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जिस रूपये को हम काले धन के नाम से पुकारते हैं, उसकी आत्मा तथा मन दोनों ही काला है। सरकारी टैक्स से बचने के लिए इसे अत्यन्त गुप्त एवं गोपनीय रखा जाता है और साथ ही विधिवत या लिखित रूप में भी इसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता है। देश की अर्थव्यवस्था के लिए काला धन टी.बी. समान रोग है। यदि ठीक से इसका निदान नहीं किया गया तो देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो सकती है। देश की प्रगति एवं अर्थव्यवस्था दिनोंदिन अवनति की ओर बढ़ती जाएगी।
काले धन का हमारे आज के जीवन में और हमारे आर्थिक व्यवहार में कितना बड़ा हाथ है, इसके तरह-तरह के अनुमान लगाए जाते है। एक अर्थशास्त्री के अनुसार हमारा आधा आर्थिक व्यापार काले धन के बल पर ही चलता है। यह बात तो सच है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर इस काले धन ने बहुत ही अनिष्टकारी प्रभाव डाला है। इसका सबसे भयानक दुष्परिणाम यह है कि इसके कारण सरकार की तमाम नीतियां निष्फल जा रही हैं।
अगर किसी ने सफेद धन कमा लिया तो उसका एक बड़ा भाग करों के द्वारा छीन लिया जाता है। सफेद धन को परिश्रम से कमाया जाता है। उसका अधिकांश भाग करों और आज के बढ़े हुए मूल्यों के कारण हाथ से निकल जाता है और बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता है। इसके विपरीत काला धन आसानी से कमाया जाता है और इसे आसानी से छिपा भी लिया जाता है और उस पर कर चुकाने को प्रश्न ही नहीं उठता। काले धन से अभिप्राय उस धन से है जो सरकारी टैक्स से बचने हेतु बिना लिखा-पढ़ी किए हुए छिपाकर तथा गोपनीय रखा जाता है। चाहे चल संपत्ति हो अथवा अचल संपत्ति, सबके ऊपर कालेधन की काली छाया मंडरा नही है। काला धन व्यक्ति तक ही सीमित रहता है। इसका उपयोग भी सीमित हो जाता है। इससे देश की अत्यधिक क्षति हो रही है।
काले धन से एक और अनिष्टकारी प्रभाव पड़ रहा है। समाज का अधिकांश आर्थिक कारोबार सरकार की आंखों से छिपाकर किया जाता है और सरकार को बचे-खुचे संकुचित क्षेत्र पर अपना नियंत्रण रखकर करना पड़ता है। हमारा सामाजिक जीवन भी इस काले धन से खोखला होता जा रहा है। जिन सामाजिक गुणो से हमें पे्ररणा लेनी चाहिए, वे गुण नष्ट होते जा रहे हैं और जिन असामाजिक तŸवों की रोकथाम होनी चाहिए, वे ’दिन दूना राज चैगुना’ करते जा रहे है। आज प्रायः हर व्यवसायी काला धन कमाने और उसे छुपाने में ही व्यस्त रहता है। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 250 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा चोरी की जाती है, जिसकी काले धन के अन्तर्गत ही गणना करनी चाहिए। इस कालेधन के कारण धन का संचय सीमित लोगों के हाथों में सिमटा है। ’काले धन’ का संचय केवल धनिक वर्ग तक सीमित रहता है क्योंकि निर्धन का तो कठोर श्रम करने के पश्चात भी बड़ी कठिनाई से पेट भर पाता है। धनिक लोग ’काले धन’ के माध्यम से समाज में महंगाई का घातक विष प्रसारित करते रहते हैं।
ओलम्पिक अन्तर्राष्टीय स्तर पर प्रत्येक चार वर्षों में आयोजित होने वाला विश्व का सबसे विशालतम खेल-मेला है जिसमें, विश्व के लगभग सभी देशाों के खिलाड़ी जाति, धर्म, राजनिति, भाषा एवं सम्प्रदाय का भेद-भाव भुलाकर एक जगह एकत्रित हो अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। इन खेलों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर के विजेताओं को क्रमाशः स्वर्ण, रजत एवं कांस्य-पदक प्रदान किया जाता है। ओलम्पिक में पदक जीतना खिलाडी़ एवं राष्ट्र दोनों के लिए गौरव का विषय है।
ओलम्पिक का इतिहास काफी पुराना है। सर्वप्रथम 776 ई. पूर्व यूनान के नगर एथेंस के ओलम्पिया पर्वत की तलहटी में खेलों की एक प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। बाद में ओलम्पिया पर्वत के नाम पर ही इस आयोजन का नाम ओलम्पिक पडा़। समय के साथ-साथ इसकी परम्परा एवं स्वरूप में धीरे-धीरे संशोधन एवं परिवर्धन होते गए। अब ओलम्पिक सारे विश्व को अपने में समाहित किए हुए है। आधुनिक ओलम्पियन खेलों के आयोजन का मुख्य श्रेय यूनान-निवासी ’पियरे द कुबर्तिन’ को जाता है, जिनके अथक प्रयास के फलस्वरूप ओलम्पिक का वर्तमान विशाल स्वरूप विश्व के सामने हैं।
ओलम्पिक का एक झण्डा है जिसक रंग सफेद है और इसमें आपस में जुडे़ पांच गोले अंकित हैं। ये गोले पंाच महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उद्घाटन के समय मशाल जलाकर हजारों कबूतरों को आकाशा में उड़ाया जाता है, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना एवं शांति का प्रतीक माना जाता है।
आधुनिक ओलम्पिक का प्रथम आयोजन सन् 1896 में यूनान के एथेंस नगर में ही हुआ था। इसके बाद से प्रति चार वर्षो के अन्तराल पर विश्व के बडे़-बड़े नगरों में ओलम्पिक का आयोजन होता चला आ रहा है। अंतराल आया केवल दो बार, जब प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इन खेलों का आयोजन रद्द का देना पड़ा था।
खेल में हार और जीत का विशेष महत्व पहीं होता । महत्व होता है अनुशासन, भइचारे ओर इमानदारी का। 1996 ई. के आलम्पिक में इन्हीं कारणों से भारत को हाॅकी में ’फेयर प्ले एवार्ड’ मिला। जिस खेल-स्पर्धा में उŸाम खेल तकनीक के साथ-साथ जितना अधिक अनुशासन, ईमानदारी और बन्घत्व का भाव रहता है, उस खेल का उतना ही उत्कृष्ट माना जाता है। ओलम्पिक -आयोजन का उद्देश् खेलों के माध्यम से सारे जगत को एक सूत्र में जोडनस है। वस्तुतः ’वसुधैव कुटुम्बकम’ ही ओलम्विक का नारा है।
I always start my classes with some form of emotional check-in regardless of age or grade level. I do so in my college classes as well as in my elementary gifted classes. I think this is even more imperative given the stress students are experiencing due to COVID19. The 10 to 15 minutes it takes is so worth the class time.
Some of the benefits of emotional check-ins discussed in the Edutopia article, A Simple but Powerful Class Opening Activity, include:
Students know that every voice matters: The emotional check-in gets every student’s voice into the room at the start of each class. Although students can always say “pass” instead of sharing, each student has the opportunity to be heard every class session. The check-in is also a great opportunity to practice active listening, turn-taking, and following group norms.
Students develop awareness of others’ emotions—and how to respond to them: When students share their emotions during the check-in, they give their classmates a snapshot of their emotional state. And if I hear a student say that “I didn’t sleep much last night” or “I feel like I can’t focus today,” I can adjust my interactions with that person accordingly.
The check-ins also acknowledge that how students are feeling is important to the educator, that they matter as human beings who have feelings and emotions.
One of my college classes moved from face-to-face to Zoom this semester. What follows are some of the check-in activities I have done with them.
Students use a feeling chart to describe how they are feeling. A side benefit of using feeling charts is that they help students increase their feelings vocabulary.

Each student shares a Rose, something good or positive, from the day or week; and a Thorn, something not-so-good or positive, from the day or week.

Students, during the check-in, take turns using the four types of self care graphic to describe strategies they are doing or would like to do to be physically, emotionally, socially, and spiritually healthy.
The teacher leads students through the 5 step check-in process described in Emotional Check-ins: Why You Need Them:
Then each student is given an opportunity to share what came up for them during the exercise.
Pear Decks are very similar to a PowerPoint or Google Slides presentation. But instead of simply static, informational slides, you get to create Interactive Slides that let every student respond to your questions or prompts. Once PearDeck is activated, through the Google Slides add-on, students are given a code to access the Pear Deck. There they interact with each slide through typing, drawing, and using a draggable icon depending how the teacher set up the slide. What follows is the Pear Deck I used for a check-in at the start of one of my classes.
Students create a timeline of images that represent: how you felt last week; how you feel today; how you want to feel this coming week; and finally, what strategies you can use to get to how you want to feel this coming week. Students then share their images via their webinar cameras and discuss their meaning with the rest of the class. What follows are (1) the prompt for this activity, and (2) sample student pictures:



Using Giphy students do a search for different feelings and emotions they are currently experiencing, and then select one or more Gifs that represent those feelings. They then take turns to do a screenshare of their selected Giphy and explain why they selected it.
Padlet is an application to create an online bulletin board that you can use to display information for any topic. You can add images, links, videos, text, and drawings. Below is a Padlet I created for an emotional check-in.

Menitmeter allows teachers to engage and interact with students in real-time. It is a polling tool wherein teachers can set the questions and your students can give their input using a mobile phone or any other device connected to the Internet. Their input is displayed on a slide in a selected format: Word Cloud, Speech Bubbles, One-By-One, and Flowchart. In the case of check-ins, it can be used to have students put in responses to a question related to how they feeling at the start of class and their responses then are shown to the class via a slide. The example below shows a slide with a Word Cloud of emotional check-in responses.

Flipgrid is a website that allows teachers to create “grids” to facilitate video discussions. Each grid is like a message board where teachers can pose questions, called “topics,” and their students can post video responses. For an emotional check-in, students record a short video about how they are feeling.

इंटरनेट दूनिया भर में फैले कम्प्यूटरों का एक विशाल संजाल है जिसमें ज्ञान एवं सूचनाएं भौगोलिक एवं राजनितिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए अनवरत प्रवाहित होती रहती है। उस संजाल में कुछ ऐसे कम्प्यूटर होते हैं जो सर्वदा सक्रिय रहते हैं और कुछ ऐसे कम्प्यूटर होते हैं जो उपभोक्ताओं के द्वारा आवश्यकता पड़ने पर खोले जाते हैं। जो कम्प्यूटर इस संजाल में सर्वदा खुले होते हैं, वह संजाल उन्हीं कम्प्यूटरों के द्वारा चलता है। ऐसे कम्प्यूटर को सर्वर कहते है। इन्टरनेट के संजाल में ऐसे कई सर्वर होते हैं और ये सभी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। हम जब कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं तो इन्हीं में से किसी एक सर्वर से अपने कम्प्यूटर का संबंध स्थापित करते हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।
इंटरनेट का प्रारम्भ आज से लगभग साढे़ तीन दशक पूर्व अमेरिका के रक्षा विभाग के एक शोध प्रकल्प के रूप में हुआ था। उस समय इस शोध में लगे वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि दो अलग-अलग स्थानों पर स्थित कम्प्यूटरों के माध्यम से आंकडों एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान कैसे किया जाए। शीत युद्ध के दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया के तीन मेनफ्रेम कम्प्यूटर और यूटा के एक मेनफ्रेम कम्प्यूटर को आपस में जोड़ा गया और इसे अर्पानेट कहा गया। इस शोध परियोजना के लिए अमेरिका की उन्नत अनुसंधान परियोजना ऐजेंसी धन उपलब्ध करा रही थी, इसलिए नेटवर्क का यह नाम रखा गया। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सियोनार्ड क्लिनराॅक एवं उनके साथियों द्वारा किए गए एक प्रयोग से दिनांक 2 सितम्बर 1969 को इस कार्य को अंजाम मिला। डाॅ. क्निराॅक को इन्टरनेट का जन्मदाता माना जाता है। इन्टरनेट के स्थापना के पीछे उद्देश्य यह था कि परमाणु हमले की स्थिति में संचार के एक जीवंत नेटवर्क को बनाए रखा जाए। लेकिन जल्द ही रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला से हटकर इसका प्रयोग व्यावसायिक आधार पर होने लगा । फिर इन्टरनेट के व्यापक स्तर पर उपयोग की संभवनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ और बड़ी-बडी़ कम्पनियों ने इस नेटवर्क को व्यापक स्तर पर स्थापित करने के लिए अपना धन लगाना प्रारम्भ कर दिया। 1992 ई. के बाद इन्टरनेट पर ध्वनि एवं वीडियो का आदान-प्रदान संभव हो गया। अपनी कुछ दशकों की यात्रा में ही इन्टरनेट ने आज विकास की कल्पनातीत दूरी तय कर ली है। आज के इन्टरनेट के संजाल में छोटे-छोटे व्यक्तिगत कम्म्यूटरों से लेकर मेनफ्रेम और सुपर कम्प्यूटर तक परस्पर सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं। आज जिसके पास भी अपना व्यक्तिगत कम्प्यूटर है वह इंटरनेट से जुड़ने की आकांक्षा रखता है।
इन्टरनेट आधुनिक विश्व के सूचना विस्फोट की क्रांति का आधार है। इन्टरनेट के ताने-बाने में आज पूरी दुनिया है। विश्व के जिस शहर में इन्टरनेट की सुविधा उपलब्ध है, वह शहर सूचना के सुपर हाइवे का हिस्सा है। दुनिया में जो कुछ भी घटित होता है और नया होता है वह सुपर हाइवे के उस शहर में तत्काल पहुंच जाता है। इन्टरनेट आधुनिक सदी का ऐसा ताना बाना है, जो अपनी स्वच्छन्द गति से पूरी दुनिया को अपने आगोश में लेता जा रहा है। कोई सीमा इसे रोक नहीं सकती। यह एक ऐसा तंत्र है, जिस पर किसी एक संस्था या व्यक्ति या देश का अधिकार नहीं है बल्कि सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ताओं की सामूहिक संपत्ति है। इन्टरनेट सभी संचार माध्यमों का समन्वित एक नया रूप है। पत्र-पत्रिका, रेडियों और टेलीविजन ने सुचनाओं के आदान-प्रदान के रूप् में लिस सूचना क्रांति का प्रवर्तन किया था, आज इन्टरनेट के विकास के कारण वह विस्फोट की स्थिति में है। इन्टरनेट में माध्यम से सूचनाओं के आदान-प्रदान एवं संवाद आज दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पलक झपकते संभव हो चुका है।
विश्व व्यापार संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पेटेंट अधिनियम में संशोधन हेतु एक अध्यादेश 25 दिसम्बर 2004 को जारी किया। इससे बहुविवादित रही उत्पाद पेटेंट व्यस्था 1 जनवरी 2004 से प्रभावी हो गई। इसके पूर्व 1999 एवं 2002 के पेटेंट (संशोधन) अधिनियमों के जरिये प्रक्रिया पेटेंट को लागू कर दिया गया था, जबकि दवाओं, रसायनों एवं अनाज के मामलों में उत्पाद पेटेंट अभी तक लम्बित था। अन्य क्षेत्रों में उत्पाद पेटेंट का प्रावधान पहले के संशोधन के जरिये किया जा चुका था। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत भारत को दवाओं, खाद्य पदार्थो व रसायनों के मामले में उत्पाद पेटेंट व्यवस्था को 1 जनवरी 2005 तक लागू करना था। इस प्रतिबद्धता को सन्दर्भित अध्यादेश के जरिये पूरा किया गया है।
विश्लेषकों का मत है कि उत्पाद पेटेंट व्यवस्था लागू होने से शरू के कुछ वर्ष तक भले ही इसका अधिक प्रभाव आम व्यक्तियों पर न पडे़, किन्तु उन्नत दवाओं, रसायनों, कृषि बीजों के मूल्यों में भारी वृद्धि इसके परिणामस्वरूप अन्ततः होगी। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक सम्पदा अधिकार समझौते के तहत नई खोजों पर आधारित उत्पादों के 20 वर्ष तक विपणन का विशेषाधिकार केवल शोधकर्ता व्यक्ति अथवा कम्पनी को प्रप्त होगा तथा उसे उसके मूल्य निर्धारण की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। इन आलोचनाओं का खण्डन करते हुए सरकार ने दावा किया है कि नए अध्यादेश के कारण न तो दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होंगी और न ही भारतीय उद्योगों पर इसका बुरा असर पडे़गा। नयी पेटेण्ट व्यवस्था में भारतीय फार्मा इण्डस्ट्री को उन्नति के पहले से अधिक अवसर प्राप्त होंगे तथा बाजार में प्रतिस्पद्र्धा बढ़ने से दवाएं सस्ती भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में तीन तथ्यों का हवाला सरकार ने दिया है। एक तो यह कि बाजार में उपलब्ध 97 प्रतिशत दवाएं पेटेंट के दायरे में आती ही नहीं, इसलिए उनके महंगा होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। दूसरे पेटेंट के दायरे में आने वाली बाकी तीन प्रतिशत दवाओं में से भी अनेक ऐसी हैं जिनके बाजार में विकल्प उपलब्ध हैं और तीसरे भारत सरकार ने संशोधित कानून में जनहित की दृष्टि से 7 ऐसे विशेष प्रावधान रखे हैं जिनके जरिये सरकार किसी भी पेटेंट का रद्द करने, पेटेंटशुदा प्रोडक्ट का आयात करने अथवा किसी भी आविष्कार को अपने लिए इस्तेमाल करने का अधिकार रख सकेगी।
विदित है कि एक दशक पूर्व भारत में पेटेंट कानून की बात डराती थी, क्योंकि ऐसे कानून से सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा होता नजर आता था, किन्तु अब हालात बदल गए हैं। अब स्वयं भारतीय दवा कम्पनियों को विश्व बाजार में झण्डे गाड़ने के लिए पेटेंट संरक्षण की आवश्यकता है। 10 वर्ष पूर्व भारत का फार्म निर्यात 4 हजार करोड़ रूपये था जो आज बढ़कर 14 हजार करोड़ रूपये हो गया है। भारतीय फार्मा निर्यात अब प्रति वर्ष 30 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है और कम्पनियां अब अपने टर्न-ओवर का 6 से 8 प्रतिशत भाग अनुसन्धान (त्-क्) मे लगा रही हैं। इन परिस्थितियों में कडे़ पेटेंट कानून से भारतीय दवा बाजार को नुकसान नहीं, फायदा होने जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि ट्रिप्स समझौते के अनुपालन हेतु 1970 के पेटेंट अधिनियम (जो 20 अप्रैल 1972 से प्रभावी हुआ) में यह तीसरा संशोधन 26 दिसम्बर 2004 के आध्यादेश के जरिये किया गया तथा 23 मार्च 2005 को इसे संसद के दानो सदनों द्वारा पारित कर दिया गया। पहला संशोधन मार्च 1999 में अधिसूचित किया गया, जो 1 जनवरी 1995 से प्रभावी हुआ था। जून 2002 में अधिसूचित दूसरा संशोधन 1 जनवरी 2000 से प्रभावी हुआ था जबकि तीसरा संशोधन 1 जनवरी 2005 से प्रभावी हुआ था।
गंगा पतित पावनी कहलाती है। पुण्य सलिला गंगा, गीता और गौ-इन तीनों को हमारी संस्कृति का आधार तत्व माना गया है। इसमें गंगा का स्थान प्रमुख है। इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि गंगा विष्णु के चरण-नख से निःसृत होकर ब्रह्या के कमण्डलु और तत्पश्चात शिव की जटाओं में विश्राम पाती हुई भगीरथ के अथक प्रयास के फलस्वरूप पृथ्वी पर अवतरित हो पाई है। पृथ्वी पर आते ही इसने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को शाप से मुक्त कर दिया। तब से अब तक न जाने कितने पतितों का उद्धार इसने किया। इसकी पावन पुलिन पर याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, अंगिरा, विश्वामित्र आदि ऋषि-मुनियों के आश्रम थे, जहां से ज्ञान की किरणें प्रस्फुटित होती थीं गंगा पुत्र भीष्म के पराक्रम को कौन नहीं जानता? इसकी पविता तो सर्वविदित है ही। ऐसी मान्यता है कि मरते समय व्यक्ति के मुख में अगर गंगा जल पड़ जाए तो व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, गंगा को हमारी संस्कृति में मां का स्थान दिया गया है। जैसे जन्मदात्री मां पुत्रों का दुख हरकर सुख देती है, वैसे ही गंगा भक्तों के लिए दुखहरणी और समस्त आनन्द-मंगलों की जननी है। गोस्वामी जी गंगा महात्म्य के बारे में लिखते हैंः- ग्ंगा का अतीत जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान भी उतना ही प्रभावशाली है। हिमालय भारत का रजत-मुकुट है और गंगा इसके वक्षस्थल का हीरक-हार। हिमालय से निःसृत होने के कारण इसके जल में जड़ी-बूटियां मिली होती हैं। इसलिए गंगाजल का स्नान और पान दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हितकर हैं। इसके तट पर बड़े-बडे़ महानगरों का आर्विभाव हुआ है, यथा ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, कोलकाता इत्यादि। ये नगर धार्मिक एवं व्यावसायिक-दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण हैं। गंगोत्री से निकलकर बंगाल की खाड़ी से मिलने तक गंगा लंबी दूरी तय करती है। इस बीच गंगाजल से सिंचित भूमि (गंगा का मैदान) सोना उगलने लगाती है। इसके तटों पर हरे-भरे जंगल हैं, जो पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं। इस प्रकार गंगा आध्यात्मिक एवं भौमिक दोनों दृष्टिकोणों से भारत के लिए वरदान है। गीमा में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-’स्त्रोतसामस्ति जाहृवी’ (10/31) अर्थात मैं नदियों में गंगा हूं।
आज इनती पवित्र और उपयोगी गंगा हमारे कुकृत्यों से दूषित हो चली है। बडे़-बडे़ नगरों का प्रदूषित जल एवं कल-कारखानों से निकले विषैले स्त्राव को सीधे गंगा में प्रवाहित किया जा रहा। यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसकी शु़िद्ध के लिए केन्द्र सरकार ने ’गंगा सफाई योजना’ शुरू की है। परन्तु अभी तक इसके सार्थक परिणाम नहीं प्राप्त हो सके हैं। हमें तो गंगा की वह पूर्ण स्थिति प्राप्त करनी है, जब कहा जाता था-’गंगा तेरा पानी अमृत’। अतः हम भारतीयों का यह पुनीत कर्Ÿाव्य है कि गंगा को प्रदुषित होने से बचाएं।
सच पूछा जाए तो भातर की मर्यादा गंगा में निहित है औार गंगा की मर्यादा भारत में। गंगा की कहानी भारतीय संस्कृति का इतिहास है। वैदिक युग से इस वैज्ञानिक युग तक सामाजिक तथा राजनीतिक उत्थान- पतन की सारी गाथाएं गंगा की लहरों तथा तटवर्ती शिलाओं पर अंकित है।
पुण्य-सलिला गंगा के जल को सर्वपापहारी, सर्वरोगहारी अमृत-तुल्य माना गया है। यही कारण है कि हिन्दुओं के अनेक तीर्थ हरिद्वार, काशी, प्रयाग आदि गंगा के तट पर स्थित हैं। आर्थिक दृष्टि से गंगा के उपकारों का भारत सदैव ऋणी रहेगा। अनगिनत कल-कारखाने गंगा-तट पर स्थापित किए गए हैं तथा उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल का विशाल क्षेत्र गंगा-जल से सिंचित उर्वर कृषि-क्षेत्र. बना हुआ है। तथापि राष्ट्र का दुर्भाग्य है कि ज्यों-ज्यों जनसंख्या बढ़ती जा रही है त्यों-त्यों गंगा का जल विभिन्न रूपों मंे अधिकाधिक प्रदुषित होता जा रहा है।
हिमालय के अंक में अवस्थित गंगोत्री से जन्मी हिमालय पर होने वाली वर्षा की विभिन्न जल-धाराओं से गंगा ने नदी का स्वरूप धारण किया। उस क्षेत्र में गंगा निश्चय ही पुण्य सलिला है और उसकी गति में प्रखरता है। किन्तु मैदानी क्षेत्र में उतरते ही उसके प्रदुषण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण गंगा-तट पर घनी आबादी के शहर और गांव विकसित हो गए हैं। उन बस्तियों का सारा कूड़ा-करकट तथा उनसे निकलता हुआ गंदे नाले-नालियों का जल गंगा में दिन-रात समाता रहता है। गंगा तट पर बसे हुए छोटे-बड़े शहरों की संख्या लगभग 920 है। कहा जाता है कि परम पावनी काशी नगरी से ही प्रतिवर्ष लगभग 10 करोड़ लीटर दूषित जल गंगा मंे प्रवाहित होता है। बनारस से ही लगभग 9000 शव प्रतिवर्ष गंगा के किनारे जलाए या बहाए जाते हैं। अधजले मुर्दे बहा देना तो आम बात है। इसी तरह अन्य क्षेत्रों से भी गंदा जल तथा कूड़ा-कचरा गंगा में बहता रहता है।
कानपुर के निकट से जब गंगा गुजरती है तब कल-कारखानों से भी गंगा-जल प्रदुषित होता है। कानपुर महानगर के चर्म शोधन संयंत्रों से बहुत घातक रासायनिक अवशेष गंगा में बहाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त कपड़ा-मिलों और सैकड़ों प्रकार के अन्य उद्योगों के द्वारा गंगा प्रदूषित होती रहती है। जूट, रसायन, धातु, नगरीय मल, चिकित्सकीय यंत्र, चमड़ा उद्योग, कपड़ा मिल आदि विभिन्न स्त्रोतों से गंगा का अमृत निरन्तर जहर बन रहा है। गंगा-तट पर स्थित उत्तर प्रदेश की औद्योगिक इकाइयों में से अधिकांश कानपुर में स्थित हैं। बिहार से होकर बंगाल की दिशा मंे बढ़ती हुई गंगा को इसी तरह प्रदूषण की भेंट स्वीकार करनी पड़ती है। बंगाल में यह हुगली कहलाती है। हुगली के दोनो तटों पर कोलकाता और उसके निकटवर्ती क्षेत्र मंे उद्योगों की बहुत सी इकाइयां कार्यरत हैं और उन सबसे रासायनिक प्रदूषण दिन-रात हुगली में खपता रहता है। महानगर से करोड़ों लीटर दूषित जन प्रति वर्ष हुगली में बहतर और घुलता रहता है। अनुमान है कि शहरी क्षेत्र से प्रतिवर्ष 4 लाख किलोग्राम वज्र्य पदार्थ नदी में बहाया जाता है। हालत यह है कि प्रदूषित गंगा अमृत के स्थान पर विष बांट रही है। हालांकि हिमालय की गोद में पवित्र गंगा की धारा की प्रत्येक बूंद आज भी, अभी भी अमृत-तुल्य है लेकिन मैदानी क्षेत्र का गंगा-जल प्रदूषण के कारण अपना संजीवनी गुण खो चुका है।
सच पूछा जाए तो औद्योगिक विस्तारवाद की दानवी गिरफ्त से हमारे जल स्त्रोत बच नहीं पा हैं। यह गिरफ्त प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत, विकलांगता, अस्वस्थता और रूग्णता का कारण बन रही है। प्रदूषित गंगा जल न केवल प्रत्यक्ष उपयोग के कारण, बल्कि खाद्य-शल्य के माध्यम से, मछलियों तथा अन्य जलीय प्राणियों के द्वारा, गगांजल का प्रयोग करने वाले दुधारू पशुओं के द्वारा भी हमें विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार बनना पड़ता है। जल में घुलनशील पदार्थों में अतिरिक्त अघुलनशील पदार्थ भी प्रवेश करते हैं, जिनके कारण नदी की गहराई कम होती जा रही है, अतः छिछली नदी नौकायन के योग्य भी नहीं रह गई है। इससे हमारे व्यापार-वाणिज्य को भी क्षति पहुंचती है। यह भी देखा जा रहा है कि नदी के विषाक्त जल के कारण जलीय प्राणियों की संख्या कम होती जा रही है। कानपुर के निकट शहर का किनारा छोड़कर गंगा की धारा कई फर्लांग दूर हटकर बह रही है। जिसका दुष्परिणाम शहरवासी भोग रहे हैं। धारा को पूर्ववत शहर के निकट लाने के सारे प्रयास विफल हुए हैं। इसका एकमात्र कारण अघुलनशील द्रव्यों के जमा होने पर नदी के तलपट का अत्यधिक उथला हो जाना है।
औद्योगिकरण की अनियोजित व्यवस्था गंगा-जल के प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है। औद्योगिक विकास के लिए सरकारी प्रयत्नों तथा नीतियों का अधकचरापन, उनके अधूरे निष्कर्ष तथा नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदूषण की जटिल समस्या है जिस पर काबू पाना भारत जैसे विकासशील देश के लिए असंभव नही ंतो कठिन जरूर है। यह भी द्रष्टत्व है कि पर्यावरणविदों द्वारा दिए गए सुझावों को सरकारी अधिकारी अपेक्षित महत्व नहीं देते हैं। पतित पावनी गंगा का 600 कि.मी. का जल-क्षेत्र विशेष रूप से विषाक्त हो चुका है। ’गंगा एक्शन प्जान’ का भी वही हाल हुआ जो प्रायः ऐसी सरकारी परियोजनाओं का होता है। गंगा के निकटवर्ती 29 शहरों को इसके लिए चुन भी लिया गया। यह योजना बनाई गई कि इन शहरों से बहकर गंगा में गिरते हुए गन्दे जल के नालों को गंगा मंे न मिलने दिया जाए, बल्कि नदी की धारा के समानान्तर नए नाले खोल कर सारा गन्दा जल उनसे होकर बड़े-बड़े कुओं में इकटठा किया जाए, जहां से पाइपों के जरिये उस जल को जल साफ करने वाले संयंत्रों को भेजा जाए। इस उद्देश्य से सभी योजनाएं पक्की तरह बनकर तैयार हो चुकी थीं। लेकिन योजनाएं अब भी कागज पर तो हैं, व्यवहार में शिथिलता आ गई है।
गंगा प्रदूषण का सबसे कारण अगर कोई है तो वह हमारे कल-कारखाने और सरकार की गंगा के प्रति उपेक्षा की भावना। भारतीय लोकतंत्र में राजनीति से सम्बद्ध लोग 99 फीसदी तुष्टीकरण की नीति पर भरोसा करते हैं, इसीलिए यह कहा जाना काफी कठिन है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त कर पाने में सरकार कहां तक सफल हो सकेगी।
गांधी दर्शन जितना पवित्र और आदर्शात्मक था उतना ही तत्कालीन भारत के लिए उपयोगी भी था। लेकिन 21वीं सदी में यह दर्शन हमारी जीवन शैली से दूर होता जा रहा है और ऐसा मालूम होने लगा है कि गांधी जी के सपनों का भारत कहीं खो गया है। सत्य के नाम पर झूठ एवं धोखाधड़ी, अहिंसा के नाम पर हिंसा और सादगी और सत्याग्रह के नाम पर स्वार्थ, दिखावा और पूर्वाग्रह से ग्रसित परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। घोटालों का देश हो जाए यह भारत, इससे बड़ा जुल्म और हो ही क्या सकता है गांधी जी के पदचिन्हों पर चलकर जहां हम गरीबी हटाकर ग्राम विकास का दम्भ भरते थे वहीं आज गरीबी कर चिंता छोड़कर शहरी विकास पर ध्यान दिया जा रहा है। गरीबी के स्थान पर गरीबों को ही हटाया जा रहा है। आधी जनसंख्या का गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करना, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी और नौकरशाही हमारे अंग-भंग में शामिल है। धर्म के परदे के पीछे साम्प्रदायिकता का जहर फैलने लगा है, धार्मिक उन्माद से हिंसा का ताण्डव हो रहा है। हमारी स्वतंत्रता एवं स्वाालम्बन को विदेशियों के हाथों बेचा जा रहा है। बढ़ता आंतकवाद, हमारी शांति, एकता और अखण्डता को निगल रहा है।
अब गांधी जी का अस्तित्व तस्वीरों, प्रतिमाआंे व भजन तक सिमट कर रह गया है। प्रति वर्ष गांधी जयन्ती पर फूल-माला चढ़ाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेना ही हमारी और हमारे राजनेताओं की प्रवृति बन गई है। हमें यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि वास्तव मंे वर्तमान परिस्थितियों में गांधी जी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं।
गांधी जी का सपना कुछ और था। वे पाश्चात्य सभ्यता की चकाचैंध से दूर रहकर भारतीय संस्कृति का उत्थान चाहते थे। उनके सपनों का भारत मानव कल्याण से आपूरित भारत था। उनका मानना था कि जब भी तुम्हें सन्देह हो या तुम्हारा अहंकार तुम्हें परेशान करने लगे, तब तुम स्वंय को निम्नलिखित कसौटी पर परखो-उस गरीब से गरीब और कमजोर से कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो, फिर खुदा से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो क्या उससे उस व्यक्ति का भला होगा? गांधी जी का तो आदर्श था-
’’सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्विद दुखभाग भवेत।।’’
गांधी जी स्वावलम्बन, समाजवाद, समानता, सादगी और स्वदेशी के माध्यम से ग्राम राज्य और राम राज्य लाना चाहते थे। दुर्भाग्यवश बापू का सपना साकार नहीं हो सका। गांधी के सारे सिद्धान्त हमारे व्यवहार से हटकर सिर्फ ढोल पीटने भर के लिए रह गए हैं। सम्प्रति विज्ञान और टेक्नोलाॅजी प्रधान युग में गांध जी के आदर्शों, सिद्धांतों तथा चिन्तन के साथ-साथ उनकी प्रतिपादित समूची जीवन पद्धति ही प्रासंगिकता के प्रश्नों के घेरे में फंस गई है। उनका विचार इस 21वीं सदी मंे दकियानूसी माना जा रहा है। अहिंसा रूपी ढाल टूट चुकी है, निहत्थी निरीह जनता गोलियों का शिकार हो रही है और गांधी का जीवन दर्शन सत्य की वह ढाल बन चुका है जिसे लेका सर्वत्र असत्य की लड़ाई लड़ी जा रही है। गांधी जी हरिजन उद्धार की बात करते थे, आज उन्हीं के देश में हरिजन इस समाज में सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं। उन्हें आरक्षण के छलावे से फुसलाया जा रहा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के शब्दों में ’गांधी नहीं रहे पर गांधीवाद घसीटा जा रहा हे। सैकड़ों संस्थाएं उनके नाम पर चल रही हैं। सत्ता की नई पौध उनके नाम पर पनपती है। दार्शनिक उनके सिद्धांतों एवं आदर्शों की चकाचैंध फैलाते हैं। संसार को चकित करते हैं।’ गांधीजी का मूलमंत्र था साधन को पाने के लिए साधन की पवित्रता की अनिवार्यता। भारतीय समाज में गांधीजी की सबसे बड़ी देन यही थी कि उन्होंने करोड़ों बेबस लोगों को आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति संकल्प, स्वावलम्बन की प्रेरणा दी। सुस्पष्ट है कि गांधी की राजनीति नैतिक मूल्यों पर आधारित थी। बायड आर. के. का तो यहां तक कहना है कि ’’मेरे विचार स ेअब वह समय आया पहुंचा है जब गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को विश्वव्यापी स्तर पर व्यवहार में लाना चाहिए। इसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जनता वह अनुभव करती है कि इसके सिवा विनाश से परित्राण की कोई आशा नहीं है।’’
’’आजादी के बाद गांधी जैसे सन्त राजनीतिक नेता की सार्थकता ही नहीं रही।’’ यह कथन माक्र्सवादी विचाराधारा के पुरोधा ई. एम.एस. नंबूदरीपाद का है। उनका यह कथन कड़वा तो लगता है लेकिन यह सत्य है। गांधी ने अपने विषय मंे स्वयं भी कहा है-’आज हिन्दुस्तान में कौन-सी ऐसी चीज हो रही है जिसमें मुझे खुशी हो सके। कांग्रेस बहुत बड़ी संस्था हो चुकी है। इसके सामने मैं उपवास नहीं कर सकता। लेकिन आज मैं भटठी में पड़ा हूं और मेरे दिल में अंगार जल रहे हैं।’
गांधी जी ने अपनी नयी जिन्दगी को सार्वजनिक आयाम देकर, अपने दर्शन को जमीन पर उतारकर, आखिरी आदमी की लड़ाई लड़ने की कोशिश की। धनी से लेकर सर्वहारा, कृषक से लेकर जमींदार, बाबू से लेकर अधिकारी, सभी के नेतृत्व का भार उठाया और राजनीतिक जगत में उनका मुकाबला करने वाला अब तक कोई पैदा नहीं हुआ। गांधी जी अपनी मृत्यु के कई दशक बाद भी लोगों के दिमाग मंे लिखित हैं क्योंकि वे भारत के लिए उसी प्रकार थे जिस प्रकार-’गंगा और हिमालय।’
निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियो में गांधी दर्शन को अपनाकर चलना जहां मुश्किल है, वहीं उसे पूर्ण रूप से नकारना भी हमारे हित में नहीं है। नए विचारों के बारे में गांधी जी ने कहा था-’’मैं नए विचारों को कदापि नहीं रोकना चाहता, पर मैं उनका गुलाम भी नहीं बनना चाहता।’’ यदि हम कहें वह पुराने युग में थे-उनके सिद्धांत, उनके आदर्श, उनका दर्शन पराधीन भारत के लिए ही मान्य था तो क्या हमारा यह कर्तव्य नही होगा कि हम विचार करें कि आज कौन से सिद्धांत हमारे देश के लिए मान्य होंगे। शांति, सुरक्षा, स्वावलम्बन, सादगी, स्वाभिमान, अहिंसा की आवश्यकता जितनी आज है उतनी तब नहीं थी। बढ़ते हुए कटटरवाद, अलगावाद, आंतकवाद एवं असहिष्णुता के वर्तमान युग में गांधी चिंतन आज पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक है।
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती बेरोजगारी, जाति एवं नस्ल की वैमनस्यता, आर्थिक विषमताओं से उभरती, आर्थिक नूतन प्रवृतियों एवं अस्थिरता मे गांधी की राजनीति, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विचारधारा आज अत्यन्त प्रासंगिक है क्योंकि यह इन समस्याओं को सुलझाने में सक्षम है। हमें गांधी दर्शन के समानुकूल दर्शन करने का सदुपयोग करने का संकल्प लेना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही गांधी दर्शन का उपयोग किया जाना चाहिए। आज हमें अंधानुकरण के संकीर्ण मार्ग से थोड़ा हटकर इस दिशा मंे गहन विचार करने की आवश्यकता है ताकि हम उस महान पुरूष के सपने को साकार कर सकें। । हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल कहने की बात रह गई है। पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता का गहरा रंग चढ़ता जा रहा है, मद्यपान हमारी सभ्यता और सम्मान का परिचायक बन चुका है। जो लोग भ्रष्ट आचरण और चरित्रहीनता के लिए बदनाम हैं, वे ही हर क्षेत्र में हमारे पथ प्रदर्शक एवं भाग्य विधाता बन बैठे हैं-
‘जम्हूरियत वह तर्ज-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बन्दों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।‘
– मो. इकबाल
भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। प्रजातांत्रिक शासत-प्रणाली में शासन जनता के हाथों में होता है। लेकिन यह संभव नहीं है कि जनता स्वयं शासर करे। इसमें जनता द्वारा चयनित या निर्वाचित प्रतिनिधि शासन चलाते हैं। इन प्रतिनिधियों का चयन जिस प्रक्रिया द्वारा होता है उसे ही ‘चुनाव या निर्वाचन‘ कहते हैं। चुनाव में विजयी उम्मीदवार देश का शासन चलाता है। अतः यह आवश्यक है कि प्रतिनिधियों का चयन सही हो अन्यथा देश में कुव्यवस्था फैल सकती है। इसलिए चुनाव प्रजातांत्रिक शासन-प्रणाली की आधारशिला है।
स्वतंत्र भारत में पांच वर्षों के अन्तराल पर आम चुनाव का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा मध्यावधि चुनाव और उन-चुनाव की भी व्यवस्था है। भारत में भली-भांति चुनाव सम्पन्न कराने के लिए चुनाव-आयोग की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग के सर्वोच्च पदाधिकारी को मुख्य चुनाव आयुक्त कहा जाता है। केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के अधीन राज्यों में भी राज्य निर्वाचन आयोग कार्य करता है। चुनाव में 18 वर्ष या ऊपर के सभी वयस्क स्त्री-पुरूष मतदाताओं को मन देने का समान अधिकार है, बशर्ते वह पागल, दिवालिया या आपराधिक चरित्र का न हो। चुनाव दो तरह से सम्पन्न कराए जाते हैं-1. प्रत्यक्ष, 2. अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता सीधे अपना मत देकर प्रतिनिधियों का चयन करती है, जैसे- विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों का चुनाव। अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही चुनाव में भाग लेते हैं। यथा- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा तथा विधान परिषद के चुनाव।
च्ुनाव के लिए सर्वप्रथम चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है। चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवार खड़ा करते हैं। इसके लिए चुनाव क्षेत्र निर्धारित रहते हैं। सम्पूर्ण चुनाव क्षेत्रों को छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया जाता है। उन इकाइयों के सभी मतदाता एक स्थान पर एकत्र होकर, पंक्तिबद्ध होकर मतदान करते हैं। उस स्थान को मतदान केन्द्र कहा जाता है। मतदान केन्द्र का सही संचालन करने के लिए उसका सबसे बड़ा अधिकारी पीठासीन अधिकारी कहलाता है। निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान के लिए पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है। प्रत्येक मतदान केन्द्र (बूथ) पर मतदाताओं की संख्या लगभग 500 से 1000 के बीच होती है। निर्धारित तिथि के एक दित पूर्व ही चुनाव कर्मचारी बूथ पर पर पहुंच जाते हैं। वे अपने साथ मतपत्र, मतपेटियां या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन (इ.वी.एम.) तथा अन्य चुनाव-सम्बन्धी सामान ले जाते हैं। शांति-व्यवस्था के लिए बूथों में से संवेदनशील अथवा अतिसंवेदनशील बूथों का चयन पहले ही कर लिया जाता है। पीठासीन अधिकारी की देख-रेख में चुनाव सम्पन्न होता है। मतदान कार्य प्रातः 8 बजे से 5 बजे शाम तक चलता रहता है। मतदान के बाद मतपेटियों या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन को सील कर दिया जाता है। मतगणना की तिथि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित की जाती है। निर्धारित समय पर मतगणना की जाती है। मतगणना स्थल के चारों ओर सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की जाती है। मतगणना के बाद जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे विजयी घोषित किया जाता है और सम्बन्धित जिले के जिलाधिकारी की उपस्थिति में उस उम्मीदवार को विजयी होने का प्रमाणपत्र दिया जाता है। उस क्षेत्र के सिविल एस.डी.ओ. या बी.डी.ओ., जो भी रिटर्निंग ऑफिसर होते हैं, उनके द्वारा विजयी होने का प्रमाण पत्र दिया जाता है।
भारत में चुनाव एक समस्या है, क्योंकि भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है। अशिक्षित जनता चुनाव का महŸव नहीं समझ पाती है। जातीयता, साम्प्रदायिकता एवं आर्थिक प्रलोभन के चक्कर में फंसकर वह अपने मताधिकार का दुरूपयोग कर बैठती है। चुनाव के समय हत्या, बूथ-कैप्चरिंग या बूथ पर भय का वातावरण बनाना आम बात है। शक्तिशाली लोग बहुमत प्राप्त करने के लिए बूथों को ही अपने पक्ष में लुटवा लेते हैं। पैसों के बल पर गरीब जनता का मत खरीद लिया जाता है। अब तो सŸाालोलुप पदाधिकारी भी बूथ लुटवाने में असामाजिक तŸवों का सहयोग करते हैं। इतना ही नहीं, वे पदाधिकारी मतगणना में भी हेराफरी से नहीं चूकते।
इस प्रकार चुनाव का अर्थ ही समाप्त हो जाता है। इस चुनाव का एक खास दोष यह भी है कि इसमें मूर्ख और विद्वान में कोई अन्तर नहीं रह जाता। यही कारण है कि आज विधायिकाओं में बुद्धिमान के बदले पहलवान लोग ही ज्यादा सुशोभित हो रहे हैं।
सारांशतः लोकतन्त्र की सफलता के लिए चुनाव का निष्पक्ष होना जरूरी है। इसके लिए चुनाव को एक पर्व की तरह मनाया जाना चाहिए। जैसे पर्व में पवित्रता का काफी महŸव है-हिंसा, बूथ-लूट, जातीयता, साम्प्रदायिकता, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि चुनाव की अपविभताएं हैं- इन्हें दूर भगाकर ही चुनाव को पवित्र बनाया जा सकता है। इसीलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए-’’चुनाव युद्ध नहीं, तीर्थ है, पर्व है।’’
दल-बदल का सामान्य अर्थ अपने दायित्व को त्यागना या उससे मुकरना है। लेकिन राजनीति में विशेष स्थितियों में इसके विभिन्न स्वरूप होते हैं। जैसे-दल का बदलना, जिस दल के अधीन चुनाव लड़े उस दल का त्याग, कोई दल छोड़ना या फिर उसमें शामिल होना आदि। अभी तक दल-बदल की कोई सार्वभौमिक एवं सर्व स्वीकृत परिभाषा नहीं बन पाई है। इस दिशा में डाॅ. सुभाष कश्यप की परिभाषा बहुत हद तक दल-बदल की अवधारणा को स्पष्ट करती है। उनके अनुसार दल-बदल का मतलब राजनीतिक प्रतीक का बदलना है, जिसमें निम्नलिखित मामले शामिल हो सकते हैं-
एक दल के टिकट पर विधायक चुना जाना और फिर उस विशेष दल को छोड़कर अन्य दल में चला जाना।दल से त्यागपत्र देकर अपने को निर्दलीय घोषित कर देना।
निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतकर किसी विशेष दल में शामिल हो जाना।
यदि कोई विधायक या सांसद किसी मामले में दल से त्यागपत्र दिए बिना अपने दल के विपरीत मत देता है तो उसे किसी भी रूप में दल-बदल से कम नहीं माना जाना चाहिए। वस्तुतः दल-बदल की प्रक्रिया उसी समय शुरू हो जाती है जब व्यक्ति चाहे किसी भी उद्देश्य से अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलता है। मूलतः राजनीतिक दल-बदल की क्रिया का प्रेरक किसी लाभ की संभावना होती है। सामान्यतः दल-बदलू वे लोग है जो राजनीतिक लाभ के लिए अपनी अवस्था बदल लेते हैं। यद्यपि कुछ राजनेताओं ने सैद्धांतिक आधार एवं नीतिगत मतभेदों के आधार पर कोई दल छोड़ा है तथापि अधिकतर मामलों में राजनीतिक दल-बदल का कारण घोर अवसरवादिता तथा पद-लाभ की आकांक्षा रही है। यदि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो लोकतांत्रिक स्वरूप के शासन मंे दल-बदल विभिन्न स्वरूपों एवं मात्राओं में पाया जाता है। विश्व का कोई लोकतांत्रिक देश इसका अपवाद नहीं है। ब्रिटेन में ग्लेडस्टन, चर्चिल जैसे महान नेताओं ने सदन में अपना पाला बदला। यदि हम स्वतंत्रता पूर्व इतिहास को देखें तो श्यामलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, हाफिज मुहम्मद इब्राहिम जैसे कई नाम हैं, जिन्होंने कई पद लाभों के लिए अपनी दलीय प्रतिबद्धताएं बदलीं। 1967 के पूर्व आचार्य नरेंद्रदेव, जे.बी. कृपालानी, अशोक मेहता इत्यादि नेताओं ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदलीं, किन्तु इन घटनाओं ने दलीय राजनीति को अधिक दूषित नहीं किया।
जो भी हो, भारत में चतुर्थ आम चुनाव (1967) के बाद राजनीतिक दल-बदल की समस्या ने गंभीर रूप धारण कर लिया। इस दल-बदल की प्रवृति में और वृद्धि होती गई तथा जून 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद भारत की राजनीति में तो जैसे दल-बदल की बाढ़-सी आ गई। इतना तो तय है कि भारत में राजनीतिक दल-बदल की प्रक्रिया का उद्भव कांग्रेस के पतन से ही त्रीव हुआ।
उपरोक्त कारणों से स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दल-बदल मंे व्यक्तिगत लाभ की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
दल-बदल रोकने के लिए समय-समय पर सरकार ने प्रयास किए। 8 दिसम्बर 1967 को लोकसभा ने एक उच्च स्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव पारित किया, जिसमे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एवं संवैधानिक विशेषज्ञ रखें गए। इसके बाद पुनः 16 मई 1973 को लोकसभा मे राजनीतिक दल-बदल विरोधी विधेयक पेश किया। पुनः इसके बाद जनता सरकार ने अप्रैल 1978 में एक विधेयक रखा जिसमे संविधान के अनुच्छेद 102 और 109 को परिवर्तित कर संसद एवं राज्य व्यवस्थापिकाओं के सदस्यों की योग्यताओं को पुननिर्धारित किया गया और अनेक प्रावधान किए गए। लेकिन पूर्व के सभी प्रयास असफल ही सिद्ध हुए। दल-बदल के विरोध में पहला ठोस कदम राजीव गांधी के द्वारा उठाया गया। राजीव गांधी सरकार ने 8वीं लोकसभा के पहले ही सत्र में विपक्षी दलों के सहयोग से दल-बदल पर अकुंश लगाने पर सहारनीय कार्य किया। जनवरी 1985 में दोनों सदनों से पारित होकर यह चर्चित विधेयक 52वें संविधान विधेयक के रूप में सामने आया। इसने भारतीय संविधान मंे दसवीं अनुसची को बढ़ाया जिसमें निम्नलिखित प्रावधान हैं, जिससे दल-बदल को रोकने का प्रयास किया गया-
निम्न परिस्थितियों में संसद या राज्य विधानमण्डल के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी-
यदि वह स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे दे।
यदि वह अपने दल या उसके अधिकृत व्यक्ति की अनुमति के बिना सदन में उसके किसी निर्देश के प्रतिकूल मतदान करे या मतदान के समय अनुपस्थित रहे। परन्तु यदि 15 दिन के अन्दर उसका दल उसे उल्लंघन के लिए क्षमा कर दे तो उसकी सदस्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य एक निश्चित समयावधि में किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाए, तो उसे दल-बदल का दोषी नहीं माना जाएगा।
किसी राजनीतिक दल के विघटन पर विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होगी यदि मूल दल के एक तिहाई सांसद, विधायक वह दल छोड़ दें।
इसी प्रकार विलय की स्थिति मंे दल-बदल नहीं माना जाएगा। यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में मिल जाएं।
दल-बदल के किसी प्रश्न पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होगा और किसी न्यायालय को उसकी वैधता जांचने का अधिकार नहीं होगा।
इस विधेयक को कार्यान्वित करने के लिए सदन के अध्यक्ष को नियम व निर्देश बनाने का अधिकार होगा।
यह सही है कि दल-बदल विरोधी अधिनियम हमारे राजनीतिक जीवन को स्वच्छ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वह ज्यादा अच्छा होता कि दल-बदल के प्रमुख कारणों जैस भौतिक लाभ की सम्भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगाया जाता तथा दल-बदलू को स्वीकारने वाले दल को कुछ समय के लिए अमान्य घोषित कर दिया जाता। इसके अतिरिक्त एक व्यावहारिक सुझाव यह भी हो सकता है कि राजनीतिक लाभ रोकने के लिए किन्हीं संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था के साथ-साथ स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं का विकास होता। मंत्रिपरिषद के आकार पर प्रतिबन्ध, मंत्री की अवधि का निर्धारण तथा राजनीतिक दल बदलुओं की सदन की सदस्यता समाप्ति आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे दल-बदल को कुछ हद तक रोका जा सकता है तथा जनता को भी इस दिशा में जागृत करना चाहिए जिससे ऐसे अपराधियों को स्वस्थ जनमत सजा दे तथा ऐसी संभवनाओं को निरूत्साहित करे। अतः जनता को स्वंय अपने सांसदों एवं विधायकों पर कड़ी निगाह रखनी होगी क्यांेकि विधायी एवं नैतिक विकल्पांे का संयोजन ही इसका एकमात्र प्रभावी उपचार हो सकता है।
आजकल हर जगह नास्टैल्जिया का व्यापार किया जा रहा है। एक संगीत कम्पनी ने फ्लैशबैक नामक एक एलबम के लिए 21 हिट गानों का चयन किया। यह कम्पनी तीसरे-चैथे दशक से संगीत का व्यापार कर रही है। उसके संग्रह में ऐसी धुनें हैं जिनसे लगभग प्रत्येक पीढ़ी की भावनाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। वस्तुतः इस कंपनी ने युगों पहले नास्टैल्जिया को कमाऊ जरिया बना लिया था। हम सब जानते हैं कि खुशबू के बाद संगीत ही आपको तत्काल अतीत में ले जा सकता है। प्रत्येक पीढ़ी के लोगों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ अपनी घड़ी को पीछे ले जाने और अतीत के सुखद समय में लौट जाने की चाह बढ़ती जाती है। व्यापारियों ने इसे समझ लिया है और इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं। हाल के समय में बाॅलीवुड में रीमेक और रीमिक्सेज की बहार आ गई है। दुनिया भर में ’मुगले आजम’ की सफलता से यह साफ है कि जितनी तेजी से हम सहस्त्राब्दी में आगे बढ़ रहे हैं उतनी ही तीव्र एक पीढी़ को वापस पीछे देखने की इच्छा है।
नास्टैल्जिया तनाव से मुक्ति देता है। यह अनेकानेक लोगों को बढ़ती उम्र मृत्यु और सतत परिवर्तन की चिंता से लड़ने की शक्ति देता है। उच्च गति वाले माॅडेम तथा 200 के करीब चैबीसों घंटे चलने वाले चैनलों के प्रहार से भारतवासी घिर गए हैं। भारत की लगभग आधी आबादी जो अभी युवा है, इस नई सुबह का स्वागत कर रही है और डिजिटल युग से लाभ उठा रही है। जबकी अनेक ऐसे लोग हैं जो इस संस्कृति के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं क्योंकि यह उनकी अपनी जमीन से उदित नहीं हुई है। इन पुराने लोगों को अपने अतीत से कुछ ऐसी कोमल चीजें चाहिए जो उन्हें सुकून दे सकें।
विश्व की सबसे बड़ी मार्केटिंग कम्पनियों के लिए काम करने वाले एक विशेषज्ञ ने पिछले दिनों कहा,’’इन दिनों हम अपनी अधुनिक सुविधाओं की पैकेजिंग पुरानी शैली में कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इससे उम्रदराज लोगों की अतीत की स्मृतियां जागेंगी, उनकी जेब में पैसे है, वे हमारे उत्पाद खरीदेंगे।‘‘ इससे मैकडोनाल्ड के उस विज्ञापन का निहितार्थ समझने में आसानी होगी जिसमें बर्गर के विज्ञापन के लिए वह राजकुमार, संजीव कुमार और राजेश खन्ना के हमशक्लों का इस्तेमाल करता है। ऐसा करके वह उम्रदराज लोगों को अपने फास्ट-फूड की ओर आकर्षित करता है।
आजकल एफ. एम. रेडियों पुराने हिट गानों का कार्यक्रम प्रसारित करता है जबकि ऐसे टीवी चैनल भी हैं जो केवल पुरानी फिल्में ही दिखाते हैं। मुगले आजम का नया संस्करण न केवल भारत बल्कि पाकिस्तान मे भी हाथों-हाथ बिका है और फिल्म निर्माताओं की नई पीढ़ी अपने अगले विषय के लिए बाॅलीवुड का पुराना कचरा खंगाल रही है। आधुनिक अभिनेताओं को पुराने विषयों में प्रस्तुत कर वे अपना बाजार बढ़ा रहे है। पुरानी फिल्मों के री-मेक का दौर चल पड़ा है।
स्वर्णिम स्मृतियों का व्यपार दुनिया भर में फायदे का धंधा बन रहा है। अमेरिका में समय-समय पर एक के बाद एक पुराने गानों की सीडी, पुरानी तस्वीरों की पुस्तकें अथवा बचपन की याद दिलाने वाले लेखों की पुनः पैकेजिंग कर उन्हें जारी किया जा रहा है। जापान के लगभग तीन करोड़ लोग जो कुल आबादी का लगभग एक चैथाई है 38 से 56 वर्ष की आयु के हैं। दुनिया भर में इस आयु वर्ग के लोग केवल किशोरों पर केन्द्रित पाॅप संस्कृति को खारिज कर रहे है। इस प्रवृति के अनुकूल तथा उपभोक्ताओं की नास्टैल्जिया से भरी भावनाओं के अनुरूप व्यापारी एक के बाद एक ऐसे उत्पादों की लहर पैदा कर रहें है जो इस समूह की युवावस्था के दौरान लोकप्रिय थे।
भारत अब इस प्रवृति की तरफ आंखे खोल रहा है। मजबूत अर्थव्यवस्था तथा पिछले कुछ वर्षो में अचानक आई समृद्धि के बावजूद सच्चाई यह है कि भारतीय लोगों को इन्हें आत्मसात करने में अभी थोड़ा समय लगेगा। हमारे जीवन में आए नाटकीय परिवर्तनों के कारण हमारी इच्छा मित्रों और परिवार वालों के साथा सहज बातचीत की और हमारे जीवन पर छा गए ब्रांडों और गति से मुक्त ठेठ देहाती जीवन जीने की होती है। भारतीय लोग अपनी परम्परा के प्रति काफी संवेदनशील हैं और अतीत की स्मृमियां उन्हें धराशायी कर देती हैं। उदीयमान नास्टैल्जिया के व्यापार से उन्हें उपनी इस कमजोरी से मुक्ति मिलती है। युवा भारत आज जहां दीप्त भविष्य के सपने देख रहा है वहीं उम्रदराज लोग अपने धूमिल कल की स्मृतियों के सहारे जी रहे हैं।
यह नास्टैल्जिया कब तक बना रहेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन यह कहना उचित होगा कि युवा सपनों के आक्रमण से बढ़ती उम्र के अमीर भारतीय लोगों को अतीत से सम्बन्ध स्थापित कर अपने जीवन पर नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा बलवती होती जा रही है।
निःशस्त्रीकरण का अभिप्राय है घातक शस्त्रास्त्र पर नियंत्रण रखना और शस्त्रों की बढ़ती संख्या को रोकना। विश्व-शांति का मूल उपाय निःशस्त्रीकरण में ही निहित है। आज विश्व शस्त्रों के अम्बार के नीचे दमघोंटू परिस्थिति में पड़ा हुआ है। विज्ञान ने इतने शक्तिशाली बमों का निर्माण कर लिया है कि विश्व की शांति के लिए खतरा पैदा हो गया है। प्रधानमंत्री नेहरू ने आधुनिक अस्त्रो की भीषणता का वर्णन करते हुए कहा-’’आज के भीषण हाइड्रोजन बमों के सम्मुख एक-एक बम जो हिरोशिमा और नागासाकी में गिराए गए थे, खिलौने के तुल्य हैं।’’ इन अणुबमों के विनाशक प्रभाव को हिरोशिमा और नागासाकी मे देखकर लोग कांप उठे थे। उसकी स्मृति से मानवता का कलेजा कांप उठता है, किन्तु जब वे शस्त्र आधुनिक शस्त्रों के सम्मुख खिलौने के तुल्य हैं, तो बड़े शस्त्र कितने भंयकर होंगे, हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
जब इतने भंयकर शस्त्रों का निर्माण हो चुका और दिन-प्रतिदिन उनकी भंयकरता मंे वृद्धि होती जा रही है, तब मानव का चिंतित हो उठना नितान्त स्वाभाविक है। आज विश्व की समस्या युद्ध और शांति है। युद्ध शस्त्रों से ही लड़े जाएंगे और इन भयानक शस्त्रों का प्रयोग प्राणिजगत को रसातल में पहुंचा देगा। अतः विचारकों और शांतिप्रिय विश्व नेताओं का मत है कि मानवता की रक्षा के लिए अस्त्रों का विनाश आवश्यक है। निरस्त्रीकरण ही इस अशांति का एकमात्र उपाय है। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका देखकर प्रत्येक राष्ट्र चिंतित हो उठा और शांति-स्थापना के लिए सभी ने सामूहिक प्रयास आरम्भ किए। 1945 में निरस्त्रीकरण का प्रश्न बड़े-बड़े राष्ट्रों द्वारा उठाया गया। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने युद्धों की विभीषिका को रोकने के लिए ’संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की। सन् 1946 में आणविक शस्त्रों पर नियंत्रण रखने के लिए अणुशक्ति आयोग का गठन किया गया और 1947 में सशस्त्र सेनाओं और हथियारों को घटाने के लिए परम्परागत शस्त्रास्त्र आयोग बनाया गया। 11 जनवरी 1952 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निरस्त्रीकरण आयोग की स्थापना की। इसके कर्तव्य निम्नलिखित थे-
सभी सशस्त्र सेनाओं और इस प्रकार के हथियारों के नियमन, उसकी सीमा और उसे संतुलित करना।
जनसंहार के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले सभी बड़े अस्त्रों को नष्ट करना।
अणुशक्ति का प्रभावकारी, अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण करने के लिए ऐसे प्रस्ताव तैयार करना।
निरस्त्रीकरण को लागू करने, राज्यों के सैनिक बजटों के स्थिरीकरण करने, परमाणविक अस्त्रों के प्रयोग की समाप्ति की घोषणा करने, युद्ध प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने, समाजवादी और पूंजीवादी देशों के बीच अनाक्रमण संधि सम्पन्न करने, दूसरे देशों के प्रदेशों से फौजों को हटाने, परमाणविक अस्त्रों के और भी अधिक प्रसार करने के विरूद्ध कदम उठाने, आकस्मिक आक्रमण को समाप्त करने के लिए कार्यवाहियां करने सम्बन्धी उपायों को क्रियान्वित करने की नितांत आवश्यकता है। जब तक ईमानदारी एवं सद्भावना से बड़े राष्ट्र निःशस्त्रीकरण का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इसमंे सफलता की आशा नहीं की जा सकती। पश्चिमी शक्तियों ने दोरंगी चाल अपनाई है। एक ओर वे विश्व-शांति-सम्मेलन में भाग लेकर ऊंचे आदर्श और विचार रख रहे हैं, दूसरी ओर अपने परमाणु शक्ति परीक्षण में सतत प्रयत्नशील हैं।
बहुत प्रसन्नता का विषय है कि आज संसार के अनेक देश निःशस्त्रीकरण की समस्या और उसके महत्व पर गम्भीरता से विचार करने लगे हैं। निःशस्त्रीकरण के लिए आज के बुद्धिवादी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है-सहानुभूति, करूणा, प्रेम, दया, भाईचारा तथा विश्व बन्धुत्व की जिसमें संसार मंे शांति का वातावरण उत्पन्न हो सके। राष्ट्रपति डाॅ. राधाकृष्णन के ये शब्द, जो परमाणु हथियार विरोधी सम्मेलन में भाषण देते हुए कहे थे, कितने तर्कयुक्त, सामयिक एवं गम्भीरतापूर्ण हैं-
अतः निःशस्त्रीकरण आज की मांग है और आवश्यकता इस बात की सबसे अधिक है कि उचित निदान द्वारा विश्वजनित मतभेदों को भुलाकर अशान्ति का माहौल खत्म किया जाए। अतः निःशस्त्रीकरण वरणीय, ग्रहणीय, सराहनीय एवं श्लाघनीय है।
शरीर का स्वस्थ रहना जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। रोगाी व्यक्ति का जीवन स्वस्थ आचार-विचार के अभाव में बोझ बनकर नष्ट हो जाता है। जिस देश के नागरिक स्वस्थ नहीं होते वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता । यही कारण है कि प्रत्येक राष्ट्र अपने नागारिकों के पोषाहार के स्तर को अच्छे से अच्छा बनाए रखने की चेष्टा करता है। पोषाहार का सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि पोषाहार पर किसी भी राष्ट्र की सपन्नता, सुरक्षा और प्रगाति निर्भर करती है। कुपोषण का बुरा प्रभाव न केवल शारिरिक स्वास्थ्य को नष्ट करता है, बल्कि वह मानसिक और बौद्धिक क्षमता को भी नष्ट करता है।, जिससे राष्ट्र की उत्पादन शक्ति घट जाती है, राष्ट्र पतन की और बढ़ने लगता है! पोषाहार व्यक्ति के शरीर को सुडौल, सुन्दर तथा प्रभावशाली बनाता है। सुन्दर व्यक्तित्व रखने वालों को सदैव सफलता मिलती है। अपरिचित लोग भी ऐसे व्यक्ति के सहायक तथा हितैषी बन जाते हैं।
गरीबी और अज्ञानवश लोग कुपोषण के चंगुल में फंस जाते हैंै। इसलिए गरीबी दूर के साथ-साथ उन्हें पोषाहार की उचित शिक्षा भी दी जानी चाहिए। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गरीबी ही कुपोषण का कारण है। साधारण आय वाला व्यक्ति भी खान-पान के सम्बन्ध में सूझ-बूझ से काम लेकर उचित पोषाहार प्राप्त कर सकता है। भारत सरकार की और से ऐसे कई केन्द्र और कई इकाइयां स्थापित की गई हैं जो गांवों में साधारण तौर से पाई जाने वाली खाद्य-वस्तुओं के सही उपयोग की शिक्षा दे रही हैं। सरकारी प्रशिक्षण केन्द्र गांव वालों को यह शिक्षा देते हैं कि जो मौसमी फल,सब्जियां गांव में मिलती हैं उनका संरक्षण किस प्रकार किया जाए ताकि दूसरे मौसमों में भी उन्हें वे फल और सब्जियां मिलती रहें। शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्येक्रम बड़े व्यापक रूप से व्याख्यान, परिचर्चा, फिल्म, प्रदर्शनी आदि की सहायता से चलाया जाता है। इतना ही नहीं, भोजन में क्या लेना चाहिए, कितना देना चाहिए तथा भोजन पकाने में कोैन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए आदि बातों से भी लोगों को परिचित कराया जा रहा है। वे यह भी सीखते हैं कि भोजन का संरक्षण किस प्रकार किया जाए और दूषित भोजन से कैसे बचा जाए। ऐसे प्रशिक्षित लोग इस तथ्य को अच्छी तरह समझ लेते हैं कि गरिष्ठ, सुस्वादु और महंगा भोजन स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार हानिकारक होता है।
स्रकार के खाद्य-विभाग ने गरीब परिवारों के लोगों के लिए सस्ते खाद्य-पदार्थ बनाने की योजनाएं बनाई हैं और उन्हें शुरू कर दिया हैं। ऐसा एक पदार्थ है-‘मिल्टन‘। यह दूध जैसा एक पेय पदार्थ है। आज हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख लीटर ‘मिल्टन‘ तैयार किया जाता है। इसी तरह दूध में विटामिन ‘ए‘ और नमक में लौह तथा आयोडीन तत्व मिलाकर उन्हें अधिक पोषक बनाया जा सकता है। राजस्थान और तमिलनाडु में ऐसी योजनाएं अपनाई जा रही हैं, जिनके द्वारा नमक में लौह तत्व मिलाकर उसे विशेष गुणकारी बनाया जा रहा है। कृषि-वैज्ञानिक निरन्तर नये-नये किस्म के अनाज, फल और सब्जियों उगाने के उपायों की खोज में लगे हुए हैं, ताकि भारत जैसे गरीबों की विशाल जनसंख्या वाला देश सस्ते पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन अधिक से अधिक मात्रा में कर सके।
भारत मुख्यतः गांवों का देश है जहां तीन-चैथाई आबादी गांवों में ही रहती है। गांवों की जनता का दो-तिहाई भाग गरीब है और बीस प्रतिशत भाग तो गरीबी रेखा के बीच है। अतः कुपोषण इस देश की महŸवपूर्ण समस्या है। भारत सरकार का खाद्य विभाग कुपोषण से देश की रक्षा के लिए अनेक कार्यक्रमों को क्रमशः लागू कर रहा है। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में चार प्रयोगशालाएं फलों और सब्जियों के क्षेत्र में उनके विभिन्न गुणों तथा घरेलू उपभोग के सम्बन्ध में निरन्तर अनुसंधान कार्य कर रही हैं। इसी तरह प्रत्येक खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों और उनकी मात्रा की खोज की जा रही है। अत्यधिक पिछड़े क्षेत्रों में और आदिवासी इलाकों में विशेष तथा पूरक पोषाहार और दिन में भोजन देने के कार्यक्रम भी धीरे-धीरे लागू किए जा रहे हैं। इसमें सरकार के साथ-साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी भाग ले रही हैं। अतः भारत में लोग पोषाहार के महŸव को समझने लगे हैं तथा उनमें जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है।
Say good bye to hugs, high fives and touching in school. (Reminder: a wave or text will suffice as a parting exchange unless you want detention).
Schools, like the Portland middle school noted in this ABC News video, are banning hugs and other physical contact because it is interfering with students’ educational experience.
There is only so much a teacher can do with their few hours of instructional time each week. More than ever, we need to encourage students to learn outside the classroom.
Luckily, learning opportunities are everywhere, especially in science! read more
K-2: My Super Powers3-5: Your Super Identity
If you were a superhero, what would you want your name to be? Explain why that name would be a perfect fit for you and your super powers. What would you wear? Choose your superhero name and draw a picture of you in your superhero outfit.
To tide myself and the rest of you fans over until the final film is released, here are some Harry Potter themed lesson ideas.
Here grade-specific samples of this week’s video writing prompts based on a clip from Charlie Brown Thanksgiving.
3-5: Food Frenzy
Food is a big part of Thanksgiving. While traditional Thanksgiving feasts include turkey, stuffing and pumpkin pie, the holiday could use some new and exciting additions to the menu. Snoopy tries some creative options for his Thanksgiving dinner. Now it’s your turn.
Create a new dish that you think would commemorate the holiday. Describe what it is made of and why you think Thanksgiving would be better with your dish on the table.
We try to thank our members every week with our Teacher Spotlight feature. This week’s spotlight teacher is Scott Bolden. Check him out!
Mr. Scott Bolden
Eagleville School
Eagleville, Tennessee
How did you know you wanted to be a teacher?
It started when I was in the first grade. My parents tell me that I came home from school during just the second week of first grade and told them I wanted to be a first grade teacher just like Miss Peggy. I always wanted to help students learn to read and find a love for learning just like she had done for myself and so many other lives she touched. I actually got to fulfill that dream. I am know teaching first grade at Eagleville School where Miss Peggy taught me.
As teachers, we are always in a race to cover required content, but is winning that race really teaching our students the skills they need?
Many educators might face the dilemma of skills vs. content when it comes to classroom curriculum. With strict state standards in place and limited class time, we are forced to choose between spending more time teaching a wide variety of content, or focusing on hands-on activities that teach skill.
As teachers, we often spend countless hours grading papers and writing comments in margins, only to have our students look at the grade and then toss the paper in the wastebasket.
While we must evaluate our students’ work, we also need to develop opportunities for our students to think about their work and use our corrective feedback to develop next steps for meeting the learning targets we have set. read more
On the 12th day of Christmas, TeachHUB gave to me….Join us on the TeachHUB facebook page as we count down the 12 school days before the holiday break with a daily giveaway to win a chalkboard mug.
Teachers find themselves with five or even ten vacant minutes at the end of class, and they ask themselves, “What now?” While some may opt to allow students additional “study time” or “early homework time,” such a plan usually goes awry, and students begin chattering, antagonizing one another, and generally become disruptive in the absence of an actual purpose.
A better answer to the “dead time” issue comes in the form of Exit Slips:
Congratulations teachers, we made it! First marking period grades are in and we are closing in on the first semester. However, as it always happens, there were a few teachers who have more than half of their students failing.
To keep teachers reflecting on how well each lesson is delivered, we’re trying to implement a new policy of authentically assessing students for any lesson objective we write.
With only a few short weeks before break, it’s tempting to let school run on autopilot until party time. This valuable learning time doesn’t have to go to waste or feel like a punishment.
To make these days count instead of countdown, here are a few tips and tricks to keep the energy and learning alive while having some pre-holiday fun.
1. It’s pretty (esp. through the window while you’re warm and cozy next to a fire drinking cocoa).
2. Snowball fights and snowman building
3. Shoveling is great cardio.
4. Snow days!!!!
5. And, finally, seasonally sensational learning opportunities.
Educational technology is changing the way we teach and the objectives of classroom assignments. Online resources continue to emerge that offer new and exciting ways to teach and bring about new teaching standards. Online sharing is one way to meet collaboration standards and objectives for 21st Century learning.
It is important for all students to see the power of online collaboration and to learn the rules about collaborating with others.
With so many lightning-fast connections at our doorstep, we find ourselves within reach of some of the most powerful learning resources that have ever existed on Earth. The quantity of choices intimidates many. However, the beauty of having so many choices, the beauty of digital media itself is its inherent flexibility and potential to serve all learners.
Why should we not make it a priority to improve our own flexibility as educators and learners at every available opportunity?
As December rolls by, the holiday hype has most likely invaded your classroom. The energy of your students is on the rise as they shift focus from their science homework to their holiday break plans.
Why not capitalize on your students’ holiday spirit with these Christmas and winter holiday activities!
Don’t forget to check the TeachHUB page on facebook to win a fun chalkboard mug. We’re giving one away every day until Christmas break.
Entering is super easy. All you have to do to win today is “like” our 12 Days of Teaching Classroom Carol.
As educators, we spend countless hours in professional development studying methods for improving teen literacy and planning ways to integrate literacy into our daily lessons.
Choosing the right books to read with or to your students can be tricky. I’ve found several nonfiction books that provide meaningful science lessons and engage adolescent minds equally well.
Since 1776 the United States has grown from a nation of relatively few religious differences to one of countless religious groups. This expanding pluralism challenges the public schools to deal creatively and sensitively with students professing many religions and none.
The following questions and answers concern religious holidays and public education, a subject often marked by confusion and conflict. Teachers and school officials, as well as parents and students, should approach this discussion as an opportunity to work cooperatively for the sake of good education rather than at cross purposes.
K-2: Transform Your House6-8: Modernize Traditions for the 21st Century
This is a technologically-advanced approach to a ribbon cutting ceremony for a new store. Think of other traditional ceremonies, like receiving a diploma at graduation, 4th of July fireworks celebrations, passing the Olympic torch, awarding statues at the Oscars or even a wedding. In at least two paragraphs, describe an updated version of the ceremony using technology to add some pizazz.
ओ पापी मानव! क्यों पाप किए जाता है?अपनी ही माँ को तू निर्वस्त्र किए जाता है।पेड़ काट कर तू धरती की लाज मिटाता जाता है।जिस आँचल ने तुझको पाला, उसे फाड़ता जाता है।
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