिल-जुलकर मनाना चाहिए तभी हम सभी इस त्योहार का असली आनंद उठा पाएंगे। इस पर्व के संबंध में ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी दुश्मनी, कटुता को भूला कर एक-दूसरे के गले मिलते हैं और मिठाइयों के साथ उत्साहपूर्वक इस त्योहार को मनाते हैं। होली से रंगपंचमी तक इस त्योहार का आनंद और उत्साह सभी जगह देखने को मिलता है।

छत्रपति शिवाजी महाराज पर हिन्दी में निबंध

परिचय : एक बहादुर, बुद्धिमानी, शौर्यवीर और दयालु शासक थे। उनका जन्म 19 फरवरी 1627 को मराठा परिवार में महाराष्ट्र के शिवनेरी में हुआ। शिवाजी के पिता शाहजी और माता जीजाबाई थीं। माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण-स्वभाव और व्यवहार में वीरंगना नारी थीं।इसी कारण उन्होंने बालक शिवा का पालन-पोषण रामायण, महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरात्माओं की उज्ज्वल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। बचपन में शिवाजी अपनी आयु के बालक इकट्ठे कर उनके नेता बनकर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे।

दादा कोणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था। धर्म, संस्कृति और राजनीति की भी उचित शिक्षा दिलवाई थी। उस युग में परम संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए।

परिवार एवं गुरु : छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निंबालकर के साथ हुआ था। उनके पुत्र का नाम संभाजी था। संभाजी शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी थे जिसने 1680 से 1689 ई. तक राज्य किया। संभाजी में अपने पिता की कर्मठता और दृढ़ संकल्प का अभाव था। संभाजी की पत्नी का नाम येसुबाई था। उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजाराम थे। शिवाजी के समर्थ गुरु रामदास का नाम भारत के साधु-संतों व विद्वत समाज में सुविख्यात है।

शिवाजी का पराक्रम : युवावस्था में आते ही उनका खेल वास्तविक कर्म शत्रु बनकर शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले आदि भी जीतने लगे। जैसे ही शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अपना अधिकार जमाया, वैसे ही उनके नाम और कर्म की सारे दक्षिण में धूम मच गई, यह खबर आग की तरह आगरा और दिल्ली तक जा पहुंची। अत्याचारी किस्म के यवन और उनके सहायक सभी शासक उनका नाम सुनकर ही मारे डर के बगलें झांकने लगे।

शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर के शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी न बना सके तो उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार किया। पता चलने पर शिवाजी आग बबूला हो गए। उन्होंने नीति और साहस का सहारा लेकर छापामारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद कराया। तब बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मुर्दा पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खां को भेजा। उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारना चाहा, पर समझदार शिवाजी के हाथ में छिपे बघनख का शिकार होकर वह स्वयं मारा गया। इससे उसकी सेनाएं अपने सेनापति को मरा पाकर वहां से दुम दबाकर भाग गईं।छत्रपति शिवाजी महाराज एक भारतीय शासक थे जिन्होंने मराठा साम्राज्य खड़ा किया था इसीलिए उन्हें एक अग्रगण्य वीर एवं अमर स्वतंत्रता-सेनानी स्वीकार किया जाता है। वीर शिवाजी राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक एवं परिचायक थे। इसी कारण निकट अतीत के राष्ट्रपुरुषों में महाराणा प्रताप के साथ-साथ इनकी भी गणना की जाती है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती महाराष्ट्र में वैसे तो 19 फरवरी को मनाई जाती है लेकिन कई संगठन शिवाजी का जन्मदिवस‍ हिन्दू कैलेंडर में आने वाली तिथि के अनुसार मनाते हैं। उनकी इस वीरता के कारण ही उन्हें एक आदर्श एवं महान राष्ट्रपुरुष के रूप में स्वीकारा जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज का 3 अप्रैल 1680 ई. में तीन सप्ताह की बीमारी के बाद रायगढ़ में स्वर्गवास हो गया।

उपसंहार : यूं तो शिवाजी पर मुस्लिम विरोधी होने का दोषारोपण किया जाता है, पर यह सत्य इसलिए नहीं कि क्योंकि उनकी सेना में तो अनेक मुस्लिम नायक एवं सेनानी थे तथा अनेक मुस्लिम सरदार और सूबेदारों जैसे लोग भी थे। वास्तव में शिवाजी का सारा संघर्ष उस कट्टरता और उद्दंडता के विरुद्ध था, जिसे औरंगजेब जैसे शासकों और उसकी छत्रछाया में पलने वाले लोगों ने अपना रखा था।

Universal Skills for Learners: Increasing School Relevancy

Kids are learning – but for way too many it occurs outside of the school environment rather than during school. Given today’s technologies, it makes sense and is exciting that learning occurs after schools hours, but for exciting, engaging, and profound learning not to occur during school hours is, simply put, a travesty.

I contend that school, especially in the latter part of the 20th century, had a high degree of irrelevancy but in today’s highly connected world, it is absurd, verging, in my perspective, as unethical practices. We are asking today’s students to spend so much of their school lives doing tasks that are unconnected to the the skills that need now and in their future lives.

. . . and the kids agree as studies have indicated.

Gallup has conducted more than 5 million surveys with students in grades five through 12 over the past several years. These students have come from every state and from a range of rural, suburban and urban school settings. Almost half of students who responded to the survey are engaged with school (47%), with approximately one-fourth “not engaged” (29%) and the remainder “actively disengaged” (24%). A closer look at the data by grade level reveals a disturbing trend. Engagement is strong at the end of elementary school, with nearly three-quarters of fifth-graders (74%) reporting high levels of engagement. But similar surveys have shown a gradual and steady decline in engagement from fifth grade through about 10th grade, with approximately half of students in middle school reporting high levels of engagement and about one-third of high school students reporting the same (School Engagement Is More Than Just Talk).

Just 54 percent of middle schoolers and 46 percent of high schoolers think their studies are relevant, according to new data from the nonprofit YouthTruth. Relevance was rated lowest on the survey of various measures of student engagement: if students take pride in their work, if they enjoy going to school, if their schoolwork is relevant, if they try to do their best, and if their teachers’ expectations help them with that goal (Only Half of Students Think What They’re Learning in School Is Relevant to the Real World, Survey Says).

Over five years ago, I wrote a post entitled Universal Skills All Learners Should Know How to Do in order to discuss those skills I believe are important for learners during this era. For this post, I revisited it. I revised it to now include financial literacy and civics.

  • How to be a self-directed learner – finding and using resources (both face-to-face and online) to learn and improve personal interests
  • How to do effective online searches
  • How to develop one’s own Personal Learning Network (PLN)
  • How to post on social media while managing one’s digital footprint
  • How to evaluate websites and online tools for credibility
  • How to orally communicate with others both face-to-face and online (e.g., Facetime, Skype, Google Handouts)
  • How to write effectively
  • How to ask questions
  • How to effectively ask for what one wants or needs
  • How to set and achieve goals
  • How to work collaboratively with others
  • How to manage one’s own time
  • How to be healthy – physically and emotionally
  • How to care for others
  • How to Enjoy and Engage in the Arts
  • How to identify and solve problems
  • How to make sound financial decisions
  • How to understand and engage in civics
  • How to take professional looking photos; make professional looking videos
  • How to learn and use emerging technologies
  • How to make and invent stuff
  • How to code

I think most administrators and educators (and learners) would agree with the importance of most of the skills on this list to assist learners to be successful now and in their futures. Sadly, though, too few of these skills are directly and intentionally taught to learners: writing, speaking, and for more progressive schools, engaging in the arts and the computer science related skills. Is the current school system model really the best we can do?

यदि मैं सीमान्त सिपाही होता

प्रस्तावना : भारत विशाल देश है। इसलिए इसका सीमांत भी अधिक विस्तृत है। इसके सीमांत के छोरों में बड़े-बड़े पहाड़, जंगल, मरुस्थल, नगर और सागर आदि हैं। चीन, पाकिस्ताने, बंगलादेश, नेपाल, बर्मा और तिब्बत आदि देशों की भूपटियाँ इसके सीमान्त छोरों पर पड़ती हैं।
सीमान्त की महत्ता : सुरक्षा की दृष्टि से सीमांत छोरों की अधिक महत्ता है; क्योंकि इन्हीं से परदेशियों का देश के भीतर प्रवेश करने का डर रहता है। इसके अलावा यदि सीमान्त के राष्ट्रों से किसी कारणवश शत्रुता हो जाए, तो ये हर प्रकार से चिन्ता का विषय बन जाते हैं, ऐसी स्थिति में शत्रु राष्ट्रों से अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सीमान्त की ओर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। वहाँ पर सुरक्षा सैनिक लगाने पड़ते हैं। हमारे सीमान्त छोर बड़े ही मुसीबत वाले हैं। चीन और पाकिस्तान आदि देश छेड़छाड़ करते रहते हैं। इसलिए हम इनकी ओर पड़ने वाली विस्तृत भूपट्टियों पर शस्त्रों से सज्जित सेना को सतर्क रखते हैं। इससे हमें रक्षा में बहुत साधन लगाने पड़ रहे हैं। हमारे नेता बराबर शांति और मैत्री की अपील करते हैं। शिमला-समझौते पर चलने के लिए कहते हैं; किन्तु पाकिस्तान ऐसा हठधर्मी राष्ट्र है कि उस पर कुछ प्रभाव पड़ता ही नहीं। यह दिनोंदिन शत्रुता की ओर अग्रसर हो रहा है। कोई नहीं जानता कि इसकी शत्रुता व हठधर्मी का कहाँ अंत होगा ?
देश का एक सीमांत छोर : हमारे देश का राजस्थान का सीमांत छोर बहुत ही पास पड़ता है। यह क्षेत्र मरुस्थली होते हुए भी पाकिस्तान की दुष्टता से आतंकित है। कभी-कभी पाकिस्तानी सैनिक हमारे गाँवों में घुस कर पशुओं को हाँक ले जाते हैं। कभी-कभी चोरी से फसलें भी काट ले जाते हैं। कभी-कभी छोटा-मोटा हमला भी कर देते हैं। फलतः गाँवों में आतंक फैला रहता है। हमारे ग्रामीण डरे से रहते हैं। हमारे सिपाही भी कंधों पर बंदूक रखे, रात-दिन सीमान्त के आसपास बसे हुए ग्रामों की रक्षा करते हैं। कभी-कभी इनकी शत्रु सैनिकों से मुठभेड़ भी हो जाती है।
सीमांत के सिपाही का फर्ज : सीमांत के सिपाही का फर्ज है। कि वह शत्रु के सैनिकों को छेड़छाड़ करने पर और सीमा का अतिक्रमण करने पर बंदी बनाए तथा आक्रमण करने की स्थिति में गोलियों से भून दे। यदि आवश्यकता पड़े, तो देश की रक्षार्थ अपनी आहुति दे दे।
मेरी आकांक्षा : मेरी चिर अभिलाषा है कि मेरी नियुक्ति सीमांत पर हो जाए। मैं जैसलमेर की सीमा पर अपने फर्ज को पूरा करना चाहता हूँ। मैं बहुत दिनों से सेना में रह कर देश की सेवा कर रहा हूँ। मैं सदैव अधिकारियों से प्रार्थना करता रहता हूँ कि मेरी नियुक्ति सीमांत पर कर दें। काश ! ऐसा हो जाए।
उपसंहार : मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सीमांत की धरती बलिदान के लिए पुकार रही है। यदि इच्छा पूर्ण हो जाए, तो मैं उन पाकिस्तानी दस्युओं को मजा चखाऊँ जो रात्रि में घुसकर भारतीय पशुओं को चुरा कर ले जाते हैं। देखें, वह दिन कब आता है ?

यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता

प्रस्तावना : शिक्षा ही राष्ट्र की बहुमुखी प्रगति का मूल स्रोत है। इसलिये हर राष्ट्र के कर्णधार शिक्षा को बहुत महत्त्व देते आए हैं। विदेशी शासकों ने हमारे राष्ट्र पर स्थायी रूप से शासन हेतु यहाँ की शिक्षा प्रणाली इस प्रकार की बनायी थी, जिससे हम परतन्त्रता की प्रवृत्ति को ही सदैव के लिए अंगीकार करें।
आधुनिक शिक्षा प्रणाली के दोष : हमारा राष्ट्र स्वतन्त्र हुआ। उसके शासन की बागडोर हमारे कर्णधारों ने सम्भाली । अनेक प्रकार से सुधार किए; पर शिक्षा प्रणाली वैसी की वैसी ही रही। उनी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। अब इस स्वतन्त्र राष्ट्र को 54 व वर्ष चल रहा है  तंब भी शिक्षा में कोई विशेष परिवर्तन दृष्टिगत नहीं हो रहा है।
विद्यालय एवं महाविद्यालयों की संख्या अधिक अवश्य हुई; पर शिक्षा का स्तर ज्यों का त्यों ही रहा। देखा जाए तो माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा बिल्कुल ही अपूर्ण है। इस पर भी उसका व्यय दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। पाठ्य पुस्तकों का शीघ्रातिशीघ्र परिवर्तन और शुल्क की बढ़ोतरी शिक्षार्थियों की कमर तोड़ रही है। विद्यालयों में विषयों और पाठ्य पुस्तकों का इतना आधिक्य होता जा रहा है कि शिक्षार्थी रट-रटकर परेशान हो जाते हैं। इस प्रकार के अध्ययन से बुद्धि क्षीण व शिथिल रह जाती है। स्वतन्त्र भारत में शिक्षा की ऐसी स्थिति देखकर मेरा रोम-रोम क्षुब्ध हो उठता है। कभी-कभी सोच उठता हूँ कि इससे अच्छा प्रबन्ध, तो मैं ही शिक्षा मन्त्री होकर कर सकता। यदि मैं शिक्षा मन्त्री होता तो भारतीय शिक्षा के लिये निम्नलिखित उपाय करता।
प्राथमिक शिक्षा : हमारे देश में ऐसे बच्चों की संख्या विशेष है जो निर्धनता के कारण विद्यालय का मुख नहीं देख पाते हैं। मैं उनकी परिस्थितियों का अवलोकन कर उन्हें पढ़ने के लिये अवश्य बाधित ही नहीं करता; अपितु प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर देता। हमारे देश में हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है, फिर वे ही निर्धनता के अभिशाप के कारण इससे वंचित क्यों रहें ? प्राथमिक विद्यालयों में शारीरिक दण्ड का निषेध करा देता और इस पर भी अध्यापक वर्ग दण्ड देता हुआ पाया जाता, तो उसे नौकरी से विमुक्त कर देता। प्राथमिक कथाओं में शिशुओं की अवस्था एवं बुद्धि का ध्यान रखकर वैसी ही सरल एवं शिक्षाप्रद पुस्तक रख पाता जिनसे कि बुद्धि का समुचित विकास होता । मान्टेसरी शिक्षा पद्धति पर विशेष बल देता और गाँधी जी द्वारा चालित बेसिक शिक्षा को ग्रामों में विशेष रूप से चलवाता। छोटे-छोटे विद्यालयों का वातावरण प्यार भरा होना चाहिए, जिनसे नन्हे-मुन्ने घर से अधिक इन्हें चाहने लगे।
माध्यमिक शिक्षा : हमारे देश की पुरातन सभ्यता एवं संस्कृति जगत प्रसिद्ध है। इसकी सुरक्षा के लिए माध्यमिक शिक्षा में लड़के और लड़कियों के लिए पृथक्-पृथक् विद्यालरा अनिवार्य हैं। यहाँ पर भी पुस्तकों की संख्या कम ही रखवाता। मेरी इच्छा है कि हमारे देश में ऐसी शिक्षा का प्रचलन रहे कि विद्यार्थी शारीरिक श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से न देखें । उन्हें शिक्षा के साथ हस्तकला भी सिखाई जाए ताकि बुद्धि के विकास के साथ-साथ शरीर भी उन्नत हो सके। अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करा देता और अंकगणित को भी ऐच्छिक विषय बनवा देता। संगीत, नृत्य, बुनाई, कताई, बढ़ईगीरी, पुस्तक बाँधना, छपाई, दर्जीगीरी, चित्रकला, रेडियो इन्जीनियरी, हस्तकला और अन्य शिल्पकला आदि अनेक प्रकार के विषयों पर बल देता। नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, इतिहास तथा संस्कृत आदि विषय भी इनके साथ रहते। विद्यार्थी इच्छानुसार विषयों का चयन करते। बालिकाओं की शिक्षा में विशेष रूप से भिन्नता होती। उनके विषय में कला और दस्तकारी तथा गृह विज्ञान पर विशेष जोर दिया जाता और उनके अन्य विषय ऐच्छिक होते।
प्रौढ़ शिक्षा : प्रौढ़ शिक्षा भी हमारे देश में बहुत आवश्यक है। इसकी महत्ता को समझते हुए मैं उसके लिए संध्याकालीन विद्यालयों की स्थापना कराता। उनके पठन-पाठन के लिए विशेष प्रकार की पुस्तकों का आयोजन करता। उनके लिए ऐसे पुस्तकालय खुलवाता जहाँ पर बैठकर प्रौढ़ जनता अपनी सुविधा से समाचारपत्र तथा मनोरंजन की पुस्तकों का अवलोकन कर सकती। उनके अध्ययन के लिए विशेष प्रकार से प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करवाता । इसके अतिरिक्त समस्त राज्यों की उच्च कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिये प्रौढ़ शिक्षा के शिक्षण का भी आयोजन करवाता ताकि उन्हें पता चल जाता कि प्रौढों को कैसे शिक्षा दी जाती है? अवकाश के समय में उन्हें सामूहिक रूप में देश के कोने-कोने के भिजवाने का आयोजन कराता ताकि वे प्रौढों को उनके समयानुकूल पढ़ाते।
उच्च शिक्षा : मेधावी शिक्षार्थियों के लिये उच्च शिक्षा अनिवार्य है। इसके साथ ही समूचे राष्ट्र में उद्योग धन्धे वाले उच्च महाविद्यालयों की प्रचुर संख्या में स्थापना करवाता ताकि शिक्षार्थियों को अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् किसी की दासता न करनी पड़े। वे स्वतन्त्र रूप से अपनी आजीविका के साधन जुटा सकें। वे अपनी-अपनी कला की प्रगति के साथ-साथ राष्ट्र को भी प्रगतिशील बना सकें। महिलाएँ भी उच्च शिक्षा में पुरुषों का साथ देतीं।
उपसंहार : यदि आज मैं शिक्षा मंत्री होता, तो देश में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च सभी तरह की शिक्षा पद्धतियों में वस्तुतः आमूलचूल परिवर्तन करता। मैं समझता हूँ कि उत्तम ढंग की शिक्षण पद्धति से ही राष्ट्र प्रगति के शिखर पर पहुँच सकता है।

शहीदी जोड़ मेला – फतहगढ़ साहिब

चण्डीगढ़-सरहिंद सड़क पर स्थित फतहगढ़ साहिब सिखों के दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबज़ादों की अद्वितीय शहीदी और बलिदान के लिए जगत प्रसिद्ध स्थान है। यहां साहिबजादा जोरावर सिंह तथा साहिबज़ादा फतहसिंह अपनी बाल्यावस्था में ही मुगलों के साथ टक्कर लेते हुए।   देश और कौम के लिए शहीद हो गए थे। उस समय इन साहिबज़ादों की आयु क्रमशः मात्र नौ वर्ष तथा सात वर्ष की थी।   उनकी महान् शहादतों की स्मृति में यहां प्रत्येक वर्ष पौष माह की एकादशी से चतुर्दशी तिथि तक (दिसम्बर माह में) शहीदी जोड़ मेला आयोजित किया जाता है।  जिसमें लाखों लोग शामिल होते हैं। इस पवित्र कस्बे का नाम फतहगढ़ साहिब, साहिबजादा फतहसिंह के नाम पर रखा गया है। फतहगढ़ साहिब सरहिंद से केवल पांच किलोमीटर तथा चण्डीगढ़ से 48 किलोमीटर दूर है।
सन् 1701 में मुगल सेना ने आनंदपुर साहिब की घेराबंदी कर ली थी। उस समय वहां स्वयं श्रीगुरु गोबिंद सिंह तथा उनका परिवार ठहरा हुआ।  था।जब मुगल सेना इस अविराम घेराबंदी से कोई लाभ न उठा सकी तो उन्होंने एक चाल चली मुगलों ने गुरुजी के समक्ष एक प्रस्ताव रखा कि यदि वह आनंदपुर साहिब का किला छोड़ दें तो वे घेराबंदी समाप्त करके अपनी सेना वापिस ले जाएंगे तथा उन पर आक्रमण नहीं करेंगे गुरुजी ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया किन्तु जब गुरुजी किले से बाहर निकल आए तब मुगलों की नीयत बदल गई तथा उन्होंने सरसा नदी, जो उस समय बाढ़ के कारण लबालब भरी हुई थी।  के किनारे गुरुजी पर हमला बोल दिया।
इस हमले में माता गुजरी जी (गुरु जी की माता) तथा छोटे साहिबज़ादे जोरावर सिंह तथा फ़तह सिंह गुरुजी से बिछुड़ गएमाता गुजरी जी तथा दोनों साहिबज़ादे ‘खेड़ीगांव’ में अपने एक नौकर गंगू के घर ठहर गए पर गंगू एक सच्चा अनुचर न निकला उसने इनाम के लालच में, तथा मुगलों के भय से मोरिण्डा के शासक के पास खबर भिजवा दीउन तीनों को कैद करके सरहिंद के गवर्नर के पास भेज दिया गया।
यह घटना 9 पौष 1761 की है। अगले दिन 10 पौष को दोनों बालकों को गवर्नर के सामने पेश किया गया।   ।, जिसने उन्हें लालच दिया कि यदि वे इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें तो उन्हें मुक्त कर दिया जाएगा, अन्यथा। उनकी हत्या कर दी जाएगी। जब साहिबजादों पर उसकी बात का कोई प्रभाव न पड़ा, तब इस निर्दयी ने उन दोनों को एक दीवार में जीवित चिनवा देने का आदेश दे दिया। जब यह दीवार साहिबज़ादों के गले तक पहुंची तो वे लगभग बेहोश हो चुके थे, तभी यह दीवार अचानक स्वयं ही चटककर धराशायी हो गई जब साहिबज़ादों को पुनः चेतना आई तो 12-13 पौष को उनको फिर वही इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए बाध्य किया गया। परन्तु उन वीर बालकों ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया परिणामस्वरूप दोनों साहिबज़ादों को शहीद कर दिया गया। जब उनकी दादी, माता गुजरी जी को इस हृदय विदारक घटना के विषय में पता चला तो उन्होंने भी तत्काल अपने प्राण त्याग दिए। इन महान् शहादतों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने यहां पर सर्वप्रथम 1888 में शहीदी जोड़ मेला आयोजित किया गया। जो कि अब प्रत्येक वर्ष बड़ी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है

हाथी के साथी

हो जाने की वजह बन जाती है।
सहायक सामग्रीसी.डीदृश्य – जानवरों की लाश पर भी अत्याचार पशुपक्षियों पर होनेवाले अत्याचार पर आधारित कोई रपट ,स्लाइड । वर्तमानकालिक क्रियाओं का चार्ट या स्लाइड
हाथियों का झुंड
रपट के प्रस्तुतीकरण के साथ कक्षा शुरू करें 
बंदरों का खौफ: छत से कूदी महिला
फरीदाबाद: 10 मई : बंदर के भय से सेक्टर-21 सी. में महिला ने दो मंजिले मकान से छलाँग लगा दी। जिससे उसके चेहरे व नाक की हड्डियाँ टूट गईं । गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना से सेक्टरवासी बंदरों से खौफजदा है। इससे पहले भी यहाँ अनेक हादसे हो चुके हैं। बंदरों के आतंक से निजाद पाने के लिए स्थानीय लोग शिकायत करेंगे। बंदरों को पकड़ने में निगम को नाकाम बताते हुए लोगों ने अब निगमायुक्त से बंदरों को मारने की अनुमति लेने का फैसला किया है ताकि इस समस्या से खुद निपटा जा सके। (खौफ: भय, निजाद: रक्षा)

 ? महिला ने दुमंजिले मकान से क्यों छलाँग लगा दी?
नगर में बंदरों का आतंक क्यों हो रहा है?
स्थानीय लोगों ने किसकी अनुमति लेने का प्रयास किया हैक्या यह उचित है?
उत्तर बताने का अवसर दें।

  • भारी मात्रा में जंगल की कटाई से जानवरों के बेघर हो जानाप्रकृति का असंतुलन होना आदि समस्याएँ आ जाती हैं।

    इस ओर संकेत करते हुए मिलानी की घटना हाथी के साथी” पढ़ें।
पहला अंतर – (यह एक….मर गया)
 वाचन प्रक्रिया ।
 छात्र सस्वर वाचन। वाचन का आकलन।
 ? जंगल के हाथी कैसे बेघर हो गए?
 ? किसी के बेघर हो जाने पर क्या होता है?

गाँव में हाथी का आक्रमण

 ? जंगली जानवरों के बेघर हो जाने से क्या होता है?
 ? “रौंद डालना”, “गुस्सा उतारना” आदि से आप ने क्या समझा है?
 उदा: हाथी ने महावत को रौंद डाला।
इस प्रकार के अन्य उदाहरण देकर अर्थ और प्रसंग समझा दें। ऊपर के प्रश्नों के उत्तर लिखें।
 ? पशु-पक्षियों को मारना कानूनी जुर्म है।
    क्या आप कानून से परिचित हैं? ( स्रोत पुस्तक के अधिनियम प्रस्तुत करें-स्लाइड शो ।)
 “ज़ोर से बिजली का झटका लगा और वह मर गया।” इसके समान कोई घटना मालूम है तो प्रस्तुत करें।

अगला अंतर – (खबर मिलते ही…..उसे सताना नहीं छोड़ा।)

हाथी के दाँत निकाले गए!

वाचन प्रक्रिया और उसका आकलन ।
? हाथी की लाश से गाँववालों का व्यवहार कैसा था?
? अपने साथी की लाश को हाथियों ने कैसे दफनाया?
? हाथी के मामले में नियमपालक उसके वंचक बन गए हैं। यह कहाँ तक सही है?
? अगर गाँववालों की जगह आप होते तो हाथी की लाश से कैसा व्यवहार करते?
हाथी के बेघर होने में मानव समाज का असंगतिपूर्ण विकास कहाँ तक जिम्मेदार है? टिप्पणी तैयार करें।
? मनुष्य जंगल की कटाई क्यों करते हैं?
? इससे जंगली जानवरों की कैसी हालत होती है?
? जंगली जानवरों के बेघर होने से मानव को क्या नुकसान होता है?
? इसपर मानव की जिम्मेदारी कहाँ तक है?

  • लेखन प्रक्रिया
रपट तैयार करें– (पाठ्यपुस्तक पृ. 21.)
छात्र चित्रवाचन करेंप्रसंग पहचानें।
चित्र में आप क्या देखते हैं?
इन जानवरों की हालत कैसी है?
क्या मानव का जानवरों से ऐसा व्यवहार उचित हैक्योंटिप्पणी तैयार करें।
पाठ्यपुस्तिका की मैंने क्या किया” शीर्षक पर दी गई जाँच सूची का इस्तेमाल करें।
भाषा की बात – विशेषण
प्रक्रिया
खंड का वाचन करें। (पाठ्यपुस्तक पृ. 21)
रेखांकित शब्द किसकी सूचना दे रहे हैं?
?यहाँ क्रिया का व्यापार किस काल में हो रहा है?
इन कालरूपों में क्या अंतर है?
किसकिस प्रसंगों में ऐसे क्रियारूपों का प्रयोग होता है?
वर्तमानकालिक क्रियाओं का चार्ट या स्लाइड दिखाएँ।
इस इकाई के पाठों से वर्तमानकालिक क्रियारूप छाँटें और उनका प्रयोग समझें।
भाषा की बात उद्घोषणा
उद्घोषणा का ध्यानपूर्वक वाचन करें।
उसका आशयग्रहण करें। संबोधनसमयस्थानतिथिकार्य आदि पर ध्यान रखें।
संक्षिप्त एवं स्पष्ट भाषा शैली से परिचय पाएँ।
उद्घोषणा प्रस्तुत करने का अवसर छात्रों को दें।
अध्यापक नमूना प्रस्तुत करें।
उद्घोषणा तैयार करें।
स्कूल के कई कार्यक्रमों से किसी एक का चयन करें।
कार्यक्रम पूर्ण रूप से तैयार करें।
समयस्थानतिथिकार्य जोड़ें।
संबोधन पर ध्यान दें।
संक्षिप्त एवं स्पष्ट भाषा शैली से उद्घोषणा तैयार करें।
भाषा की बात – विश्लेषण
दीप्ती की डायरी टी.बीपृ. 23 पढ़ें।
डायरी ध्यान से पढ़ेंरेखांकित क्रियारूपों पर ध्यान दें।
रेखांकित क्रियाएँ किस काल की सूचना देती हैं?
अन्य उदाहरण दें।
इकाई के पाठों से भविष्यत्कालीन क्रियारूप छाँटकर लिखें।
विश्लेषण– पोस्टर
पोस्टर का वाचन करें।
कार्यक्रम पहचानें।
कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए क्याक्या करेंगे?
इन बातों पर चर्चा करें।
प्रदर्शनी कैसे चलाएँगे?
किनकिन साहित्यकारों के चित्र इकट्ठा करेंगे?
कौनकौनसी प्रतियोगिताएँ चलाएँगे?
कवितापाठ का मूल्याँकन कौन करेंगे?
सार्वजनिक सम्मेलन में स्वागत भाषणअध्यक्षीय भाषणकृतज्ञता ज्ञापन आदि कौनकौन करेंगे?
उद्घाटन करने के लिए किसको आमंत्रित करेंगे?

पारिभाषिक शब्दावली टी.बीपृ. 25.
पारिभाषिक शब्दों से परिचय पाएँ।
ये पारिभाषिक शब्द किस विभाग से संबंधित हैं?
संचार संबंधी अन्य दो पारिभाषिक शब्द लिखें।

अतिरिक्त कार्य
पत्नी POSTMAN आया है।
डाकियाएक REGISTERED LETTER है।
पतिकहाँ से है?
डाकियातिरुवनंतपुरम से। यहाँ हस्ताक्षर कीजिए।
पतिइनमें नया STAMP लगाया गया है।
पत्नीएक INLAND LETTER CARD मिलेगा जी?
डाकियानहीं जीडाकघर में जाइए।

हमने क्या किया?
  • रपट द्वारा प्रवेश प्रक्रिया चलाई
  • समस्या निर्धारित की
  • अंकित वाचन कराया
  • टिप्पणी तैयार कराई
  • रपट लिखवाई
  • वर्तमानकालिक क्रियारूपों की अवधारणा बनाई
  • उद्घोषणा लिखवाई
  • पोस्टर तैयार कराया
  • पारिभाषिक शब्दों का परिचय दिया

एकल अभिनय अथवा एक-पात्रीय नाटक

रंगमंच अभिनेता का माध्यम है, किन्तु दुर्भाग्यवश रंगमंच में अभिनेता की अलग पहचान नहीं बन पायी | इस पहचान के बिना रंगमंचकी पहचान भी संभव नहीं है | ‘एकल अभिनय’ पूरी तरह अभिनेता का रंगमंच है | यह एक अभिनेता को उसके द्वारा अर्जित अनुभव, कार्यदक्षता और कल्पनाशीलता के प्रदर्शन का स्वतंत्र अवसर उपलब्ध करता है और उसे उसकी जादुई शक्ति के साथ रंगमंच पर प्रतिष्ठापित भी करता है | एकल नाट्य (या एकल अभिनय) किसी भी स्तर पर सामूहिकता का निषेध नहीं करता, बल्कि यह सामुदायिक जीवन का अंग है, क्योंकि यह व्यापक दर्शक समुदाय को सम्बोधित होता है |
ऊपरी तौर पर ‘एकल अभिनय’ भले ही सरल लगता हो; किन्तु वास्तव में, यह ‘समूह-अभिनय’ से ज्यादा जटिल है और कल्पनाशीलता तथा नाट्य-कौशल में सिद्धहस्त अभिनेता की माँग करता है | समूह अभिनय में, जहाँ अनेक अभिनेताओं की क्रिया-प्रतिक्रिया के संघर्ष से नाट्य प्रभाव की सृष्टि होती है; वहीं एकल अभिनय में, अभिनेता के भीतर यह नाट्य-व्यापार घटित होता है, जो उसकी शारीरिक क्रिया द्वारा मंच पर साकार होता है | एकल अभिनय,
मूल-धारा के समूह अभिनय के विरुद्ध नहीं है; बल्कि यह उसे सम्पुष्ट करता है, बल प्रदान करता है; सबसे अधिक यह रंगमंच की अनिवार्य इकाई अभिनेता को विशेष पहचान देता है, उसके प्रति दर्शकों की आस्था को शक्ति प्रदान करता है | इसप्रकार यह रंगमंच के नायक ‘अभिनेता’ को पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है | बांग्ला रंगमंच में, एकल अभिनय की परम्परा काफी वर्षों से है और तृप्ति मित्र-साँवली मित्र के प्रयोग का भारतीय रंगमंच में उच्च-मूल्यांकन किया जाता है | बाऊल एक तरह का एकल नाट्य ही है | महान बांग्ला अभिनेता शांति गोपाल द्वारा अंतर्राष्ट्रीय-स्तर पर चर्चित ‘लेनिन’, ‘कार्लमार्क्स’, ‘सुभाषचंद्र’, ‘राममोहन रॉय’ आदि पर मंचित जात्रा; एक हद तक, उनका एकल अभिनय ही था | इधर कुछ वर्षों से; हिन्दी, कन्नड़, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओं में एकल अभिनय के अनेक अभिनव प्रयोग किये गए हैं | पटना में ‘नटमंडप’ द्वारा इस सिलसिले को पिछले कुछ वर्षों से गंभीरता से आगे बढाया गया है | बिहार के अन्य कतिपय रंगकर्मियों द्वारा भी एकल अभिनय के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये गए हैं | रंगमंच के लिए किसी नाट्य प्रयोग की प्रासंगिकता, उसके द्वारा संपूर्ण नाट्य प्रभाव की सृष्टि और नाट्यकला का आस्वाद करा पाने की उसकी क्षमता में अन्तर्निहित है | इसलिए, एकल अभिनय एक सामान्य नाट्य मंचन जैसा ही है, जिसमें एक-अकेले अभिनेता के अतिरिक्त, किसी दूसरे अभिनेता की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती और इसकी सफलता भी इसी में है कि दर्शक को किसी भी क्षण किसी अन्य अभिनेता के न होने का अहसास न हो | एकल अभिनय को, रंगमंच के एक ‘फॉर्म’ अथवा शैली के रूप में दर्शकों की स्वीकृति भी मिल रही है और यह रंगमंच के हित में है|

नोम चोमस्की एक अमेरिकी भाषाविद्, दार्शनिक, संज्ञानात्मक वैज्ञानिक, तार्किक, राजनीतिक आलोचक और कार्यकर्ता है

नोम चोमस्की 7 दिसंबर 1928 को फिलाडेल्फिया में पैदा हुआ था और कई वर्षों के लिए भाषा विज्ञान के एक प्रोफेसर की गई है. उन्होंने पेंसिलवानिया विश्वविद्यालय से 1955 में एक डॉक्टर की डिग्री को सुरक्षित करने में सक्षम था. यह वह भाषा विज्ञान में majored कि कि विश्वविद्यालय में किया गया.

चोमस्की पहले भी भाषा विज्ञान के एक विद्वान था, जो उसकी हिब्रू पिता द्वारा भाषा के क्षेत्र के लिए शुरू की गई थी.

उन्होंने यह भी एक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, संज्ञानात्मक वैज्ञानिक, दार्शनिक और कई पुस्तकों के सम्मानित लेखक माना जाता है. यह लोगों को राजनीतिक क्षेत्र में एक उदारवादी समाजवादी के रूप में उसे वर्णन करने के लिए शुरू किया है कि 1960 के आसपास थी.

उन्होंने कहा कि भाषाई दुनिया पर एक बड़ा प्रभाव है और वह लोगों को एक नई भाषा सीखने के लिए पर जोर डालने में निभाई भूमिका होने के लिए, तथापि, जमा किया गया है.

वे वृद्धि के रूप में अच्छी तरह से चोमस्की पदानुक्रम के रूप में जाना जाता है जो उनके सिद्धांत, और अधिक शक्ति के साथ अलग अलग वर्गों में निर्धारित व्याकरण बिताते हैं. उत्पादक व्याकरण और सार्वभौमिक व्याकरण का उनका विचार भी चोम्स्की और अन्य भाषाविद् के बीच विभाजनकारी का हिस्सा था.

उनका काम भी ऐसे इम्यूनोलॉजी, विकासवादी मनोविज्ञान, और कृत्रिम बुद्धि के अनुसंधान के साथ ही कम्प्यूटरीकृत है कि भाषा के अनुवाद के रूप में विशेषज्ञता के अन्य क्षेत्रों को प्रभावित किया है.

चोमस्की अपने अन्य समकक्षों की तुलना में एक अलग तरह के प्रकाश में भाषा के अध्ययन का दरवाजा खटखटाया. उनके सार्वभौमिक व्याकरण सिद्धांत है कि सभी मनुष्यों शेयर भाषाई नियमों की एक आंतरिक सेट है कि प्राथमिक सिद्धांत पर बल दिया. यह वह एक भाषा सीखने की शुरुआत चरणों बुलाया.

यह कुछ विशिष्ट नियम, दी जब किसी भी भाषा के उत्पादक व्याकरण, उचित व्याकरण की दृष्टि से एक वाक्य फार्म का गठबंधन होगा कि शब्दों की गणना करेगा कि तथ्य यह है कि पहचान की Naom चोमस्की था. सही ढंग से संपर्क किया जब वे एक ही नियम वाक्य की आकारिकी पर जोर देना होगा.

चोमस्की के उत्पादक व्याकरण के इस सिद्धांत के पहले संस्करण परिवर्तनकारी व्याकरण था. बेशक, उत्पादक व्याकरण संज्ञानात्मक व्याकरण और कार्यात्मक सिद्धांतों के समर्थकों से कुछ आलोचनाओं प्राप्त करता है.

समापन

चोमस्की मन दूसरों को यह ऋण देने से भाषा विज्ञान के साथ क्या करना था कि लगा. वह एक भाषाई वातावरण में रखा जाता है जब एक बच्चे का उदाहरण देकर प्रेफसस इस बोली जाती हैं कि शब्दों के लिए अनुकूल करने के लिए एक सहज क्षमता है करने में सक्षम है.

ब्लॉग में contact पेज कैसे जोडे

हर Blog और Website के लिए Contact, About, Privacy policy Pages बहुत important होते हैं ।
इनकी मदद से Audience आपसे अच्छी तरह से connect रहती है और आपके बारे में और भी ज्यादा जानकारी प्राप्त करती है ।
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इस तरह के pages हर website के जरूरी है
अगर आप अपनी site को professional look देना चाहते हो तो आपको site पर इस तरह के pages जरूर add करने होगें ।
Google भी इन pages को पसंद करता है इससे site trustable हो जाती है ।
Contact Page हर Website के लिए important होता है इससे site के visitors आपसे contact कर सकते हैं, कोई कंपनी advertising के लिए आपसे संपर्क करना सकती है ।
यह एक Brand के लिए बहुत जरूरी है ।
अगर आप Contact page पर ज्यादा जानकरी देना नहीं चाहते तो आप एक Callable Contact page बना सकते हैं ।


Callable Link क्या है ?

Normally जब हम किसी web url पर click करते है तो किसी site का कोई पेज open है ।
लेकिन जब हम किसी callable link पर क्लिक करते हैं तो Direct Email Send, Call या Massage Editor Open हो जाता है
जिसमें Receiver person का email या phone पहले से लिखा रहता है हमें केवल वहां अपना message type करके send पर क्लिक करना होता है ।
Example :- Click Here

आप अपने blog में भी इस तरह का Page Add कर सकते हैं इससे जब भी कोई व्यक्ति इस पर क्लिक करेगा वह direct email send पर पहुंच जाएगा ।
अपनी इस पोस्ट में मैं आपको बताउंगा कि blogspot में Callable contact page कैसे add करें ।